प्रमाण पत्र


कम्मु (कमल) और तन्नु (तनुजा) जिन्दगी के उस दौर से गुजर रहे थे जब यह दुनिया, यह महफिल आदमी के किसी काम की नहीं रह जाती और वह अपने यार की केवल एक झलक पाने के लिए खुदा तक को किसी को देने के लिए तैयार रहता है। तनुजा की बडी बहन पुन्नु (पुनीता) उन्हें कई बार समझा चुकी थी कि जिस रास्ते पर वे चल रहे हैं, वह उनके लिए ठीक नहीं है। वे अपने माता-पिता को तो धोखा दे ही रहे हैं, साथ ही अपनी जिन्दगी के साथ भी खिलवाड कर रहे हैं। यह उम्र पढने- लिखने की है। अगर वे इस अवसर को चूक गए,तो उन्हें जिन्दगी भर पछताना पडेगा। किन्तु जवानी के गुलाबी नशे में झूमते, प्यारकी तिलस्मी दुनिया की दहलीज पर खडे उसके छोटे भाई-बहन उसकी संकोचशील एवं दब्बू प्रवृति का लाभ उठाकर मनमानी करते।

रमेश ने तनुजा को एक बजे रोज गार्डन में बुलाया था। वहीं से ज्योति थियेटर में मैटिनी शो देखने का भी प्रोग्राम था। किन्तु रमेश स्वयं समय की सीमा तोड कर साढे ग्यारह बजे ही तनुजा के घर पहुँच गया। कन्नु कालेज चला गया था। बाबू जी अपने दफ्तर और माताजी संतोषी माता के मन्दिर। घर में पुनीता अकेली थी। रमेश ने घण्टी बजाई तो वह किताब हाथ में उठाए ही दरवाजा खोलने आ गई।

“तुम.! “ उसे देखते ही पुनीता ने घबराहट में पूछा ?

“जी मैं.. रमा-ईश ।“रमेश ने फिल्मी अंदाज में उत्तर दिया।

“मगर रमेश, मुझे तुम्हारा इस तरह चोरी-छिपे घर आना अच्छा नहीं लगता।“

“चोरी-छिपे आना मुझे भी कहाँ अच्छा लगता है। मगर तुम पत्थर की मूर्ति हो पुन्नु, जिसके दिल में न कोई भाव है न उमंग। बस दिन-रात किताबें, कडुवे खतरनाक मिक्सचर और टैस्टट्यूबस। एक वह है, तुम्हारी छोटी बहन तन्नु, जिसे किसी भी बात से कभी कोई इनकार नहीं।“ रमेश ने कहा।

“वह बच्ची है। उसे भले-बुरे की समझ नहीं है।

“तुम हो न एक समझदार, जो बेकार ही अपना अनुपम सौन्दर्य और जवानी कैमिकल्स में नष्ट कर रही हो। “ रमेश ने व्यंग्य किया।

“इस सौन्दर्य और जवानी की कीमत तुम्हे कुछ साल बाद मालूम पडेगी, जब धोबी के कुत्ते की तरह तुम न घर के रहोगे न घाट के। जवानी और खूबसूरती की जिस चकाचौंध में तुम पढाई-लिखाई,मान-मर्यादा और उचित-अनुचित भूल चुके हो, वह दो-चार साल बाद गायब हो जाएगी और तुम हाथ मलते रह जाओगे।“फुनीता ने कहा।

“तुम से बहस करना बेकार है। लेकिन मुझे दुख होता है कि म्रेरे कालेज की सबसे हसीन और कमसिन लडकी जहरीले कैमिकल्स में अपनी सुन्दरता गला रही है। मैनें तुम से पहले भी कहा था पुन्नु कि तुम मुझे बेहद पसंद हो।“

“और मैनें भी तुमसे कहा था कि तुम मुझे बिल्कुल पसंद नहीं हो। तुम सुन्दर हो, स्वस्थ हो,पैसे वाले हो मगर तुम अच्छे इन्सान नहीं हो।तुम पैसे के दम पर रस के लोभी भँवरे हो। मैं चाहती हूँ कि तुम मेरी भोली-भाली मासूम बहन तन्नु का पीछा छोड दो उसे पढने –लिखने दो ।“

“तन्नु को मैने नहीं, बल्कि उसने मुझे फंसाया है। मैं तुमसे प्यार करता हूँ।मैं केवल तुम्हें चाहता हूँ। लेकिन तुमने कभी मेरी कीमत नहीं जानी। इसलिए तुम्हारे पास आने के लिए मुझे उसका सहारा लेना पडा। लेकिन वह बेवकूफ मुझसे प्यार करने लगी है। वास्तव में मैं किसी भी कीमत पर तुम्हें चाहता हूँ। “ रमेश ने भावुकता में कहा।

“यह कोई नई बात नहीं है। पहाड पर चढने के बाद आदमी खुद को पहाड से ऊँचा समझने लगता है। मगर मुझे पाने का विचार ही छोड दो तो अच्छा है।“

“तुम्हें अपने रूप का बहुत घमन्ड है पुन्नु ?”

“तुम्हे जो समझना है, तुम समझो। कम से कम मैं ऐसा कुछ नहीं समझती ।“

“याद रखना पुन्नु, अहंकार का परिणाम अच्छा नहीं होता ।“ रमेश ने कहा और एक झटके से बाहर निकल गया।

रमेश का वाक्य पुनीता के दिल में अभिशप्त तीर सा लगा। मगर वह दरवाजा बन्द करके अपने स्टडी टेबल पर आ गई और भारी-भरकम पुस्तक में आँखें गडा दी।


पुनीता जितना ही तनुजा और कमल को समझाने का प्रयास करती, वे उतने ही उदण्ड और ढीठ होते जाते थे। वह चाहती थी कि अपने छोटे भाई-बहन की करतूत अपने माता-पिता को बता दे। किन्तु कम्मु और तन्नु उसके पैर पकड कर गिडगिडाते और वह अपने मुँह पर ताला लगा लेती। इस रहस्य को छिपाए रखने में जितनी ही देर होती जाती थी,पुनीता अपराध बोध से उतनी ही दबती जाती थी। कई बार उसके मन में आया कि वह उन्हें घर में छोड कर कहीं बाहर चली जाए।उसके माता-पिता आएँगे तो स्वयं देख लेंगे। वह उन चारों को स्वतंत्र छोड कर कोई गलत कदम उठाने का अवसर भी न देना चाहती थी। वह एक अजीब दुविधा में फंस गई थी। रमेश को देखते ही एक अभिशप्त तीर की की कसक उसके हृदय में टीसने लगती थी। वह लाख चाहती कि उसकी ओर ना देखे किन्तु रमेश की बातें उसका ध्यान उधर खींच लेती थी।

एक बार तनुजा के स्कूल से पत्र आया। प्रिंसीपल ने लिखा था कि आपकी लडकी कई-कई दिन स्कूल में नहीं आती है। उन्हें लडकी के हाव-भाव से उसके आचरण पर संदेह होता है। इसलिए कृपया आप अपनी लडकी को समय रहते संभालें।

तनुजा के पिता पत्र पढकर बहुत दुखी हुए। किन्तु जवान बेटी को वे क्या कहते। उन्होंने डांट-डपट कर उसे छोड दिया। लेकिन उसकी माँ सतर्क हो गई और वह स्कूल तक उसके साथ जाने-आने लगीं। तनुजा चुप और खोई-खोई सी रहने लगी। उसकी माँ उससे ढेरों सवाल पूछती। किन्तु वह खामोश रहती और कभी कोई उत्तर देती भी तो बिल्कुल अटपटा । कुछ ही दिनों में उसकी खामोशी विद्रोह बन कर उभरने लगी। वह घर की चीजों को तोडती-फोडती। अपनी कापी-किताबों को फाड डालती। यहाँ तक कि वह रसोईघर में जाती तो अपने कपडों में आग लगाने की कोशिश करती। तनुजा की हरकतें देखकर उसकी माँ भयभीत हो उठी। उन्होने पुनीता से इस बारे में बात की तो वह अनजान बन कर सुझाव देने लगी।

“ मेरे ख्याल में ऐसा कुछ नहीं है मम्मी। आप उसे अकेली स्कूल जाने दें,सब ठीक हो जाएगा।“

“नहीं पुन्नु ! तन्नु किसी चक्कर में पडकर रास्ते से भटक गई है ।“ माँ ने अपनी चिंता व्यक्त की।

“अगर आपको ऐसा लगता है तो उसकी शादी कर दो। इसमें ज्यादा सोचने-समझने की कहाँ जरूरत है ?’

“ लेकिन बेटा, जब बडी बहन और भाई की शादी नहीं हुई, तो बच्ची की शादी पहले कैसे कर दें?”

“तो फिर बच्ची के बारे में ऐसी बातें भी क्यों सोचती हो। क्यों नहीं उसे बच्ची समझ कर स्वतंत्र रूप से स्कूल जाने देती। वह भी तो अपना भला-बुरा सोच सकती है।“ पुनीता के शब्दों में झुंझलाहट उभर आई थी।

“ पुन्नु ! बेटा तुम्हें मैने कभी कुछ कहा । तन्नु में मैने ऐसा कूछ देखा है,तभी कुछ कह रही हूँ।“

“तो फिर आप जाने, मैं आपको क्या कह सकती हूँ।“ पुनीता ने कहा और जाने लगी। “पुन्नु,तुम तो मेरी समझदार बेटी हो। तुमने हमेशा मुझे सही राय दी है, फिर ऐसे नाजुक मौके पर तुम चुप क्यों हो गई?”

“क्योंकि जरा सी बात को आपने पहाड बना दिया है। यदि आप सचमुच ही मेरी राय जानना चाहती हैं, तो तन्नु की शादी कर दो सब ठीक हो जाएगा।“

“बडी बहन और भाई को छोड कर छोटी की शादी कैसे कर दें बेटा, लोग क्या कहेंगे, समाज में न जाने कैसी-कैसी बातें होने लगेंगी।“

“अगर समाज की इतनी ही परवाह है, तो मत करो कुछ भी। बैठो चुपचाप। मगर क्या तब भी आप चैन से रह पाएंगी ?”

“पुन्नु , आज अपनी माँ से इतनी रूखी-रूखी क्यों है बेटा ! अगर तू ही मेरा साथ नहीं देगी तो कौन मेरी मदद करेगा।“

“लेकिन आप किसी की बात मानती कहाँ हैं।

मैं तेरी बात मान लेती हूँ। तू भी मेरी एक बात मान ले। तन्नु के साथ-साथ तू भी शादी कर ले । हम दोनों की शादी एक साथ कर देंगे। फिर किसी को कुछ कहने-सुनने का मौका नहीं मिलेगा।“ उन्होनें कहा और पुनीता के चेहरे पर नजरें गडा दी।

“ एक ने कुँए में छलांग लगा दी तो, क्या मैं भी उसके पीछे कूद पडूँ ? नहीं मम्मी ! मैं ऐसा कुछ नहीं करूँगी। मुझे अभी पढना है। आप तन्नु की शादी करके चिंतामुक्त हो जाओ।“ पुनीता ने जोर देकर कहा।

माँ के पास पुनीता से तर्क करने का कोई कारण नहीं था। वैसे भी वह कुछ गलत नहीं कह रही थी।वह पढना चाहती है तो उसे पढने से क्यों रोका जाए। माता-पिता भी यही चाहते हैं कि उनकी सन्तान पढ-लिख कर की उनका नाम रोशन करेँ।

फिर एक दिन पता तला कि तनुजा मर्यादा की सीमा लांघ कर प्यार की बलि चढ गई। तनुजा की प्रिन्सीपल का पत्र संयोग से सीधा पुनीता के हाथ में पहुँच गया। वह पत्र पढ कर अवाक् रह गई। किसी से कुछ कहने-सुनने का भी अवसर नही रह गया था। पुनीता स्वयं को इसका दोषी मान रही थी। क्यों न पहले ही दिन उसने अपने माता-पिता को सब कुछ साफ-साफ बता दिया? मगर कम्मु-तन्नु भी तो बच्चे नहीं हैं। कन्नु बी.ए. फाइनल में और तन्नु हायर सेकेन्डरी मं पढ रही है। फिर उसकी मानता भी कौन है। उसने तो अपनी तरफ से उन्हें समझाने की पूरी-पूरी कोशिश की थी। लेकिन वे उसी पर जूठा आरोप लगाने की धमकी देकर उसे ब्लैकमेल करते रहे।

तनुजा स्कूल से लौटी तो पुनीता उसे अपने कमरे में ले गई और उसे सामने बैठा कर उसे ऊपर से नीचे तक देखने लगी।

“क्या हुआ दीदी ! तुम मुझे ऐसे क्या देख रही हो ? ” तनुजा ने पूछा।

“देख रही हूँ,मेरी छोटी सी गुडिया ने कितना बडा फैंसला खुद अकेले ही ले लिया ! “

“ऐसा क्या बडा काम हो गया दीदी ?”

तन्नु यह क्या किया तू ने? तू ने मुझसे वायदा किया था कि तुम कोई गलत काम नहीं करोगी ।‘

“मैने कोई गलत काम नहीं किया है। रमेश ने भगवान के सामने मुझसे विवाह किया है।“ तनुजा ने निर्भीकतापूर्वक उत्तर दिया।

“क्या.... ? अरे तुझे अपने भविष्य की, अपने माता-पिता की इज्जत की भी परवाह नहीं ?”

“ भविष्य किसने देखा है दीदी ! तुम्हें भविष्य की ज्यादा चिन्ता है तो बैठी रहो, मैं रमेश के बिना एक पल भी नहीं रह सकती।‘

“ तो क्या घर से भाग जाएगी ? “

“भागूंगी क्यों, रमेश के मम्मी-पापा ने मुझे स्वीकार कर लिया है और वे जल्दी ही हमारी शादी की बात करने आ रहे हैं ।“

‘ तन्नु तुझे अपनी पढाई- लिखाई की भी चिन्ता नहीं ?”

“पढाई-लिखाई के लिए तुम जो हो दीदी ।मैं पढ-लिख कर डिग्रियाँ नहीं बटोरना चाहती। मैं तो अपनी छोटी सी गृहस्थी बसा कर जिंदगी जीना चाहती हूँ, एक प्यार भरी, दुख-दर्द से दूर वास्तविक जिन्दगी । बडी-बडी डिग्रियाँ लेकर भी आखिर वही करना है जो एक सामान्य लडकी करती है तो उससे लाभ क्या ? और तुम्हें ज्यादा दुख न हो तो मैं यह भी बता देना चाहती हूँ कि कमल भैया भी प्रिया को भगवान के सामने माला पहना चुके हैं और प्रिया के माता-पिता भी उनकी शादी की बात करने आने वाले हैं।“

“मुझे तेरी बातें सुन कर आश्चर्य हो रहा है तन्नु ! तुमने मुझे पता तक नहीं लगने दिया ।‘

“पता तो तब लगता जब तुम्हें किताबों से फुर्सत मिलती। तुम तो दिन-रात मोटे-मोटे ग्रंथों में डूबी रहती हो। एक बात पूछूँ बडी-बडी किताबों मे आँखें फोड कर तुम्हें मिलेगा क्या । ?”

तनुजा के विवाह की बात चली,तो रिस्तेदारों में पुनीता का सवाल भी उभरा। बडी बेटी को छोड कर छोटी का रिस्ता कैसे किया जा सकता है? इसी बात को लेकर पुनीता की माँ ने सब कुछ जानते हुए भी उस से पूछा “ पुन्नु बेटा, तन्नु ने तो हमारी नाक कटवा दी। लेकिन जब तक तेरी शादी न हो जाए, हम उसकी जिद्द कैसे पूरी कर सकते हैं। इसलिए बेटा ! अगर तुझे भी कोई लडका पसंद है तो बता दे ।हम उसके सामने हाथ-पैर जोड कर मना लेंगे।“

“मम्मी, अपनी बेटी पर भरोसा नहीं आपको ?” पुनीता ने दुखी स्वर में कहा।“

“भरोसा तो तन्नु पर भी कम नहीं था हमें। लेकिन जो उसने किया वह तो हमने कभी सपने में भी नहीं सोचा था।मगर गलती हमारी ही थी जो जवान लडकियों पर हमने इतना भरोसा किया। “

“ मैं तन्नु नहीं हूँ माँ। मैं तुम्हें कभी शिकायत का मौका नहीं दूँगी ।“

“ तो भी बेटा, अब क्या जिन्दगी भर पढती ही रहेगी ।“

“ मम्मी मैं अपनी सोलह साल की मेहनत पर केवल इसलिए पानी फेर दूँ कि आपको तन्नु से पहले मेरी शादी करनी है। नहीं मम्मी, मैं एम.एस.सी. का एग्जाम दूँगी ही और अगर मेरा चांस बन गया तो पी.एच.डी. भी जरूर करूँगी । इसलिए आप समाज की, रिस्तेदारों की चिन्ता के बिना तन्नु की शादी कर दो। सब ठीक हो जाएगा। “ पुनीता ने जोर दे कर कहा।

बेटी के निर्भीक और दृढ विचारों से सहमत माँ ने पति को समझा-बुझा कर तनुजा की शादी के लिए राजी कर लिया। कमल भी बी.ए. पास करके नौकरी लग गया और प्रिया से शादी करके उसे घर ले आया। पुनीता यूनिवर्सिटी में दिव्तीय स्थान पर आई थी। इसलिए उसे सरलता से पी. एच. डी. के लिए विषय मिल गया ।वह फिर अपनी किताबों में खो गई।

तनुजा की शादी के बाद वह वह स्वयं को चिनतामुक्त तथा निर्द्व्न्द अनुभव कर रही थी। कभी-कभी प्रिया की महत्वाकांक्षांए घर में कलह का कारण बनती, किन्तु पुनीता बीच-बचाव करके बात को टाल देती। बाबूजी तक कोई बात पहुँच ही नहीं पाती।कमल अपनी बडी बहन की समझ-बूझ और मेहनत से अभिभूत था। प्रिया भी पुनीता की सेवा में लगी रहती। तनुजा जब कभी पिता के घर आती तो वह भी अपनी बडी बहन के आगे-पीछे घूमती रहती।पुनीता उसे देख कर खुश होती। छः-सात महीने में ही रंग-रूप निखर गया था और उसका शरीर गदरा गया था। उम्मीद से होने के कारण उसके शरीर में एक नई कान्ति प्रकट हो गई थी।

सब कुछ होते हुए भी रमेश की नजरें पुनीता पर ही जमीं रहती। वह ललचाई नजरों से उसे घूरता रहता। जब कभी अनचाहे ही पुनीता की नजरें उससे मिल जाती तो वह सिहर उठती। उसे लगता जैसे रमेश आज भी उसे पाने के लिए लालायित है। किन्तु वह निर्णय नहीं कर पाती कि यह उसका प्रेम है या प्रतिशोध। मगर तन्नु का ध्यान आते ही वह अपने विचारों को झटक देती और अपनी किताबों में डूब जाती।

एक साल में ही तनुजा एक बेटे की माँ बन गई। बच्चा अपने पिता पर गया था।पुनीता उसे गोद में उठाती तो उसे रमेश सामने नजर आता और वह चाह कर भी बच्चेको प्यार नहीं कर पाती। किन्तु रमेश अपने बच्चे को उसकी बाहों मे देखता तो एक सुखद अनुभूति से भर उठता और पुनीता को एकटक देखता रह जाता। पुनीता छटपटा कर रह जाती और बच्चे को छोड कर अपनी पढाई में खो जाती।

पुनीता ने पी.एच.डी. का परिणाम अपने माता-पिता को सुनाया तो वे खुशी से झूम उठे। लेकिन जब उसने आगे रिसर्च के लिए विदेश जाने की बात उन्हें बताई तो उन्हे गहरी ठेस लगी।उसकी माँ ने कहा “ पुन्नु , पढाई की भी आखिर कोई हद तो होगी बेटा। पहले तुझे एम.एस.सी की धुन थी, फिर पी.एच.डी. बीच में आ गई और अब विदेश जा कर क्या करना चाहती है?”

“माँ पढाई की कोई हद नहीं होती, आदमी जब तक चाहे पढ सकता है।“

“लेकिन बेटा ! उम्र की तो हद होती है। तेरे छोटे भाई-बहन बाल-बच्चेदार हो गए। तू क्या बूढी हो कर शादी करेगी?”

“देखो माँ तुमने फिर वही राग शुरू कर दिया। जरूरी तो नहीं कि हर आदमी शादी करे ही। फिर मैं तीन साल के लिए ही तो अमेरिका जा रही हूँ। यह तो तुम्हारे आशीर्वाद से मुझे चाँस मिल गया, वरना लोग अपने खर्च पर भी विदेश नहीं जा पाते।“

एक महीने में ही सब तैयारी करके पुनीता अमेरिका जाने के लिए दिल्ली एयरपोर्ट पर पहुँच गई। पूरा परिवार उसे विदा करने दिल्ली आया था। रमेश की आँखें आखिरी क्षण तक पुनीता के चेहरे पर जमीं रहीं। किन्तु वह निष्ठुर पत्थर की मूर्ति भावहीन चेहरा बनाए दोनों हाथ जोड कर हवाई जहाज की ओर बढ गई।

तीन साल बाद पुनीता अपने घर लौटी तो वह अपना चुम्बकीय आकर्षण खो चुकी थी। मानसिक तनाव और रात-दिन की कडी मेहनत से उसकी कमल सी बडी-बडी आँखों के नीचे काली धारी उभर आई थीं। उसके हंसते होंठ और फूल से खिले चेहरे का कसाव ढीला पड गया था। उसकी माँ तो उसे देख कर ठगी सी रह गई। बीमार पिता ने भी अपनी परी सी सुन्दर बच्ची को जवानी की दहलीज लाँघते देखा तो छटपटा कर रह गए ।सबसे दुखदायी उन्हें पुनीता के वे शब्द लगे जिसमें उसने बताया कि बैंगलोर की एक दवा निर्माता कम्पनी में उसे डायरेक्टर की नियुक्ति का प्रस्ताव मिला है। पुनीता ने जिस दवाई की खोज की है उसे बना कर वह छोटे-छोटे बच्चों को एक जानलेवा बीमारी से मुक्ति दिला देगी।उसकी इखोज की दुनिया में खूब प्रशंसा हुई है और उसे अनेक सम्मान तथा प्रमाण पत्र दिए गए हैं।

उसके पिताजी तो कुछ नहीं बोले। किन्तु उसकी माँ से न रहा गया। वह दुखी स्वर में बोली “ पुन्नु बेटा ! तुमसे कुछ कहने की हिम्मत तो नहीं होती ।तुम पढी-लिखी और समझदार हो। दुनिया भर में नाम कमाया है तुमने। लेकिन तुमने मेरी ममता का गला घोट दिया। मेरी फूल सी बच्ची की तमाम खुशियां छीन ली।‘ उनकी आँखें भर आई थी और गला रूँध गया था उनका।

“माँ मेरा सपना पूरा हो गया। अब मैं तुम्हारे सारे सपने साकार कर दूँगी। बस मैं एक बार बैंगलोर जाकर अपनी दवाई का सैम्पल कम्पनि को दे दूँ। फिर तुम जहाँ कहोगी, मैं शादी करके अपनी गृहस्थी बसा लूँगी।“ पुनीता ने माँ को समझाया।

हाल ही में पुनीता को राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था। वह पुरस्कार प्राप्त करने दिल्ली गई थी। उसने अपने माता-पिता को भी इस अवसर पर दिल्ली पहुँचने के लिए आग्रह किया था। किन्तु वे नहीं आए। उन्होने कमल और तनुजा को उनके परिवार सहित भेज दिया था।पुनीता आग्रह करके उन्हें अपने साथ बैंगलोर ले गई। सब लोग उसका आलीशान बँगला और मोटर गाडियां देख कर खुश तो बहुत हुए, किन्तु उसके पागलपन पर उन्हें दुख भी बहुत हुआ। रमेश को तो जैसे उससे नफरत सी हो गई थी। पुनीता कई बार उसके सामने अकेली आई भी, किन्तु उसने उसकी तरफ देखा तक नहीँ।

कन्नु के दो बच्चे थे। तन्नु भी दो बच्चों की माँ बन चुकी थी, किन्तु अभी भी उसका खिला –खिला सौन्दर्य बरबस ही अपनी ओर आकर्षित करता था।। प्रिया का शरीर भी आत्म संतोष से प्रफुल्लित था। पुनीता ने सबको हंसता-खेलता देख कर हंसने का प्रयास किया। किन्तु उसे अनुभव हुआ कि वह तो हंसना जानती ही नहीं। उसे याद नहीं आता कि वह कभी हंसी भी थी। उसके चेहरे पर एक निर्जीव कठोरता और आँखों में सूनापन समा गया था।उसके चेहरे से हंसी लुप्त हो चुकी थी। उसने घबरा कर स्वयं को दर्पण में देखा तो छटपटा उठी। उसकी आँखों के नीचे काली परत, मुरझाए पीले होंठ, बालों में जहाँ-तहाँ सफदी और चेहरे पर थकान की उदासी ही शेष बची थी।

उसने चोरी से रमेश की ओर देखा। दोनों की आँखें मिलीं। किन्तु रमेश ने उपेक्षा से मुँह फेर लिया। पुनीता तडप कर रह गई । रमेस एक सप्ताह वहां रहा लेकिन उसने पुनीता से एक शब्द भी ऩहीं कहा। वह बच्चों के साथ खेलता रहता या कमल और प्रिया के साथ बातें करता। कभी-कभी वह सबको साथ लेकर घूमने चला जाता। लेकिन जैसे भी हो वह पुनीता से बचने का भरसक प्रयत्न करता । पुनीता का मन कहता कि वह उनसे पूछे कि उसने ऐसी कौन सी गलती की है। क्या पढना-लिखना, अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन पाप है। क्या मनुष्य भी जानवरों की भान्ति खाने और बच्चे पैदा करने के लिए ही है। मगर वह किसी से कुछ न कह कर चुप रह जाती। वह अपने जीवन के फैंसले से सन्तुष्ट थी।

वे जब अपने घर वापिस जाने लगे तो पुनीता उदास हो गई।किन्तु इस बार किसी ने उससे शादी के विषय में बात नहीं की। उन सब की इच्छा थी कि वे पुनीता से कुछ कहें।मगर क्या कहे उन्हें समझ नहीं आ रहा था ।वे सब जाने को अपना सामान उठा रहे थे। किन्तु पुनीता निरविकार रूप से सोफे पर बैठी ड्राइग रूम में सजे प्रमाम पत्रों को देखती रह गई ।***

--प्रभु मंढइय़ा “विकल”

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