पच्चीस साल पहले

कप मे चम्मच से चीनी मिलाते हुए ,पहली बार मुझे महसूस हुआ कि ये छोटी सी क्रिया कितनी महत्त्वपूर्ण हो सकती है ,खासकर तब जब उन दो लोगो के बीच बातचीत करने के लिए कुछ भी ना हो,जिन्हें चौबीसो घंटे भी काम पड़ते थे, कुछ कहने और कुछ सुनने के लिए.मैं तुम्हे कनखियों से देख रही थी,तुम्हारी आँखे ढून्ढ रही थी,यौवन की चपलता,अनछुए सौंदर्य और भावनाओ की निर्मलता को. हाँ कुछ भी तो शेष नहीं रहा मेरे पास.देख रही थी तुम्हारे बालो से भी सफेदी झाँक रही थी,माथे पर सलवटें ,चहरे पर रौब,सफलता का संतोष तो नहीं कह सकती ,मगर सफलता के मद मैं चूर तुम्हारी आँखें. नहीं तुम पच्चीस साल पहले वाले रोशन नहीं हो.घुंघराली लटो को ऊपर उठाते,बैग को आड़ा तिरछा पकड़ घुमावदार मोड़ो पर सरपट चाल से दौड़ते हुए रोशन तो नहीं लगते.

आज से पच्चीस साल पहले मेरा यौवन तुम्हारे सामीप्य की गर्मी से खिल उठा था,और तुम्हारी जडता मेरे स्नेह की गर्मी से गल रही थी.तुम्हारी माँ को तुमने किसी दुसरे की बांहो मैं झूलते देखा था,और मैं रोज़ ही अपने पिता को सिगरेट के छल्लों मै माँ की याद को उड़ाते देख रही थी. हम दोनों की आत्मा प्यार की प्यासी थी.हम दोनों एकदम से समझ गए थे कि हम एक दुसरे के लिए बने है.पर्वतीय शामे बिलकुल मरघट की तरह एकाकी होती है,ऐसे निर्जन शान्ति जो किसी को भी निगल ले. इतना विस्तृत कोहरा जंहा हम दोनों का भविष्य ढका पड़ा था ,हम एक दुसरे का हाथ थामे हुए थे. उसी कोहरे को चीरते हुए आगे बढ़ रहे थे.


तुम पढ़ने मैं तेज़ थे.तुम अपनी माँ, से इन नंगी वीरान पहाड़ियों से बहुत दूर चले जाना चाहते थे.तुम्हारी सिलेक्शन हैदराबाद के बहुत बड़े इंजिनीरिंग कॉलेज मे हो गया ,तुम जाने की तैयारी करने लगे. मैं भी बहुत खुश थी,तुम शहर जाओगे पढ़ लिखकर बड़े आदमी बनोगे।मैंने तुम्हारी सारी तैयारी करवाई,पैकिंग की.और फिर उस शाम तुमने,नीली झील के किनारे,अगल बगल उड़ते हुए बादलों की साक्षी मैं,रुई सी सफेद बर्फ को मेरे होठों से हठाकर अपने जलते हुए होठ मेरे होठों से लगा दिए.वह चुम्बन मेरे पवित्र प्रेम का हमारे पवित्र प्रेम का साक्षी बना.साक्षी बनी वो पहाड़ियां जो नीरस निर्विकार और अकेली खड़ी थी.

ट्रैन निकलने का समय हो गया था. तब मुझे पहली बार अंदाज हुआ कि तुम मुझसे बहुत दूर जा रहे थे. मेरी रुलाई फुट पड़ी.मैं तुम्हे हाथ हिलाता हुआ देखकर तुम्हारे बहुत दूर तक दौड़ी,शायद मैं तुमसे कहना चाह रही थी,कि मैं तुमसे बहुत प्यार करती हूँ लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी.उसके बाद हर सांस के साथ मैंने तुम्हारे अहसास को जिया.मेरे बदन को छू कर निकलने वाली हवा से भी मै तुम्हारा पैगाम पूछती,उस झील के किनारे बहते पानी को निहारतीं. तुम जिंदगी मैं कुछ पाने के लिए बहुत आगे निकल गए थे और मैं उस सरिता की तरह थी जो केवल सागर से मिलना जानती है.बाबा ने मेरी शादी कर दी.अच्छा घर वर,रणवीर भी बहुत अच्छे। उन्होंने मुझे सब कुछ दिया जो एक पत्नी पति से अपेक्षा करती हैं.लेकिन रोशन मैं तुम्हे भुला ना पायी।

रोशन काफी पियो,ठंडी हो गयी है. तुमने धीरे धीरे काफी पीना शुरू किया.आज तुम ठीक मेरे सामने बैठे हो,तुम्हारा हाथ पकड़ कर मैं वो सब कुछ कह सकती हूँ जिसे कहने के लिए मेरे होठ फड़फड़ा रहे थे,जिंदगी भर मैंने केवल एक बार तुमसे मिलने की तम्मन्ना की थी,लेकिन देखती हूँ की आज जब वो पल सिमट कर मेरी मुट्ठी मै कैद है तो........

नहीं तुम मेरे वो वाले रोशन नहीं,मेरा रोशन तो मेरे प्रेम के प्रतीक के रूप मे मेरे मन मंदिर पर अंकित है.आज भी उस रोशन की याद मेरे अतराफ़ गुलाबजल बनकर मुझे महका देती है। तुम सर्दी की मदमस्त दोपहर मैं धुप का चिलका बनकर मुझपर छा जाते हो.आज जब तुम मेरे सामने हो तो मैं तुम्हारे यथार्थ को छुकर तुम्हारी स्वप्निल यादो को टूटने नहीं दे सकती।

मैं झटके से उठती हूँ,और तुम्हारी ओर देखे बिना निकल पड़ती हूँ. मैं तुम्हारी यादो को कब्र पर रखा फूल नहीं बगिया का पल्लवित कुसुम बनाना चाहती हूँ.


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