फ़लसफ़ा प्यार-का

इंद्रधनुष में जितने रंग होते हैं उतने जीवन के हर क्षण में होते हैं। सुमि, हम देखने की कोशिश नहीं करते। इंद्रधनुष देखते वक्त वर्षा की बूंदें आखों और आकाश के बीच होती हैं। जबकि जीवन के इंद्रधनुष को देखने के लिये आँखों में आये आंसुओं को रोकना पड़ता है। पलकें बंद करके हलक में आये स्पंदन को गटकना मुश्किल हो जाता है। रंग सदा से सात होते हैं। हम दुःखी होते हैं तो सतरंगी भी काले पड़ जाते हैं। खुश होते हैं तो चहकते हैं रंग। काला रंग भी कत्थई हो जाता है... गुलाबी, पीला, हरा, नीला में तब्दील होने लगता है- हर ख्वाब जो हकीकत बनना चाहता है।

मैं तुम्हारे बारे में किंचित भी सोचता हूं तो लगता है ओस ओढ़े हुई घास पर सुमि तुम हौले-हौले चलती हुई मेरी तरफ आती हो। अगर आँखें ज्यादा फैलाकर तुम्हें पहचानने की कोशिश करूं तो ओस की बूंदें भाप बनकर अदृष्य होने लगती हैं। आशा का रंग सूख-सूख जाता है। आकाश के एक कौने में बने इंद्रधनुष के रंग हल्के पड़ने लगते हैं। जैसे-जैसे बादल में से सूरज निकलता जाता है। इंद्रधनुष नीले आकाश में खो जाता है---जैसे माँ के आंचल में दूधमुहा छिप जाता है। प्रेमी प्रेमिका के आगोश में सिमट जाता है। बांहों में लिपटता इंद्रधनुष बेखबर होकर बादलों से दूर निकल जाता है। पकड़ में ही नहीं आता। ठीक तुम्हारी परछांई की तरह। मेरी आँखों को तुम दिखती हो परंतु परछाई दिखाती हुई विलोपित हो जाती हो। धीरे-धीरे तुम्हारे कदमों की आहट पर भी अंधेरा छाता चला जाता है।

यह सब मैं सुमि तुम्हें ‘इम्प्रेस’ करने के लिये नहीं सोच रहा। तुम्हें स्मरण कराने का नाकाम प्रयास भी नहीं करना चाहता। न ही वह इंद्र धनुषी-रंग देखना चाहता हूँ जो तुमने मुझे दिखाये थे कभी। दिखाये ही नहीं वल्कि मेरे इर्द-गिर्द बुन दिये थे ऊनी धागों के स्वेटर की तरह। उसमें तुम्हारी ऊष्मा थी बातों की, यादों की वह गरमाहट थी जो शायद अब बर्फ की सिल्ली में तब्दील हो गयी है। समय की परतों में यह सिल्ली इस कदर जकड़ गयी है कि सरक ही नहीं रही। टस-से-मस नहीं हो रही। अगर तुम कहीं से अवतार भी ले लो तो यह हिम पिघलने वाला नहीं। चाहे जितनी ऊष्मा बहाना। ये किन्ही आंसुओं से नहीं बनी वल्कि इंद्रधनुष के उन रंगों से बनी है जो सूख गये हैं- बर्फ की परतों में। पहाड़ों पर जमी हिम पिघलकर गंगा जल बन सकता है। अफसोस तुम्हें कोई नहीं बदल सकता। मैं असहाय तो नहीं परंतु तुम्हारी स्वतंत्रत इच्छा के खिलाफ सोचना भी नहीं चाहता।

सुमि, मैं भी तुम्हारी अदाओं में, शैली में ढलता गया था। जब-जब तुम मिलती थीं तो कितना उन्माद होता था बातों में। और आज अगर साक्षात भी तुम आजाओ तो तुम्हारी जुल्फ की एक लट भी हवा में नहीं लहरायेगी। भले धूल भरी आंधियां चले या सर्द हवाओं के थपेड़े लगे गालों पर। सब कुछ अपरिवर्तनीय लगता है अब। तुम जब साथ थीं, और अब जब साथ नहीं हो। समय करवट लेता रहा।

सुमि, तुम कहती थी न कि जब मुझे पा नहीं सकते इस जन्म में तो क्यों याद करते हो ? क्यों बुलाते हो ? मत करो एसएमएस। मत दो मिसकॉल। क्यों कम्प्युटर पर बैठकर घंटों ‘चैट’ के लिये मैसेज-ऑन-मैसेज देते हो। ई-मेल डिस्कार्ड कर दो। फेसबुक पर मत लिखो कविताएं। तुम्हीं कहती थीं न कि जब मेरे जीवन का ब्लॉग तुम्हारे स्पर्ष भी नहीं कर रहा तो क्यों बहक रहे हो। विरह में जी रहे हो क्यों ? पुरानी बातों को भूलकर नया जीवन जीयो। मेरे पीछे क्यों भाग रहे हो। कुछ हासिल होने वाला नही है। तुम्हीं कहती थीं कि तुम पत्थर दिल हो। तुम्हारा आज यह कह देना आसान है। शुरू से याद दिलाता हूँ आपको। उस वक्त आप, आप ही कहलाती थीं। तुम्हें या तुम बनने में तुम्हें थोड़ा समय ज्यादा जरूर लगा। दोनों की नजदीकियां अत्यंत गोपनीय-सी थीं।

ट्रेनिंग के बाद मैंने ट्रेफिक पुलिस अधीक्षक का पद ग्रहण ही किया था। रात की गश्त पर था। नववर्ष की पूर्व संध्या पर ‘रेवलर्स’ की धीगांमस्ती में मोटरबाईक पर युवक अपनी गर्ल फ्रैंड्स को बैठा कर हवा से बातें कर रहे थे। रिंग रोड पर एक सड़क दुर्घटना का वायरलेस मैसेज था। ट्रेफिक जाम था। स्कूटर पर एक दम्पति अपनी दो वर्षीय बिटिया के साथ डिवाईडर से टकराकर उछले, और दूसरी साईड पर बेहोश पड़े थे। मोटरसाईकिल राईडर को बचाने के चक्कर में ट्रक ने स्कूटर को पीछे से हिट किया था। ट्रक खड़ा था। ड्राईवर फरार। बाईक सवार भी कहां रुकने वाले थे। एम्बुलेंस दम्पति और बेबी को बड़े अस्पताल ले जाने लगी तो महिला में चेतना आ गयी, ‘‘सर, हमें बचाईये। हमारी इसमें कोई गलती नहीं। मेरे हजबेंड और बेटी को देखिये, वो ठीक तो हैं न! एक तरफ मोटर साईकिल वाले, पीछे से शायद ट्रक था। हमें बचाओ।’’ कहते-कहते महिला फिर अचेत होने लगी। एम्बुलेंस उन्हें बड़े अस्पताल छोड़ आई। अगली प्रातः न्यूजपेपर्स में पढ़कर मुझे अत्यंत दुःख हुआ कि इलाजे दौरान पुरुष चल बसा।

लगभग एक माह बाद एक महिला मेरे कार्यालय के बाहर मिलने के लिये खड़ी थी। सिपाही ने आगे बढ़कर उस रात की सड़क दुर्घटना का जिक्र किया जिसमें पुरुष चल बसा था।

‘‘हां, बताईये। मेरे योग्य कोई सेवा।’’ मैंने उस असहाय बनी महिला जो काफी शिक्षित लग रही थी से पूछा। कैप उतार कर उस महिला को बैठने को कहा, ‘‘येस। बैठिये। घबराएं नहीं। बोलिये ?’’

‘‘सर, मैं सुमित्रापंत। फाइन आर्टस की प्राईवेट कॉलेज में प्रवक्ता हूँ। आपने भी देखी थी वह दुर्घटना। मेरे पति की मुत्यु हो गयी थी अस्पताल में। वो राजकीय सेवा में अकाउंटेंट पद पर थे। ट्रेफिक पुलिस ने हम पर ही मुकद्दमा बना दिया है। कहते हैं ड्राईविंग लाईसेंस की काल अवधि एक माह पहले एक्सपायर हो गयी तथा गाड़ी का एश्योरेंस भी उसे साथ खत्म हो चुका। घर कैसे चलेगा। क्या खायेंगे। हमें बचाईये।’’ कहते -कहते वह फफक पड़ी।

‘‘देखिए, कानून तो अपना काम करेगा। मैं मामले को दिखवाता हूँ। मेडम सुमित्रा जी धैर्य रखिए। उचित न्याय होगा आपके साथ। पेपर्स छोड़ दीजिये। दिखवाता हूँ।’’ मैने हमदर्दी दिखाई।

सूनी मांग, चेहरे पर रौनक, ब्लू जीन्स पर सफेद टॉप पहने और गोदी में बिटिया लिये सुमित्रा एक दिन अचानक मेरे दफ्तर में आ पहुंची। मिठाई का पैकिट टेबल पर रखते हुए बोली, ‘‘थैंक्यू वेरी मच सर! मुझे मेरे हसबैंड की एलपीसी(लास्ट पे स्लिप) मिल गयी। जल्द ही पूरे माह की तनख्वाह भी मिल जायेगी। पीएफ और पैंश्न की फाईल भी चल पड़ी है। मेरे योग्य कोई सेवा हो तो बतायें। ये मेरा मोबाईल नम्बर है।’’

‘‘मुझे अब भी विश्वास नहीं होता कि एक मामूली -सी सड़क दुर्घटना में आपके पति का....।’’ मैं पूरा वाक्य भी नहीं कर पाया कि वह बोल पड़ी, ‘‘प्रभु इच्छा! मेरी किस्मत में यही लिखा था।’’

‘‘आपसे मुझे पूर्ण हमदर्दी है। इस दुःख की घड़ी में हिम्मत बंधाता हूँ कि आप कठिन परिस्थिति में अपने आप को, बिटिया को संभालें। और ये मिठाई पैक वापिस ले जाईये। यह मुँह मीठा करने का उचित अवसर नहीं है।’’ कहता हुआ मैं बाहर निकल गया।

मेरा विभाग ट्रेफिक वीक मना रहा था। कुछ बेहतरीन पोस्टर और बैनर डिजाईन होकर आये थे। शहर के चुनिंदा आर्टिस्ट उन्हें ‘डिस्प्ले’ करते हुए मेरे कक्ष के बारह गैलरी में खड़े थे। कुछ के चुने गये, शेष अस्वीकृत कर दिये गये।

‘‘अरे, आप और यहां।‘‘ मेरे पूछते-पूछते सुमित्रा ने हाथ जोड़ दिये, ‘‘अगेन थैंक्स सर । आप ने मेरा बनाया पोस्टर डिजाईन पसंद किया। आइ’म रियली ओब्लाईज्ड।’’

‘‘यह संयोग मात्र है दुबारा। मैंने कोई एहसान नहीं किया। आप ग्रेट आर्टिस्ट हैं। पोस्टर में वास्तविकता की झलक के साथ संवेदना और गहरा दर्द भी छिपा है। हो सके तो हमारे विभाग के लिये समय-समय पर ऐसे पोस्टर्स, ड्रॉइंग देते रहिये।’’

सुमि, मैं सच कहूंगा कि इन पोस्टर्स पर बनी रेखाओं ने मेरे तुम्हारे दिलों में पास-पास कुछ उकेर दिया था। जो गहराता चला गया। तुम्हारे-मेरे संबोधन और व्यवहार में आत्मीयता के साथ प्रगाढ़ता आती गयी। वीक एण्ड हो या कोई सार्वजनिक अवकाश। हम-तुम मोबाईल पर बतिया लेते थे। तुमने अपनी निजी जिंदगी की किताब के अक्षरों को मेरे मन मस्तिष्क पर गोद-सा दिया था। हम एक दूसरे को पढ़ चुके थे भली-भांति। तुम्हारी बिटिया मोहिनी भी नर्सरी स्कूल जाने लगी थी।

शहर फाल्गुनी बयार के रंगों से सरोबार था। मैं सिविल लाईन्स जाकर अपनी व्यक्तिगत कार में आता। तुमने मुझे तत्काल बुलाया था। पुलिस वर्दी उतार कर सिविल ड्रेस पहनने का समय भी तुमने नहीं दिया था। पुलिस रेंज से सीधे तुम्हारे घर पहुंचा था। तुमने डोरबेल नहीं सुनी। तुम्हें ढूढ़ने के लिये छत की ओर देखा तो तुम ऊपर खड़ी मुस्करा रही थीं।

‘‘बोलो, क्या जल्दी थी ? अब नीचे पधारो-सा। ऊपर क्या कर रही हो तल्ख धूप में।’’ मैं तुम्हें इषारे से नीचे बुला रहा था कि बिटिया ने रंग भरी पिचकारी दिखादी- किसी गन की की तरह। मैं कहता ही रह गया, ‘‘रुक, ऐ ऐ...क्या कर रही हो ? तू नीचे तो आ जरा बताता हूँ। नो, मोहिनी प्लीज डोंट डू इट!’’

तुम पिछले दरवाजे से उतर कर मेरे पीछे चुपके से आ खड़ी हुई। मुझे पता भी नहीं चला था। आहट होने पर मैंने पीछे मुड़कर देखता, तब तक मोहिनी मेरे कंधे पर झूल गयी। उसने अपनी नन्हीं-नन्हीं मुलायम हथेलियों से मेरी ककर्ष दाढ़ी भरे चेहरे पर हरे रंग का गुलाल मल दिया। सिर पर रंग उड़ेल दिया।

‘‘सुनों, मोहिनी ये सब क्या मजाक है। होली में अभी कई दिन हैं। ये कौन-सा तरीका है, भला। कोई ऐसी गुस्ताखी करता तो थाने में बंद कर देता।’’

‘‘और कुछ आता है एसपी साहब! बस चले तो आप सबको थाने में बंद कर दो- होली खेलने की गुस्ताखी में।’’ ये छोटी सी बच्ची है। पिचकारी पकड़नी सीखी है। रंगों के मतलब थोड़ी ही जानती है। प्लीज डोंट माइंड।’’ सुमित्रा ने उसकी गलती पर मांफी मांगते हुए मुझे पोर्च में पड़ी प्लास्टिक चेयर पर बैठा दिया।

मोहिनी ने सिर झुकाकर कहा, ‘‘सौरी, अंकल बैठिये। मैं टॉवल लाती हूँ आपके लिए मुँह साफ कर लीजियेगा।’’

तुम्हारा एक यह रंग था। किसी कार्य से संबन्धित बात पर तुम एकदम मित्र बन जातीं। बाद में व्यक्तिगत विषयों पर चुप्पी साध लेती थीं। वर्षों छाई रही उदासी, अकेलेपन, और असुरक्षा की भावना से तुम ऊबर चुकी थीं। तुम्हारे माथे पर आत्मविश्वास चमकता था। मैं अचंभित था कि तुम्हारी आँखों को रंगों का धनुष न केवल खूबसूरत लगने लगा था बल्कि तुम जीवन में पुनः रंग का फ़लसफ़ा भी जान गयी थीं। किसी भी ऑफिशयल वर्क और रचनात्मक मामले में तुम एकदम मित्र बन जातीं। व्यक्तिगत विषयों पर चुप्पी साधनी शुरू कर दी थी। तुम्हारे चेहरे की सौम्यता और मुस्कान को देखकर कोई भी अंदाज तक नहीं लगा सकता कि तुम किसी गंभीर पारिवारिक त्रासदी से गुजरी हो। लगता है तुम्हारे साथ मैंने दो-तीन वर्ष नहीं कई दशक गुजारे हैं। तुम अपनी हर क्षणिक खुशी या छोटी सी सफलता का सेहरा मेरे सिर बांधती आई हो, ‘‘मिस्टर आईपीएस शषांक जयरमन ये सब आपके प्रयासों से हुआ है।

मेरे जीवन का कायाकल्प। आपका संबल न होता तो मैं उठ नहीं पाती। मेरे अपने रिश्तेदार मुँह फेर गये थे। एक खुश खबरी है- मुझे यूनिवर्सिटी में फाइन आर्ट्स का एसिसटेंट प्रोफेसर पद का एंप्याटंमेंट लैटर मिल गया है। ये रहा। इस सबका श्रेय आईपीएस जयरमन को जाता है।’’

‘‘लगता है, तुम मुझे अपने पास नहीं बैठने देना चाहती। मैं चलकर ट्रेफिक संभालूं, वो ज्यादा अच्छा है।’’ मैं उठ कर चलने लगा तो सुमित्रा एकदम सामने आ खड़ी हुई, ‘‘दस-पंद्रह मिनट और रुक सकते हो। मोहिनी के स्कूल से आने का समय हो रहा है। आज शाम मेरी मम्मी भी आ रही हैं। कोई एक दो रिश्तेदार भी आयेंगे। वो लोग एक हफ्ता रहेंगे। मोबाईल पर मिसकॉल दे देना। समय मिलते ही कॉलबैक कर लूंगी।’’ कहते-कहते सुमि मेरे एकदम पीछे-पीछे सट-सी गयी और कंधे पर कोहनियां टिका कर कान के पास मुंह लाकर बोली, ‘‘समझ गये ना। आई विल मिस यू!’’

इंद्रधनुष के सारे रंग जैसे इकट्ठे हो गये। आपस में ऐसे मिले कि मन में हिलोरें लेने लगे। रोंगटे खड़े हो गये। मैं पलटा तो सुमि किचिन में दौड़ गयी, ‘‘चाय उबल गयी है। अभी आती हूँ। रुकना।’’ जब तक चाय और नाश्ता आया मोहिनी का स्कूल ऑटो बाहर आकर रुका, ‘‘मॉम। आइ’म हीयर।’’

वो दिन आखिरी ही रहा। हम नहीं मिल सके। हफ्ता-पंद्रह दिन महीना तो एसएमएस पर संदेश देते गुजरा। कभी सुमि टाल देती बात करना, कभी मिलने की डेट सोचती रह जाती। मैं जोर देता तो बहानों की एक फेहरिस्त तैयार हो गयी थी। लैण्डलाईन पर फोन कर उससे पूछता तो कोर्ट-कचहरी की तरह नयी डेट दे देती। कभी मोहिनी मोबाईल पर ये कहकर रख देती- ‘‘मॉम इज स्लिपिंग। कॉल अगेन!’’ कभी किसी बुजुर्ग महिला की देहाती आवाज सुनाई देती। उससे मिलने के हफ्ते महीनों में बदलते चले गये। एक-दो बार सुमि ने बात की तो अनमने ढंग से,

‘‘यूनिवर्सिटी से आकर थक जाती हूँ। फिर कई सारी ट्यूश्न। मैंने पीएचडी शुरू कर दी है। अपने प्रोफेसर गाइड डॉ. टंडन को ही समय नहीं दे पाती हूँ। मैंने सुना आपका किसी सीमावर्ती जिले में ट्रांसफर हो गया है। कभी शहर आओ तो बताना। मिल लूंगी। मेरी मम्मी भी जब गांव गयी तो कहती गयीं कि शषांक तुम्हारे सगे भाई से भी बढ़कर है। ऐसा इंसान पृथ्वी पर मिलना मुष्किल है। उसने निस्वार्थ भाव से तुम्हारी हर संभव मदद की। पर मुझे लगता है हर इंसान के अपने संस्कार होते हैं। वह उनसे बंधा होता है। आपने वही किया जो आप करना चाहते थे। वह

आपकी फितरत में है। कार्य प्रणाली में है। भावुकतावश हमें नहीं सोचना चाहिए।’’ वह सदुपदेश देती रही। मैंने मोबाईल खुला छोड़ दिया। उधर से आवाज आती रही....सुन रहे हैं न आईपीएस सा’ब।’’

शषांक ने मोबाईल वहीं छोड़ा जिप्सी स्टार्ट कर बार्डर लाइन की एक मात्र रोड पर आ गये। यह रोड दो सीमाओं को विभक्त कर रही थी। कई किलोमीटर्स तक चलती सड़क पर शषांक सिर्फ सामने देख रहे थे। सुनसान सड़क पर वह दौड़े जा रहा था। सब पीछे छूट गया था। धोरों के पीछे बहुत लम्बी रेखा है जो पृथ्वी-आकाश को मिलाती है। ऐसा दृष्टि दोष होता है जैसे पृथ्वी-आकाष वाकई में सदैव के लिये मिल गये। उस मिलाप को जितना देखने आगे भागोगे वह क्षितिज और आगे बढ़ता जायेगा। वास्तविकता तो ये है कि वे कभी नहीं मिलते हैं। मुझे यह एहसास हुआ कि पृथ्वी-आकाश के प्यार का क्षितिज-मिलान आज भी अनबुझा है।

hindi@pratilipi.com
080 41710149
सोशल मीडिया पर हमें फॉलो करें।
     

हमारे बारे में
हमारे साथ काम करें
गोपनीयता नीति
सेवा की शर्तें
© 2017 Nasadiya Tech. Pvt. Ltd.