श्रीवास्तव सर का लेक्चर खत्म होने  में सिर्फ 5 मिनट बाकी थे और मैं और शुभम रह-रहकर कभी घड़ी की तरफ तो कभी एक दूसरे की तरफ देख रहे थे ,और चिढ़वाली मुस्कुराहट मुस्कुरा रहे थे । जैसे ही सर ने अपने नोट्स का आखरी स्टेटमेंट बोला, हम एक दूसरे की तरफ देख कर हाथों से बोतल के ढक्कन खोलने के जैसा इशारा कर के बोले "तो मैंने आपको इस टॉपिक का क्रक्स बता दिया है एग्जाम में इसे इलैबोरेट कर लीजिएगा।"और एक चुटीली मुस्कान छेड़ दी. मोटे श्रीवास्तव सर को ज्ञान बहुत ज्यादा ना था (शायद इसीलिए एढॉक पर थे )परंतु अपने अनुशासन की कठोरता के आड़ में इसे छुपा लेते थे ।बाहर निकलते ही शुभम ने यहां के सिलेबस के आउटडेटेड होने का राग छेड़ा,
" यार यहां के  प्रोफेसरों की अप्रोच नाही मल्टी डायमेंशनल है और ना ही इंटरडिसिप्लिनरी" शुभम में झुँझलाते हुए कहा।
" मल्टी डायमेंशनल और इंटरडिसिप्लिनरी ", मुझे लगता है ये नोट्स  इन्होंने अपनी पीएचडी के दिनों में बनाए होंगे और पिछले 20 साल से हर बैच को वही चिपका रहे हैं" मैंने चुटकी ली  और शुभम मेरे पीछे की तरफ देख मुस्कुरा दिया. पीछे से शाहीन आ  रही थी जो हमेशा अपने मार्क्स को लेके परेशां रहती थी यूँ तो उसके मार्क्स हम लोगो से ज्यादा होते थे पर मैडम को 80% लाने की हनक थी. लखनऊ यूनिवर्सिटी में अस्सी परसेंट मजाक है क्या? 

तुम लोगों ने सुना नहीं की बैक / इम्प्रूवमेंट के फॉर्म आ गए हैं?शाहीन ने गौरवान्वित होकर खुफिया जानकारी देने के  भाव से बताया... मैंने उसकी तरफ देखा… फिर उसके बैक की तरफ देखा… और शुभम को आंख मारते हुवे कहा, मुझे नहीं लगता ज़रीन की तुम्हे "बैक इम्प्रूवमेंट" की जरूरत है,

...अरे क्यों नहीं, फाइनेंसियल अड्मिनिन्सट्रेशन में मेरे सेवेंटी थ्री मार्क्स ही हैं. मैं तो इम्प्रूवमेंट भरूंगी!

मैंने और शुभम ने एक दुसरे की आँखों में देखा मनो कह रहे हो की सेवेंटी थ्री , यहाँ हम दोनों 62 और 64 पे खुश हैं, और आगे बढ़ गए.

"साले तेरा जोक समझ लेती न वो तो एच ओ डी ऑफिस में होते", शुभम ने चुटकी ली

छोड़ न कैंटीन चले?

कैंटीन क्यों चलेंगे , जब आज डिपार्टमेंट खुद ही खिला रहा है 

क्यों?

तुम्हे पता नहीं? जूनियर्स, टीचर्स की चापलूसी के लिए एक सेमिनार करवा रहें हैं, इनटॉलेरेंस पर. उसके बाद एक कल्चरल प्रोग्राम भी है. कल क्लास में एक जूनियर पूछने आयी तो थी.अरे गज़ब यार तू अपनी पोएट्री भी सुना देना एक आत, एक दो जूनियर भी सेट हो जाएँगी.

मैंने कितनी बार तुमसे कहा है की मैं पोएट्री लड़कियों को इम्प्रेस करने के लिए नहीं सुनाता… ये एक कला है यार.

हाँ, तुम्हारी कलाएं तो पिछले कई सालों से देख रहा हूँ. खैर चलोगे?

सेमिनार में मुझे कोई दिलचस्पी न थी,पर चूंकि मेरे पास करने को कुछ बेहतर था नहीं और गार्डन में मसाले जबरदस्त महक रहे थे, तो चल पड़ा. सेमिनार कम नौटंकी ज्यादा थी. जूनियर लड़कियां अपने सर्वोत्तम लिबास में, सीने पे वालंटियर का बैच लगाए जबरदस्ती मुस्कुरा रही थीं. अपने स्त्रीत्व से मजबूर होकर रह रह कर सेल्फी भी ले रही थी.कोई हाथ में मालाएं लिए, कोई कुर्सी मेज पर बैठी पेन और रजिस्टर लिए, कोई दरवाजे पे खड़ी वेलकम बोलने के लिए,कोई किनारे खड़ी अपनी स्पीच रटते हुवे. लड़कों के पास पहनने को ज्यादा विकल्प होते नहीं तो वो कोट पर बैच लगाए, कोई मेंबर सेक्रेटरी, कोई  ट्रेजरार, इधर उधर टहल रहे थे. प्रेजिडेंट अगर व्यस्त न भी हो तो उसे व्यस्त दिखना चाहये, कभी माइक पे जाके माइक चेक कर रहा था, कभी वालंटियर्स को मोटीवेट कर रहा था.कुल मिलाकर तनाव इस बात का था की इस सरे उद्योग का फल एग्जाम में तो मिले ही कम से कम.. सेमिनार ख़त्म हुवा और कल्चरल प्रोग्राम शुरु हुवा. मेरी दिलचस्पी बढ़ी और शुभम की घटनी शुरू हुवी.

सीनियर्स की तरफ से पार्टिसिपेशन में शुभम ने मेरा हाथ उठा दिया, पर मैंने मना कर दिया. कुछ नाच गाने के बाद एक लड़की स्टेज पर चढ़ी गाना गाने के लिए, और मैं उसे वहां देख कर चौंक गया !  औसत कद, गोरा रंग, और तीखी गढन. वो मेरे जूनियर्स की जूनियर थी. वो बात हुवे 5 साल हो गए थे और जिन सब भावनाओ से मैं भागा था और कभी उधर पलट के देखने की हिम्मत नहीं हुई थी, वो सभी दृश्य मेरी आँखों में तैरने लगे थे. उसने गाना शुरू किया और शुभम की बोरियत परवान चढ़ गयी.

'यार मैं लाइब्रेरी जा रहा हूँ, मुझसे नहीं झेला जायेगा ये सब, तुम्हारी पोएम तब भी झेल सकता हूँ" शुभम ने जम्हाई लेते हुवे कहा

मैंने खोई हुई आँखों से उसकी ओर देखा जैसे कुछ ढूंढ रहा हूँ.

प्रोग्राम के बाद अमीनाबाद चलेंगे कुछ बुक्स लेनी है.

 मैंने खोये हुवे ही सर हिला दिया और वो चला गया.

गाना बज रहा था ...."ज़िन्दगी के सफर में...बिछड़ जाते ...."

उसने गाना ख़त्म किया और मुस्कुरायी. मुस्कुराती “वो” पांच साल पहले भी थी. दिक्कत तो यही थी की बस मुस्कुराती ही तो थी…मैं भी मुस्कुरा देता था… मेरे दोस्त भी मुस्कुरा देते थे… इंटरमीडिएट के उन दिनों में मुस्कराहट फ़ैल गयी थी. विकासनगर की शाम कुछ ऐसी लगती थीं की मेरे मुहब्बत की दास्तान के लिए ही हों. 

 

शुरुआत एक खास दिन से हुई थी. दिन याद है मुझे. बार बार याद आता है. हर बार वही याद करता हूँ जो पिछली बार की याद का अपने हिसाब से स्पस्टीकरण होता है. जुलाई का आखरी शनिवार  था. मैम ने टेस्ट बोला था फिजिक्स में और खुद एब्सेंट हो गयी थी. जब भी इन्हें छुट्टी लेनी होती है टेस्ट बोल देती हैं और हमारी बैंड बज जाती है.

खैर पीरियड खाली था और एक नर्सरी की टीचर हमारे क्लास में बैठी कापियां जांच रही थीं. क्लास में लगभग हर तरह के प्राणी मौजूद थे. फर्स्ट सीट के टॉपर्स, बीच के मग्गू, पीछे के तफ़रीबाज, टीचर के चापलूस,खुफिया एजेंट्स जिनके पास सब चीज़ की जानकारी होती है,हॉलीवुड मूवीज के भंडार, समसामयिक सिलेबस के क्रिटिक, पेन फाइटर्स… सब थे हमारी क्लास में. गलती से मार्क्स अच्छे आ जाने के कारन मैं शुभम जैसे टॉपर्स के साथ आगे बैठता था पर हाँ पीरियड खाली होने के मौको पे मैं पीछे की सीटों पर सरक जाता था. वहां शुरू होते थे मसालेदार बातों के सिलसिले.

"अबे माल तो सी.एम् .यस की लड़कियां होती हैं, हमारे आर एल बी में तो सब नॉन मेल हैं बस,...अब्बे ऐसा न कहो अपने स्कूल में टेंथ 'बी' में नहीं देखे हो?

अब्बे छोडो ताज़ा खबर ये है की प्रणीतवा जूली को पटा लिहिस बे.(यहाँ ये बताना उचित होगा की जिन लड़कों  की गर्लफ्रेंड बन जाती थी, वो स्वतः ही बाकि बेरोजगारों के आदर्श हो जाते थे)

..भक्क वो सिर्फ दोस्त हैं बस

 ...अच्छा... दोस्त हैं? साइबर कैफ़े में कोण सी दोस्ती होती है भला?.

.सही में?...अब्बे क्या करते होंगे साइबर कैफ़े में?..

.वही जो तुम्हारे नसीब में है नहीं...

"तुम लोग ले दे के वहीँ पहुँच जाते हो"..(मैंने इन सूरमाओ की बातों को मोड़ते हुवे कहा.)."पानी है किसी के पास?

यूँ तो मुझे इन मसालेदार बातो में मजा आता था,परंतु एक हद के बाद मैं भारतीय संस्कृति का परिचारक बन जाता था. मेरे चौराहे पर जाने का उद्देश्य आँखों की रौशनी बढ़ाना नहीं था, पर कभी कभी एक नजर लड़कियों को देख लिया करता था . खैर इन योद्धाओं के पास पानी था नहीं.क्लास में प्यास लगने पर एक नियम था की अगर आप नीचे पानी पीने वाटरकूलर पर जा रहे हैं तो आपको क्लास के बाकी लाचारों की बोतलें ले जानी होंगी भरने को...भाई...भाई...भाई...प्लीज मेरी भी लिए जाओ. उनकी दयनीय स्थिति और भविष्य संबंधों को ध्यान में रखते हुवे मैं दो बोतलें लेके नीचे चला. रानी लक्ष्मि बाई स्कूल का अनुशासन बहुत कड़ा था. स्कूल इंटरमीडिएट तक था पर लड़कियां सिर्फ हाइस्कूल तक थीं, वाटरकूलर दो थे. एक बॉयज एक गर्ल्स. संयोगवश या यूँ कहें दुर्भाग्यवश लड़को का वाटरकूलर उस दिन खराब था. स्कूल में कैमरे अभी तक लगे नही थे और स्पोर्ट्स टीचर इस भरी दुपहरी में अपने कमरे में पड़ी ऊँघ रही थी, तो हम चल पड़े गर्ल्स वाटरकूलर की तरफ. पहले अपनी प्यास बुझाई और फिर दोनों टोटियों में क्लास के दो प्यासों की बोतल लगा दी भरने को. इतने में से किसी ने हमारी बोतल हटानी चाही तो हमने बिना पीछे देखे हाथ के इशारे से रोक दिया, एक तो हम स्कूल के सीनियरमोस्ट बैच के छात्र, ऊपर से सुभाष हाउस के कप्तान,स्कूल चार हाउसों में बटा था  जिसमे से एक हाउस के हम कप्तान थे और हमारी बोतल कौन उल्लू हटा रहा था, शायद हटा रही थी.

"ये भैया लोग गर्ल्स के वाटरकूलर पे भी चले आते हैं,हर जगह अपनी चलाते हैं, कोई मैनर्स ही नहीं हैं" पीछे कोई पैर पटक रहा था. दूसरी लड़की कह रही थी "चुप भी रहो, हर जगह लड़ने को तैयार."

हमारी बोतलें और सब्र का घड़ा दोनों भर चुका था. हम हनक में थे और सोच रहे थे की ..."कउन है ये ?" ...पलटे...बिना उसके चेहरे को देखे, दोनों बोतल उसके हाथ में देते हुवे बोले.. "पकड़ना जरा!"

अनिर्णय की स्थिति में उसने बोतल पकड़ लीं और हम उसके गले में काले स्ट्रैप से लटके आइडेंटिटी कार्ड को हाथ में लेते हुवे बोले!

दिशा मिश्रा डी/ओ एस. के .मिश्रा

X"बी"

रोल नो. (अब याद नहीं)

"डोंट यू हैव मैनर्स हाउ टू टॉक टू योर सीनियर्स? उसकी आँखों में देखकर हम रौब जमाते हुवे बोले. हमें पता था की उसे हमारी शर्ट पर लगा कप्तान का बैच दिख जायेगा, होगी कोई लड़की, सॉरी सॉरी करेगी. पर चेहरा देखा तो हम सन्न रह गए...इतना खूबसूरत कोई, इतनी खूबसूरत ऑंखें? नहीं, काजल वाजल नहीं लगा था पर ऐसे तीखे नैन नक्श, कि हम नजर हटा ही नहीं पा रहे थे. आलू जैसा मुह हो गया था हमारा. एक सेकंड...दो सेकंड...तीन सेकंड...

"बोतल सम्हालिए अपनी !" मेरे खोये हुवे भाव को झिडकते हुवे उसने कहा.

हम खोये हुवे क्लास तक आये और ये खुमारी शुभम के साथ बांटनी चाही.

"लड़की? बस यही बचा है जिंदगी में अब? ऐसा ही रहा तो सेक्टर १४ ब्रांच कि लड़कियां ही टॉप कर जाएँगी." शुभम ने सारा नशा उतार दिया. ...पर हमें तो बर्बाद होना था.

 

    अगले दिन छुट्टी थी. हमने एक लंबी चौड़ी स्पीच तैयार की.."गिव गर्ल्स देयर चांस". स्पीच ताबड़तोड़ दी और उसे देखके मुस्कुराये भी. वो भी मुस्कुराई. और हमारी जिंदगी का अधोगमन शुरू हुआ.

इस बीच हमने कुछ कलाएं भी सीखीं, जैसे टाई ढीली करके , शर्ट की बाहें चढ़ा के चलने की कला,तुम्हारे सामने से गुजरके ये एक्टिंग करने की कला की हम तुम्हे नहीं देखे हैं पर तुम देख लो कितना सज  के निकले हैं,कितना बिजी हैं, इंटरवल में कैंटीन के सामने तुम्हारा इंतज़ार करने की और तुम्हारे आते ही अचानक कुछ याद आने की एक्टिंग और वहां से चले जाने की एक्टिंग, तुम्हारे सामने से गुजरने पर दोस्तों के साथ जबरदस्ती बात करने की एक्टिंग और फिर दोस्तों से पूछना ."देख रही थी क्या बे?...वो नामाकूल भी हाँ कह देते थे. परिवर्तन तो हमने तुम्हारे अंदर भी कराये थे. जैसे तुम्हारा स्कूल बेपरवाह लेट आना, क्योंकि हमने डिसिप्लिन इंचारजों से कह रखा था की तुम्हे कुछ न कहें, तुम किसी को भी झिड़क देती थी, डिसिप्लिन इंचारजों को भी. हर कम्पटीशन में तुम भाग लेती थी मेहंदी कम्पटीशन,रंगोली कम्पटीशन ,क्योंकि तुम्हारा नाम सुभाष हाउस की तरफ से दे दिया जाता था, मॉनिटर भी बन गयी तुम, तुम भी ये बात जानती थी. और उस अंताक्षरी में तुमने गाना गाया था...क्या बेकार गाना था, "नहीं चाहये दिल दुखाना किसी का..."  हमारा दिल और जिगर (पता नहीं किधर होते हैं बॉडी में ), दोनों दुखा रही थी तुम.

 

बिना तनख्वाह के खुफिया एजेंट, धीरज ने रिपोर्ट सौंपी...."भाई नाम दिशा है, आनंद समोसे वाली गली में कार्नर पर रेड मकान, घर गोला में है,अपने इंटर के ही 5-7 हीरो प्रोपोज़ कर चुके हैं,सब रिजेक्ट, और इसके साथ वाली नेहा,३-४ लड़को को  प्रिंसिपल ऑफिस पहुंचा चुकी है , अपना रवि लोहानी इसी के चक्कर में मारा गाया था, कम्पटीशन टफ है मगर लड़की टाइट है, बॉडी ब्राइट है........"

" अब्बे फटीचर कवि बस कर, मुझे नहीं इंटरेस्ट है भाई, वैसे भी बोर्ड है इस बार"

धीरज मेरा दोस्त था और डिसिप्लिन इंचार्ज होने के नाते असिस्टेंट भी, वो भला चुप कहा रहने वाला था..

"हाँ मगर वो तुझे देख के मुस्कुराती है, उसी की क्लास की खुसबू बता रही थी की उसने "ट्रुथ एंड डेयर" के गेम में कहा था की उसे ट्वेल्थ का शशांक पसंद है" धीरज ने अंगड़ाई लेते हुवे कहा.

अब्बे मुझे क्या करना है, इंटर में नाइनटी प्लस लाने हैं इस बार" मैंने खुद को तसल्ली दी.

“हाँ छोडो, मेरे अस्सी बन जाएँ वही बहुत है”.धीरज ने चलना चाहा.

मगर शशांक वो गिटारिस्ट भी तो हो सकता है, कॉमर्स वाला, शशांक शर्मा,पंडित भी है साला. मैंने भावों को दबाते हुवे कहा, "बस पूछ रहा हूँ"

हाँ ये गिटारिस्ट तो और कहर मचाये हुवे हैं, गिटार लेके सीढ़ी पे बैठ जाएँ बस, चाहे इनके गिटार से एक भी धुन न निकल रही हो , दो चार लड़कियां तो गिर ही पड़ेंगी.

 

उस रात नींद नहीं आयी. "ट्रुथ एंड डेयर" में उसने कहा था की उसे शशांक पसंद है, मुस्कुराती भी है,जब भी साइकिल स्टैंड से साइकिल ले के निकलता हूँ मुस्कुराती है.मेरी स्माइल को एक्सेप्ट भी करती है. सबको देख के मुस्कुराती है क्या? नहीं नहीं , सिर्फ मुझे देख के. और किसी की तरफ तो देखती भी नहीं.पक्का मैं ही होऊंगा वो शशांक.... शशांक -दिशा , दिशाशांक...नहीं यार वो गिटारिस्ट होगा, पंडित भी है,गाता भी है,,,"वन लव , वन लव कर के...वन लव इस आल इस यू नीड. हमारी कविताओं में क्या रूचि होगी दिशा को?...ये साला वेस्टर्न कल्चर हर जगह अतिक्रमड़ कर रहा है, बताओ कवि की कोई इज्जत ही नहीं.....नहीं नहीं दिशा ऐसी नहीं होगी...दिशा मिश्रा. पंडित. ये साले पंडित लोग ही हम ठाकुरों की बुद्धि भ्रस्ट किये हैं हमेशा. हम कॉपी के पीछे लिखे दिशा मिश्रा. नहीं नहीं दिशा मिश्रा नहीं अच्छा लग रहा . दिशा सिंह. ये अच्छा है. कितना प्यारा नाम है "दिशा सिंह ".कुल मिलाके हम ये खुद को कंविंस कर लिए की केस हमारी पाली में है.

 तब से हमारे जीवन में आमूलचूल परिवर्तन शुरू हुवे.हम आगे की सीटे छोड़ के पीछे की सीटों पर बैठने लगे थे,मंदिर मंगलवार की जगह शनिवार को जाने लगे थे,हनुमान जी से रिक्वेस्ट करके, क्योंकि तुम शनिवार को आती थी शनिदेव के लिए. बताओ? इन ब्रह्मचारी भगवानो से हम तुम्हे मांगते थे और तुम्हारे आते ही भक्तिभाव में ऐसा लीन हो जाते थे जैसे तुम्हे देखा ही नहीं.इज्जत मेंटेनन्स के लिए परसाद ११ से बढाके २१ का कर दिया था. मंदिर के सभी भगवानो के आगे लोटते थे ताकि तुम्हारे आने से जाने तक का टाइम पास हो जाये. नया गाना आया था , रिकॉर्ड कर लिए थे, "....कैसे बताये की तुझको चाहे…यारा बता न पाएं…" जगजीत सिंह की ग़ज़ल सुनने लगे थे, "झुकी झुकी सी नजर,"…और उसका ये वाला स्टांजा रिपीट कर कर के सुनते थे, "तेरी उम्मीद पे ठुकरा रहा हु दुनिया को...तुझे भी अपने पे ये ऐतबार है की नहीं" …मानो 4-5 लड़कियों का प्रपोजल रिजेक्ट कर चुके हों...नया नया पता चला था की हम रगा भी लेते हैं, उस दिन अपनी धुन में तेजी से सीढियां चढ़कर लाइब्रेरी की तरफ मुड़ते हुवे तुमसे टकराये थे. स्क्रू गेज से कैलकुलेट हो जाए इतनी कम दूरी पर थे, एक सेकंड,दो सेकंड, तीन सेकंड...

"रास्ता दीजिये मुझे आगे जाना है" झुंझलाई नहीं थी, शरमाते हुवे कहा था तुमने.

  लाइब्रेरी में तुम्हारे घुसते ही दोस्तों की एक्टिंग शुरू.तुम्हे सुना सुना के ,"अरे शशांक कहाँ है? शशांक यार ये क्वेश्चन समझाना जरा? शशांक यार अपनी कॉपी देना जरा" ...और हमारी फूल के कुप्पा हो के शर्माने की एक्टिंग.तुम शर्मा के हस पड़ी थी, बालियां हिल गयी थीं,...लड़की मिले या न मिले पर अगर दोस्त लोग भाभी मानने लगे तो लड़के को आधा सफल माना जाना चाहये.

 

प्रीबोर्ड शुरू हो चुके थे और हम लगभग लगभग ख़त्म,सारे पेपर ख़त्म हो चुके थे बस फिजिक्स बाकी था और उसके बाद एक महीने की छुट्टी, बोर्ड एग्जाम के लिए सेंटर दुसरे स्कूल जाना था,लड़कियों का सेल्फ सेंटर था.फिजिक्स एग्जाम के लिए छुट्टी में भी एक्स्ट्रा क्लास थी और मैम प्रदीप'स  की मोटी किताब  से सवाल लगवा रही थीं....."रास्ता दीजिये मुझे आगे जाना है",झुंझलाई नहीं थी, मुस्कुरायी थी. रास्ता? पागल, मंजिल तो आ गयी, आगे कहाँ जाना है?ऐसे कहना चाहये था, हाँ ये सही रहता.नहीं , दरबान की तरह झुक के रास्ता देते तो और सही होता. पर हम बोल ही नहीं पाते कुछ.....मैम वेक्टर वाले सारे सवाल शशांक से पूछिये, इसका डायरेक्शन (दिशा) का फंडा क्लियर है. पागल हैं ये दोस्त भी.

 

तभी मैम ने सर पे एक टप्पी मारी..."कहाँ खोये हो? ..चलो बताओ ये प्रोजेस्टायिल पार्टिकल कहाँ गिरेगा?

मैम वो..वो....

बताओ कैसे निकलोगे??

(शुभम आगे से कुछ यू स्क्वायर प्लस ज़ी स्क्वायर जैसे इशारे कर रहा था पर मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था.)

मैम वो जो ...वो जो  ज्ञात जानकारी है वो ...वो एक तरफ लिख लेंगे..जो ...जो निकालना है उसके आगे क्वेश्चन मार्क लगा लेंगे, जो रिक्वायर्ड फार्मूला है वो पुट कर देंगे! आंसर निकाल लेंगे..."

मैम दो मिनट स्तब्ध रही की क्या बोल गया लड़का. फिर बोलीं ," कोन सा फार्मूला, कोन  सी वैल्यूज? क्या पुट करोगे?

इतने में घंटी बज गयी और हमारी जान छूटी. क्लास के बाद धीरज आया और मुझे चढ़ाना शुरू किया.

 अब तो कॉलेज ख़त्म हो रहा है, अब कब बोलोगे?

क्या बोलना है?

नाटक मत करो, कल का एग्जाम है फिर अगले हफ्ते फेरवेल है जो टेंथ और ट्वेल्थ का अलग अलग होगा, फिर एक महीने बाद बोर्ड है जो दूसरे स्कूल में होगा.बोलोगे कब?

हम पर छायावाद हावी था," खता तो तब है जब हम हाले दिल किसी से कहें, किसी को चाहते रहना कोई खता तो नहीं" टाइप गाने सुनते थे, तपाक से बोल दिए,"प्यार का मतलब सिर्फ हासिल करना नहीं होता धीरज,तुम नहीं समझोगे"

ई राग हमें न बताओ, उसके लिए कविता लिखे हो, जेब में लिए फिरते हो, कब दोगे?

 दे दें ? पक्का? अब्बे घर चली गयी होगी.

क्लास में है, टिफ़िन कर रही है. केवल 8-10 लडकियां है, बाकि पूरी बिल्डिंग खाली है, ऐसा मौका फिर नहीं आएगा.

अब्बे, फिर कभी दे देंगे यार.डर लग रहा है.

चलो हम भी चलें साथ में? इसमें डरने की क्या बात है?

आगे-आगे धीरज और पीछे पीछे हम दुम दबाये चल  रहे थे.धीरज क्लास में घुसा और आदेश भाव से बोला," आप लोग जरा लंच बाहर कर लीजिये. पहले तो लड़कियां चौंकी, की क्या बोल रहा है , उठें की न उठें, पर मेरे कमरे में प्रवेश करते ही वो उठ के जाने लगीं.मैंने दिशा को इशारा कर के रोका,"नहीं, आप नहीं, आप रुकिए"

उसने नेहा को पकड़ के रोकना चाहा.

"हाँ, आप भी रुक जाइये, बेहतर रहेगा"      

यहाँ तक मामला ठीक था, वो दोनों सामने की सीट पर बैठी थीं,मैं सीट के सामने खड़ा था, धीरज बाहर दरवाजे पे अंदर की तरफ खड़ा था, ब्लैकबोर्ड पर ट्रिगोनोमेटरी के आसान सवाल. उसकी सीट पर एक पेटीज, और सहमी हुई सी उसकी ऑंखें. मैंने पाया की वहाँ पहुच कर मैं एक ऐसे जानवर में बदल गया हूँ जिसके मुह में जुबान नहीं है और जिसके पैर लगातार काँप रहे हैं.

मैं..वो..मैं..(नेहा मुस्कुरा रही थी, जैसे कितनी बड़ी एक्सपर्ट हो)

'बोलो", धीरज ने ऑंखें दिखायीं.

"क्या?क्या बोलना है?मुझे कुछ समझ ही नहीं आ रहा था और वो पेटीज तोड़ रही थी,

यार तुम खाना बंद करो,मैं नर्वस हूँ तुम खाये जा रही हो, अजीब भुक्कड़ हो!

"फरमाइए", नेहा ने कहा.

वो.. मैं तुम्हे, आई मीन इसे, दिशा तुम्हे, पसंद करता हूँ,,,एंड आई लाइक यू (दोनों बातों का एक ही मतलब होता है गधे, मैंने मन में कहा), ठीक है थैंक्यू , चलें धीरज? और मैं दरवाजे की तरफ बढ़ा..धीरज ने मुझे वापस धक्का दिया," आगे बोलो"

"आगे क्या बोलूं , हो तो गया" मैंने दिशा की तरफ देखा जैसे सहमति ले रहा हूँ भागने की.

धीरज मेरे कान में फुसफुसाया,"कुछ तो ढंग का बोल, कवि दिमाग चला!!" मुझे याद आया की मेरी जेब में कविता पड़ी है उसके नाम की. इतने में एक मैम वहां से गुजरी. कॉमर्स टीचर,

"तुम लोग का एग्जाम नहीं है कल?फिजिक्स है न?यहाँ क्या कर रहे हो तुम दोनों?"

"मैम केमिस्ट्री इम्प्रूव कर रहे हैं” मैंने मन में कहा.

"मैम वो अब सेशन ख़त्म हो रहा है तो हम लोग जूनियर्स की काउंसलिंग कर रहे हैं की इंटर में साइंस ले या कॉमर्स''?धीरज ने चटपट कहा…कम्माल है यार ये धीरज भी.जबरदस्त सोचा इसने.

अच्छा?मैम ने भौंहे सिकोड़ते हुवे कहा,चूंकि जल्दी में थीं इसलिए चली गयीं.

मैंने जेब से ऐ-4 साइज कविता निकली जो फोल्ड करके ब्लेजर के सामने वाली पॉकेट में थी.

"मैंने एक कविता लिखी है तुम्हारे लिए, चाहता था की जाने से पहले तुम्हे ये दे दूं....फा...फाड़ना मत...तुम्हारे लिए है…मतलब लिखी है.

वो पन्ना लेने में सकुचा रही थी पर नेहा ने हाथ बढ़ा कर लपक लिया. मुझे सुकून मिला.

हो...हो…गया न...इत ..इतना ही होता है न, मैंने दिशा की तरफ देखा जैसे पूछ रहा हूँ, कि अब जाऊं? उसने भी मासूमियत से सर हिला दिया जैसे मेरे ही साइड हो वो. धीरज ने भी तिरस्कार भाव से सर हिला दिया कि " चलो भैया!"

बाहर निकल के जान में जान आयी. "सही था न?" मैंने लंबी सांस छोड़ते हुवे कहा,

हाँ कॉन्फिडेंस तो जबरदस्त था आपका!

अरे छोडो यार, लेकिन वो भी को-ऑपरेट कर रही थी, नहीं?

वही तो मैं भी सोच रहा था, कि क्यों?

हम दोनों ने एक दुसरे कि तरफ विस्मय से देखा.

पर यार तुमने जवाब तो पूछा ही नहीं?

वापस चलें क्या? अब्बे छोडो, मैंने बोल दिया यही बहुत है,कल आखरी दिन है बोल ही देगी.

 

रात को फिर नींद नहीं आयी.एग्जाम कि तो कोई चिंता ही नहीं थी. फेल होने के पूरे आसार थे, पर हम विजयी मूड में थे,....नेहा अच्छी लड़की है,सपोर्ट कर रही थी, गलत कहते हैं सब उसके बारे में. धीरज मेरा सबसे अच्छा दोस्त है. जो मुसीबत में काम आये वो दोस्त. शुभम वुभम सब मतलब के दोस्त हैं, बस पढाई के टाइम के , 'यार तुम्हारे नोट्स कम्पलीट हैं?यार अपनी प्रदीपस देना कुछ दिन के लिए." बस पढाई में डूबे हुवे. किताबो कि ब्लैक एंड वाइट दुनिया से निकलो और थोड़ा रंग भरो जिंदगी में. ये सब एक पार्ट है लाइफ का. पर्सनालिटी डेवेलोपमेंट. ये दिखाता है कि आपकी अंतरवैयक्तिक दक्षताएं (इंटरपर्सनल स्किल्स) कितनी हैं. बेचारा शुभम , पुअर गाय. दिन भर पढाई पढाई पढाई....मेरे दोस्त,"ढाई अक्षर प्रेम के पढ़े सो पंडित होये"...अरे वाह हम तो 'पंडित' बन गए. मामला बन गया. सामने कॉपी खुली हुई थी फिजिक्स की और हम फिजिकली किसी और ही दुनिया में थे.टॉपिक खुला हुआ था, 'कंज़र्वेशन  ऑफ़ एनर्जी(ऊर्जा का संरछड़), और हम ऊर्जा से भरे जा रहे थे, कल क्या लिखेंगे से ज्यादा जरूरी था कल क्या बोलेंगे?....इस बार धड़ाधड़ बोलेंगे वो भी फ़्लूएंट इंग्लिश में, जैसे पहली बार बोले थे, जैसे स्टेज पे बोलते थे. अरे नहीं , कल मिलेंगे ही नहीं, अरे थोड़ा मौका दो उससे सोचने का!.....खैर जैसे तैसे रात कटी, सुबह धुली हुई  प्रेस कराई शर्ट में हम स्कूल पहुंचे. हमारे दैनिक जीवन में १० रुपये के सेट वेट जेल और १० रुपये के फेयर एंड हैंडसम का खर्च बढ़ गया था.

पूरी बिल्डिंग में दिशा और नेहा कहीं दिखी नहीं. क्लास के बाहर शुभम मिला. पुअर गाय.

'बड़ी चर्चा में हो आजकल?सही जा रहे हो!" उस  ने बैग में से पैड निकालते हुवे कहा.

मैंने विजयी मुस्कान मुस्कुरायी और वो तिरस्कार भाव से देखते हुवे आगे चला गया. मैं सोच में पड़ गया. आगे कि सीट पर मेरा रोल नंबर था, हीरोगिरी में पैड लाना भूल गया था. इसे कैसे पता चला?किसने बताई होंगी इस पढ़ाकू को ये सब बातें?इतना मुह बना के क्यों देख रहा था जैसे मेरी शामत आने वाली हो.खैर पेपर बटा, कॉपी बटी. पेपर आसान नहीं था परंतु कुछ पूर्व संचित कर्मो कि वजह से सारे प्रश्न कहीं देखे देखे लग रहे थे.....पर शुभम को क्या पता है? मैम ने  बताया?कहीं दिशा ने मैम से शिकायत तो नहीं कि? प्रिंसिपल मैम से? मेरे चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं. पर प्रूफ क्या है?मैं साफ़ मना कर दूंगा, मैम आई डोंट हैव इंटरेस्ट इन सुच थिंग्स! पर कविवर, वो कविता?: कॉपी पर कारणों इंजन के चित्र को शेड करते हुवे मैं ये सब सोच रहा था. कविता को नेहा ने लपक के हाथ में क्यों ले लिया था?वो साहित्यप्रेमी कब से हो गयी?सुबूत इकठ्ठा कर रही थी क्या? सहसा मेरा ध्यान कारणों इंजन से हटकर नेहा कि केस हिस्ट्री पर गया. ये वही लड़की थी जो कई लड़कों को प्रिंसिपल ऑफिस कि तीर्थ यात्रा करा चुकी थी. कई लड़के तो स्कूल से  मोक्ष भी प्राप्त कर चुके थे.रवि लोहानी के पिटने का दृश्य मेरे आँखों के सामने तैरने लगा. उसके पापा ने उसे प्रिंसिपल ऑफिस के सामने जूतों से मारा था. मुझे ऐसा लगा कि पापा मुझे सबके सामने जूतों से पीट रहे हैं. फ़रवरी के महीने में मेरे पसीने छूट रहे थे.... नहीं यार दिशा ऐसी लड़की नहीं होगी, वो ऐसा नहीं करेगी. क्यों मुस्कुराती थी मुझे देख के?कल तो सपोर्ट भी कर रही थी, जब मैंने पूछा था "हो गया न? इतना ही होता है न? उसने सर हिलाया था जैसे कह रही हो कि आप जाओ, मैं सोचूंगी.....नहीं बेटा वो ये नहीं कह रही थी, वो कह रही थी कि हाँ हो गया , इतना काफी है आपकी बैंड बजाने के लिए, बाकि लड़के भी इतना ही प्रोपोज़ करते हैं....और तो और ये दोनों डायनें आज दिख भी नहीं रही थीं बिल्डिंग में, पक्का प्रिंसिपल ऑफिस में होंगी, और तुम्हारा वो स्पार्कल से सजाया 'साहित्य पत्र', प्रिंसिपल मैम कि टेबल पे होगा. क्या जरूरत क्या थी तुमको कालिदास बनने कि?

"कुछ इतराती,कुछ बलखाती

मन को विचलित सा कर जाती,

तुम अपने नैन चकोरों से ,

तुम तीखे तीखे छोरों से,

मेरे चंचल ह्रदय को धड़काती,

...कुछ इतराती ,कुछ बलखाती,,

जब कभी भी मुस्कुराती हो

मैं मंत्रमुग्ध हो जाता हूँ,

खुसबू बिखेरती चलती हो

    खुद ही खुद में खो जाता हूँ,

 

बेटा, मंत्रमुध तो पापा हो जायेंगे तुम्हारे साहित्य से,नाम कटा के गांव बुला लेंगे,कि बेटा घर से नवलेखन करो. मुझे अपनी इस टुटपुँजिया कविताबाजी  पे इतना गुस्सा आ रहा था कि सर पीट लूँ.....,मैं साफ़ मुकर जाऊंगा मैम के सामने , मैम मैंने ये लिखा ही नहीं है आप राइटिंग मैच करा लीजिये. ओ बेटा शशांक यू आर आ जीनियस ,राइटिंग तो तेरी है ही नहीं,भैया से लिखवाया था अच्छी राइटिंग में....नहीं यार पकड़ा जाऊंगा मैं….मैं लगभग रो रहा था...इंटर में मैडल से लेकर आर्मी अफसर बनने तक के सारा भविष्य  चौपट नजर आ रहा था. मैं दो तीन पंक्तियाँ प्रिंसिपल मैम कि तारीफ में लिख दूंगा.....अब्बे मैं ये क्या सोच रहा हूँ.

हर अगले छड़ मुझे लग रहा था कि अभी एक चपरासी प्रिंसिपल मैम से मेरा बुलावा लेके आएगा और मैं रह रह कर दरवाजे कि तरफ देख रहा था. और चपरासी आया भी, सीधा मैम के पास गया,और मैम ने क्लास कि तरफ देखा, मुझे लगा मुझे ही देख रही हों.

"शशांक!"

'यस...यस...मैम "

"तुम्हारे बगल वाला लड़का नहीं आया?'

यस मैम, वो पिछले सभी एक्जामो में नहीं आया है"

मैम ने चपरासी कि तरफ देखा और कहा," वन एब्सेंट"..मेरे दिल कि धड़कन थोड़ा शांत हुई, इसके बाद चपरासी दो तीन बार और आया और हर बार मेरे ५ मिनट ले गया.बदतमीज़! मेरी भावभंगिमा तब टूटी जब मैम ने अनॉउंस किआ,"लास्ट थर्टी मिनट्स लेफ्ट'. जल्दी जल्दी में इतना कर दिया कि बस पास हो जाऊं. क्लास से बाहर निकलते  ही वो कॉमर्स वाली मैम मिल गयीं.

"शशांक, प्रिंसिपल ऑफिस में वेट हो रहा है, जल्दी जाइये", उन्होंने एक कुटीली मुस्कान के साथ कहा. मैंने उनकी तरफ ऐसी लाचारी से देखा जैसे ईद के दिन बकरा छोटे पठान को देखता है,कि तुम्ही बचा लो!....सब बर्बाद हो चूका था. बुढ़िया प्रिंसिपल का तमतमाया चेहरा, पापा का जूता,क्लासमेट्स के तिरस्कार से भरे चेहरे, मेरी आँखों के आगे घूम रहे थे. क्लासरूम से प्रिंसिपल ऑफिस कितना दूर है ये आज मुझे जान पड़ा. सारा कुसूर इस हरामी धीरज का है.इसी ने मुझे फसाया था. क्या जरूरत थी मुझे उस क्लासरूम में जाने कि अपनी ये फ़र्ज़ी तुकबंदी का कागज़ उसके बैग में भी तो डलवाया जा सकता था, जैसे उसके बर्थडे पर बर्थडे कार्ड डलवाया था चुपके से. मगर आपकी वो कविता...ओह हो हो...

"मैं खेत सींचता हूँ जैसे, पानी में खेल रही हो तुम,

तुमको देखूं या कल अपना, ये नजर हमें भरमाती है,

तुम आज लुभावन लगती हो, मुझे कल कि फिक्र सताती है'...

 

रहोगे गवार के गंवार,कविता में भी खेती कर रहे हैं बुड़बक,५ साल आये हो गया शहर . अच्छा है पापा को तुम्हारा भविष्य तय करने में कठिनाई नहीं होगी, गन्ने कि अगुवानी बुवाई करना. पर अब सब बर्बाद हो चूका था.शुभम मेरे दोस्त बचा लो मुझे.अब से सिर्फ पढाई करूंगा, इस एक महीने में बोर्ड कि ऐसी तयारी करूंगा कि..मगर कैसे? एडमिट कार्ड तो आपको मिलेगा नहीं, उसके लिए पापा बुलाये जायेंगे.

 

जैसे तैसे कदम घिर्राते हुवे हम  प्रिंसिपल ऑफिस पहुंचे. दरवाजे से झाँक कर देखा तो अंदर धीरज भी खड़ा था. बहुत सही बेटा, तुम भी फसे , सही है. थोड़ी तसल्ली मिली.

"कॉम इन शशांक!" प्रिंसिपल मैम कि आवाज आयी.

कैसे घुसूं? हमेशा कि तरह मुस्कुराते हुवे या पणिया कि तरह सर झुकाये हुवे. पर ये क्या अंदर तो 5-7 लड़के खड़े थे. मॉस प्रपोजल हुवा है क्या?शुभम भी था ..ये भी? धोकेबाज़ ब्रूटस!

मैं धीरज के कान में फुसफुसाया" ई सब प्रोपोज़ किये हैं क्या बे?"

"क्या बक रहे हो?" धीरज ने आवाज दबाते हुवे कहा.

"देखिये स्टूडेंट्स आप सब से मुझे बोर्ड एग्जाम में काफी उम्मीदे हैं..."

"मैम मेरा आज का पेपर देख लेंगी तो आपकी वो उम्मीद टूट जाएगी' मैं मन में कुनमुनाया.

उम्मीद है कि आप अच्छे मार्क्स लाकर इस ब्रांच का नाम रखेंगे, मैं आपके अच्छे परफॉरमेंस के लिए शुभकामनाये देती हूँ,डू वेल!' प्रिंसिपल मैम ने जाने का संकेत किया.

इस समय प्रिंसिपल मैम मुझे किसी देवी से कम नहीं लग रही थीं, और मैं मन ही मन उनकी हर बात मानने कि प्रतिज्ञा कर रहा था.

***

"प्रोग्राम ख़त्म हो गया, लंच करने नहीं चलोगे?" शाहीन ने मुझे जगाया.

हाँ , चलता हूँ.

२ घंटे कब बीत गए पता ही नहीं चला. मेरा हाल ऐसा था जैसे अभी एक गहरी नींद से उठा हूँ और समझने कि कोशिश कर रहा हूँ की मैं हूँ कहाँ? खैर लंच से कोई समझौता नहीं, 'प्यार ' अपनी जगह है ,

'पनीर' अपनी जगह… वो जूनियर्स के साथ लंच कर रही थी. चूंकि मैं अब पहले से ज्यादा कॉंफिडेंट हो चुका था, मैं उधर ही लपका. एक जूनियर ने पुछा,'भैया प्रोग्राम कैसा रहा?', "अच्छा रहा ' कहके मैं सीधा उसी से मुखातिब हुआ.

"मिश्रा जी , आप विकासनगर से आती हैं न?

हाँ, मगर आपको कैसे पता ?" वो थोड़ा चौंककर ,थोड़ा पहचानने कि कोशिश में बोली,

"आनंद समोसे वाली गली में कार्नर वाला मकान', मैंने नाटकीय तनाव को बढ़ाते हुवे कहा.

उसकी आँखे फ़ैल गयीं और वो मुझे पहचानना चाह रही थी.

"मैं आपकी बड़ी बहन दिशा के साथ आर.एल.बी में था" मैंने उसके विस्मय को कम करते हुवे कहा.

  आप उनके क्लासमैट थे?

नहीं दो साल सीनियर.

'आप शशांक भइया हो? आप कवितायेँ लिखते हो? बहुत सुना है दीदी से आपकी कविताओं के बारे में." वो एक सांस में बोल गयी.

'जी ! मैं शशांक हूँ', मैंने नजाकत से सर झुकाते हुवे कहा

वाओ! इनफैक्ट दीदी मुझे अभी लेने आ रही हैं, आप मिल भी लीजियेगा'

"जरूर! ', और मैं रसगुल्ले कि तरफ बढ़ गया.

 

उसे याद  हूँ मैं? सिर्फ दो साल सीनियर बोला और पहला नाम मेरा? कितने लड़को ने प्रोपोज़ किया था, स्कूल कि सबसे सुन्दर लड़की को. और मेरा नाम? उसे "कवितायेँ", पसंद थी मेरी? वो शशांक , शशांक शर्मा नहीं शशांक सिंह था? काश शुभम यहाँ होता और ये सब सुनता. हमेशा मेरा मजाक उडाता है उन दिनों के लिए. भले मैंने एक महीने अंडरग्राउंड पढाई करके 91% लाये थे, मैडल भी लिया था स्कूल से, पर बाकी का पूरा साल मेरा निरर्थक नहीं था? मैं था उसकी जिंदगी में कुछ?

 

बाहर निकला. तुम दिखी मुझे दूर से आते हुवे. ब्लू जीन्स,वाइट कुर्ता. पहले से भी ज्यादा हसीं,खूबसूरत.

इतने दिनों बाद …5 saal ho gaye hain. मैं लाइब्रेरी कि तरफ मुड़ गया.

शुभम ! अमीनाबाद नहीं चलना है बुक्स लेने?

चल रहे हैं! जल्दी क्या है?लंच कर लें?

नहीं! नहीं! अभी चलो मैं तुम्हे वहीँ कुछ खिला दूंगा.

चलो.

 

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