ओ वसंत! तुम्हारे स्वागत में सिर्फ प्रेम लिखना चाहती हूँ
तुम्हारी आहट से पहले और अंतिम पदचाप तक

सिर्फ प्रेम ...

अपने अन्तरराग को मधुर स्मृतियों में डूबों कर
अगले वसंतोत्सव के लिए भर लेना चाहती हूँ प्रेम का प्याला

ताकि लड़ संकू हर उस विष से जो अनजाने ही घर कर बैठा है रोम रोम में

अवांक्षित अवशिष्ट को परे कर
ओ वंसत ! तुम्हें जी भर जीना चाहती हूँ..

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