नागेश आफिस से आकर अपनी गाड़ी का हार्न बार-बार बजाए जा रहा था,फिर भी बाहर कोई नही आया तो उसका माथा ठनका।अच्छे विचार आने की बजाए मन में कुछ उलझन -सी हुई।गाड़ी से उतर कर जल्दी से अन्दर गया तो वहाँ का दृश्य देखकर तो हैरान ही रह गया। दोनों बच्चे अपने दादा की गोदी में बैठे मजे से खेल रहे थे,जबकि हर रोज तो इस समय उसकी इन्तजार में बाहर गेट पर ही खड़े मिलते थे,ताकि गाड़ी में बैठकर पार्क का चक्कर लगाएं ।
बाबूजी व छोटे भाई शिवेश को गांव से आया देखकर वह अनमना-सा हो गया।उसने शिवेश की ओर देखकर आंखों-ही-आंखों में इशारे से पूछा,'यहाँ क्यो लाए हो इन्हें ?' "भैया बाबूजी पिछले महीने से बीमार हैं। दिनों -दिन सेहत बिगड़ रही थी।वैद्य जी की दवाई ने भी असर करना बंद कर दिया है, वहाँ कोई अच्छा डाक्टर भी नही है।सो मैं ...मैं ..।अभी अपनी बात पूरी कर पाता इससे पहले ही नागेश बोल उठा, "तो मैं क्या डाक्टर हूं ?" "पर भैया,,शहर में तो बड़े- बड़े डाक्टर होते हैं ।बड़े ताऊ जी भी कह रहे थे कि शहर में हर बीमारी का इलाज हो जाता है।" शिवेश डर -डर कर बोल रहा था।
"इलाज क्या मुफ्त में हो जाता है ...लाखों लग जाते हैं ।रुपये पैसों का भी इन्तजाम करके लाए हो या खाली हाथ लटकाये चले आए....?"
बड़े भैया के व्यंग्य-बाणों से निकले तीर दूसरे कमरे में बच्चों के साथ बैठे बाबूजी के हृदय को बींध रहे थे।
"भैया मेरे पास जो भी जमा पूंजी थी वह तो छोटी बहन के गौने में व बाबूजी की दवा दारू में खरच हो गयी ।आपने उस बखत यह कहा था कि 'मैनें अभी फ्लैट खरीदा है,बाद में दे दूंगा।" डरते-डरते शिवेश बोला।
"पर गाँव में खेत और मकान तो हैं न! मैंने तो उसमें से कभी कुछ नही माँगा।तुम समझते हो मेरे पास पैसों का पेड़ है जब जी चाहा झाड़ लिया। तुम्हे क्या पता शहरों में कितने खर्चे होते हैं ।" कहकर भैया ने भाभी को चाय लाने के लिए आवाज दी।
अपने भाई की बातें सुनकर शिवेश निरुत्तर सा खड़ा रहा,जैसे बाबूजी को यहाँ लाकर बहुत बड़ा अपराध कर दिया हो।वह कह नहीं सका कि आपकी पढ़ाई व नौकरी लगवाने के कारण ही जमीन और मकान गिरवी पड़े हैं ।उसे याद है जब भैया पैसे मंगवाते थे तो पिता जी कैसे- कैसे सरपंच के आगे गिड़गिड़ाते थे।नौकरी के लिए मकान गिरवी रखना पड़ा था।उस समय भैया की मधुर वाणी कितनी कर्णप्रिय लगती थी।पर आज उनका बदला हुआ रूप देखकर तो विश्वास ही नही होता कि यही भैया हैं ।शायद भाभी ने ही सिखा -पढ़ा दिया हो ।
नागेश भैया सरकारी सेवा में प्रतिष्ठित पद पर हैं ।सरकारी निवास के साथ-साथ नौकर चाकर भी मिले हुए हैं ।दोनों बच्चे अच्छे स्कूल में हैं ।सब सुख साधन होते हुए भी पता नही क्यों बाबूजी के यहां आने पर भैया बेरुखी दिखा रहे हैं ।तभी बाबूजी के खांसने की आवाज आई शायद यह उनके बुलाने का ईशारा हो।वह उनके कमरे में गया तो देखा भाभी बाबूजी को बड़े स्नेह से खाना खिला रही थी।भाभी के चेहरे को देख कर लग रहा था वे हमारे आने से खुश हैं ।मन को संतोष हुआ कि चलो कोई तो है,,जो बाबूजी का ध्यान रख रहा है।
रात को सोते-सोते बाबूजी को खांसी का ऐसा दौरा पड़ा कि उनकी छाती में बहुत दर्द हुआ।भैया ने डाक्टर को घर पर ही बुला लिया।डाक्टर ने चेक-अप करके कुछ दवाइयां व इंजेक्शन दिये और अगले दिन के लिए अस्पताल में दाखिल कराने की राय दी।भैया ने डाक्टर के आदेशानुसार बाबूजी को पास के ही नर्सिंग होम में दाखिल करा दिया।तीन चार दिन में बाबूजी की तबीयत सम्भल गयी।बाबूजी घर आ गये।भाभी तन- मन से बाबूजी का ध्यान रख रहीं थी।भैया को कोई सरोकार नहीं था।वे अपने कार्यों में ही व्यस्त रहते।बाबूजी चाहते थे कि उनका बड़ा बेटा कुछ देर उनके साथ बैठकर सुख -दुख की ,गांव- घर की बात करे,पर ऐसा हो नहीं पाता ।भैया सुबह से गये हुए रात के सात -आठ बजे ही घर आते।
गाँव से आए हुए एक सप्ताह से अधिक समय हो गया था।घर व खेती भी सम्भालनी थी,सो मैनें भैया भाभी से इजाजत मांगी।बाबूजी भी स्वस्थ लग रहे थे।मेरे अकेले जाने की बात सुनकर भैया की त्योरी चढ़ गयी और गुस्से से बोले, "अकेले गाँव जाकर क्या करोगे,अब बाबूजी ठीक हैं उन्हें भी साथ लेते जाओ।यहां अकेले पड़े-पड़े बोर ही होंगे।कम से कम गाँव में उनके हमउम्र के लोग हैं जिनके सहारे उनका समय तो पास हो जाएगा?" कहते-कहते भैया खाने की मेज से उठकर चले गये।चुप रहने के सिवाय उसके पास कोई चारा नहीं था।वह जानता था जो सुख सुविधा बाबूजी को यहाँ मिल रही हैं वह गाँव में कहाँ... ।शौच के लिए भी बाहर जाना पड़ता है और अब उनसे ज्यादा चला- फिरा भी नहीं जाता।यहां बच्चों के साथ भी घुल- मिल गये हैं।पर,यह सब कहने की उसमें हिम्मत कहाँ जो वह बड़े भाई के सामने जुबान खोलता।
सोने के लिए जब वह बाबूजी के कमरे में गया तो भाभी बाबूजी को शहद के साथ दवाई दे रही थी।बाबूजी की आंखों में उदासी स्पष्ट दिखाई दे रही थी ,शायद उन्होंने भैया की बातें सुन ली थीं।मैं भी चुपचाप बिस्तर पर लेट गया।पर नींद कोसों दूर थी।सोने की बहुत कोशिश की। करवट बदलते हुए देखा बाबूजी भी जाग रहे थे।। "सो जाओ शिवेश ,प्रभु सब ठीक करेंगे ।" बाबूजी बोले। उन्होंने पानी मांगा,देखा तो जग खाली था।मै जग लेकर रसोईघर की ओर गया तो देखा, भैया के कमरे की बत्ती जल रही थी और भैया की आवाज भी स्पष्ट सुनाई दे रही थी और अधिक सुनने के लिए स्वयं को रोक नही सका।
भाभी कह रहीं थी,"अभी बाबूजी को गांव मत भेजो,उन्हें आराम की सख्त जरुरत है।गांव जाकर खेतों में जाए बिना नही रहेंगे ।" तभी भैया का तेज स्वर उभरा,"तुम बेवकूफ़ हो, उन्हें यहाँ नहीं रख सकते।"
"क्यों नहीं रख सकते? मैं उनका ध्यान रखूंगी, उनकी सेवा करूंगी,आपको कोई परेशानी नहीं होगी।" भाभी कहकर चुप हो गयी।भैया का स्वर और तेज हो गया,वे बोले-"तुम्हें याद है अगले हफ्ते अखिलेश का बर्थ डे है और मैंने अपने आफिस वालों को शहर के बड़े -बड़े लोगो को भी इन्वाइट किया हुआ है।" "यह तो सोने पे सुहागा" वाली कहावत सिद्ध हो जाएगी। अखिलेश को अपने दादा जी का आशीर्वाद भी मिल जाएगा।" भाभी की बातों में खुशी छलक रही थी।भाभी का जवाब सुनकर तो मैं दंग ही रह गया। भाभी के लिए हमारी सोच कितनी गलत थी। " काश!आज ऐसा हो जाता कि माँ एक बार फिर हमारे पास आ जाती।" आज भाभी के सम्मान में मेरा मस्तक झुक गया था।मन कर रहा था अभी जाकर भाभी के चरण छू लूं और माफी मांग लूं।मां बाबूजी के साथ मेरी सोच भी गलत साबित हुई।जब भाभी के शब्द मेरे कानों में पड़े।वे बोलीं,"जिस पिता ने तुम्हें पढ़ा लिखा कर इस योग्य बनाया कि तुम समाज मे सिर उठाकर चल सको। उसी जन्मदाता को अपना पिता कहकर बड़े लोगों से मिलवाने में शर्म आती है ? क्योंकि वह अनपढ़ हैं ....? जो भाई दिन- रात खेतों में काम करके हमारे खेत व घर सम्भाल रहा है,उसे अपना भाई कहने में आपके मन में हीन भावना आ रही है,फिर आप अपने बच्चों को क्या संस्कार दोगे ...?आपकी सोच इतनी छोटी होगी, मुझे नहीं पता था.....?" कहकर भाभी चुप हो गई।मैं अधिक देर वहाँ खड़ा नही रह सका।मुझे अपने आप से घृणा हो रही थी।मैनें भाई को भगवान का दर्जा दिया हुआ था।सोचता था भाभी ही भैया को हमसे मिलने के लिए रोकती होंगी।कितना गलत था मैं।सोचते -सोचते पता नहीं कब आंख लग गई।
"बाबूजी, चाय लीजिए.." भाभी की आवाज सुनकर मेरी नींद खुली।देखा तो भाभी बाबूजी को सहारा देकर बैठा रही थी।चाय पीते हुए बाबूजी बोले, "बेटी ,मैं सोच रहा हूं गाँव चला जाऊं,वहाँ खेतों का काम भी देखना है।अब स्वास्थ्य पहले से ठीक है।"कहकर बाबूजी मेरी ओर देखने लगे।उनकी आंखों में विवशता स्पष्ट झलक रही थी ,उन्हें अब भी यही लग रहा होगा कि भाभी ने ही भैया को उकसाया होगा।लेकिन उसी समय भाभी बोली- "पिता जी,आप कहीं नहीं जाएंगे। यहीं रहेगें ....हमारे साथ।अभी और टैस्ट करवाने हैं।क्या यहाँ आपको कोई कष्ट है..?"
" नहीं ..नही बेटी, ऐसी बात,नहीं है.....'' । बाबूजी धीरे-धीरे बोले।
"तो ठीक है,अब मैं आपकी एक नहीं सुनूंगी" कहकर मुस्कराते हुए भैया को नाश्ता देने चली गयी,क्योंकि भैया आवाज लगा रहे थे।मेरा मन खुशी से पागल हो रहा था ।"काश...!आज माँ जिंदा होती तो अपनी बहू का यह रूप देखकर कितनी खुश होती।"
वह दिन याद है जब भैया ने शहर में अपनी पसन्द की लड़की से शादी करके माँ को कह दिया था कि वह गाँव में आना नहीं चाहती।मां ने कितने आंसू बहाये थे ।भाभी को ही भला बूरा कहा था,,जबकि भाभी को भैया स्वयं गाँव ले जाना नहीं चाहते थे। यह कैसी विडम्बना है कि हम बिना सोचे- समझे सारा दोष पराई लड़की पर मंढ़ देते हैं ।
तभी गाड़ी स्टार्ट होने की आवाज के साथ-साथ भैया की आवाज भी सुनाई दी ,वे कह रहे थे आज आने में देर हो जाएगी, जरूरी मीटिंग है।बाबूजी भैया से बात करने को बेचैन हो रहे थे ।उन्होंने कहा, " नागेश को कह मुझसे बात कर के जाएगा।'' मैं बाहर की ओर दौड़ा ,पर तब तक भैया जा चुके थे ।भाभी ने फोन लगाया लेकिन उन्होंने फोन काट दिया।
कुछ देर बाद भैया का ही फोन आया ,यह कहने के लिए कि उन्हें फोन करके डिस्टर्ब न करे।परिवार के झमेले अपने आप ही सुलझा लें ।
दोपहर के खाने की तैयारी करवा कर भाभी बाबूजी को डाक्टर के पास लेजाती,कि तभी बाबूजी की तबीयत बिगड़ने लगी।उनकी सांसे उखड़ रही थीं।सांस लेने मे कठिनाई होने लगी।जल्दी से डाक्टर को फोन लगाया।बाबू जी रुक रुककर बोल रहे थे ' नागेश से बात कराओ।'
उनकी ऐसी स्थिति देखकर मै घबरा गया।भाभी फोन पर फोन लगाए जा रही थी पर दूसरी ओए से फोन कट रहा था।लग रहा था बाबूजी भैया से कोई जरूरी बात करना चाह रहे हैं ।भाभी ने आफिस मे फोन मिलाया लेकिन भैया ने बात करने से मना करके फोन काट दिया।इधर डा.ने जांच करके भाभी को धीरे से कुछ कहा,जिसका कुछेक अन्दाजा मुझे भी हो गया।भाभी बाबूजी को अस्पताल ले जाना चाह रही थी,पर इशारे से बाबूजी ने मना कर दिया।अब उन्हें सांस लेने में अधिक कठिनाई होने लगी।पुन: नागेश का नाम लिया।भाभी ने एक बार फिर कोशिश की।आखिर में सन्देश छोड़ दिया।
उसी क्षण बाबूजी ने आंखें खोली और हम सब कीओर देखते हुए अखिलेश के सिर पर हाथ रखा तो हाथ उसी स्थिति में रह गया।जब हाथ हटाने लगे तो गर्दन एक ओर लुढ़क गयी।आत्मा पिंजरा छोड़कर जा चुकी थी हम सब की आंखें बिना कुछ कहे अविरल जलधारा बहाती रही ।भाभी ने बाबूजी जी के प्राणान्त का समाचार आफिस में दे दिया ,फोन किसी कर्मचारी ने उठाया और कहा कि साहब ने डिस्टर्ब करने से मना किया है।भाभी ने आंसू पोंछे और अंतिम क्रियाकर्म की तैयारी करवाने में लग गयीं ।आसपास के लोग आने लगे ।आफिस के लोग भी आ गये।किसी ने बताया कि मीटिंग के बाद बड़े साहब के साथ ही किसी पार्टी के लिए निकल गये ।
अन्तिम यात्रा की सारी तैयारी हो चुकी थी।आंगन में बाबूजी का पार्थिव शरीर रखा हुआ था लोग अन्तिम दर्शन कररहे थे।भीड़ बड़ती जा रही थी,आखिर एक सरकारी आफिसर के पिता की अन्तिम यात्रा जो थी।तभी पंडित जी ने कहा, सूर्यास्त से पहले संस्कार हो जाना चाहिए ।मैं भाभी की ओर देखने लगा।भाभी ने निर्णय लेने में एक क्षण भी नहीं लगायाऔर बोली "शिवेश बाबूजी को मुखाग्नि तुम दोगे।"
'पर भाभी मैं ..,.बड़े तो भै...या ।'भाभी ने मेरी ओर देखा तो मै कुछ बोल न सका।
,"राम नाम सत्य है" के स्वर के साथ कंधा देने के लिए लोग आगे बढ़े।देखते ही देखते बाबूजी पंचतत्त्व में विलीन हो गये।सही अर्थों में मैं आज अनाथ हो गया था।मां के बाद बाबूजी ही तो सब कुछ थे।
रात को आठ बजे के बाद भैया घर आए तो सारी वस्तुस्थिति को भांप कर चुप रहे।किसी के पास कुछ भी कहने को नहीं था।हाथ- मुंह धोकर तौलिए से हाथ पौंछते हुए बोले,"चलो,तुम लोगों ने अच्छा निर्णय लिया,अन्यथा मृत शरीर के पास सारी रात बैठना पड़ता।उनके मुख से ऐसे शब्द सुनकर मेरे साथ-साथ भाभी की आंखे आंसू बहाने लगी,पर वे चुप रहीं ।
अगले दिन से नाते- रिश्तेदार शोक प्रकट करने के लिए आने लगे।कुछ नजदीकी रिश्तेदार रात को रुक भी जाते।जो भैया को अच्छा नहीं लगता था।उन्होंने तेरह दिन के शोक की जगह तीन दिन के बाद ही रसम-क्रिया करने को पंडित जी से कहा।इसमें भाभी ने अपनी ओर से कोई सहमति असहमति नही दिखाई ।जो निर्णय लेना था वह भैया को ही लेना था।
चौथे दिन भाभी ने बड़ी श्रद्धा व तन्मयता से शान्ति पाठ व हवन करवाया ।भोजन के साथ-साथ दान दक्षिणा भी दी।पगड़ी -रसम के समय सभी चुपचाप बाबूजी के चित्र पर पुष्प अर्पित कर अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि देने लगे और पंडित जी ने मन्त्रोंच्चार के साथ पगड़ी बंधवाने के लिए भैया को आगे आने को कहा ।भैया ने हाथ जोड़कर जैसे ही सिर झुकाया तो अचानक भाभी बोली,"रूकिए पंडित जी,इस पगड़ी को बंधवाने का हक इन्हें नहीं, इनके छोटे भाई शिवेश को है।" सभी हैरान एक दूसरे की ओर देखने लगे।पंडित जी के साथ-साथ नाते रिश्तेदार भी बोले, ' पगड़ी तो बड़े बेटे को ही बंधती है, छोटे को नहीं।'
हाथ जोड़कर भाभी बोली,"मुझे क्षमा करें, आप सब मेरे आदरणीय हैं ।कोई भी इनसान उम्र से बड़ा नहीं होता,अपने कर्मों से बड़ा होता है,और वह है शिवेश ,जिसने अन्तिम सांस तक बाबूजी की सेवा की,अपना कर्त्तव्य निभाया।" यह सुनकर सभी निरुत्तर रह गये ।कहते- कहते भाभी की रूलाई फूट पड़ी।
बाबूजी के चित्र पर पुष्प अर्पित करते हुए भैया अश्रु बहा रहे थे।ये अश्रु आत्मग्लानि के थे या........वह नहीं जान सका

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