सूर्यनन्दिनी एक रहस्य - पार्ट 1

कहानी के पात्र:

समर्थ - एक तीस साल का नौजवान जो की पेशे से एक आर्किटेक्ट है |

कुंवर अजीत सिंह - राजघराने के युवराज जिनकी शादी प्रियानन्दिनी से होने वाली है |

प्रियानन्दिनी - कुंवर अजीत की मंगेतर और होने वाली बीवी |

पंडित राम प्रसाद शास्त्री - कुंवर अजीत सिंह के पारिवारिक पंडित, उम्र में 60 साल |

सूर्यनन्दिनी - ????


आज रविवार था तो समर्थ अभी भी सो ही रहा था, अक्सर रविवार को वो लेट ही उठता था पर तभी मोबाइल के बजने के साथ उसकी नींद खुली तो उसने देखा कि किसी अनजान व्यक्ति का कॉल आया है, तो वो फोन काटने का सोचता है पर कटने की जगह कॉल उठ जाती है और दूसरी तरफ से आवाज़ आती है - क्या मैं समर्थ से बात कर रहा हूं ?

एक अनजान आदमी के मुंह से अपना नाम सुन के आवाज़ से वो चौंक जाता है और कहता है - हां मैं समर्थ ही बोल रहा हूं, बताइए !

आदमी - मैं अजीत बात कर रहा हूं कुंवर अजीत, याद है कुछ हफ्ते पहले आप मुझसे मिले थे मैंने आपको कहा था कि मुझे अपने महल को सुसज्जित करवाना है !

कुंवर अजीत सिंह नाम सुनकर समर्थ कहता है - हां सर याद आ गया मुझे...!

अजीत - तो समर्थ क्या तुम आज मुझसे मिलने आ सकते हो मेरे ऑफिस, दरअसल मुझे महल के बारे में कुछ बात करनी थी, और सॉरी आज रविवार के दिन तुम्हे तंग करने के लिए ।

समर्थ - ठीक है सर मैं आ जाऊंगा आप मुझे एड्रेस भेज दीजिए ।

अजीत - ठीक है मैं वॉट्सएप करता हूं तुम्हे !

लगभग एक घंटे बाद समर्थ कुंवर अजीत के ऑफिस पहुंच जाता है जहाँ उसे गार्ड से पता चलता है की कुंवर अजीत तो अभी दस मिनट पहले ही निकल चुके हैं, तो वो अजीत को कॉल लगाता है तो वो कहते हैं - ओह आई एम सो सॉरी ! वो मैं अपनी मंगेतर प्रियानन्दिनी को लेने चला गया था तुम्हे कॉल करना भूल गया, ऐसा करो तुम मेरे महल ही आ जाओ |

समर्थ - ठीक है सर !


जब समर्थ महल पर पहुंचता है तो उसकी आँखें फटी रह जाती हैं क्यूंकि देखने में वो महल एक दम विशाल और भव्य होता है लेकिन अधिक पुराना होने के कारण थोड़ा मैला लगता है, इतने में कुंवर अजीत सिंह वहां आगमन करते हैं और उनके साथ एक महिला जो की उनकी मंगेतर होती हैं महिला सांवले नैन नक्श वाली लेकिन सुन्दर और आकर्षक होती है जिनका परिचय कुमारी प्रियनंदिनी नाम से करवाया जाता है |

परिचय के बाद कुंवर अजीत समर्थ को महल के बारे में बताते हैं की आजकल की महंगाई के जमाने में महल में रहना काफी खर्चीला है इसलिए वो अपनी शादी के बाद महल के कुछ हिस्से में खुद रहेंगे और बाकी पुराने महल को एक फाइव स्टार होटल में तब्दील करवाना चाहते हैं क्यूंकि तुम तो जानते ही हो हमारे जयपुर में विदेश से भी लोग घूमने आते हैं और उन्हें हमारी संस्कृति, यह राजसी महल कितने आकर्षित करते हैं... तो मैं भी उन्हें ऐसा ही अनुभव देना चाहता हूँ जिसे वे सारी ज़िन्दगी याद रख सकें ... लेकिन मुझे मेरे हिस्से का महल, जो की हमारा घर होगा दो महीने में तैयार चाहिए, बाकी होटल का काम चाहे आठ दस महीने में हो जाए |

समर्थ - ठीक है सर, लेकिन मेरे मन में एक हिचकिचाहट है |

कुंवर अजीत - पैसों को लेकर है तो घबराओ मत मैं तुम्हे पचास परसेंट एडवांस दूंगा, बाकी का पेमेंट काम पूरा होने के बाद |

कहते हैं न की घर आयी लक्ष्मी को ठुकराते नहीं हैं तो समर्थ तुरंत हाँ बोल देता है लेकिन उसके मन में अब भी एक घबराहट होती है की इतना बड़ा काम वो और उसकी टीम कैसे करेगी इतने कम समय में....

अब अजीत समर्थ की तरफ अपना हाथ बढ़ाते हैं और देखते हैं की समर्थ उसकी जेब से हाथ निकल रहा है, पर कुंवर अजीत को दृष्टिगोचर होता है की समर्थ अपनी म्यान में से तलवार निकाल रहा है उन्हें मारने के लिए....तो अजीत डर के मारे चिल्ला पड़ते हैं - नहीं.....!

यह देख समर्थ बोलता है - क्या हुआ सर | प्रियानन्दिनी भी डर जाती हैं और अजीत को बोलती हैं क्या हुआ अजीत तुम अचानक से डर क्यों गए !

तो अजीत समर्थ को देखते तो उन्हें वो नार्मल ही लगता है और वहां से चला जाता है....


....समर्थ के जाने के बाद प्रियानन्दिनी और अजीत एक होटल में लंच करने के लिए जाते हैं जहाँ प्रिया अजीत से पूछती है - क्या हुआ अजीत ! आज समर्थ से हाथ मिलाते वक़्त तुम डर क्यों गए थे ?

अजीत - हाथ मिलते वक़्त जब मैंने समर्थ की तरफ देखा तो मुझे लगा उसके हाथ में तलवार है जिसे वो म्यान से निकाल रहा है !

अजीत का जवाब सुनकर प्रियानन्दिनी बोलती हैं - तुम्हारे दिमाग में कुछ और चल रहा होगा जिसे तुमने समर्थ से जोड़ लिया, राजघराने में पले बड़े हो इसलिए तुम्हे हर कोई राजा ही नज़र आता है |

अजीत - ऐसी बात नहीं है प्रिया...

करीब पंद्रह - बीस दिन बाद कुंवर अजीत महल की और आते हैं की किस तरह से काम हो रहा है तो वो क्या देखते हैं की महल की दीवारें चमक रही हैं अंदर एक दम बढ़िया कालीन बिछा हुआ है, इम्पोर्टेड ग्रीनरी से महल की सीढिया सजाई गयी हैं काम को शानदार ढंग से होता देख कुंवर अजीत का मन संतुष्ट हो जाता है की...चलो अब महीने भर में महल तैयार हो जायेगा ...इतने में ही समर्थ भी वहां आ जाता है |

उसे देखते ही अजीत बोलते हैं - वाह ! क्या सजावट की है महल की तुमने समर्थ, लेकिन काम में इतना भी मत डूब जाना की मेरी शादी में ना आ पाओ, कार्ड भिजवाया था तुम्हारे यहां मिल गया ना |

समर्थ - हाँ सर मिल गया है कार्ड |

कुंवर अजीत बोलते हैं वैसे तो मैं आधी अधूरी चीज़ बीच में देखना पसंद नहीं करता लेकिन क्या है न अगले हफ्ते ही मेरी शादी है फिर उसके तुरंत बाद मैं और प्रिया हनीमून के लिए यूरोप निकल जाएंगे तो सोचा की एक बार महल की तरफ हो ही आऊं |

थैंक यू सर आपको मेरा काम पसंद आया और शादी के लिए बहुत बहुत बधाई आपको और मैडम दोनों को, यह सुनके कुंवर अजीत हँसते हैं है और समर्थ को थैंक्स बोलते हैं और जाते हुए एक बार समर्थ से हाथ मिलाते हैं तो अजीत को समर्थ में एक राजा नज़र आता है जो उन्हें एक रहस्यमयी मुस्कान के साथ देख रहा होता है, उसकी आँखें देख के अजीत डर जाते हैं और जल्दी से महल से बाहर निकल आते हैं |


अब अजीत जल्दी से प्रिया को फ़ोन लगते हैं और उनसे कहते हैं - मुझे तुमसे मिलना है जल्दी, प्लीज फटाफट तैयार हो जाओ तुम्हे लेने आ रहा हूँ मैं |

जब अजीत प्रियनन्दिनी को उनके घर से लेकर लॉन्ग ड्राइव पे जाते हैं और रास्ते में प्रिया से कहते हैं - आज फिर मुझे समर्थ में राजा की छवि दिखाई दी !

प्रिया थोड़ा गुस्से में - बकवास ! तुम अभी भी इन फालतू की बातों में अपना टाइम बर्बाद कर रहे हो |

अजीत - मेरा विश्वास करो प्रिया, वो चेहरा मुझे किसी की याद दिलाता है, वो एक राजा के रूप में मुझे....टॉर्चर करता है !

प्रिया - अगर तुमने मुझे इसीलिए बुलाया है तो मुझे वापिस घर ड्राप कर दो, और वैसे भी अगले हफ्ते हमारी शादी है उसमे हमें कोई नाटक नहीं चाहिए, यह समर्थ का राजा के रूप में आके तुम्हे टार्चर करने का तो बिलकुल भी नहीं |

अजीत - यार प्रिया तुम तो मेरा विश्वास करो, अब यह बात मैं अपने घरवालों को भी नहीं बता सकता |

प्रिया - गाडी रोको !

अजीत - लेकिन यह एकदम से क्या हुआ |

प्रिया गुस्से में - उतरो गाडी से....पता है इतने दिनों तुम इतनी टेंशन में हो, आज गाडी मैं चलाऊंगी तुम मौसम का मज़ा लो !

अजीत - क्या....?

प्रिया - जी हाँ, आपने ठीक सुना जनाब, अब गाडी से उतरिये ताकि हम ड्राइव कर सकें !



एक हफ्ते बाद


अब शादी वाले दिन शहर के बड़े होटल में पार्टी रखी जाती है उसमे दूसरे राजघराने के सदस्य व कुंवर अजीत और प्रियनंदिनी के दोस्त रिश्तेदार सहित कई जानी मानी हस्तियां शरीक होती हैं, पार्टी में शामिल हुए अधिकतर मेहमान अजीत और प्रियनंदिनी की तारीफ़े करते नहीं थकते, तभी समर्थ की एंट्री होती है पार्टी में जो की गोल्डन कुर्ते पयजामे में आता है और पार्टी में आये सभी लोगों की नज़र समर्थ की और बढ़ जाती है और सब ऐसे देखते हैं जैसे की जैसे असली राजकुमार तो अब आया हो क्योंकि समर्थ वहां केवल कुंवर अजीत और प्रियनंदिनी को ही जानता होता है तो वह सीधा ही स्टेज पे उन्हें गिफ्ट देने के लिए चला जाता है वहां समर्थ जैसे ही अजीत को बधाई देने के लिए हाथ आगे बढ़ाता है अजीत एक बार तो ठिठक जाते हैं पर इतने लोगों के सामने बदनाम होने के डर से वो हाथ आगे बढ़ाते हैं तो उन्हें समर्थ वैसे ही राजा के भेष में नज़र आने लगता है, और कुंवर अजीत को पसीने आने लगते हैं पर वे अपने चेहरे से जाहिर नहीं होने देते | ये देख प्रियनंदिनी कहती हैं मैंने कहा था ना ये तुम्हारे मन का वहम है !

शादी संपन्न होने के बाद कुंवर अजीत और प्रिया हनीमून के लिए यूरोप निकल जाते हैं और समर्थ भी दो दिन की छुट्टी के बाद फिर से महल की साज सज्जा में लग जाता है |

अपना हनीमून यूरोप में मन रहे कुंवर अजीत एक दिन नींद में ही अचानक चिल्लाते हैं - मुझे क्षमा कर दीजिये राजन !

अजीत के इस तरह चिल्लाने की आवाज़ सुन कर प्रियनंदिनी की नींद खुल जाती हैं और वो पूछतीं हैं क्या हुआ कोई भयानक सपना देखा क्या?

तो अजीत कहते - हाँ उन्हें सपना आया की वो किसी नगर के राजा थे और समर्थ भी कहीं का राजा था और दोनों में किसी बात को लेकर युद्ध हो जाता है तो समर्थ कुंवर अजीत की गर्दन पे तलवार रख देता और अजीत समर्थ के पैरो में गिरकर माफ़ी मांगने लगते हैं की - मुझे क्षमा कर दीजिये राजन !

.....हुंह यार अजीत तुम यहाँ भी समर्थ को लेकर हमारा हनीमून क्यों खराब कर रहे हो चुपचाप सो जाओ तुमने कोई भयानक सपना देखा होगा प्रिया कहतीं है !

लेकिन अगले दिन जब वो दोनों सोकर उठते हैं कुंवर अजीत की गर्दन पे सचमुच का घाव होता है जो की किसी नुकीले हथयार का ही लगता है घाव देखकर प्रियनंदिनी थोड़ा डर जाती है अब उन्हें भी यकीन होने लगता है की अजीत की बातों पे | लेकिन अनजान देश में इतनी आसानी से डॉक्टर का अपॉइंटमेंट तो मिलता नहीं है और वैसे भी वे डॉक्टर को क्या बताते की घाव एक ऐसे आदमी ने किया है जो कि उनके सपने में आया था, तो वे पागल कह लाये जायेंगे इसीलिए वे अपना होटल बदल लेते हैं |

हनीमून के बाद भारत आने के बाद भी कुंवर अजीत को कईं बार वही सपना आता है, लेकिन बदनामी का डर होने की वजह से वो यह बात अपने परिवार में भी किसी को नहीं बताना चाहते तो वे अपने फॅमिली डॉक्टर को दिखाते हैं, लेकिन जब डॉक्टर के पास जाते हैं तो अजीत की गर्दन पे कोई घाव नहीं होता तो उन्हें आश्चर्य हो जाता है साथ ही डर भी लगने लगता है!

तब प्रियनंदिनी उनसे कहती है की क्यों ना हम अपने पारिवारिक पंडितजी से तुम्हारी जनम कुंडली दिखाकर पूछे, उन्हें इन सब बातों का बहुत ज्ञान है | अगले दिन जब अजीत और प्रियनंदिनी पंडित राम प्रसाद शास्त्री जी के पास जाकर कुंवर अजीत के साथ हो रही घटनाओं के बारे में बताते हैं, यह सुन कर एक बार तो पंडितजी को आश्चर्य होता है फिर वो कुंवर अजीत की कुंडली देखते हैं और पूछते हैं की - आप सबसे पहले समर्थ से कब मिले थे ?

तो अजीत कहते हैं पहले मैं समर्थ से अपने नए महल यानी मेरे घर में मिला था उसके बाद जब मैं उसे पुराने महल ले गया था तब पहली बार ऐसी अजीब घटना हुई थी |

प्रियनन्दिनी भी बोल पड़ती हैं - हाँ उस समय मैं भी वहीँ थी पर मुझे कुछ भी अजीब नहीं लगा था !

शास्त्री जी - आपको क्यों अजीब लगेगा, दो दो राजयोग तो इनके जीवन में हैं |

अजीत - क्या मतलब शास्त्री जी !

शास्त्री जी - हाँ कुंवर सा, पहला राजयोग यह की इस जीवन में आप राज घराने में पैदा हुए हैं, और दूसरा यह की आपके पिछले जनम के भी कुछ ऐसे ही संयोग हैं, यानी आप पूर्व जनम में कोई राजा थे जिनका कुछ अधूरा रह गया था |

प्रिया - तो यह सब तब शुरू हुआ शास्त्री जी, जब अजीत समर्थ को पुराना महल दिखाने ले गए थे ?

शास्त्री जी कुछ सोचते हुए - हाँ और तब से ही जो समर्थ है उनमे अजीत को एक राजा नज़र आता है, अब या तो समर्थ सच में पिछले जनम में राजा था जो आपसे बदला लेना चाहता है या फिर समर्थ पे किसी राजा की आवेश चढ़ गया है जो की आपके पुराने महल में भटक रहा था और एक शरीर की तलाश में था और अब समर्थ के रूप में आपसे बदला लेना चाहता है !

अजीत थोड़ा घबरा जाते हैं और बोलते हैं - पर मैंने ऐसा क्या किया है जो वो मुझसे बदला लेना चाहता है |

शास्त्री जी - बदला तो वो अब लेगा कुंवर सा, क्यूंकि अभी तक वो पूरी तरह से आपके सामने आया नहीं है और वो मौका ढून्ढ रहा है सामने आने का...

अजीत पूछते हैं - इसका कोई उपाय है शास्त्री जी ?

प्रियानन्दिनी डर जाती हैं और कहती हैं - कोई उपाय नहीं करना हमें, तुम कल ही समर्थ को फ़ोन करना की आगे का काम हम किसी और से करवा लेंगे, और वैसे भी आर्किटेक्ट लोगों की कमी नहीं है दुनिया में |

शास्त्री जी कहते हैं - उपाय तो करना ही पड़ेगा क्यूंकि जितनी ज्योतिष विद्या मैं जानता हूँ कुंवर अजीत की कुंडली में आने वाला समय बहुत भारी है, इनकी गृह दशा ठीक नहीं है आप लोगों को समर्थ से सतर्क रहना होगा | ....और चाहे आप समर्थ से कॉन्ट्रैक्ट ख़त्म कर दे, पर जो शक्ति यह सब करवा रही है वो किसी और शरीर का सहारा लेकर भी आपसे बदला लेने आ सकती है |

तो अजीत पूछते हैं - फिर हमें क्या करना चाहिए शास्त्रीजी ?

शास्त्री जी कुछ सोचते हुए - हमें एक हवन करना होगा जिससे की हमें पता चल सके की जो शक्ति समर्थ के द्वारा आपको टार्चर करती है वो हमारे सामने आ सके, पर इसमें एक खतरा है अगर वो शक्ति समर्थ पे हावी हो गयी तो शायद हम में से किसी की जान भी चली जाए |

प्रियानन्दिनी कहती हैं - पर पंडित जी कुछ ऐसा हो सकता है की शक्ति हावी भी समर्थ पे हो और जान भी उसी की जाए |

अजीत भी प्रिया की बात सुनकर बोलते हैं - हाँ शास्त्री जी कोई तरीका तो होगा जिससे हम में से कोई न मरे ?

शास्त्री जी - तरीका है आप अपनी पुश्तैनी तलवार भी हवन सामग्री के साथ ले आना, क्यूंकि जब आपको सबसे पहले दृष्टिगोचर हुआ था तब समर्थ के हाथ में तलवार थी जैसा आपने बताया था !

अजीत - तलवार क्यों, मेरे पास तो लाइसेंस वाली पिस्तौल भी है वही ले आऊंगा मैं | अगर कुछ ऊंच नीच हुई तो एक गोली में ही समर्थ का काम ख़त्म हो जायेगा |

शास्त्री - नहीं कुंवर सा.... राजाओं के समय में तलवारें चला करती थी पिस्तौल नहीं, और तलवार से समर्थ को भी शक नहीं होगा की हमारी योजना क्या है, क्यूंकि तलवार शस्त्र पूजन के लिए भी काम में आती हैं |
प्रिया - तो हवन का समय और दिन क्या रहेगा शास्त्री जी ?

शास्त्री जी - इस शनिवार को सुबह 11 बजे बस इतना ध्यान रखना की यह योजना हम तीनों के अलावा किसी को भी पता नहीं चले |


अब कुंवर अजीत और प्रियनंदिनी महल की तरफ जाते हैं और देखते हैं की काम तो पूरा हो चूका है लेकिन समर्थ वहां नहीं है और ना ही उसकी टीम का कोई व्यक्ति, तब कुंवर अजीत समर्थ को फ़ोन लगाते हैं....इतने दिनों बाद कुंवर अजीत का कॉल आते हुए देख कर समर्थ तुरंत फ़ोन उठा लेता है और पूछता है - कैसे हैं सर, कब आये आप यूरोप से....?
जवाब में अजीत कहते हैं - मैं ठीक हूँ, तुम यह बताओ की जब महल का काम हो गया था तो तुमने बताया क्यों नहीं | वो तो आज जब मैं वहां गया तो मुझे पता चला !
समर्थ - सर वैसे मैं तीन दिन पहले ही आपके घर गया था लेकिन वहां जा कर मुझे पता चला की आप अपने घर पर नहीं हैं फिर मैंने आपको कॉल किया तो आपका फ़ोन भी स्विच ऑफ आ रहा था, तो मैं वापिस आ गया और सोचा की शायद आप बिजी होंगे तो दो तीन दिन बाद आपको कॉल करके खुद ही बता दूंगा की महल का काम पूरा हो गया है और अगले हफ्ते से ही मेरी टीम आपके होटल का काम शुरू कर देगी |

....नहीं नहीं ! - कुंवर अजीत बीच में बोलते हैं की होटल का काम शुरू करने से पहले मैं चाहता हूँ की हम वहां एक हवन करवा लें, क्योंकि महल का वह हिस्सा कुछ हज़ार साल पुराना है, और हमारे पंडित जी की सलाह पर इस शनिवार सुबह 11 बजे हमने हवन रखवाया है | मैं चाहता हूँ की तुम भी उस पूजा में आओ क्योंकि अब तो तुम भी हमारे परिवार का एक हिस्सा ही हो यार |
समर्थ - दरअसल सर मुझे शनिवार को थोड़ा काम है, पर मैं कोशिश करूँगा आने की |
समर्थ का ऐसा जवाब सुनकर अजीत सकपका जाते हैं और बोलते हैं - थैंक यू ! चलो बाय !


अब हवन के दिन शास्त्रीजी, कुंवर अजीत और प्रियनंदिनी महल में पहले से ही मौजूद होते हैं और समर्थ के आने का इंतज़ार कर रहे होते हैं तभी अचानक कुंवर अजीत के फ़ोन की घंटी बजती है, वो देखते हैं तो समर्थ का फ़ोन आ रहा होता है जिससे उन्हें लगता की कहीं समर्थ ने इसलिए फ़ोन तो नहीं किया की वो आ नहीं पायेगा अगर ऐसा हुआ तो उनका सारा प्लान चौपट हो जायेगा...उन्हें फ़ोन उठाते हुए डर लगता है लेकिन फिर भी वो फ़ोन उठा के हेल्लो बोलते हैं तो समर्थ कहता है - सर मैं यह पुराने महल के बाहर ही खड़ा हूँ पर मुझे पता नहीं चल रहा की कहाँ आना है...इतना कहते ही नेटवर्क प्रॉब्लम के कारण फ़ोन काट जाता है तो कुंवर अजीत भागते हुए नीचे समर्थ को लेने जाते हैं |

समर्थ के साथ महल में दाखिल होते हुए अजीत हर चीज़ से समर्थ का परिचय कराते हैं की यह जो तुम आँगन देख रहे यहां उस जमाने में नृत्य हुआ करते थे और राजा वहां बालकनी से उसे देखते थे |
उस सामने वाली बालकनी से रानी अपनी दासियों के साथ नृत्य का आनंद लेती थी... अजीत की बातें सुनकर समर्थ यह सोचने लगता है की उस ज़माने में महल कितना भव्य रहा होगा, यह सभी विचार समर्थ के मन में चल रहे थे की.... तभी कुंवर अजीत कहते हैं बस इन्ही सीढ़ियों से हमें नीचे जाना है सीढ़ियों से उतरकर जब वे नीचे पहुँचते हैं ही वे एक विशाल कक्ष में पहुँच जाते हैं जो की 52 स्तम्भों से बना हुआ होता है उसके मध्य में एक हवन कुंड होता है जिसके एक तरफ शास्त्री जी हवन सामग्री के साथ हवन की तैयारी में लगे होते हैं और प्रियनंदिनी भी वहीँ बैठी होती हैं तो कुंवर अजीत उनके बगल में बैठ जाते हैं और सामने समर्थ बैठ जाता है |

शास्त्री जी मंत्रो उच्चारण के साथ हवन शुरू कर देते हैं फिर धीरे धीरे हवन कुंड में अग्नि बढ़ने लागरी है तो वे कुंवर अजीत से कहते हैं - अब आप अपनी पुश्तैनी तलवार को हवन कुंड के मध्य में गाड़ दीजिये कुंवर सा, क्यूंकि महल में मौजूद वह अदृश्य शक्ति इस अग्नि का सहारा लेकर ही हमें कुछ बताने वाली है |
तो अचानक ही आग का एक गोला हवन कुंड के मध्य में से उठता है जिसे देख सबकी दररर के मारे आँखें बंद हो जाती हैं, फिर जब सब वापस आँखें खोलते है तो देखते हैं की हवन कुंड में हज़ारों साल पूर्व का एक दृश्य नज़र आ रहा है जिसमे - कुंवर अजीत एक राजा हैं और समर्थ भी किसी नगर का राजा है | समर्थ रानी जो की कुंवर अजीत की पत्नी हैं उन्हें पाना चाहता है और इसी बात पर दोनों में युद्ध हो जाता है तो समर्थ कुंवर अजीत की गर्दन पे तलवार रख देता है !!.... बस इतना ही दिखता और इसके बाद अग्नि सामान्य हो जाती है, जिसे देख प्रियनंदिनी कहती हैं लेकिन उस रानी की शक्ल मुझसे क्यों नहीं मिलती शास्त्री जी ? क्या यह मेरा दूसरा जनम नहीं है या मैं किसी दूसरी शक्ल के साथ जन्मी हूँ |


शास्त्रीजी कहते हैं - कुछ भी हो बेटी लेकिन यह तो तय है की समर्थ ने ही कुंवर अजीत को पिछले जनम में मारा था और इस जनम में भी ये ही कुंवर सा की मौत का कारण बनेगा इसीलिए हमे समर्थ की बलि चढ़ानी होगी |

इतना देखने और सुनने के बाद समर्थ कहता है - यह तो धोखा है तो आपने मुझे धोखे से यहां बुलाया है...ताकि आप हवन के बहाने मेरी बलि दे सको, मैं नहीं मानता इन बकवास बातों को यह पिछले जनम जैसा कुछ नहीं होता! मैं आपको क्यों मारना चाहूंगा कुंवर अजीत !

कुंवर अजीत कहते हैं - लेकिन अभी तुमने देखा ना उस हवन कुंड में जो भी दिखाई दिया, हम सब अंधे तो नहीं है, हम सबने देखा है वह दृश्य कैसे तुमने तलवार मेरी गर्दन पे रख दी थी !

अब समर्थ का गुस्सा बढ़ जाता है और वो कहता है - हाँ हाँ....लेकिन यह भी तो हो सकता है वह कोई और राजा हो और उसकी केवल शक्ल मुझसे मिलती हो ! वैसे भी अगर मैंने पिछले जनम में अजीत को मार दिया था तो इस तो इस जनम में मैं ऐसा फिर से क्यों करूँगा |

अब शास्त्री जी कुंवर अजीत को सतर्क करते हुए कहते हैं - कुंवर सा इसकी बातों में मत आना इससे पहले की वह शक्ति इस पर हावी हो, हवन कुंड के मध्य से अपनी तलवार उठाइये और ख़तम कर दीजिये इसे !

कुंवर अजीत एक ज़ोरदार मुक्का समर्थ के मुँह पे मारते हैं समर्थ के मुँह से जिससे खून बहने लगता है फिर वे हवन कुंड में से तलवार उठा लेते हैं |

समर्थ दर्द से कराह उठता है और कहता है - मेरा विश्वास कीजिये सर यह सब इस पंडित के द्वारा रची गयी एक कहानी है....सब झूठ है !

शास्त्री जी कहते हैं - यह कहानी नहीं हकीकत हैं, तुम पिछले जनम का बदला लेने आये हो....क्योंकि तुम प्रियनंदिनी को पाना चाहते हो और कुंवर अजीत के जिन्दा होते हुए तुम ऐसा कर नहीं सकते इसीलिए !

अब समर्थ का गुस्सा बढ़ जाता है और वो कहता है - की अगर मैंने पिछले जनम में अजीत को मारकर प्रियनंदिनी को पा लिया था तो इस जनम में मैं ऐसा फिर से क्यों करूँगा |

क्यूंकि मेरे हाथों मरने के लिए तूने यह जनम लिया है...नमक हराम, कुत्ते ! और तलवार का एक वार समर्थ के हाथ पे करते हैं तो उससे खून निकलने लगता है |

....अचानक हुए इस हमले से समर्थ संभल नहीं पाता तो शास्त्रीजी समर्थ को पकड़ लेते हैं और कहते हैं - कुंवर सा पकड़ लिया मैंने इसे, उड़ा दीजिये इसकी गर्दन और अजीत जैसे ही समर्थ पे प्रहार करते हैं तो वो अपने हाथों से नंगी तलवार को पकड़ लेता है और उसकी आँखों में एक ऐसा दृश्य दिखता है जैसे की वो पहले भी इसी तरह कुंवर अजीत की तलवार को पकड़ चुका है, तो समर्थ एक जोरदार लात अजीत के पेट में मारता है जिससे की अजीत के हाथ से तलवार छूट जाती है और वो ज़मीन पे गिर जाते हैं |

अब समर्थ एक धक्का मरता है जिससे की शास्त्री जी ज़मीन पे गिर जाते हैं और समर्थ नीचे गिरी तलवार उठा लेता फिर वो शास्त्री जी को चिल्ला के बोलता है - तूने ही भड़काया है ना इसको....यह सारी कहानी तूने ही गड़ी है ना, तो चल अब मैं तुझे ही ख़तम कर देता हूँ और तलवार से शास्त्री के पेट में ताबरतोड़ वार कर देता है जिससे शास्त्री जी की मृत्यु हो जाती है |

शास्त्री जी पर हुए इस वार से प्रियनंदिनी व अजीत डर जाते हैं और समर्थ का लहूलुहान गुस्से वाला चेहरा और उसके हाथ में रक्त से सनी हुई तलवार देखकर उनके पसीने छूट जाते हैं, और दोनों वहां से भागते हुए सीढ़ियों से ऊपर जाने लगते हैं तो समर्थ भी उनके पीछे भागने लगता है और चिल्लाता है - जब मैं कह रहा था की मैंने कुछ नहीं किया है तब आप लोग नहीं माने और अब इस पंडित के मरने के बाद भाग क्यों रहे हो !

दोनों को तेज़ भागता देख समर्थ अपनी गति तेज़ कर देता है देखता है की प्रिया सीढ़ियों पर ज़्यादा तेज़ नहीं चढ़ पा रहीं है तो समर्थ दोगुनी तेज़ी से सीढ़ियां चढ़ते हुए तलवार फ़ेंक देता है जो की प्रियानन्दिनी पीठ में घुस जाती है और वो लहुलूहान होकर वहीँ गिर जाती हैं | जब कुंवर अजीत मुड़कर देखते हैं की प्रिया के पेट में तलवार आर पार हुई पड़ी है तो वे प्रिया को उठाते हुए बोलते हैं - प्रिया उठो...प्रिया प्लीज उठो....मैं तुम्हारे बिना जी नहीं पाऊंगा ....!!
तो उन्हें समर्थ की आवाज़ आती है - वो नहीं उठेगी, क्यूंकि वो अब इस धरती से ही उठ चुकी है !

कुंवर अजीत जो गुस्सा आ जाता है तो वो प्रिया के पेट से तलवार निकालते हुआ समर्थ की तरफ चिल्लाते हुए दौड़ते हैं....हरामज़ादे तूने मेरी प्रिया को मुझसे छीना, अब मैं तुझसे तेरी जिंदगी छीनूँगा !

ये देख समर्थ डर जाता है क्योंकि कुंवर अजीत उस की तरफ भागते हुए आ रहे होते हैं तो समर्थ भागने लगता है और भागते हुए वो एक स्तम्भ से टकरा जाता है जिससे उसे चक्कर आने लगता हैं और वो बेहोश हो जाता है |
दूसरी और अजीत जब सीढ़ियों से नीचे उतर कर आ रहे होते हैं तो उनका संतुलन बिगड़ जाता है और वे लगभग २० फुट नीचे घिसते हुए सीढ़ियों से गिर जाते हैं तभी उन्हें कुछ ऐसा दिखाई देता है जिससे की उनके मुँह से निकल पड़ता है - नहीं सूर्यनन्दिनी....सारा महल इस आवाज़ से गूंज उठता है जिससे कुंवर अजीत भी चक्कर खाकर बेहोश हो जाते हैं !


....आप सब यह सोच रहे होंगे की यह सूर्यनन्दिनी कौन हैं, कहीं यह प्रियनंदिनी ही तो नहीं, लेकिन प्रियनंदिनी तो मर चुकी है और तो फिर यह सूर्यनन्दिनी कहीं कुंवर अजीत के पिछले जनम की पत्नी तो नहीं अगर ऐसा है तो अभी तक समर्थ को कुछ भी याद क्यों नहीं आ रहा क्या समर्थ को कुछ याद आ पायेगा या वो बिना कुछ याद आये ही कुंवर अजीत को फिर से मार देगा ?

और सबसे बड़ा सवाल ये सूर्यनंदिनी कहाँ है ?


यह जानने के लिए पढ़िए सूर्यनंदिनी एक रहस्य - पार्ट 2 https://hindi.pratilipi.com/read?id=4701413002182656

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