‘लाइट बंद कर दो।‘ कहा था राजेश ने।

‘क्यों, क्यों बंद कर दे लाइट।‘ मैने पूछा।

‘अरे तुम समझती नहीं हो। समझा करो।‘

‘क्या समझाना चाहते हो, बताओ तो।‘

‘यही कि अंधेरे का मजा ही कुछ और है।‘

‘नहीं, नहीं चाहिए मुझे अंधेरे का मजा।‘

‘तुम जिद बहुत करने लगी हो।‘

‘जिद मैं नहीं करती, जिद्दी आप होते जा रहे हैं। क्या समझते हो, मैं कुछ जानती नहीं। .....इतने दिनों में आपकी नस-नस से वाकिफ हो गई हूं मैं कि आपके मन में क्या बात हैं।‘ मुझे भी न जाने क्या हो गया था या यह कहें कि मैं अपने आपे से बाहर होती जा रही थी। आखिर कब तक अपमान सहती। सहन करने की भी कोई सीमा होती है। मैं अच्छी तरह जानती थी कि राजेश के मन में पिछले कई महीनों से क्या चल रहा था।

‘क्या है मेरे मन में बताओ....बताओ....अब बताती क्यों नहीं।‘ राजेश खिसियाने लगा था।

‘देखो मेरा मुंह मत खुलवाओ।‘ मुझे भी मानो पागलपन के दौरे पड़ गए हों।

‘खोलो .....खोलो मुंह..... आखिर रोका किसने है मुंह खोलने को। उस दिन नहीं खोलती थीं जब.... ।‘ राजेश के मुंह से इतना सुनकर तो मेरे तनबदन में आग लग गई थी। ‘तब ....क्या......क्या कहना चाहते हो। कहो ना। मुंह बंद क्यों कर लिया। अरे मन में जो है कह डालो.....रोक क्यों रहे हो जुबान पर आई बात को। कभी जुबान से तो कभी शरीर से अपमानित ही तो करते आ रहे हो तब से आज तक.....तब तो बहुत बड़े देवता बन गए थे। क्या इसीलिए बने थे देवता कि जीवन भर मुझे तिल-तिलकर जलाओ.....सुलागाओ मुझे, गीली लकड़ी की तरह।.....काश तुम मुझे मर जाने देते.......काश तुमने मेरा साथ न दिया होता ......।‘ मैं रोने लगी थी। आंसुओं से चेहरा सराबोर हो गया था।

राजेश ने कपडे़ पहन लिए थे। मैं रोती जा रही थी और कपड़े भी पहनती जा रही थी। राजेश ने मुझे चुप नहीं करवाया था वैसे मेरा जरा सा चेहरा मुरझाया हुआ देखता तो हाल कहने लगता था, ‘क्या हुआ राज.....मुझसे कोई गलती हो गई‘ और कान पकड़कर उठा बैठक लगाने लगता। उसने कभी मुझसे राजश्री नहीं कहा। हां, कभी जब मुझे परेशान करने का मन होता तब जरूर ‘क्या हुआ भाभी’ कहने लगता था लेकिन आज तो बिल्कुल निर्दयी बन गया था। उसने कपड़े पहन लिए और करवट लेकर सो गया था लेकिन मैं....... मुझसे तो नींद कोसों दूर थी। मैं बार-बार बीस साल पहले वाले राजेश को याद कर-करके बिलख रही थी.............

...........जब मेरी शादी होकर आयी थी तब राजेश सातवीं कक्षा में पढ़ता था। बहुत प्यारा सा सुंदर और मासूम। कोई समझ नहीं थीं उसमें दुनियादारी की। कितनी ही बार मेरी गोद में सो जाता था। इसके भैया हमेशा कहा करते, ‘राजश्री, चलो तुम्हे मैंने मुंह दिखाई में देवर के रूप में बेटा दे दिया। अब इसी से खेलो।‘ और मैं खुशी-खुशी राजेश को प्यार करती रहती। राजेश स्कूल से आता तो भाभी-भाभी करके मुझसे लिपट जाता। मैं मां की तरह उसका ध्यान रखती। दो ही भाई थे ये-राजेश और मेरे पति। दोनों भाइयों के बीच बारह साल का अंतर था। मेरी सासु बताया करती थीं कि इन दोनों भाइयों के बीच उनकी दो बेटियां और एक बेटा भी हुए थे लेकिन बचे नहीं थे तीनों। राजेश के पैदा होने पर मेरे ससुर ने खूब खुशियां मनाई थीं। मंदिर, मस्जिद से लेकर पीर, मजार तक पर ले गए थे राजेश को। ‘बस राजेश बच जाए अब और बच्चे नहीं करेंगे।‘ राजेश, सास-ससुर और मेरे पति की धड़कन था।

समय भागता गया और सास-ससुर बूढ़े होते गए। घर में धन धौलत की कमी न थी। जमीन जायदाद थी तो नौकर चाकर भी थे लेकिन मेरे पति के मन में कहीं शंका घनी थी जो उनके अंतस्थल में बैठी हुई थी।

वे मुझसे प्यार तो करते थे लेकिन अंदर ही अंदर कहीं बिखरे हुए थे। मैंने बहुत पूछा लेकिन उन्होंने कभी बताया नहीं। हमेशा टालमटोल कर जाते, ‘कुछ नहीं बस एैसे ही।‘ क्या इतना कह देने से काम चल जाता है। मेरा पति अंदर ही अंदर टूट रहा था। मैं कैसे खुश रह सकती थी। राजेश धीरे-धीरे बड़ा होने लगा था। अब मेरी गोद में नहीं समाता था। दुनियादारी समझने लगा था।

तभी-तभी एक दिन.....मेरी चचेरी ननद ने बताया, भाभी, भैया हमारे खेतों में काम करने वाले बटाईदार की लड़की को प्यार करते थे। बटाईदार छोटी जाति का था। प्यार अधूरा ही रह गया। घर में खूब तूफान मचा लेकिन शादी नहीं हो पाई। लड़की और उसके मां-बाप चाहते थे लेकिन सामाजिक व्यवस्था आड़े आ गई। बटाईदार ने अपनी बेटी की शादी अपनी ही जाति-बिरादरी में कर दी है। भैया आज भी उस लड़की की याद में अकेले में रोते हैं।‘

मैंने सुना तो मैं सन्न रह गई थी। नसीब पीट लिया था अपना लेकिन मेरे वश में कुछ नहीं था। और एक रात जब हम दोनों लेटे हुए थे तो मैंने पूछ ही लिया था, ‘अगर आप किसी और से प्यार करते थे और किसी कारण से वह आपको नहीं मिली। आपका प्यार परवान नहीं चढ़ सका तो इसमें मेरा कसूर क्या है।‘

‘मेरे प्यार में कोई कमी नहीं है राजश्री। मैं तुम्हें बहुत प्यार करता हूं लेकिन मैं क्या करूं।‘ और जिस रात हम दोनों में ये बातें हुईं ठीक उसकी अगली सुबह से मेरे पति मुझे छोड़कर न जाने कहां चले गए थे। हां, वे लौटकर नहीं आए। मैं अपने आप को दोष देती रही कि आखिर क्या जरूरी था ये सब पूछने की। एैसे प्यार के किस्से तो न जाने कितनी औरतों और आदमियों के शादी के पहले रहे होते हैं। शायद मैंने जल्दी कर दी थी। मैं धीरज रखती तो यह नौबत नहीं आती। लेकिन अब पछताने के सिवाय मेरे पास कोई चार नहीं था। इनके जाने के बाद ही मुझे पता चला कि मैं पेट से हूं। मैंने अपनी सासु को बताया तो वे बहुत खुश तो नहीं हुई हां थोड़ी सी आश्वस्त जरूर थीं। उनका मानना था कि मेरे पति के घर छोड़कर चले जाने के लिए मैं ही जिम्मेदार हूं। मेरे ससुर अपने पुत्रवियोग में रात दिन रेते रहते थे। उनकी आंखों की रोशनी चली गई थी। बिल्कुल दिखाई नहीं देता था उन्हें। और ठीक उसी दिन, जिस दिन मेरा बेटा पैदा हुआ मेरे ससुर की अर्थी उठी थी। मेरी सासु ने मेरे बेटे को ही अपने दादा की मृत्यु का उत्तरदायी माना था, ‘न जाने किस घड़ी में पैदा हुआ अभागा मेरे पति को लील गया।‘

लेकिन मेरी सासु से बहुत दूर की समझ रखने वाला राजेश मुझे बहुत सम्मान देता था। हमेशा यही कहा करता, ‘मेरी भाभी, मेरी दूसरी मां है।‘ और मैं उसकी इस बात पर अपना जीवन संवारने को कटिबद्ध थी।

मेरी सासु ने मुझे मेरे ससुर की मृत्यु और अपने बेटे के घर छोड़ जाने के लिए प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्षरूप से दोषी मान लिया था। हमेशा कहा करती, ‘डायन है डायन....अभी न जाने कितनों को और निगल जाएगी। ए रे......राजेश दूर रहा कर इस कुलच्छिनी से कहीं तेरे ऊपर भी डोरे न डाल दे....एैसी कुतियों की क्या। देवर ही फंसा लें.....और फांस लें सो कुछ नई.....तुझे भी न निगल जाए।‘

मैं अंदर तक सिहर जाती थी अपनी सासु की बातों से। अब तो आसुओं के साथ मेरा चोली दामन का संबंध हो गया था लेकिन एैसे में राजेश ने मेरा खूब साथ दिया। मेरे बेटे को पालने और बड़ा करने में राजेश ने कोई कमी नहीं छोड़ी। बिल्कुल पिता की तरह साथ दिया था। बेटा भी बड़ा होने लगा और जब बेटे ने पहली बार मुंह खोला तो राजेश को ही पापा कहा था। मुझे उस दिन न जाने क्यों मन में खुशी हुई थी। राजेश ने मेरी तरफ देखा तो बस हंस दिया था। मुझे राजेश की हंसी में कुछ लगा था या यह मानो कि मेरे मन का बहम था।

धीरे-धीरे राजेश मेरे बहुत करीब आता गया या यह कह लो कि मैं राजेश के करीब जाने लगी थी और यही बात मेरी सासु की आंखों की किरकिरी बनी हुई थी।

घर में अब हम चार ही प्राणी थे, मैं, मेरा बेटा, राजेश और सासु। पति की यादों को कब तक संजोती। बेटा धीरे-धीरे पैरां चलने लगा था और देखते ही देखते वह दिन भी आया जब वह स्कूल जाने लगा। उसके स्कूल चले जाने पर मैं बिल्कुल अकेली हो जाती थी। राजेश खेतों पर या बटाईदारों के साथ हिसाब किताब में लगा रहता और रात को जब लौटता तो थकाहारा बिल्कुल टूटा हुआ रहता। मैं उसे बहुत प्यार से खाना परोसती और कितनी ही बार तो हाथों से भी खाना खिलाती। वह हमेशा कहता, ‘अब मैं बड़ा हो गया हूं भाभी। बहुत खिला लिया अब नहीं।‘ और यह तो हमेशा पूछता, ‘तुमने नहीं खाया।‘ और अपने हाथों से खिलाने लगता। उसका एैसा करना मुझे खुशी देता। मन अंदर ही अंदर हिलोरें मारने लगता। एक युग समाप्त हो गया था पुरूषस्पर्श के बिना। अब न जाने क्यों मुझे राजेश का स्पर्श एक देवर का स्पर्श नहीं लगता। उसका छूना मुझे पुरूष का छूना लगने लगा था। मैं हमेशा यही चाहती कि मैं जब भी खाना खाऊं तो मेरा राजेश ही मेरे मुंह में निवाला दे। और जिस दिन राजेश मुझे नहीं खिलाता उस दिन मैं लगभग भूखी ही रह जाती। मुझे हुआ क्या था मैं भी नहीं जानती थी। मैं अपने आप पर गुस्सा होती तो मन अंदर से धिक्कारने लगता। इसमें क्या है पगली देवर तो वैसे भी द्विवर अर्थात दूसरा वर होता है। मैं मन को समझा लेती और आखिर एक दिन मैं हार गई थी...............

उस दिन.....हां.....हां...उसी दिन तो.........राजेश शहर से मण्डी में सामान बेचकर, हिसाब करके आया था। रात लगभग आधी होने को आयी थी। बेटे को सुलाकर और अपनी सासु को खाना खिलाकर मैं राजेश का इंतजार कर रही थी। राजेश को बटाईदार घर छोड़ गया था।

राजेश ने घर में घुसते ही आवाज लगाई , ‘भाभी’ और मैं पागल सी उसके पास दरवाजे पर पहुंच गई थी। न जाने मुझे क्या हुआ था कि मैं उसे चूमे चली जा रही थी। उसके दोनों गाल, नाक, माथा, ठोड़ी और जैसे ही मैने उसके होठों पर चूमना चाहा तो उसने भी मेरे होठों को चूम लिया था। एैसा कभी नहीं हुआ था। मैं भी हमेशा उसके गाल और माथे को ही पुचकारती थी लेकिन उस दिन...उस दिन.....उसने मेरे होठ चूमे ही नहीं थे बल्कि धीरे से फुसफुसाया भी था, ‘आई लव यू राज।‘

पहली बार राजेश के मुंह से अपना नाम सुनकर मैं आसमान में उड़ने लगी थी। और पगला राजेश....इतने से ही शांत नहीं हुआ था, ‘भाभी, आई लव यू....मैं नहीं रह सकता तुम्हारे बिना.....राज मुझे कभी अपने से अलग नहीं करना। मैं नहीं रह पाऊंगा। मर जाऊंगा मैं......।‘ बस जैसे ही उसने आखिरी शब्द ‘मर जाऊगा मैं’ कहा था अनगिनत थप्पड़ मैंने उसके गालों पर जड़ दिए थे। वह मुंह मेरे सामने किए खड़ा रहा था। और जब मुझे होश आया, ‘हाय भगवान मैंने ये क्या कर दिया।‘ बस फिर क्या था जिस हाथ से मैंने राजेश के गाल पर थप्पड़ मारे थे उसी हाथ को दीवार पर दे मारा था। एैसा एक बार नहीं किया था मैंने। मैं तो लगातार मारती ही रही थी। हाथ से खून बहने लगा था और तभी.......हां....हां तभी तो, राजेश ने उसी हाथ को अपनी क्रीम कलर की सर्ट से पोंछते हुए कहा था, ‘नहीं....नहीं.......भाभी नहीं......राज एैसा मत करो..मैं तो तुम्हारा न जाने कब से था......भाभी......तुम्हीं नहीं जान पाई मुझे।‘ राजेश कभी भाभी कहता तो कभी राज कह रहा था।

अब मैं उसे कैसे समझाती कि मैं तो तुम्हें बहुत पहले से ही चाहती हूं मगर, तुम्हीं ने नहीं समझा।

बस उस दिन देवर-भाभी की सारी दीवारें धराशाई हो गई थीं। राजेश मुझे कमरे में ले आया था। हाथ को डिटोल से धोकर बेटनीवेट लगाई थी और सहलाता रहा था। और उस रात......हां.......हां....उसी रात तो...मैं और राजेश मन से ही नहीं शरीर से भी एक हो गए थे। एक जमाने से सूखे पड़े रेगिस्तान में बाढ़ आ गई थी। मेरी खुशियों का पारावार न था। और राजेश के मन में भी कोई प्रायश्चित नहीं था......कोई रंज..... कोई मलाल नहीं था......कोई दुख नहीं था।

सुबह सासु ने हाथ पर पट्टी लगी देखी तो पूछा भी था, ‘कैसे‘। मैंने सिर्फ इतना ही कहा था, ‘किवाड़ की झिरी में फंस गया था अम्मा जी इसीलिए चोट लग गई।‘ मेरी सासु ने सिर्फ इतना ही कहा था, ‘किवाड़ की झिरी का ध्यान रखा कर बहू.....हाथ भी कट सकता था।‘ मैं मन ही मन में सोच रही थी, ‘मैं तो पूरी ही कट जाना चाहती हूं सासु मां।‘

बस उसी दिन से हम दोनों पति-पत्नी की तरह रहने लगे थे। मैं राजेश से उम्र में बहुत बड़ी थी। मैं रात में ही संजती संवरती थी और वैसे भी मेरे सजने-संवरने पर कोई प्रतिबंध तो था नहीं क्योंकि मेरा पति मरा तो था नहीं सो मैं विधवा कही जाती वह तो चला गया था। मैं जानबूझकर खूब सजती संवरती। अपनी उम्र को छिपाने की खूब कोशिश करती। राजेश हमेशा यही कहता, ‘तुम ज्यादा सजा संवरा मत करो नहीं तो किसी की नजर लग जाएगी।‘ और कभी-कभी कहने लगता, ‘तुम मुझे अपने से दूर तो नहीं कर दोगी।‘ या फिर, ‘सच में चांद से भी ज्यादा सुंदर हो, भाभी।‘

मैं एक दिन गुस्सा हो गई थी, ‘मुझे भाभी मत कहा करो हां नहीं तो।‘ उस दिन के बाद वह राज कहने लगा था मुझे। कुछ दिनों से तो इतना जिद्दी हो गया था कि हमेशा कहता, ‘लाइट ऑफ नहीं करनी है।‘ मैं रोकती तो जिद्द करने लगता, ‘संगमरमर टूयूब लाइट की रोशनी में तो और ज्यादा चमकने लगता है राज.....।‘ शरीर पर एक भी कपड़ा नहीं रहने देता और पैर के नाखून से लेकर सर तक चूमता रहता। मैं अंदर तक भीग जाती फिर जैसे ही लाइट ऑफ करना चाहती हाथ पकड़ लेता।

सोचते-सोचते उठकर बैठ गई और आज.....आज कैसे जिद कर रहा था, ‘लाइट बंद कर दो।‘ न तो राज बोला था और न ही भाभी, जैसे मैं कोई अजनबी होऊं। बिस्तर से उठ गई। बाहर झांककर देखा। तारे टिमटिमा रहे थे। रात शायद ढलान पर थी लेकिन सवेरा नहीं हुआ था। आकर फिर लेट गई थी मैं। आंखे थीं कि सोना ही नहीं चाहती थीं कि फिर खुली आंखों से ही सपने देखने लगी थी।

......मेरी हर रात दिवाली होती थी। सासु मां ने कहा भी था एक दिन, ‘राजेश शादी कर ले अब। मैं चाहती हूं मेरे जाने से पहले ही तेरी शादी कर दूं।‘ राजेश ने बात हवा में उड़ा दी थी। हां मुझे जरूर चिढ़ाया था, ‘शादी कर लूं भाभीजी।‘ बदले में, मैं उससे दो दिन तक बिल्कुल नहीं बोली थी। उसने खूब मिन्नतें की थीं तब जाकर मानी थी मैं।

और तभी एक दिन....घर के दरवाजे पर किसी ने दस्तक दी थी। मैं भागकर गई तो मेरे पैरां के नीचे जमीन नहीं थी।

मेरे पति गेरूआ कपड़े पहने,लम्बी-लम्बी जटाएं एक हाथ में त्रिशूल पकड़े और दूसरे में कमण्डल लिए खड़े थे।

‘तुम‘

‘हां मैं।‘

‘तुम अभी......।‘

‘हां, मैं मरा नहीं।‘

‘...........।‘

‘मैं लौट आया हूं वापिस....।‘ इतना कहकर उन्होंने किवाड़ बंद कर दिए थे। मुझे अपनी बाहों में भर लिया था। मुझे उनका आलिगंन घिनघिना लग रहा था।

मेरी सासु ने देखा तो बहुत खुश हो गई थीं। राजेश ने बनावटी खुशी जताई थी। बेटा उनसे डर रहा था सो उनके पास नहीं गया था। मेरे पति ने पूछा भी था, ‘कौन सी कक्षा में पढ़ता है।‘

‘आठवीं में।‘ मैं न जाने कब बोल गई थी।

‘हां लंबा समय हो गया।‘ वे बोले थे

‘युग तो नहीं बीता।‘ मैं बोलती चली गई थी।

‘युग भी बीत जाता तब भी मैं तो तुम्हारा ही रहता राजश्री।‘ वे बोले थे ।

मैं क्या जबाब देती। मैं तो अंदर-अंदर ही बिखर रही थी। स्थिति लगभग ऐसी ही राजेश की भी थी। वह तो बिल्कुल शांत था मानो तालाब में पानी ठहर गया हो।

अगले ही दिन, मेरे पति ने अपने गेरूआ कपड़े उतारक फेंक दिए थे। बाल कटवा लिए और एक गृहस्थ की तरह रहने को कृतसंकल्प थे। मुझे उनका छूना एैसा लगता था मानो मेरे शरीर पर छिपकलियां रेंग रही हों। मैं बहुत कोशिश करती सहज होने की लेकिन सहज न हो पाती थी।

और तभी एक दिन........

......वे घर से बाहर गए थे किसी काम से। बेटा स्कूल गया था। सासु को ढंग से दिखाई नहीं देता था उनकी आंखों में मोतियाबिंदु बढ़ गया था। मैं और राजेश दिन में ही...........। संयोगवश बाहर के किवाड़ों पर कुंडी नहीं लगा पाए थे हम दोनों। असल में हुआ क्या था मेरे पति शायद युगों-युगों से प्यासे थे सो घर से बाहर ही नहीं जाते थे और फिर उनका प्यार आर-पार का होता था। मेरी आदत राजेश ने खराब कर दी थी...।

मैंने राजेश से कहा था, ‘राजेश मेरे पेट में तुम्हारा बच्चा है।‘ बस फिर क्या था राजेश ने मुझे सिर से पांव तक चूमना शुरू कर दिया था। पागल हुआ जा रहा था राजेश। मैं क्या करती मैं भी उसका साथ दे रही थी कि.....कि.....मेरे पति न जाने कब अंदर आ गए थे और उन्होंने सब कुछ देख सुन लिया था।

अब कुछ शेष नहीं रह गया था। बोले कुछ नहीं थे। तुरंत वापिस चले गए लेकिन अच्छी बात यह थी कि न तो मैं और न हीं राजेश, डरे बिल्कुल नहीं थे। राजेश ने कहा भी था, ‘जो होगा सो देखेंगे।‘

मेरे पति ने घर-खानदान के सभी लोगों से मेरे और राजेश के संबंध के बारे में बता दिया था।

पूरे गांव की पंचायत बैठी थी। पूरे गांव के लोग इकट्ठे हुए थे जिनमें से पांच लोग ऊपर चौड़े से स्थान पर बैठे थे और शेष लोग उनके नीचे दरी पर बैठे थे। मेरे पति थे और उनके साथ मेरी सासु मां को एक आदमी संवारे बैठा था। मैं और मेरा राजेश अपराधी की तरह खड़े थे।

‘तुम्हे शर्म नहीं आई जिसे बेटे की तरह पाला उसी के साथ संबंध बना लिए।‘ उन पांचां में से एक जिसकी मूंछें सबसे ज्यादा लंबी थी, गुर्राया था।

मैने कोई जवाब नहीं दिया था।

‘जिस औरत ने तुम्हें बेटे की तरह पाला जिसे तुम भाभी कहते हो-जानते भी हो भाभी मां समान होती है। तुमने अपनी भाभी के साथ ही संबंध बना लिए।‘ जिसकी मूंछे थोड़ी सी कम नुकीली थीं। वह बोला था राजेश से।

राजेश कुछ नहीं बोला था। वह तो बस मुझे ही देखे चला जा रहा था।

और न जाने इसी तरह के कितने सवाल पूछे जा रहे थे हम दोनों से। हम दोनों किसी के किसी तरह के प्रश्न का उत्तर नहीं दे रहे थे।

और जब किसी ने पूछा था, ‘अच्छा राजेश बताओ तुम्हारे लिए लड़कियों की कमी रह गई थी जो इस बुढ़िया पर मर गए जाकर.....अरे भई इतनी ही जल्दी थी तो शादी कर लेते और साइड में इसे भी र.....ख.....ते.....र.....ह....ते।‘ बस फिर क्या था राजेश ने चीते की तरह उस पर छलांग लगा दी थी और उसे जमीन पर गिराकर बहुत मारा था। उसका माथा फूट गया था। बीसों लोग उसे रोक रहे थे मगर राजेश थमने वाला कहां था।

मैं पहुंच गई थी भागकर, ‘राजेश छोड़ दो उसे।‘

राजेश के हाथ रूक गए थे। वह आदमी बिलबिला रहा था।

अब कुछ साबित करने को रह ही नहीं गया था। तुरंत ही पंचायत ने अपना निर्णय सुना दिया था, ‘इस कुलच्छिनी और इस नीच को भरी पंचायत में नंगा किया जाए। दोनों के सिर के बाल काट दिए जाएं। मुंह काला कर दिया जाए और दोनों को गधों पर बैठाकर पूरे गांव में घुमाया जाए। फिर....उसके बाद....दोनों को गांव से निकाल दिया जाए और फिर कभी ये दोनों इस गांव में दिखाई दें तो इन दोनों को पत्थर मार-मारकर मार डाला जाए।‘

जैसा पंचों का निर्णय था ठीक वैसा ही किया गया था। राजेश ने और मैंने बिल्कुल विरोध नहीं किया था। हां, इतना जरूर था जब एैसा किया जा रहा था तब मेरा बेटा जरूर मेरे पीछ-पीछे भाग रहा था और राजेश को पापा-पापा पुकारे चला जा रहा था।

हम दोनों गांव से बाहर कर दिए गए थे। मेरा बेटा भी मेरे साथ था। अपने शरीर के संवेदनशील अंगों को अपने हाथों से छिपाते-छिपाते हम दोनों अपने बच्चे के साथ एक रिश्तेदार के घर पहुंचे थे। उसने हम दोनों को कपड़े दिए। कुछ दिन रखा भी था। जब सामान्य हुए तब हमने उसका धन्यवाद किया और अपने बच्चे को लेकर शहर की ओर चले आए थे।

राजेश जवान तो था ही दृढ़निश्चयी भी था। मेहनती भी था। किसी ठेकेदार के साथ मिलकर काम करने लगा। कुछ दिन मैंने भी लोगों के घरों में झाड़ू-पौंछा किया। धीरे-धीरे स्थिति सामान्य होने लगी थी। और फिर एक दिन एैसा भी आया जब राजेश छोटे मोटे ठेके लेने लगा। उसने मेरा बाहर काम करना बंद करवा दिया था।

किराए के घर में रहते-रहते हमने अपना घर भी खरीद लिया था और इतना ही नहीं, देखते-देखते हमारे घर में सब कुछ हो गया। और इसी दौरान,मेरे एक बेटी और हो गई थी।

अब मेरे घर में एक बेटा था। एक बेटी थी और बहुत प्यारा सा पति था। खुशियां थीं....संपन्नता थी।

राजेश ठेकेदार बन गया था। उसके संबंध बड़े-बड़े ठेकेदारों से तो थे ही इंजीनियर्स से भी थे। बड़ी-बड़ी पार्टियों में जाता। मुझे भी साथ ले जाता। अब मैं देखती राजेश मुझसे पार्टियों में दूरियां बनाने लगा। इंजीनियर्स और ठेकेदारों की सुन्दर-सुन्दर औरतों के साथ हंस-हंसकर बातें करता। और हद तो उस दिन हो गई जब उसने एक इंजीनियर की जवान पत्नी से, उसके यह पूछे जाने पर कि यह औरत तुम्हारी कौन हैं तो मुझे भाभी बता दिया। मैंने सुना तो मैं तिलमिला गई थी।

मैंने पार्टी छोड़ दी थी और ऑटो से अपने घर चली आई। मैं रास्ते भर पार्टी वाले राजेश और पंचायत में उस व्यक्ति पर टूटने वाले, उसे कुचलने वाले और मेरे सिर्फ एक बार मना करने पर रूक जाने वाले राजेश के बारे में सोच रही थी। मेरे सिर में दर्द होने लगा था। घर पहुंची तो बेटे ने पूछा था, ‘मम्मी, पापा नहीं आए।‘

‘कौन पापा।‘

‘मम्मी, मेरे पापा।‘

‘वह तेरे पापा नहीं है।......वह मेरा देवर है।......तुम्हारा चाचा।.......सुंदर और जवान।‘ मेरी इस बात पर बेटे न जान लिया था कि मम्मी गुस्सा है और इसका कारण राजेश हैं।

मेरे आने के थोड़ी देर बाद, राजेश भी आ गया था।

सीधा मेरे पास ही आया था। कान पकड़कर उठक-बैठक करने लगा था ठीक वैसे ही जैसे पहले किया करता था जब छोटा था। मैं गुस्सा थी मैंने देखकर भी नहीं देखा था। तभी तो बेटे ने कहा ‘मम्मी, मांफ कर दो न पापा को।‘

मैंने मांफ किया था या नहीं, मैं नहीं जानती। मेरी आंखें जरूर वही थीं और बस इतना ही बोली थी, ‘राजेश तुमने पार्टी में मेरे साथ अच्छा नहीं किया....तुम्हीं तो कहा करते थे शरीर तो कुछ माएने ही नहीं रखता सारा लफड़ा तो मन का है.......और आज तुमने मेरा मन ही तोड़ दिया.......मैंने कब कहा था ..... मैं तुम्हारे लायक हूं। वह तो तुमने साथ दिया तो जी ली आज तक नहीं तो कब की.....म.....र.....ग....ई....हो....ती..‘ इसके आगे कहां बोल पाई थी मैं। आंखों में समुन्दर था जो तटों को लांघकर शहर में घुस आया था।

राजेश ने मुझे बहुत प्यार किया था लेकिन मुझे संतोष नहीं आ रहा था।

और आज.....आज फिर राजेश ने मेरा मन दुखाया है।

सोचते-सोचते बाहर आकर देखा तो सवेरा अभी हुआ ही नहीं था। शायद किसी-किसी के जीवन में कभी सवेरा होता ही नहीं है। मैं जाकर फिर लेट गई थी। राजेश अभी भी सो रहा था।

मुझे कोसां नींद नहीं थी। आंखे पथरा गई थीं। शायद फिर सपने देखना चाह रही थीं.......सपने.......पथराई आंखां के सपने।

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