किरायदार

पति की मृत्यु के पश्चात चेतना पर बड़ी जिम्मेदारी आ गयी | नौकरी तो करने ही लगी थी वह | मासूम सी सिया का चेहरा देख जब तब आँखों से अश्रुधारा बहने लगती | चेतना की वृद्धा सास भी जवान बेटे की असमय मौत से टूट सी गयी थी | घर में तंगहाली का जाल फैलने लगा | रिश्तेदारों ने सलाह दी कि ऊपर वाले पोर्शन में कोई किरायदार को रख दो | घरखर्च तो आराम से चल ही जाएगा |

रवि किरायदार बनकर आया | धीरे धीरे उसके मजाकिया स्वभाव ने घर में छाई उदासी को तोड़ दिया | सिया को तो बेहद चाहता था वह | उसे पार्क ले जाता | उसकी हर जरुरत का खयाल रखता | कभी कभी गुमसुम रहने वाली चेतना के अधरों पर भी मुस्कान ले आता था वो |

समय पंख लगाए उड़ता जा रहा था | दो साल कब बीत गए पता ही नहीं चला | एक दिन माँजी की तबियत अचानक ख़राब हो गयी | चेतना घर पर नहीं थी | रवि उसी वक्त ऑफिस से आया ही था कि उसने सिया के रोने की आवाज़ें सुनी | तुरंत अन्दर पहुँच गया | चेतना की सास की साँसे उखड़ रही थी|

“अरे आंटी जी ये क्या हो रहा है आपको ?” मैं अभी एम्बुलेंस बुलवाता हूँ !!”

“रहने दे बेटा....मेरे पास ज्यादा समय नहीं है.. तुझसे एक जरुरी बात.....” धीरे धीरे उनकी आँखें बंद होने लगी | फिर भी कोशिश कर रही थी कुछ बोलने की | “रवि क्या...क्या तुम मेरी चेतना का सहारा बन सकते हो ? मेरी बेटी का जीवन अभी बहुत लम्बा है | उसके जीवनसाथी बन जाना बेटा |” ये अंतिम वाक्य थे उनके और पानीदार आँखें सदा के लिए बंद हो गयी |

रवि ने आगे बढ़कर सिया को अपनी गोद में उठा लिया | एक नयी जिम्मेदारी का बोझ उठाने के लिए स्वयं को तैयाए कर चुका था अब वह |

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