गहराते स्मृति-दंश

कमलानाथ

बीच में ये मेरे दोस्त के चाचाजी थे। यानी हैं। और उनके साथ ही हँसती हुई ये मेरे दोस्त की चाचीजी हैं। यानी थीं। सबसे बाईं तरफ़ ये मैं हूँ, मोटी सी जैकेट पहने हुए जो यहाँ आते ही मुझे ख़रीदनी पड़ी थी और दूसरी सबसे दाहिनी ओर मेरा दोस्त अश्विन है। दरअसल इनसे मुलाक़ात से पहले तक ये दोनों मेरे दोस्त के भी चाचाजी चाचीजी थे ही नहीं। दो साल बाद बने थे, जब उसकी सगाई तय हुई। फिर वे सचमुच हमेशा के लिए हम दोनों के ही हो गए।

जब मैं अमरीका आया था, उसी ‘कंपनी’ में अश्विन से मेरी मुलाक़ात और फिर दोस्ती हुई थी। तब हम एक ही ऐसी नाव में सवार थे जिसमें पतवार थी ही नहीं। हवा उसे जहाँ लेजाती वह उसी तरफ़ मुड़ कर बहने लगती थी। हम लोग अमरीका आ तो गए थे, पर आने के बाद हमें पता चला अभी हमारी कोई नौकरी थी ही नहीं। जिसे हम ‘कंपनी’ समझ कर आये थे वो कोई एजेंट था जो हमें यहाँ सैन फ्रांसिस्को ले तो आया था, पर यहीं से ‘बैंच’ पर रख कर हमें अलग अलग कंपनियों के इंटरव्यू दिलवा रहा था। जहां वो बताता, हम अपनी डिग्रियों की कॉपी लेकर चल देते। इंजीनियरिंग पास करने के बाद जब भारत में ही हमारी मुलाक़ात इस एजेंट से हुई, उसने अमरीका को लेकर कई तरह के सब्ज़ बाग़ हमें दिखाए थे। हमारे पासपोर्ट और डिग्रियां उसने ही अपने कब्ज़े में ले ली थीं।

मैं यहाँ ‘हम’ कह रहा हूँ, इसलिए कि ठीक इसी तरह अश्विन के साथ भी हुआ था। यहाँ आने के दो महीने के बाद ही हम दोनों की नौकरियां अलग अलग कंपनियों में लगीं, हालाँकि मुझे लगता था अश्विन की मुझसे कहीं पहले लग जानी चाहिए थी। मुझे हमेशा लगता था अश्विन मुझसे कहीं ज़्यादा होशियार था। वह था भी। उसने किसी और कॉलेज से डिग्री ली थी। खैर, यह सब कहना खास ज़रूरी नहीं है। इन दो महीनों में जब हम ‘बैंच’ पर थे, साथ साथ ही सैन फ्रांसिस्को में घूमते फिरते थे, पिछले इंटरव्युओं में पूछे गए प्रश्नों के सही जवाब जानने के लिए लायब्रेरियों में जाते थे, सस्ते भारतीय रेस्टोरेंट ढूँढा करते थे, और कभी कभी कोई मूवी भी देख लेते थे। पतली हालत में होने के कारण ज़ाहिर था एक दूसरे का हमसे कुछ नहीं छुपा था, पर इसका अंजाम ये हुआ कि हमारी दोस्ती पक्की हो गयी। और सबसे अच्छी बात ये कि ये दोनों कम्पनियाँ भी जिनमें बाद में हमारी नौकरी लगी, सैन फ्रांसिस्को शहर में ही थीं। तब हमने एक छोटा सा अपार्टमेंट किराये पर ले लिया था और कहीं से खाना बनाने के बर्तनों का जुगाड़ भी कर लिया था, हालाँकि हममें से किसी को खाना बनाना नहीं आता था। बस यूं ही काम चल रहा था।

दो साल से अश्विन की सगाई रुकी हुई थी, जिसके लिए उसे भारत जाना था। लेकिन जिस प्रॉजेक्ट पर वह काम कर रहा था, उस समय उसमें से निकल पाना बेहद मुश्किल था और शायद तब तक, जब तक कि वह प्रॉजेक्ट कमीशन नहीं होजाता। ऐसी हालत में निश्चय यह हुआ कि अश्विन की सगाई उसकी होने वाली बीवी से ‘इन एब्सेंशिया’ अमरीका में ही हो जाय और उसकी होने वाली बीवी की उसी तरह भारत में। एक दूसरे की अनुपस्थिति की ऐसी सगाई पर कुछ अजीब सा तो लग रहा था लेकिन इसमें किसी को किसी तरह का कोई एतराज नहीं था। मैंने अश्विन से तो नहीं कहा पर मुझे लग रहा था उसको लेकर उसकी बीवी के घर वाले थोड़े ‘इनसिक्योर’ से हो रहे थे कि कहीं वह अमरीका में ही किसी से शादी न कर बैठे! उसकी होने वाली बीवी के चाचाजी यहाँ कैलिफ़ॉर्निया में ही बर्कले में रहते थे। लिहाज़ा उन्हीं के घर पर सगाई की रस्म अदा हुई। इसी सिलसिले में पहली बार हमारी मुलाक़ात उनसे वहीँ हुई थी, जब सगाई के पहले वे लोग अश्विन से मिलना चाहते थे। मैं अश्विन के साथ ही उनके यहाँ गया था।

चाचीजी ने तब जितने व्यंजन बना रखे थे उन्हें देख कर मेरे और अश्विन के मन में जो गणित का पहला सवाल आया वो ये था कि अगर यह सब खाना हमें घर लेजाने को मिल जाय तो उसके बल पर हम दो व्यक्तियों के प्रति दिन दो वक़्त के हिसाब से कितने दिन निकल सकते हैं? और अगर उसमें से प्रतिदिन केवल दो व्यंजन ही खाए जाएँ तो कितने ज़्यादा दिन और बढ़ सकते हैं? सचमुच तब हम अच्छे भारतीय खाने के लिए तरस गए थे और उस दिन खाने पर टूट ही पड़े थे। हमें याद नहीं इतना बढ़िया खाना हमने उससे पहले कब खाया था। तब चाचीजी शायद हमारी मानसिकता को बेहतर समझ सकी थीं और लौटते वक़्त उन्होंने बहुत सारा खाना हमारे साथ बाँध भी दिया था, जिसे नकली ना-नुकुर के बाद हम ले आये थे और रास्ते भर बेहद खुश हो रहे थे। ऐसा लग रहा था अश्विन को बीवी मिलने से ज़्यादा खुशी खाना मिलने और शायद भविष्य में भी मिलते रहने की सम्भावना से हो रही थी। सगाई के पहले तक और उसके बाद भी फिर हमारा वहाँ आना जाना काफ़ी होने लगा था। वे बड़े आग्रह के साथ हमें फिर जल्दी ही आने का निमंत्रण देते थे और हम लगभग सभी सप्ताहांतों पर पहुँच भी जाते थे। हम उनसे काफ़ी घुल मिल से गए थे। तब तक हालाँकि अश्विन की शादी भी नहीं हुई थी लेकिन उसकी होने वाली बीवी के साथ साथ वे हमारे भी चाचा चाची हो चुके थे। उनकी एक बेटी थी मोनिका, जिसने हाईस्कूल पास करके कॉलेज में एडमिशन लिया था। वे अपनी इकलौती बेटी से बेहद प्यार करते थे वो इस बात से ज़ाहिर होता था कि घर भर में हर जगह उसके बचपन से लेकर अब तक की उसी की फ़ोटुएं लगी हुई थीं।

बात सिर्फ़ खाने की ही नहीं है। तब हमने जाना, व्यक्तियों के तौर पर भी चाचाजी चाचीजी कितने अच्छे थे। वे एक दूसरे को बेहद प्यार करते थे। चाचाजी अक्सर अपने पुराने एल्बम दिखाते थे जब शादी के छः महीने बाद बाद वे यूरोप घूमने गए थे। वे एक दूसरे की ‘अजीब’ हरकतों का वर्णन भी बड़े मज़ेदार तरीके से करते थे। उन्होंने एक दूसरे को जाना भी शादी के बाद ही। उनकी शादी कुछ इस तरह हुई थी कि उससे पहले वे मिले भी नहीं थे, सिर्फ़ उन्होंने एक दूसरे की फ़ोटो देख कर ही रज़ामंदी दे दी थी। तब चाचाजी अमरीका में आगये थे और चाचीजी भारत में ही थीं। वे भी किसी प्रॉजेक्ट में फंसे हुए थे और केवल शादी के वक़्त ही किसी तरह भारत पहुँच पाए थे। फिर शादी के करीब छः महीने बाद ही उन्हें छुट्टियाँ मिल पाई थीं जब वे यूरोप गए थे। वे बताते थे उनका हनीमून तो वास्तव में यूरोप में ही हुआ था। फ़ोटो दिखाते हुए चाचाजी कहते थे – “देखो नितिन ये फ़ोटो हमारी तब की है जब हम यूरोप में ...” और वाक्य पूरा होने से पहले ही चाचीजी कुछ शर्माती हुई सी चाय या ठंडा लाने का नाम लेकर वहाँ से खिसक लेती थीं और चाचाजी हँसने लगते थे।

इस मायने में अश्विन की सगाई भी कुछ इसी तरह की ही थी कि उसकी होने वाली बीवी विनीता भी साथ नहीं थी और उनकी सगाई एक दूसरे के साथ, लेकिन एक दूसरे की अनुपस्थिति में दो महाद्वीपों में अलग अलग जगह हो रही थी। तब हम चाचाजी चाचीजी से मज़ाक करते थे कि अगर अश्विन को छुट्टी नहीं मिल पाए तो क्या उसकी शादी भी इसी तरह यहाँ हो सकती है और उसकी बीवी की वहाँ भारत में? बाद में वे लोग यहाँ अमरीका में ही मिल लेंगे। इस बात पर हम सब लोग खूब हंसा करते थे। चाचीजी विनीता की एक पुरानी फ़ोटो दिखाती थीं जिसके साथ उस स्थिति में अश्विन यहाँ शादी कर सकता था। बाद में वो फ़ोटो अश्विन सचमुच मांग लाया था। शादी करने के लिए नहीं, वैसे ही देखते रहने के लिए।

शादी के बाद अश्विन ने सैन फ्रांसिस्को में ही एक दूसरा फ़्लैट किराये पर ले लिया था और करीब एक साल बाद उसने कोई दूसरी कंपनी जॉइन करली थी और विनीता के साथ इस शहर से दूर चला गया था। मैं वहीँ था और तब भी चाचाजी के यहाँ अकसर जाता रहता था। कभी सोचा ही नहीं था कि अश्विन की वजह से ही उनसे जान पहचान हुई थी, पर अब मैं भी शायद उनके परिवार का उतना ही अहम हिस्सा होगया था जितनी विनीता या जितना अश्विन खुद। चाचीजी इतनी उत्साही थीं कि लगभग हर वीक एंड या लंबे वीक एंड पर कहीं बाहर जाने का कार्यक्रम बना लेती थीं। तब वे हमेशा चाहती थीं कि अश्विन के साथ मैं भी उसमें शामिल होऊं। और ज़्यादातर मैं होता था। ऐसी ही एक लंबी ड्राइव पर हम गए थे जहाँ यह फ़ोटो अपने कैमरे से हमने एक सैलानी से खिंचवाई थी। उन दिनों में ही मैं उन लोगों को और अच्छी तरह जान और समझ पाया था। चाचाजी को शायद डायबीटीज़ की शिकायत थी। मुझे लगा वे कितने निर्भर थे चाचीजी पर। वे ही उनकी सेहत का ध्यान रखती थीं, क्या खाना है, कब क्या नहीं खाना, वगैरह, सभी के लिए। चाचाजी भी बेहद खयाल रखते थे चाचीजी का। उनकी ज़रा भी तबियत ख़राब होती थी तो उनके लाख मना करने पर भी या तो वे घर से काम करते थे या दफ़्तर से छुट्टी ही ले लेते थे। उनको ज़रा भी घर का काम नहीं करने देते थे, यहाँ तक कि खुद ही कई बार खाना बनाने की ज़िद करते थे। चाचीजी ने ही बड़े प्यारे उलाहने भरे शब्दों में एक बार यह सब बताया था।

चाचीजी हर साल क्रिसमस या नए साल पर अपने ही घर पर कोई न कोई आयोजन रखती थीं जिसमें वे अपने कुछ पड़ौसियों और परिचितों को बुलाती थीं। उनका घर काफ़ी बड़ा था और पिछवाड़े में दूर दूर तक का हरा मैदान भी उन्हीं का था, जिसमें उन्होंने एक झूला लगा रखा था और कुछ फूलों की क्यारियां। इन लोगों के साथ उनका इतना ज़्यादा प्रेम था कि उनके इन्वाइट पर सभी आते थे और अच्छा ख़ासा मजमा लग जाता था। तब वे दिन भर खाना बनाने में व्यस्त रहती थीं और चाचाजी उनकी मदद करने में। आम दिनों में भी जब कभी मैं उन लोगों से मिलने जाता था, चाचाजी हमेशा वहीँ उनके साथ काम करते मिलते थे। मज़ाक में कहा भी करते थे कि काम तो बस बहाना है, असली बात तो चाचीजी को देखते रहना होता है। तब चाचीजी लड़कियों की तरह शर्मा जाती थीं और उन्हें मेरे सामने बेशर्मों की तरह बात करने से बाज़ आने की हिदायत देती थीं। वे अकसर बताते थे जब वे अमरीका आये थे तब उनका कोई दोस्त या रिश्तेदार यहाँ नहीं था, और अब भी नहीं है, सिवाय चाचीजी के और अब विनीता के। कभी कभी वे अपनी और चाचीजी की कोई फ़ोटो दिखा कर मुझसे पूछते थे कि क्या उसमें उन दोनों की शक्लें मिलती जुलती दिखाई दे रही हैं? फिर बताते थे कि अगर दो व्यक्ति, ख़ासकर पति-पत्नी, लंबे अर्से तक साथ साथ रहें और उनमें बेहद प्यार हो, तो उनकी शक्लें भी बाद में काफ़ी हद तक मिलने लग जाती हैं। तब फ़ोटो में मुझे अगर नहीं भी मिलती हुई दिखाई पड़ती हों, पर उनको सामने से देखने में ज़रूर लगने लगता था कि सचमुच वे मिलते जुलते से दिखते थे। मुझको तो इसलिए भी कि मैं जानता था वे एक दूसरे को कितना प्यार करते थे।

उनकी बिटिया मोनिका ने जब अपना कॉलेज पूरा किया तो वो भी किसी ट्रेनिंग के सिलसिले में दूसरे शहर में चली गयी थी। तब चाचीजी को काफ़ी अकेलापन महसूस होने लग गया था। चाचाजी उनके उस अकेलेपन को दूर करने के लिए दफ़्तर से दस बार टेलीफ़ोन पर उनसे बात करते थे, उनकी तबियत के बारे में पूछते थे, और घर में क्या क्या किया या खाना खाया कि नहीं ये सब जानना चाहते थे। एक दूसरे पर उनकी निर्भरता और ज़्यादा बढ़ गयी थी। लगता था जैसे बिटिया के चले जाने से उसके हिस्से का प्यार भी वे एक दूसरे में ही उंडेलते थे। जब कभी मैं बर्कले उनके घर जाता था तब वे मेरी ‘सहानुभूति’ के लिए उसी तरह एक दूसरे की प्यार भरी, पर नकली सी, शिकायत करते थे।

मैंने भी कुछ सालों बाद एक दूसरी कम्पनी जॉइन कर ली थी और काफ़ी दूर शिकागो शहर में आगया था। यहाँ आकर मेरी व्यस्तता बढ़ गयी थी। उन लोगों से मिलना जुलना भी बहुत कम हो गया था। बस टेलीफ़ोन पर ही कभी कभी बात होती थी। तब चाचीजी ने पिछली बात जहाँ छोड़ी होती थी उससे आगे सब बातें विस्तार से बताती थीं। विनीता और अश्विन से उनकी बात होती रहती थी, हालाँकि मेरी बात अब उनसे लंबे वक़्त के बाद ही हो पाती थी। ज़्यादातर उनका हाल चाचीजी के ज़रिये ही मिलता था। मोनिका अपना जॉब और शहर भी बदलती रहती थी और इसी उधेड़बुन के चलते उसका बर्कले आना बहुत कम होता जारहा था। चाचीजी किसी गैर-सरकारी संस्था से जुड़ गयी थीं और उनके दोपहर का समय वहीँ बीतता था। चाचाजी के लौटने तक ही वे वापस आती थीं और तब वे एक साथ चाय पीते थे। उनका अलिखित नियम था कि जो पहले घर पहुँच जाए वही चाय बना कर तैयार रखे।

मुझे जो नया प्रॉजेक्ट मिला था उसके सिलसिले मैं न केवल बहुत ज़्यादा व्यस्त होगया था बल्कि अक्सर मुझे अलग अलग शहरों में दौरा भी करना पड़ता था। नतीजा ये था कि कई बार महीनों महीनों तक चाचाजी चाचीजी से टेलीफ़ोन तक पर बात नहीं होती थी। यह वही समय था जब पिछले क़रीब सात महीनों से मैं उनको टेलीफ़ोन भी नहीं कर पाया था।

पर मुझे एक मीटिंग के लिए बर्कले आना था और मैं खुश था कि इतने लंबे समय के बाद मैं उन लोगों से मिल पाऊँगा। मुझे मालूम था चाचीजी और चाचाजी शाम क़रीब साढ़े छः बजे तक ही घर पहुँचते थे। इसीलिए मैंने सात के बाद ही वहाँ पहुँचने का प्रोग्राम बनाया। मैंने स्विस चॉकलेट का एक बड़ा गिफ़्ट पैक बनवाया था। मुझे मालूम था चाचीजी को चॉकलेट बेहद पसंद थी, हालाँकि वे चाचाजी से छुपा कर चुपचाप खाती थीं।

मैंने उनके घर पहुँच कर घंटी बजाई। कांच के अंदर से झाँकने पर अँधेरा ही दिखाई दे रहा था। बिना सूचना दिए आने का यही नुकसान था। मैं अपने आपको ही दोष दे रहा था कि ‘सरप्राइज़’ देने के चक्कर में मुझे ‘शॉक’ मिल गया। मैं लौटने ही वाला था कि काफ़ी देर बाद अंदर से एक लाइट जली। अंदर चाचाजी दिखाई दिए जो जल्दी जल्दी चल कर आने की कोशिश कर रहे थे। उन्होंने दरवाज़ा खोला और आश्चर्य मिश्रित आत्मीयता से मुझसे गले मिले। अंदर आकर उन्होंने दो तीन और लाइटें जलाईं तब घर में थोड़ी सी रौशनी हुई।

चाचाजी की दाढ़ी बढ़ी हुई थी और वे धुले हुए, पर बिना इस्त्री के सलवटों वाले कपड़े पहने हुए थे। उनके बाल भी बेतरतीब थे, जैसे नहाने के बाद कंघी ही नहीं की हो। ऐसा मैंने उन्हें पहली बार देखा था। दूर अंदर की बैठक में सिर्फ़ एक टेबल लैम्प जला हुआ था। संगीत की मद्धम सी आवाज़ भी आ रही थी। शायद चाचाजी वहीँ बैठे होंगे। मेरी निगाहें चाचीजी को ढूँढ़ रही थीं। वे शायद ऊपर बैडरूम में होंगी। मैंने सोफ़े पर बैठते ही उनका हालचाल जानने के लिए हमेशा की तरह औपचारिक शब्द दोहराए। पर अचानक चाचाजी की आँखें छलछला उठीं और फिर वे फफक फफक कर रोने लगे। मैं भी किसी अनहोनी की आशंका से काँप गया।

काफ़ी देर बाद जब चाचाजी कुछ संयत से हुए उन्होंने बताया कि चार महीने पहले अचानक ही चाचीजी हार्टअटैक से चल बसीं। कोई बड़ा अटैक था, हालाँकि इस तरह की पहले कभी कोई शिकायत नहीं हुई थी। वे रोज़ की तरह चाय पर चाचाजी का इंतज़ार कर रही थीं। जब चाचाजी दफ़्तर से लौटे, वे वहीँ कुर्सी पर लुढ़की हुई थीं और जो किताब वे पढ़ रही थीं, ज़मीन पर गिरी हुई थी।

मैं खुद यह सब सुन कर अपने आप पर नियंत्रण खोता जारहा था। पर मुझे मालूम था उस वक़्त किसी भी तरह मुझे सिर्फ़ चाचाजी को सांत्वना देनी थी जो मेरे लिए तब तक का सबसे मुश्किल काम था। मेरी आवाज़ भी भरभरा रही थी और मैं सिर्फ़ चाचाजी के पास खड़ा होकर उनके कंधे पर हाथ फिरा रहा था। मुझे नहीं मालूम उस समय मेरे मुंह से क्या शब्द निकल रहे थे। चाचाजी, जिनका समूचा अस्तित्व ही जैसे चाचीजी से था, पूरी तरह एक टूटे व्यक्ति से नज़र आरहे थे जिसे अपने बारे में कोई होश नहीं था। मुझे डाइनिंग टेबल और किचन देखने पर नहीं लग रहा था कि उन्होंने दफ़्तर से लौटने के बाद चाय भी पी होगी।

काफ़ी देर बाद वे मुझे अंदर वाली बैठक में ले गये। कोई हिन्दी फ़िल्मी गाना बज रहा था – “फिर वही शाम, वही ग़म.... ।” टेबल लैम्प के पास एक एल्बम खुला हुआ पड़ा था। शायद वे इसी में खोये हुए थे और उन्होंने घंटी की आवाज़ भी तब नहीं सुनी थी।

एल्बम का एक पन्ना पलटते हुए अचानक उनकी आँखों में एक क्षण के लिए चमक आई और उनके मुँह से पहले की तरह निकल पड़ा – “देखो नितिन, ये जिनेवा की फ़ोटो हमारी तब की है जब हम यूरोप में....” और वे फिर से फफक पड़े।

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