सुबह के साढे छ: बजे थे। अलार्म ने चिरपरिचित आवाज़ में घनघनाना शुरू कर दिया। मैं रोज़ की तरह ही अलसाई सी आँखे मलती उठ गई ।वैसे भी ये अलार्म बजता ही सिर्फ मेरे लिये था।खैर मैंने अलार्म बंद किया और अपने रोज़मर्रा के कामों में व्यस्त हो गई । आठ बजे मेरा छोटा बेटा अमन नहा धो कर ,नाश्ता कर स्कूल के लिये निकल गया । नौ बजे तक मेरे पतिदेव भी अपने काम पर चले गए। घर के कामों में समय का पता ही नही चलता ।दस बज गए थे तभी मेरा बड़ा बेटा नितिन अचानक अचकचा कर उठा और हड़बदाता सा बोला " मम्मी आपने मुझे उठाया क्यों नहीं । आज दोस्तों के साथ घूमने जाने का प्रोग्राम बनाया था ।देखो मैं कितना लेट हो गया।सारे दोस्त मेरा इंतज़ार कर रहे होंगे। " ये कहते कहते वो बड़ी तेजी से नहाने भागा ।कोई और दिन हो तो शरीर में आलस ही भरा रहता है पर आज तो जैसे उसमे बिजली की सी तेज़ी आ गई थी। वो भागता हुआ सा नाश्ते की मेज तक आया पैर नाश्ते के लिये भी नही रुका मानो इस समय उसके लिए दोस्तों से ज़रूरी कुछ भी नही था। उसके चेहरे की खुशी मिली आतुरता देख कर अपनी भी वही उम्र याद हो आई।मैं भी तो ऐसी ही थी। दोस्तों के आगे खाने पीने का कोई महत्व ही नही रहता था। जब दोस्त साथ होते तो कुछ और नही चाहिए होता था खास तौर पर खुशबू के साथ ।उसके साथ दिन कहाँ चला जाता पता ही नही चलता था। वो सिर्फ दोस्त नही थी मेरी, बल्कि मेरी हमराज़ भी थी।आठवी से बाहरवीं तक साथ पढ़े थे हम। कितनी मस्ती की थी हम दोनों ने साथ मैं । जहाँ जाते साथ जाते ,साथ खाते ।दिन जैसे पंख लगाकर उड़ गए। उसकी जल्दी शादी हो गई । फिर कुछ वक्त बात नही हो पाई हमारी। कॉलेज करते ही मेरी भी शादी तय हो गई थी। उसके बिना शादी कैसे करती ।वो आई भी मेरी शादी में ।बस वो आखिरी बार मिले थे हम।इसके बाद तो जैसे खो गई वो ।उसका पता भी बदल गया था।मैं भी अपनी गृहस्थी बसाने की जद्दोजहद में व्यस्त हो गयी।लेकिन सब कुछ होते हुए भी जैसे एक कमी सी थी।एक ऐसी कमी जिसकी कोई भरपाई नही हो पा रही थी।सबकुछ तो था,एक प्यारा सा घर,प्यारकरने वाले पति,दो छोटे छोटे बच्चे,ससुराल,मायका, लेकिन नही थी तो सिर्फ मेरी बचपन की सहेली खुशबू।जिससे मैं अपने दिल की हर बात खुलकर करती थी।जहाँ न कोई औपचारितकता थी न कोई दिखावापन। हमने एकसाथ बचपन से जवानी की दहलीज पर कदम रखा।उस नाजुक दौर के एक दूसरे के सपने,रूमानी एहसास ,कितने किस्से ,कितने कहानियों के गवाह थे हमदोनो ।आज भी याद आता है तो होठों पर मुस्कान आ जाती है। शादी के बाद उससे मेरा संपर्क बिल्कुल ही टूट गया था। कोई फ़ोन नम्बर भी नही था । आज बीस साल हो गए मेरी शादी को ।कितनी बार ऐसा लगता कि कोई जादू सा हो जाये और वो मेरे सामने आ जाये ।पर ऐसा भी कभी होता है भला।

शादी के बाद ऐसा नही था कि मैंने उसे ढूंढने की कोशिश नही की ।पर शायद मैं कुछ कर नही सकती थी कोई तरीका ही नही था ओर ये सोच कर फिर मैं अपने रोजमर्रा के कामों में उलझ जाती। वैसे भी उस समय सिर्फ एक लैंडलाइन ही हुआ करता था। ससुराल से आना जाना कही मुमकिन सा ही नही था। खुशबू बस मेरे जीवन की महक बन मेरे साथ चली जा रही थी।कभी दोस्ती की मिसाल के रूप में तो कभी महकती यादो के रूप में।

पिछले कुछ चार सालों से उसे ढूंढने का एक तरीका हाथ आ गया था मेरे । एंड्रॉयड फोन आ गया था मेरे हाथ में जिसने वाट्सएप्प ओर फ़ेसबुक जैसी सोशल साइट्स से परिचय कराया । एक उम्मीद सी जग गई थी जब ये पता चला कि बिछड़े हुए लोगों को ढूंढ सकते हैं फ़ेसबुक पर । ऐसा लगा कि अब शायद मुझे अपनी खोई दोस्त मिल जाये । मेरा खाली समय अब फ़ेसबुक पर ही बीतने लगा । जैसे ही मैं खुशबू नाम डालती कितनी सारी ख़ूबशु सामने आ जाती। मुझे नाम के अलावा कुछ और पता ही नही था ।फिर अब तो चेहरा भी बदल गया होगा उसका। थोड़ी सी भी उम्मीद हो तो खोज को बल मिल जाता है।मेरा भी रोज़ फ़ेसबुक चेक करना एक सिलसिला सा बनगया।उसके साथ गुज़रे

वो दिन चित्रपट की तरह आंखों के आगे उभर आते ।इसी तरह हर रोज उसे याद करती और फिर आहें भरकर रह जाती।इसी तरह मेरे दिन गुज़र रहे थे।किसी न किसी चीज़ से जुड़ी हुई उसकी यादें मुझे गाहे बगाहे यूं ही झंझोड़ दिया करती थी।बस यही सोचती रहती थी कि काश कभी ऐसा चमत्कार हो कि खुशबू मुझे कहीं किसी मोड़ पर मिल जाए।लेकिन ऐसे चमत्कार तो सिर्फ फिल्मों में ही होते हैं।मैं यही सोचकर मुस्कुरा उठती थी।कुछ दिनों पहले की बात है,इतवार का दिन था ।रोज़ की तरह ही अपने रोजमर्रा के कामों में उलझी हुई थी कि अचानक फ़ोन की घंटी बजने लगी। फ़ोन उठाया और हेलो बोला फिर सामने से आती आवाज़ ने जैसे मेरे होश ही उड़ा दिए ।समझ नही आया हँसू या रोऊँ ।वो कह रही थी पहचान कौन बोल रही हूं। समय के साथ शक्ल तो बदल जाती है पर आवाज़ नही।उस आवाज़ को कैसे भूल सकती थी मैं।वो खुशबू थी ।यकीन ही नही हो रहा था ।बीस साल बाद जैसे खुद से मिली थी मैं ।लगा जैसे दिल में जो उसके बिना खालीपन था वो भर गया हो।पता नही कितनी देर बातें की हमने ।वो इंदौर में थी और मै देहली में। मैंने उससे पूछा उसे कहाँ से मिला मेरा नंबर । उसने बताया कि वो भी मुझे फ़ेसबुक पर लगातार ढूंढती रहती थी। वो कभी मेरे भाई का नाम डालकर देखती कभी पापा का।ऐसे ही ढूंढते हुए उसे हमारे स्कूल की एक ओर दोस्त मिल गई जिसके पास मेरे मायके का पुराना पता था।फिर क्या था उसने उस पते पर मेरे पापा का पता करवाया। फिर मेरे पापा से उसने मेरा फ़ोन नंबर लिया और तुरंत ही मुझे मिलाया।इस तरह बीस सालों की दूरी खत्म हो गई। मन से फ़ेसबुक जैसी सोशल साइट्स के लिए धन्यवाद निकला जिसने हम दो बिछड़े हुए दोस्तों को दुबारा मिला दिया और आगे भी जुड़े रहने के कई तरीके दे दिए ।उससे मिलने के बाद जैसे ज़िंदगी ही बदल गयी मेरी।लगता है मेरा बचपन फिर से लौट आया है।जब भी समय मिलता है कभी फोन या कभी ऑनलाइन हमारी बातें होती ही रहती हैं।जब हम बातें करते हैं तो लगता ही नही कि हम एक पत्नी,एक माँ या एक गृहणी भी हैं।हम सिर्फ हम बन जाते हैं ,वही बचपन वाली निश्छल सहेलियां।फिर कुछ देर बाद एक दूसरे को ये समझाते हुए कि भई घर गृहस्थी भी है और उनके काम भी निपटाने हैं,एक दूसरे को बातें खत्म करने के लिए कहते हैं।बस इसी तरह हमारी ऑनलाइन ज़िंदगी चल रही है।बच्चों को दिनभर ऑनलाइन पर उपदेश देने वाली हमदोनो सहेलियों का आखिरकार इसी ऑनलाइन संसार मे पुनर्मिलन हुआ।तो शायद इतनी बुरी भी नही है ऑनलाइन ज़िंदगी।शायद इसी को कहते हैं "चलती का नाम ऑनलाइन ज़िंदगी।

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