(सपने हमारे अचेतन के चेतन मन होते है। जाग्रत अवस्था में हम जो कुछ नही, कर पाते, वे सब स्वप्नलोक में पूर्ण होते हैं। सच कहूँ तो मेरी अनेक चाहतें, सपने में ही पूरी हुई. उन सबकी चर्चा यहाँ नहीं करूँगा। केवल दो-तीन सपनो का जिक्र करूँगा। जिन्हें मैं भूल नहीं पाता।)

बहुत पहले मुझे अक्सर सपना आता था कि मैं किसी गुफा में हूँ, और देख रहा हूँ कि चारों तरफ साँप-ही-साँप मंडरा रहे हैं. मैं उनसे बचने के लिए इधर-उधर भाग रहा हूँ। चीख रहा हूँ , मगर कोई नहीं आता। भयंकर डर के साथ मैं उन सांपो को देखता हूँ। एक ऊपर आकर गिरता है, उसे दूर फेंकता हूँ. . फिर दूसरा टपक जाता है। कोई डसता नहीं, बस सारे इधर-उधर चल रहे हैं। मैं उनसे बच रहा हूँ। बचने के बाद बाहर निकलता हूँ तो सामने उजाला-ही उजाला है । बाहर एक विशाल नदी बह रही है, लेकिन वहाँ कुछ मगरमच्छ नज़र आते हैं। मैं उन्हें देख कर रुक जाता हूँ. एक मगरमच्छ बढ़ रहा है। मैं घबरा कर भीतर जाता हूँ, तो वहां साँप चल रहे हैं । बस, इतना ही दृश्य। यही बार-बार आता रहा है. अनेक सपने आते रहते हैं. उन्हें मैं भूल जाता हूँ, लेकिन सापों से घिरे होने वाले सपने को भूल नहीं सका। आज सोचता हूँ कि ये साँप मुझे घेरे हुए तो थे, मगर किसी ने डसा क्यों नहीं? हालांकि अब इस तरह का कोई सपना कुछ वर्षों से नहीं आया, मगर वर्षों तक ऐसे सपने आते रहे, उनका कारण समझ नही पाता हूँ कि ऐसे सपने क्यों आते थे? न जाने क्यों ?

एक और सपना बचपन में भी देखा करता था - और मज़े की बात - आज भी कभी-कभी देखता हूँ, कि मैं तेजी के साथ उड़ रहा हूँ। रस्ते में पेड़ आ रहे हैं, बिजली के तार नज़र आ रहे हैं, कुछ घर भी दिख रहे हैं। इन सब से बचता-बचाता आकाश में उड़ा चला जा रहा हूँ. बहुत ऊँचाई की उड़ान नहीं है. उसकी सीमा भी है क्योंकि पेड़ भी नज़र आ रहे हैं. बिजली के तार भी हैं. उनसे टकरा न जाऊं इसलिए बचने का उपक्रम भी कर रहा हूँ. मैं कहाँ जा रहा हूँ, कुछ पता नहीं, लेकिन उड़ा जा रहा हूँ। न कोई पंख लगे हैं, न कोई उड़नखटोला है। फिर भी उड़ रहा हूँ. हाथ चलाते हुए उड़ रहा हूँ। जैसे नदी में तैरते हैं हम, उसी तरह हाथ चला रहा हूँ। कहाँ उड़ रहा हूँ, यह भी समझ में नहीं आता। कौन -सा शहर है, यह भी पता नही। और उड़ान भी किस तरह? दोनों हाथ अगल-बगल फैलाए और पंखों की तरह ऊपर -नीचे किए और उड़ना शुरू। आज भी इसी तरह का सपना आता है, न जाने क्यों? आँखें खुलने के बाद मैंने अनेक बार उसी तरह उड़ान भरने की कोशिश की और खड़ पर हंसी भी आई। अब सोचता हूँ कि क्या ये उड़ान मेरे उस मन की है जो अक्सर सोचता है कि मुझे जीवन में सफलता के शिखर तक पहुंचना है, जहां तक शायद मैं अब तक पहुँच नही सका हूँ। और जिसके लिए कोशिश जारी है। क्या यही कोशिश मुझे सपने में खुद को उड़ते देखने में तब्दील हो जाती है ? यह सपना बार-बार आता है, न जाने क्यों?पिताजी दो वर्ष पहले नहीं रहे। उनका श्राद्ध भी किया पर आज भी कभी-कभी पिता नज़र आ जाते हैं। कई बार वे अपने युवा काल में जैसे थे, वैसा दीखते हैं. न जाने क्यों यह सपना आता है ? क्या पिता को मेरे मन के भीतर का कोई कोना भूल नहीं पा रहा है, इसलिए? माँ तो कभी नज़र नहीं आई, पर पिता आते रहते हैं. न जाने क्यों?


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