बात उन दिनों की है जब मै बी.ए. प्रथम वर्ष की तयारी कर रही थी| किताब लेकर मै प्रतिदिन छत की मुंडेर पर बैठ जाती और बगल वाले आँगन में देखती रहती ....उस नन्ही सी ,दुबली सी ,सांवली मनमोहक चेहरे वाली ,दो ढाई साल की प्यारी सी बच्ची पार्वती को. ...|

पार्वती के पिता ने अंग्रेजी से एम.ए. तक पढ़ी,.... किन्तु बिना माँ बाप की बेटी, पार्वती की माँ, को तलाक दे दिया था.....,और अब पार्वती अपनी माँ के साथ सौतेले पिता के अत्याचारों को सह रही थी |

........वो काला ,लम्बा ,बेडोल शरीर वाला, एक आँख से काणा ,मुँह पर चेचक के दागों से बदसूरत और पहले से तीन बड़ी बेटियों का बाप था , जिसकी पहली पत्नी मर चुकी थी |

.........पार्वती के लिए साक्षात् यमराज जैसा वो भयानक हैवान एक सरकारी स्कूल में मास्टर था |.....बेटा पैदा करने की चाह में इस आदमी ने पार्वती की माँ से शादी की थी |.....पढ़ी लिखी पार्वती की माँ की शादी इस आदमी से करा के भाई-भाभी ने अपना बोझ उतार दिया था |

.......माँ के साथ आई पार्वती को घर में दादी, बुआ,सौतेली बहिनें ,सौतेले पिता किसी ने नहीं अपनाया,....उसे जीने लायक खाना पानी उसकी माँ सबसे छुपकर दे दिया करती ,कभी कभी उसके कपडे बदल देती ....

बेटी पर उसे दया तो आती होगी..... पर उसे बेटी से दूरी बनानी पड़ती थी ...क्योंकि मास्टर इसका गुस्सा पार्वती की बेरहमी से पिटाई करके निकलता था,.....और वो शायद इस उम्मीद में थी कि एक दिन सब ठीक हो जायेगा| जिस दिन बेटा पैदा हो जायेगा.... सब पार्वती को भी अपना लेंगे.......औरत माँ बनकर शायद और भी मजबूर हो जाती है|

जेठ की भरी दोपहरी में पार्वती दिन और रात एक टाट पर बैठी रहती, उसी पर सो जाती....,जब धूप चढ़ती तो वह दीवार की ओर सिमटती जाती, ..... जिस उम्र में माँ की छाती से लिपटकर सोना था........पार्वती अँधेरे की चादर ओढ़ कर........... अकेले दीवार के सहारे पड़ी रहती ,

....बड़ी सख्त जान थी ...न धूप से जलती थी ,न भूख से मरती थी ,न ज़मीन पर उसे साँप ,बिच्छू जैसे कीड़े काटते थे |

जब भी मैं उसको प्यार से आवाज़ लगाती ..."पार्वती" ........ !! ...खिलखिला जाती ,......ऐसे देखती मानो कह रही हो ..."मुझे गले लगा लो "...|


सोशल मीडिआ उन दिनों इतना जागरूक नहीं था ,.....छोटे कस्बों में मध्यम वर्गीय लोग किसी के घरेलू मामलों में दखल नहीं देते ,.....में भी कभी हिम्मत नहीं कर पाई....., बस सहानुभति से उसे देखती रहती ...|


एक सुबह पार्वती की माँ की ज़ोर ज़ोर से रोने की आवाज़ से मैं घबराकर जाग उठी ,.....पता चला....... पार्वती मर गई !!!

दुष्ट क्रूर सौतेला बाप जो उसे बेरहमी से मारा करता था...... उस नन्ही सी जान को उठाकर ज़मीन पर पटक देता था |

ये सब देख नहीं पाती थी मैं .....उठकर कमरे में चली जाती थी ,वहां भी पार्वती की चीखें मुझे बेचैन कर देती थीं .......,

आज वही सौतेला बाप समाज को दिखाने के लिए घड़ियाली आँसू बहा रहा था.......... ,पार्वती का अंतिम संस्कार कर रहा था ,

पार्वती की माँ बिलख बिलख कर रोते हुए कह रही थी ....."मार डाला इसने मेरी पार्वती को ये मुझे भी मार डालेगा "...पुचकार के चुप कराने की आड़ में सास और शादीशुदा ननद उसका मुँह बंद कर रही थीं |

.....और...........


"पार्वती चली गई".....


मगर मेरी कहानी यहीं खत्म नहीं हुई .......

मास्टर ने ट्रांसफर करा लिया और पार्वती की माँ को लेकर वह दूसरे शहर चला गया | करीब डेढ़ दो साल बाद पार्वती की माँ पति के साथ ससुराल वापस आई बहुत सुन्दर हृष्ट पुष्ट और प्रसन्न लग रही थी....महँगे कपड़े ,गहरा श्रृंगार ,गहनों से लदी हुई अत्यंत प्रसन्न लग रही थी | सास ननद उसे खूब लाड़ कर रही थीं,सौतेली बेटियों ने अब उसे मम्मी कहना शुरू कर दिया था, ..पति उसे पलकों पर रख रहा था ,ऐसा लग रहा था मानो दुनियाँ में सबसे खुशनसीब वही है |

और.........

उसकी गोद में एक गोरा, स्वस्थ, खिलखिलाता ......बेटा था......

ये कहानी का सुखद अंत हो सकता है .....किन्तु इस अंत ने मुझे व्यथित कर दिया |

आस पड़ोस वाले उससे खुश होकर मिल रहे थे........,

मगर.......

मै बेचैन थी ....."इस ख़ुशी के लिए क्या पार्वती का मरना ज़रूरी था ?"


पार्वती चली गई ......."उसका क्या कसूर था ?"


"कैसे इस औरत ने पार्वती को भुलाकर इस आदमी को अपनाया होगा..?????????"


जिस पार्वती की माँ से मेरी सहानुभूति रहती थी..... आज मुझे उससे नफ़रत हो रही थी .....मन में अंतर्द्वंद का तूफ़ान उमड़ रहा था .....मानो मै सदमे में थी....!

सब भूल गए उसे............ मगर मुझे ........


..............आज भी ......याद है .........


"एक थी पार्वती"







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