पूछे मुझसे मेरा मन प्रश्न एक ही बार-बार

कहाँ मिलेगा मुझको सुख,मंद चलेगी कहाँ बयार

स्वर्णिम किरणे जहाँ हो बिखरी,शीतलता का हो आसार

स्वपन जहाँ होते है सच,कहाँ बसा है वो संसार


नहीं हो सारे अत्याचार,भूख और गरीबी की मार

होते हो सब के दुःख दूर,नहीं रहे कोई मजबूर

रहता हो हर कोई जहाँ पर प्रेम और सोहाद्र से

मनमोहक हो वातावरण,पुष्पों के सुगन्धित श्रृंगार से


अंधियारे को चीर जहाँ आशा का सूर्य निकलता हो

करते प्रतीक्षा जो इस समय की उनको ये हर्षित करता हो

स्वाति नक्षत्र की बूँद के जैसे हर दिन ही पावन वर्षा हो

मिल जाये तृप्ति उन सब को जो भी जितना तरसा हो











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