बड़ी बेसब्री से था हमको इसका इन्तजार

जिससे मिलने की आस मे ये दिल था बेकरार |

क्या बताएं मिले वो जब भी इक अजनबी बनके

हाल तो क्या इक नज़र भर भी न देखा हमको |

इस बेरुखी की उम्मीद तो न थी यूँ ....

झूठ ही सही हौले से कुछ तो कहा होता |

तुमने जो हमें दिल की नज़रों से देखा होता

आईने की तरह साफ़ नज़र आता ये चेहरा |

तुम्हारा क्या कुसूर शायद मेरी किस्मत ही ऐसी है ....

मिलता वही सबको है जो मुकद्दर मे लिखा होता है ||

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