पिछले माह शादी को २५ साल हो गए है| वक़्त कैसे गुज़र जाता है ,पता ही नहीं लगता | इस घर में बहू बन कर आना ,ये घर संभालना ,बच्चोंं के पहले जन्मदिन से लेकर उनके कॉलेज जाने तक का सफर , सब देखा है इस घर ने |

अपने घर में सबसे छोटी और लाड़ली बेटी थी मैं| कॉलेज पूरा हुआ तो बाउजी ने लड़के देखने शुरू किये | एक दो जगह बात करने के बाद इनका रिश्ता मिला | बात इतनी जल्दी पक्की हो गयी के कुछ समझने से पहले ही शादी की तारीख भी तय कर ली गयी | पहले ज्यादा बात -चीत का रिवाज़ तो होता नहीं था |

बचपन से ही मुझे शाम को माँ के साथ बैठ कर चाय की प्याली पीने का बड़ा शौक था | शाम को बैठ कर हम दोनों माँ बेटी अपने पूरे दिन की कहानी एक दूसरे को सुनाते| ये हुआ ,ये नहीं हुआ | सारी ख़ुशी ,परेशानी ,और उपाय उसी वक़्त निकलते थे | दिन का सबसे अच्छा वक़्त था वो |

धीरे धीरे शादी का वक़्त पास आया और मैं शादी करके ससुराल आ गयी | पति बहार जॉब करते थे ,तो ससुराल में रहने का ज्यादा मौका न मिला | सामान पैक करके हम कलकत्ता शहर आ गए | नया शहर और नया रिश्ता |

पति की आदतें मैं जानती नहीं थी , बस ये जरूर समझ आ या के वो शाम की चाय नहीं पीते थे | दिन गुज़रने लगे , वो ऑफिस चले जाते मैं घर के काम करके कोई किताब पढ़ने में लग जाती | शाम को आकर वो अखबार में डूबे रहते और मैं टीवी या किताबोंं में | किसी की ज़िंदगी में क्या चल रहा है , ये दोनों न जानते थे |

कैसा रहा दिन ? , अच्छा था ,ठीक था | बस इन्ही जवाबोंं से समझना पड़ता था की कैसा चल रहा सब | एक ही घर में रहते रहते पता ही नई चला कब हम दोनों एक दूसरे से कटे कटे से रहने लगे |

मैंने छुट्टियों में माँ के घर जाने की इच्छा रखी | उन्होंने कहा क्यों नहीं जाओ |

इतने दिनों बाद माँ के पास आकर ज़नत सा सुख महसूस हुआ | वही शाम की चाय और बातें | "कितना मिस कर रही थी मैं ये चाय ", मैंने माँ को कहा | माँ ने भी हँस कर कहा ," अरे पगली,चाय भी कोई याद करने की चीज है | मैंने मुस्कुरा कर कहा ," माँ , तुम नहीं समझोगी |

धीरे धीरे छुटियाँ खत्म हुई तो वो मुझे लेने आये |एक दो दिन रुके मेरे घर | बिच में कोई चिट्टी नहीं आयी उनकी | मैंने भी मान लिया उनको ,उस घर में मेरे होने न होने का कोई फर्क ही नहीं पड़ता | शादी के ६ महीने का बाद भी इतना अलगाव |

वो लेने आये और में रुआंसे गले से माँ बाउजी को विदा बोलकर रेल में बैठ गयी | घर बिखरा हुआ था | संडे था ,उनकी छुट्टी थी | कोई बात नहीं हुए हमारी बस हाँ , ना | मैंने मान लिया था शायद अब ऐसा ही लाइफ निकालनी पड़ेगी | चुप चुप सी |

शाम को काम करके में बालकनी में बैठी ही थी आंखें मीचे | वो हाथ में चाय की ट्रे लेकर आये और बोले ," पता है तुम्हारे बिना घर किता सूना हो गया था | मन ही नहीं लगता था |तुम्हे बड़ा याद किया मैंने और तुमने ??? और तुमने बताया नहीं की शाम को चाय पीती हो तुम ? "

मैं हक्की बक्की उनको एक टक देखती रही | आँखों से आंसू को बड़ी मुश्किल से रोका मैंने |एक प्याली मेरे हाथ मैं देते हुए बोले ," ऑफिस में क्या हुआ ये तो सुनो , शर्मा जी है ना ............

वो बोल रहे थे और मैं उनको देख रही थी | आँखों को बिना बताए आंसू चुपके से निकल पड़े | उन्होंने पूछा अरे क्या हुआ , घर की याद आ रही है क्या या चाय में कोई कमी है ?? मैंने कहा ," नहीं नहीं , बोलें ना क्या बोल रहे थे | शाम की चाय और वो बातें २५ साल बाद भी चल रही है |

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