चौराहा

शहर के जिस चौराहे पर सर्वाधिक भीड़ होती है, वहीं बगल में एक किनारे पर आकर वे लोग अक्सर इकट्ठे हो जाते हैं। फिर अचानक उनका सारा कुनबा कहीं और कूच कर जाता है। वे वहां से उजाड़े जाते हैं या फिर अपनी इच्छा से कोई दूसरा ठौर-ठिकाना ढूंढ़ने निकल पड़ते हैं, इस बारे में निश्चित रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता, पर यह सच है कि बंजारों की ज़िंदगी है उनकी -- कभी यहां, तो कभी वहां।

इस बार भी शीतकाल के आरंभ होते ही वे वहां आ बसे थे... शोर-शराबे और भीड़-भरे चौराहे के आसपास। ध्वनि या वायु-प्रदूषण की उन्हें कोई चिन्ता नहीं रहती। सारा दिन और यहां तक कि देर रात तक इस सड़क पर वाहनों की चिल्ल-पों मची रहती है, गंदा धुआं फैला रहता है, पर इन सबसे बेखबर वे वहीं खुली आसमान के नीचे अपनी दिनचर्या में व्यस्त नज़र आते हैं। दिन के उजाले में वहां सिर्फ औरतें या बच्चे ही होते हैं, या फिर कुछ बीमार से सुस्त पुरुष। उस समय तो वहां बूढ़े-बुजर्ग भी नहीं दिखते।

इस चौराहे से होकर आपाधापी में भागते हुए शहर के लोगों का शायद ही इन पर ध्यान जाता हो, यहां तक कि अपने आपको चुस्त-दुरुस्त कहनेवाला प्रशासन भी इनके प्रति आंखें मूंदे रहता है। सबसे बड़ी बात यह है कि बड़े-बड़े नेताओं, अधिकारियों और विदेशी मेहमानों का काफ़िला भी उनकी बग़ल से होकर ही गुज़रता है।

कल तक उस चौराहे के आप-पास की जो ज़मीन उजड़ी हुई थी, वह रात-ही-रात में आबाद हो गई। वहां अब कामचलाऊ तम्बू गड़ गए थे, जिन्हें बड़ी लापरवाही से खड़ा किया गया था... रंग-विरंगे, पर अधिकतर काले और फटे-पुराने पाॅलिथीनों से छाए हुए। इस समय प्रातः की बेला में वे सब खुले में सूर्य की किरणों को समेट रहे थे।

जहां शहर के खाते-पीते लोगों ने ठंड से सिकुड़ना शुरू कर दिया था, वहीं ये अब भी फटे-पुराने कपड़ों में थे। बच्चों को देखकर ऐसा लगता था कि वे किसी घोर विवशता में देह पर कपड़े धारण किए हुए हैं। ‘घरों’ के बाहर ज़मीन पर इधर-उधर खजूर के हरे नुकीले पत्ते पसार दिए गए थे। औरत-बच्चे सभी गंदे लिबासों में न जाने कब के नहाए लग रहे थे। उन औरतों ने घाघरा, कांचली-चोली पहन रखा था। पूरे टाण्डे में अनगिनत नवजात शिशुओं से लेकर साल-दो साल के बच्चे कुलबुला रहे थे।

सभी औरतें एक ही जगह पर हाथ भर की दूरी पर थीं, लेकिन सब की सब एक-दूसरे से बेखबर, अपनी-अपनी धुन में। औरतों की तीन जोड़ियां अलग-अलग बैठीं बिखरे गंदे बालों से जुएं बीन रही थीं। उनमें से एक बड़ी धृष्टता से अपना मुंह बिचकाए हुए सिर पर ज़ोर-ज़ोर से खुजली कर रही थी। उन सबके केश रूखे और धूल-धूसरित थे। हां, कुछ युवतियां जो औसतन साफ-सुथरी थीं, अपने केशों में तेल लगाकर चोटला गुंथवा रही थीं। सबकी सब अपने-अपने में मगन। कहीं भी ऐसा नहीं लग रहा था कि ये एक-दूसरे से किसी तरह जुड़े हुए हैं।

पास ही कुछेक पेड़ थे। इनमें से एक की मज़बूत शाखा पर साइकिल के कुछ टायरों को एक-दूसरे से बांधकर लड़कों ने झूला बना लिया था। दो बच्चे इकट्ठे ही उल्टा-सीधा होकर उससे झूलने में लगे थे, जबकि उनसे छोटे वहां खड़े उन्हें निहारे जा रहे थे। एक लड़का एक लकड़ी की सहायता से मिट्टी खोदने में निमग्न था, जबकि तीन बच्चों ने न जाने क्यों अपने बाल मुंडवा लिए थे। वे भाई-भाई लग रहे थे और बाकी लड़कों की तुलना में साफ़-सुथरे भी। दूसरे पेड़ों पर कुछ नवजात झोजी में झूला खाए सो रहे थे जबकि कुछ बच्चे गुल्ली-डंडा खेलते हुए काफ़ी दूर निकल गए थे।

दोपहर बाद उनके टाण्डे के आस-पास पाॅलिथीन, प्लास्टिक, कागज-पत्तल, शीशी-बोतलों का भंडार जमा हो गया था, जहां कुछ औरतें अब उनकी छंटाई में लगी थीं।

उनके कुछ बच्चे भी अपनी मनपसंद चीज़ों की तलाश में वहां खड़े इधर-उधर निगाहें दौड़ा रहे थे। इस समय बस्ती खाली-खाली-सी लग रही थी और वहां गंदगी-सने चिथड़े ही बिखरे नज़र आ रहे थे। वे युवतियां भी कहीं दिखाई नहीं दे रही थीं जो सुबह अपने बनाव- श्रृंगार में जुटी हुई थीं। सिर्फ कुछ बूढ़ी औरतें ही वहां बेकार बैठी थीं।

पर शाम का नज़ारा कुछ अलग ही था। टाण्डे में बंदरों के कुछ जोड़े आ पहुंचे थे, जो रस्सियों से बंधे ऊलजलूल हरकतें कर रहे थे। वहां के लोग उनसे बेखबर अब रात के भोजन की व्यवस्था में जुट गए थे। बच्चे इस समय भी खेल रहे थे, पर अब उनका खेल ‘इनडोर’ था। छोटे-छोटे बच्चों ने तो जैसे रोना सीखा ही नहीं था। कुछ धरती पर बिछी चादर पर लेट और लोट रहे थे तो कुछ मांओं की गोद में थे। यह अस्थायी बस्ती सुबह की अपेक्षा शाम को सरगर्म थी। खमीस, झगला पहने मर्द एक-एक कर वापस आने लगे थे। कुछ आकर औरतों की बगल में बैठ विभिन्न मुद्दों पर विचार-विमर्श कर रहे थे। कुछ फिर से नीड़ के निर्माण में व्यस्त हो गए थे और उन पर पाॅलिथीन डाल रहे थे। उनके टाण्डे के ठीक ऊपर दो पेड़ों के सहारे बंधा किसी संस्था का परचम लहरा रहा था, जिस पर अंग्रेजी में ‘वेलकम डेलिगेट्स’ लिखा हुआ था। किसी-किसी ‘घर’ में सलोई की तैयारी हो रही थी। कहीं आलू-प्याज काटे जा रहे थे। सेंधी-शराब पीना यहां बुरा नहीं माना जाता, इसलिए अस्तरी-पावसेरी (अधिया-पउवा) भी मर्द अपने साथ लेते आए थे। इसके बिना सलोई खाने का भला क्या मज़ा?

चपली इंच—दो इंच की छोटी-छोटी मछलियों को पानी में धो-धोकर साफ कर रही थी। उधर दुखियारी मोटी-मोटी बाटी (रोटी) तवे पर सेंक रही थी। यहां चकले-बेलन का कोई काम न था। दोनों हथेलियां ही इनका काम दे रही थीं।

दुखियारी के साथ सचमुच दुखद घटना होती आई थी। एक-एक कर उसने पांच बच्चों को जना था, जिनमें से तीन तो लड़के ही थे, पर उनमें से दो बेटे और दो बेटियां किसी अज्ञात बीमारी के कारण भगवान को प्यारे हो गए थे। वैसे तो टाण्डे में एक-दो प्रायः सभी के मरे थे। उन्हें यह स्वीकार करने की आदत-सी पड़ गई थी कि उनके बच्चे पैदा तो होते ही रहेंगे और उनमें से कुछ मरते भी रहेंगे।

दुखियारी की चार बच्चों के मर जाने का इतना ग़म नहीं था, जितना पांचवें के बचानक गुम हो जाने का। मरों को तो उसने भुला दिया था, परंतु जो खो गया था, उसकी याद अक्सर उसे कचोटती रहती और वह जब-तब कुरलाने लगती। उसका मर्द तो सब-कुछ भुलाकर अगले बच्चे के आने की उम्मीद लगाए बैठा था, पर दुखियारी की कोख फिर से हरी नहीं पायी थी। जब उसका मन ही अब इसके लिए तैयार नहीं था, शरीर कहां से हो पाता भला? इसका परिणाम यह हुआ कि पांचवें खोये बेटे की याद दुखियारी के ज़ेहन में और पुख्ता होती चली गई।

उसका पति तो सारा दिन रोटी की जुगाड़ में इधर-उधर भटकता रहता, कभी कूड़ा-कर्कट बीन लाता तो कभी किसी सड़क के किनारे बने ढाबे पर जूठे बर्तन साफ करने लगता, पर वहां से भी उसे अक्सर साफ़-सुथरा न रहने के कारण खदेड़ दिया जाता। वह सुबह निकलता और दिन के खाने का बन्दोबस्त होते हो टाण्डे में लौट आता। वहां चुपचाप बैठा बीड़ियां फूंकता या हाथ-पर-हाथ धरे बैठा रहता। पहले उसके पास भी दो बन्दर थे, पर उसे उन्हें नचाने का काम मन माफ़िक नहीे लगा था। आजकल उनके करतब देखता भी कौन है? ऊपर से उनके खाने की भी चिन्ता बनी रहती थी। उसे कोई नया धंधा जंचता ही नहीं था। टाण्डे के कुछ बच्चों ने तो थैले में ब्रुश और बूटपालिश डालकर जूते चमकाने का नया काम शुरू कर दिया था। भीख मांगने का धंधा सिर्फ़ युवतियों का ही जम पाया था। वे अपना मुखड़ा चकमा कर पान खाते हुए निकलतीं।

उस दिन रजुआ और धामू चलती बस में एस्बेस्टस के दो टुकड़ों को चटखाते हुए एक नई फ़िल्मी धुन पर भीख मांग रहे थे कि बस के कण्डक्टर ने गाली देते हुए उनके धूल-भरे कपाड़ पर एक-एक थप्पड़ जमाया और बस से धकियाते हुए उन्हें नीचे उतार दिया था। वे पहले कुछ रुआंसे हुए थे, पर बस से उतरते ही हंसते हुए एक ओर चल दिए थे। बस में बैठी सवारियों का भी मुफ्त में मनोरंजन हो गया था।

दुखियारी का दर्द शहर के इसी चौराहे पर आकर कुछ तेज़ी से उभरता, क्योंकि दो साल पहले उसका मन्नू यहीं से गायब हुआ था। उस समय वह दो—ढाई वर्ष का होगा। नया-नया बोलना शुरू किया था, अतः मां से तोतली बोली में ढेर सारी बातें करता और दूसरे बच्चों के साथ सारा दिन खेलता रहता। दुखियारी ने दूसरे बड़े बच्चों को हिदायत दे रखी थी कि उसका ख्याल रखा करें। वैसे उन बच्चों का ख्याल रखने की क्या आवश्यकता? वे तो वैसे ही पक्के होते हैं। सड़क के किनारे पैदा होते हैं और वहीं पलते-बढ़ते हैं। मजाल है कि कभी कोई आती-जाती साइकिल से ही टकराया हो।

पर उस दिन मन्नू जो अचानक गायब हुआ कि आज तक उसका पता नहीं चला। दूसरे बच्चों के साथ खेलता-खेलता वह दूर निकल गया था और फिर उनसे बिछुड़कर शहर की भीड़ में कहीं खो गया।

उस दिन शाम को जब मन्नू का बापू उसके लिए किसी कूड़े के ढेर से उठाकर सुन्दर-सी, पर फटे कपड़ों वाली एक लंगड़ी गुड़िया लेकर आया और उसे दुखियारी को दिखाते हुए मन्नू के बारे में पूछा, तब कहीं जाकर पता चला कि मन्नू बच्चों की टोली में नहीं है। सबने मिलकर आस-पास और दूर-दूर तक उसे ढूंढा। दुकानों और होटलों में पूछा, पर कहीं से उसकी खोज-खबर नहीं मिली। दुखियारी की ‘मन्नू रे...मनुआ...’ की पुकार भी वाहनों और भीड़ के रेले में खोकर रह गई। अंधियारा घिरने पर हारे हुए सभी टाण्डे में लौट आए। दुखियारी अपने बेटे का नाम ले लेकर रात-भर रोती रही। लोगों ने उसे दिलासा दी कि वह मिल जाएगा। उसका मरद भी समझाता रहा। बाद में उसके क्रन्दन से तंग आकर वह खीझ उठा और गालियां बकने, ‘‘साली... छोरे ने भी नहीं सम्भाल सकणो है, इब रो रही है माथे पर।’’

पति की झिड़की खाकर उसके रोने का सुर धीमा पड़ गया। दूसरे दिन भी मन्नू नहीं मिला। इतने बड़े शहर में अब उसे कहां ढूंढा जाए। टाण्डे में एक दिन बेचैनी की हलचल हुई और फिर पूर्ववत् सब ज्यों-का त्यों हो गया।

रघुवा ने सलाह दी थी कि थाने में जाकर इत्तला करते हैं, पर उनमें से ही एक समझदार बुजुर्ग ने टोका था, ‘‘कसेन बेकार के पचड़े में पड़ो हो। आत जो दो-चार दिन रैहणो, वा ते भी छुट्टी मिल जाअगी। पुलिस ने जीणा हराम कर देणो। छोरे को तो ढूंढणे ते रहे, ऊपर से हर दिन पूछताछ की ड्रामाबाजी अलग ते। सेठ-साहूकार का छोरा वेतो कोनी। गरीब-दरिदर को छोरा वेतो। जेथो होवेगा, रूखी-सूखी खा के जी लेग्गा।’’

नियति को स्वीकार कर सबने चुप्पी साध ली, पर मां का मन मानता भला, जिसकी छाती से चिपका रहेनेवाला बच्चा अचानक कहीं खो जाए। वह लम्बी आहें भरती रहती।

- 2 -

पिछले एक वर्ष में वे अब दूसरी बार यहां आए थे। दुखियारी के यहां पहुंचते ही उसके मन के किसी कोने में आशा की मद्धिम-सी लौ सुगबुगाने लगती। उसकी आंखें सड़क पर गड़ जातीं, परंतु पिछली बार भी वह यहां से निराश होकर गई थी।

इस बार यहां आए सप्ताह-भर ही बीता होगा कि एक दिन शाम को टाण्डे के ही छगणा ने आकर उन्हें बताया कि उसने मन्नू को शहर के दक्षिण छोर में बस अनाथ-आश्रम की चहारदीवारी के अन्दर घास के मैदान पर खेलते देखा है। छगणा वहां एक ट्रक के साथ कुली का काम करने गया था। सुनकर दुखियारी और उसके मरद कन्हाई की प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। दुखियारी को जैसे साल-भर पहले कहीं खो गई खुशी दुबारा मिल गई हो। वे तो उसी समय छगणा को लेकर जाने के लिए तैयार हो गए, पर छगणा ने कहा, ‘‘सवेरे चलांगे भाई, इस बेला जाणा ठीक नईं रेग्गा। पौंचते ही राज हो जाणो है।’’

छगणा की बात उन्हें जंच गई। वे अधीरता से सुबह की प्रतीक्षा करने लगे, पर रात में अब नींद कहां आती भला? टाण्डे में एक-एक कर आवाज़ें आनी बन्द होने लगीं और अन्त में आवाज़ रही तो सड़क से गुजरती गाड़ियों की।

‘‘कैसो होगा महारा मनुआ?’’ दुखियारी ने अपने पति से पूछा।

‘‘अच्छोइ होग्गा, कम-से-कम इहां ते।’’

शीत की गिरफ्त धीरे-धीरे बढ़ती जा रही थी। वह दुखियारी के करीब सरक आया था।

‘‘याद है मनुआ के बाप्पू, जिस दिण वा खोग्यो था, वा दिण तुम वोर खातर केतो एक गुड़िया ले को आए थे।’’ दुखियारी ने कहा।

‘‘हां...एक टांग की गुड़िया।’’

दोनों हंस पड़े थे।

वह आगे बोली, ‘‘जाणो, मने वा गुड़िया गाठरी में बांध को राखी है।’’

‘‘अच्छा।’’

‘‘कल कुछ चोखो खाणो ने बणाणो है।’’

‘‘देखो। कुछ कमाई-वमाई हुई त...’’

‘‘वोर चिन्ता कोनी करो। मने कुछ पिस्सो जमा करके राख्यो है।’’

‘‘अच्छा...बड़ी स्याणी निकड़ी तू तां। फेर तो छगणो ने भी पावसेरी (पाव भर शराब) पिला देणो।’’

आसमान तारों से भर आया था। दोनों की आंखें ऊपर टंगी हुई थीं। उनकी सारी रात यूं ही करवटें बदलते बीत गई। हल्की सर्द रात, ऊपर से लम्बी। उन्होंने ऐसी लम्बी रात जीवन में पहली बार देखी थी।

प्रात: के क्षीण प्रकाश में जब वहां बंधे मुर्गे-मुर्गियों में से कुछ अपने पंख फड़फड़ाने लगे तो कन्हाई उठकर बैठ गया। दुखियारी जैसी उसकी प्रतीक्षा कर रही थी। वह भी झटपट जाकर सड़क के किनारे लगे हैंड-पंप पर हाथ-मुंह धो आई, पर कन्हाई ने उससे कहा, ‘‘मनुआ की मां, तू आत ही ठैर। मैं वो को लेको जल्दी ही लौट आणो।’’

दुखियारी ने उसे छगणा को संग ले जाने की याद दिलाई, पर कन्हाई ने कहा, ‘‘वोर नामालूम कब जागणो। मैं एकलो ही हो आणो। उस अनाथ-आश्रम का मने बी कुछ-कुछ पता है। बड़ो अस्पताल से आग्गे जा को पूछ लूंगा किसी ते। इब ना जाणो कितणो बजो है, पर हौले-हौले निकड़ो हूं। सूरज चढ़ते ने वां पहुंच जाणो। देर हो जावे तो चिन्ता कोनी करयो। कुछ लिखती-पढ़ती में वक़त लाग सको है।’’

इतना कहकर वह टाण्डे से निकल सड़क पर उतार आया और अनाथ-आश्रम की ओर तेजी से कदम बढ़ा दिए। आज उसका मन्नू मिल जाएगा। एक साल में कितना बड़ा हो गया होगा। जबरन भुलाए हुए अपने बेटे को चेहरा याद करते हुए वह बढ़ा जा रहा था। हृदय में खुशी की खलबली होने लगी थी।

बड़े अस्पताल तक पहुंचते-पहुंचते सूरज का लाल गोला पूरब दिशा में चढ़ आया। सड़कें भी प्रातः की अंगड़ाइयां लेने लगी थीं। दूध और अखबार वाले अपनी-अपनी साइकिलों पर इधर-उधर दौड़े जा रहे थे। थोड़ी ही देर में कन्हाई अस्पताल को पार कर गया और सड़क जहां से दो दिशाओं में विभाजित होती थी, वहां रुककर उसने फुटपाथ के एक कोने में बैठे चायवाले से पूछा, ‘‘इधर अनाथ-आश्रम कहां है भाई?’’

‘‘सीधे जाकर पहला बिल्डिंग छोड़ के दूसरा।’’ चायवाले ने खैनी का थूक एक ओर फेंकते हुए कहा।

उसकी चाल और तेज़ हो गई और कुछ ही देर में वह अनाथ-आश्रम के मुख्यद्वार पर था। वहां तैनात गोरखा चौकीदार ने उसे घूरते हुए कहा, ‘‘हां भई, क्या मांगता है?’’

‘‘चौकीदार जी, म्हारा बेटा खो गया था। यहीं पर है। हमको अपने एक आदमी ने बताया।’’

‘‘कब खोया था?’’

‘‘यही कोई साल-भर हो गया है।’’

‘‘ठीक ए। अब्बी आपिस नहीं खुला। नौ बजे का बाद में आना। तब्बी मैडम जी आएगी। पता कर लेना।’’कहकर चौकीदार वहीं चहलकदमी करने लगा।

कन्हाई अधीर हो उठा, ‘‘अभी पता नहीं लग सकता?’’

‘‘अब्बी कैसी पता चलेगा भाई। आपिस खुलेगा तबी आना। बोला तो...।’’

‘‘कितना बजा है अभी?’’ कन्हाई ने चौकीदार से पूछा।

चौकीदार ने कलाई में बंधी घड़ी पर निगाह डालते हुए कहा, ‘‘अब्बी साढ़े छे बजे हैं।’’

कन्हाई धीरे-धीरे लौटकर चायवाले के पास आ गया। वहां उसने एक चाय के लिए कहा।

चायवाले ने उसे देखते ही पूछा, ‘‘मिला नहीं का अनाथ-आश्रम?’’

‘‘मिल तो गया है, पर अभी आफिस नहीं खुला है।’’

‘‘कवनो नौकरी-वौकरी का खातिर बुलाय हैं का?’’

‘‘अरे नहीं भाई, हमारा बेटा खो गयो है। उसी का पता करना था।’’ उबलती हुई चाय की पत्तियों पर निगाह डालते हुए कन्हाई ने कहा।

चाय पीकर वह बीड़ी सुलगाता हुआ उसी सड़क पर धीरे-धीरे आगे बढ़ गया और एक स्थान पर जाकर उकडूं होकर बैठ गया। अब वह दुखियारी के बारे में सोचने लगा। वह कब से अपने बेटे को देखने के लिए सड़क की दिशा में आंखें बिछाई हुई होगी। एक वर्ष बाद उसने पहली बार उसके चेहरे पर खुशी की परछाईं देखी थी। जब नौ बजने को हुए तो वह एक राहगीर से समय पूछकर अनाथ-आश्रम में जा हाज़िर हुआ। वहां उसने दोनों हाथ जोड़ दिए, ‘‘मेम साब, म्हारा बेटा मन्नू एक साल पहले खो गयो था। हमारे टाण्डे के एक आदमी ने बताया कि उसने उसको यहां देखो है।’’

अनाथ-आश्रम की परिचारिका ने उसे सिर से पांव तक देखकर पूछा, ‘‘कहां से आए हो?’’

‘‘मेम साब, हम तो छोटा-मोटा काम करते हैं। होटल वाले चौराहे के पास रहते हैं। एक साल पहले जब ठंडी में आए थे तो म्हारा दो साल का मन्नू अचानक कहीं खो गया था। हमने बहुत ढूंढ़्या पर मिल्या नहीं जी।’’

परिचारिका ने एक रजिस्टर उठाया और उसके पन्ने पलटे।

फिर उसने उन पांच बच्चों को बुला लाने का आदेश दिया तो गत वर्ष शीतकाल के दौरान यहां लाए गए थे।

अपने बेटे को देखकर कन्हाई का मन उत्फुल्ल हो उठा, पर अचानक दूसरे ही क्षण अपने आपको संयत करते हुए उसने झट से ‘ना’ की मुद्रा में सिर हिला दिया। बच्चा टुकुर-टुकुर उसे देखता रहा। उसके कहने पर कि उसमें उसका बेटा मन्नू नहीं है, बच्चे वापस भेज दिए गए।

मन में घुमड़ती भावनाओं को समेटे वह अनाथ-आश्रम से बाहर निकला और अपनी बस्ती की ओर लौट गया, जहां उसकी पत्नी दुखियारी बड़ी बेसब्री से उसकी प्रतीक्षा कर रही थी। वहां पहुंचते ही उसने मुंह लटकाते हुए कहा, ‘‘वा में म्हारा मनुआ न था।’’

एक सफेद झूठ कहकर वह अपने बेटे के सुखद भविष्य की कल्पना में खो गया, जहां वह साफ-सुथरे कपड़ों में सजा-धजा स्वस्थ सुनहरे कल की ओर बढ़ा जा रहा था। उसकी घुमक्कड़ी ज़िन्दगी में तो उसका भविष्य महज़ प्रश्नचिह्न ही बनकर रह जाता।

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