आशीर्वाद

माँ मिज़ाज से बहुत मासूम थी। सुबह सवेरे उठकर भजन कीर्तन करती थी, फिर नाश्ता करके कुछ देर सो जाती, दिन निकलते माँ बालों में खुश्बू वाला तेल लगा कर कंघी करती और पूरा दिन ख़ुशी के नग़मे गाते हुए हंसते मुस्कुराते गुज़ार देती,शाम को माँ बेचैनी से आशीष के आने का इंतज़ार करने लगती ।आशीष को देखकर माँ की बातें शुरू हो जाती और जैसे ख़त्म होने का नाम ही नही लेती थी। आशीष माँ को अपने हाथो से खाना खिलाता था,क्योंकि कभी माँ कपडो पर सालन गिरा लेती थी तो कभी पानी।माँ आशीष से बहुत प्यार करती थी और दुआ देती थी "एक दिन तू बहुत बड़ा आदमी बनेगा "वो प्यार से माँ को बाज़ुओं में ले लेता और कहता "और माँ हमेशा अपने बेटे के साथ रहेगी,रहेगी ना?" माँ मुस्कुरा कर उसके सर पर हाथ रख देती और ये दुआ खुदा (भगवान)के रजिस्टर में दर्ज हो जाती। माँ अपने सारे काम खुद कर लिया करती थी इस छोटे से घर का हर कोना माँ को पहचानता था ।बस एक बिस्तर लगाने का काम था जो माँ खुद नही कर पाती थी कभी चादर उलटी बिछ जाती तो कभी तकिया हाथ नही आता ,माँ अंधी जो थी। माँ का एक ये ही काम था जो आशीष की वाइफ पूजा करती थी,पूजा एक हसीन,हाइली एडुकेटेड लड़की थी जिसने कभी माँ को पसंद नही किया था।आशीष एक प्राइवेट कम्पनी मे छोटी सी जॉब पर था, वो इतना कमा लेता था कि ज़िन्दगी ठीक ठाक सी बसर हो रही थी। लेकिन वो माँ की खूब सेवा किया करता बदले में माँ उसे दुआए दिया करती थी ।
उस दिन आशीष घर आया तो माँ को सर्दी में बैठे देख कर पूछा "पूजा ! आज माँ का बिस्तर नही लगाया ?"
"घर में सिर्फ बिस्तर लगाना ही एक काम नही है, पूरा दिन बस काम काम ,ऊपर से इस घर का साइज़ देखा है, दम घुटता है मेरा इस घर से ,और इस घर के लोगों से।" वो बिस्तर उल्टा सीधा लगा कर कमरे में भाग गई आशीष ने देखा माँ आँखों में आंसू लिए मुस्कुरा रही थी।लेकिन माँ पूजा की नफरत आशीष के प्यार के सामने बहुत छोटी लगती थी फिर ये हुआ की जल्दी ही माँ की दुआएं लग गई और आशीष का प्रमोशन हो गया।कम्पनी ने उसे बड़ा सा घर दिया ,आशीष ख़ुशी से फूला नही समाता था,और बार बार माँ के बार बार गले लग जाता और माँ थी की वही रिकॉर्ड बजता रहता था " एक दिन तू बहुत बड़ा आदमी बनेगा " आशीष कहता "माँ अब बड़ा आदमी बन तो गया हूँ, और कितनी दुआए देगी ? बस तू हमेशा मेरे साथ रहना" माँ उसके सर पर हाथ रखती जिसे आशीष अक्सर पकड़ कर खुद ही अपने सर पर रख लेता था, क्योंकि माँ को कभी आवाज़ का सही अंदाज़ नही हो पाता था , सब तरफ सिर्फ अँधेरा ही अँधेरा था।सिवाए उस जगह के जहां उसका बेटा उसे दिखाई देता था उसके लिए बेटा ही तो सब कुछ था,सब कुछ यानि सब कुछ।

"तो? अब घर का साइज़ ठीक हैना?" नए घर में आकर आशीष ने एक्ससिटेड सी पूजा से पूछा।पूजा के पास अब आशीष से नाराज़ रहने की कोई वजह नही थी उसे उसके सपनो का महल मिल गया था।

ये घर पिछले घर से काफी बड़ा था,इस बड़े घर में 7 कमरे थे,लेकिन माँ थी कि उसे इतने कमरों के मुकाबले बरामदा ज़्यादा भा गया ।बरामदे के कोने में माँ का बिस्तर लग गया ।सुबह सवेरे इस घर में भी माँ के पूजा पाठ से दिन शुरू होता आशीष और पूजा के उठने तक माँ बरामदे में टहलती ,ख़ुशी के नग़मे गाती रहती।धीरे धीरे इस घर ने भी माँ को अपना लिया था यहाँ उसे जल्दी ही चलने फिरने का अंदाज़ा होने लगा था,अब घर माँ को खुद अपने रस्ते दिखाता था। उस दिन पूजा और आशीष कमरे में थे अचानक माँ कमरे में दाखिल हो गई।"माँ को तो कोई सेंस ही नही रहा आशीष ! कम से कम कमरे में आने से पहले एक बार नॉक तो कर सकती हेना। प्राइवेसी नाम की भी कोई चीज़ होती है ज़िन्दगी में।"वो चिल्लाने लगी। माँ आँखों में आंसू लिए मुस्कुराती हुई वहां से लौट आई। कुछ दिन बाद घर में पेंट शुरू हो गया ,माँ का पसन्दीदा रंग गुलाबी था जबकि पूजा का नीला। आशीष नेे पूजा को कन्विंस करने की बहुत कोशिश की लेकिन उसने एक नही सुनी " नही आशीष,इन माय हाउस आई वॉन्ट ब्लू और माँ को क्या पता चलेगा कि कोनसा कलर है दीवारो पर?ब्लू हो या पिंक कलर माँ के लिए तो सब बराबर है ना।" फिर घर की दीवारों पर नीला रंग हो गया।माँ को नीले रंग का इल्म ही नही था वो तो ख़ुशी से फूली नही समाती थी,बरामदे की चिकनी महंगी दीवारों को हाथ से छूकर देखती और पूछती"इन दीवारो पर रंग गुलाबी ही लगाया हेना?"
उस दिन माँ ने आशीष से काफी देर बात की ,लेकिन आशीष खामोश बैठा रहा।मुंह से कोई लफ्ज़ नही निकाला ,रात को ठीक से नींद नही आई।आधी रात को उठकर कमरे से बाहर आया,माँ जाग रही थी घर की चिकनी दीवारों को हाथों से छू छूकर ख़ुशी के नग़मे गा रही थी। आशीष !! माँ उसे आहट से पहचान गई थी।उसने माँ के झुर्रियों भरे हाथ अपने हाथों में थाम लिए और दिल ही दिल में माँ से माफ़ी मांगने लगा।कुछ दिन गुज़रे थे कि माँ को अचानक बुखार हो गया , 3 दिन माँ का खाना पीना,माँ को एक जगह से दूसरी जगह ले जाना सब पूजा और आशीष की ज़िम्मेदारी में आ गया था ।पूजा इस सब से आजिज़ आ गई थी उसने घर में बोलना ,काम करना सब छोड़ दिया,बस गुमसुम रहती थी,डॉक्टर ने बताया उसे कोई फिजिकल प्रॉब्लम नही ।उस दिन बड़ी मुश्किल से पूजा सिर्फ एक बात बोल पाई" माँ को कही छोड़ आओ आशीष !मेरा दम घुट ता है।"आशीष हैरान रह गया अब वो जान गया था मर्ज़ ,बीमारी उसकी प्रॉब्लम नही था, उसकी प्रॉब्लम माँ थी टाइम के साथ पूजा दिन ब दिन ज़्यादा चिड़चिड़ी रहने लगी थी ।उस दिन आशीष ने
सुबह सुबह माँ से कहा-- माँ तैयार हो जा,आज हम घूमने जाएंगे।" इतना सुनना था कि माँ ख़ुशी से झूम उठी।खुश्बू वाला तेल लगाकर चोटी बनाई ,गुलाबी साड़ी में तैयार ये माँ बुढ़ापे में किसी गठरी के जेसी सिकुड़ गई थी, कांपते हाथ आशीष के सर पर फेर कर बोली -"चलें बेटा?" झुर्रियों भरे ये हाथ आशीष का सकून थे , मगर अब......" अच्छा माँ ! दो तीन जोड़ी कपड़े भी रख लेना।" आशीष ने नज़रें चुरा कर कहा
"कपड़े? वो क्यों,हम लोग कुछ दिन रुक कर आएंगे क्या?"
"हाँ माँ ,जगह बहुत अच्छी है कुछ दिन रुक भी सकते हैं " माँ और भी खुश हो गई ।पूजा बरामदे के दूसरे कोने में खड़ी ख़ामोशी से सब देख रही थी।
माँ ने कुछ कपड़े बांधे और साथ चल दी पूरा वक़्त ट्रेन में माँ आशीष का हाथ पकड़े बैठी रही।
वृद्धा आश्रम में जाकर माँ को ये समझने में बहुत देर लगी कि वो अब आशीष के साथ वापिस घर नही जाएगी अब उसे हमेशा के लिए यहीं रहना था
"मगर बेटा ! हमारा घर तो बहुत बड़ा है ना , फिर ....??" माँ का दिल रो रहा थाा "मुझे तुझे देखे बिना जीने की आदत नही है, मैं यहां कैसे रहूंगी?" उसने आशीष के चेहरे को छूकर कहा।
"मै मिलने आता रहूंगा माँ" आशीष ने माँ के हाथो को थाम कर सर पर रख लिया।
"भगवान तुझे ख़ूब बड़ा आदमी बनाए" और मेरे आशीष को हमेशा मेरे साथ रखे" माँ ने आंसुओं के बीच दुआ दी।
फिर माँ खामोश हो गई,आश्रम की कुछ औरतें माँ को अंदर ले गईं।

आशीष घर आया तो देखा पूजा स्टूल पर खड़ी बरामदे में नीले कलर के पर्दे लगा रही थी,बहुत खूबसूरत और फ्रेश लग रही थी उसने डांटा
"पूजा ,तुम प्रेग्नेंट हो नीचे उतरो"
पूजा बहुत खुश थी अब सब कुछ आसान हो गया था ,घर में कोई भजन कीर्तन नही होता था,पुरे घर में एक क्लासिक साइलेंट रहती थी। कुछ वक़्त बाद पूजा को बेटी हुई,ये खूबसूरत लड़की पूजा और आशीष की ज़िन्दगी की सबसे बड़ी ख्वाहिश थी। उन्हें लगा अब सब मुकम्मल हो गया है, लेकिन बेटी थी की लगातार रोती रहती,डॉक्टर्स परेशान हो गए,कुछ टेस्ट के बाद उन्होंने बताया की उनकी बेटी ब्लाइंड है
"प्लीज डॉक्टर, चाहे जितना पैसा लगे"
आशीष का दिमाग आउट हो गया वो खौफ और सदमे से बेहाल था लेकिन कोई उपाए काम नही आया।पूजा शॉक्ड कंडीशन में थी,डॉक्टर्स ने हर मुमकिन कोशिश की सब नाकाम,आखिर उन्हें कबूल करना ही पड़ा कि वो एक अंधी लड़की के माँ बाप हैं।बहुत प्यार से उन्होंने इसका नाम ख़ुशी रखा।
बेटी की परवरिश में उन्होंने सेहत ,पैसा सब पर से ख्याल हटा लिया , ख़ुशी को उन्होंने सारी बातें सिखाई।हाथ से छूकर abcd को पहचानना , जानवरों की,चिड़ियों की आवाज़ें,खुशबू सूंघकर फूलो के नाम बताना, हवा का चलना,बारिश की बूंदों को हाथो में बन्द करके खुश होना,तरह तरह के खेल,बालों को गूंधना उन्होंने उसे सब सिखाया,सिवाए रंगो को पहचानने के ,रंगो को पहचानने का कोई तरीका उनके पास नही था लेकिन फिर भी वो गुलाबी नाम के कभी समझ न आने वाले रंग को अपना मनपसंद रंग मन बैठी।
पूजा दिन रात ख़ुशी की सेवा करते नही थकती थी।उसे अपने हाथो से खाना खिलाती,बाल संवारती,देर तक उसके सामने बैठी रहती,और रात को उसका बिस्तर लगाती।लेकिन ये सब आसान नही था,अब तो सब मुश्किल ही मुश्किल लगता था।ख़ुशी हर वक़्त हंसती ,खिलखिलाती रहती थी वो पूजा की तरह बहुत चूजी थी,कोम्प्रोमाईज़ उसे बर्दाश्त नही था ।बरामदे की महंगी चिकनी दीवारो को हाथ से छूकर पूछती "मम्मी ये दीवार गुलाबी हेना " उसके एक सवाल के जवाब में पूरे घर का रंग नीले से बदल कर गुलाबी कर दिया गया था ।नन्ही ख़ुशी गुलाबी बरामदे में बेठी रोज़ शाम पापा के घर आने का इंतज़ार करती थी , अपने इंतज़ार में बैठी ख़ुशी को देखकर आशीष खौफ से उसकी तरफ बढ़ता ,इस छोटी सी बच्ची के मासूम चेहरे में उसे हज़ार झुर्रियां नज़र आती थी,ये बेटी थी या बूढी माँ? आहिस्ता भारी क़दमो से चलता आशीष उसके क़रीब पहुंचता और उसका झुर्रियों भरा हाथ पकड़ कर सर पर रख लेता था।इसी हाथ के आशीर्वाद से तो लोग उसे बड़ा आदमी कहते थे ,नही उसे धोका नही लग सकता था ,ये उस माँ का हाथ था जिसका आशीर्वाद भगवान का वचन था जो आज भी हर लम्हा उसके साथ थी ,अपनी मजबूरियों ,अपने इंतज़ार और कभी न देख पाने वाली आँखों के साथ।
आशीष तड़प कर ख़ुशी को खुद से लिपटा लेता ।पूजा बरामदे के कोने में खड़ी ख़ामोशी से ये सब मन्ज़र देखती रहती लेकिन आज उसकी खामोशियों का शोर बहुत बढ़ गया था ,उसने आगे बढ़कर आशीष के कदमों में अपना सर रख दिया और बिलखते हुए कहा "आशीष !माँ को घर वापिस ले आओ"

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