पुरूष, कहते हैं ना मनुष्य एक सामाजिक प्राणी हैं, कर्तव्यों​ से बन्धा हुआ, उसी समाज का एक हिस्सा है पुरुष, जिसके पास अपना कहने को कुछ रिश्ते और साथ देने को उनकी चाहते​, उसकी खुशी हां उसमें है जिसमें उसका परिवार जी सके, जिसमें उनकी जरुरते पुरी हो सके ।

उनमें से कुछ कितनी कोशिशे करते हे, अपने परिवार को वो सारी खुशियां देने की, जो वे चाहते हैं मगर वो कितनी भी कोशिश कर लें, कहीं ना कहीं कमी रह ही जाती हैं, वो पुरूष जता ही नहीं पाता कि उसने कितना चाहा मगर कर ना सका, कहते हैं ना दुनिया रिसल्ट देखती है, कोशिशे नहीं, बस वैसे ही उसके जज्बात नहीं देखे जाते, वो उदासी नहीं देखी जाती, उस पुरुष की हार नाकाम होने से नहीं होती, उस पुरुष की हार होती है, अपने परिवार की नजरों में नाकामयाब होने से ।

वो पुरूष, जो बेटा, पति, पिता, इस रंगमंच का महत्वपूर्ण हिस्सा, क्या चाहता है बस इतना कि, जिसके लिए वो अपनी सारी ख्वाहिशें भुला कर उन्हीं में जिता है उनसे बस बदले में वो लफ्ज़ सुने जिससे उसकी कोशिशों को मंजिल मिले, आंखों​ में वो गर्व दिखे जिसे देखकर वह और ज्यादा मेहनत कर सके ।

वो पुरूष कितना हार जाता है अपनो की नजरों​ में गिरकर, फिर भी भागता नहीं अपनी जिम्मेदारियों से, किससे कहता है वह, जो तुफान उसके दिल में उठता है, हां दिखाने को उसके पास जख्म भी कहा होता हैं ।

शायद वो खुद से तन्हा सा कह रहा होता है,

“ ये जज्बात मेरे मुझमें दफ्न होने लगे है,

हर वक्त ठहरी खामोशी अब बढाने लगे है,

कोइ रखदे अगर इनपर हाथ तो जल ना जाए,

इस कदर अब ये मुझको जलाने लगे है,

बढ़ती जा रही है तड़प हर एहसास की,

अब धीरे-धीरे​ ये मुझको मिटाने लगे हैं ।

कितना समर्पित होता है वह पुरुष अपने कर्तव्यों को लेकर, उसके प्रति समर्पण एक परिवार की नींव सा है , जिसके बिना वो इतना अधूरा है जैसे बिना नींव का मकान ।

एक पिता जो अपने बच्चों के लिए इतना भागता है कि एक मां की तरह उन्हें ममता भी कहा दें पाता है, उन्हें बढते हुए भी सोते हुए देखता है, क्योंकि​ देर से आता है, और सुबह निकल जाता है ।

कितना कुछ खोता है वो हर रोज, वो पाने की ख्वाहिश में जो उसके साथ कभी रहेगा ही नहीं ।

वो सृजनकर्ता, वो स्त्री का दुसरा भाग, उसकी रचना स्त्री की पुरक है, ना वो महापुरुष, ना ही दानव, वो इस सृष्टि रूपी स्त्री की मुरत है ।

अगर कोशिशें कि जाए तो उस पुरुष को संवारा जा सकता है, ऐसे पुरुष बहुत कम बचें है, हमें इसी तरह की कोशिशें​ जारी रखनी चाहिए, जिससे उनके जज्बातों​ को सम्भाला जा सके ।


दिलों तक पहुंचने की एक अनजान सी कोशिश ।

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