समय का अंतराल

मानसी झूले में लेटी नन्ही परी को देख भाव विभोर थी । साक्षात् ईश्वर का वरदान। मानसी को सदैव एक बिटिया की चाह थी।वो एक बड़ी कंपनी में अधिकारी थी। विवाह के बारे में मानसी ने कभी नही सोचा ।सच तो ये है कि वो विवाह करना ही नहीं चाहती थी ।पढाई फिर कैरिअर काम इन सब में कब जीवन के 40 वर्ष बीत गए मानसी को पता ही नहीं चला ।
मानसी अचानक अतीत की स्मृतियों में खो गयी ।एक छोटे से कस्बे में उसका जन्म हुआ था ।उससे पूर्व तीन बड़ी बहन थीं ।भरा पूरा परिवार था ।दादा -दादी , चाचा -चाची का परिवार और उसका परिवार सब एक साथ रहते थे ।चाची दादी की प्रिय थी ।कारण उसके दो बेटे ही थे ।"दो बेटों को जन्म देना दादी की नज़र में स्त्री का सर्वोपरि गुण था ".....।माँ घर की सबसे बेकार वस्तु थी ! ..सारे घर का काम करने वाली मशीन ! उसके बाद भी सारा दिन दादी की गालियां खाने के लिए अभिशप्त । साथ ही मानसी के दादा और पिता की मार खा कर भी ...खुद को धन्य मानने को बाध्य !.......".4 बेटियों को जन्म देने का पाप किया था मां ने तो मार खाना उसकी नियति थी !"
मानसी और उसकी बहनों के साथ बचपन से ही बुरा व्यवहार हुआ ।हर समय ताने -उलाहने ,चाची के बेटों के सामने उनकी हैसियत नोकरानी से ज्यादा नहीं थी ।......मानसी तो सबसे ज्यादा शोषण का शिकार रही ।चौथी सन्तान वो भी --बेटी ! दादी दिन भर उसे दुत्कारती ।........
मानसी का मां से गहरा लगाव था । मां के सबसे निकट रही मां उसे गोद में लेकर छुप छुप का रोती थी ।मानसी सोचती थी -बड़ी होकर वो मां को इस दर्द से मुक्त कराएगी ।.....कस्बे के सरकारी स्कूल से बारहवीं पास करते करते पिता ने बहनों की शादी करा दी ।...........
मानसी के लिए भी रिश्ता ढूंढा जाने लगा ।मानसी ने विद्रोह कर दिया आगे पढ़ूंगी ,नोकरी करुँगी ।खूब क्लेश हुआ ।माँ को गालियां और मार पड़ी ऐसी बेटी पैदा करने के लिए !
मानसी स्कॉलरशिप लेकर शहर आ गयी ।यहां पढ़ने लगी ,साथ ही रात में कॉल सेंटर में काम करती ।..............देखते देखते समय गुज़र गया ।मानसी एक अच्छे पद पर कार्यरत हुई ।
विडम्बना ये रही की जिस " माँ " के लिए उसने इतनी लड़ाई लड़ी वो ही उसकी सफलता देखने को जीवित नहीं रही । मानसी के घर छोड़ने के 2 वर्ष बाद ही उसका देहांत हो गया था ।मानसी अतीत से बाहर आयी ।
अनाथ आश्रम में झूले में लेटी नन्हीं परी को गोद लेने का निर्णय मानसी को आत्मिक शान्ति दे रहा था । एक सिंगल मदर के रूप में जीवन जीने का निश्चय वो पहले ही कर चुकी थी ।सारी औपचारिकताएं पूरी हो चुकी थीं ।आज मानसी को नन्ही बच्ची को सदा के लिए अपनी बेटी कहने का अधिकार मिलने वाला था । अनाथाश्रम के संचालक ने बच्ची मानसी को सौंपी ।उसके गोद में आते ही मानसी को लगा --" मां रूप बदल कर उसकी गोद में आ गयी । एक समय मां उसे गोद में लेकर रोया करती थी ।आज वो बच्ची को गोद में लेकर रो रही थी । पर ये ख़ुशी के आंसू थे । मां का जो कर्ज उस पर था वो इस बच्ची को अच्छी तरह परवरिश देकर और सारे सुख देकर वो चुकायेगी । ..." मानसी ने बच्ची का नाम रखा ..."देवी " ....जो मां का नाम था।”
कल "देवी " उसकी माँ थी और आज "देवी " उसकी बेटी है। कल मानसी का नन्हा हाथ देवी के हाथ में था ।आज देवी का नन्हा हाथ मानसी के हाथ में है .......पर आज समय का अंतराल है ......देवी मां मजबूर थी ! मानसी सशक्त है वो मां रूपी देवी बेटी के नन्हे हाथों को सशक्त बनायेगी ।

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