लेडीज वार्ड

अब कैसी हो अपर्णा.....? डॉक्टर ने अपर्णा की रिपोर्ट पढ़ते हुए कहा।


जैसी आप दो दिन पहले छोड़ कर गए थे, वैसी ही हूँ । बेरूखी के साथ अपर्णा ने डॉक्‍टर को जवाब दिया। उसके पतले होठ सूख कर काले हो गए थे । उनमें दरारें उभर आई थीं।


हम्‍मम... सबसे पहले जरूरी है कि तुम अपनी नेगेटिविटी दूर करों। कोई भी बीमारी स्‍थायी नहीं है, कुछ जल्‍दी ठीक हो जाती है और कुछ कई दिनों के बाद। डॉक्‍टर ने अपर्णा को मोटिवेट करते हुए कहा।


नर्स जब अपर्णा को इंजेक्‍शन लगा रही थी तो डॉक्‍टर ने अजय की ओर मुखातिब होते हुए कहा "दवाईयाँ टाईम पर देने की जिम्‍मेदारी तुम्‍हारी है, भगवान ने चाहा तो जल्‍दी ही ठीक हो जाएगी।"


जी डॉक्‍टर साहब... अजय ने अपनी गर्दन हिलाकर जबाब दिया। सरकारी नौकर अजय अपनी पत्‍नी अपर्णा से बेहद प्रेम करता है । अपर्णा का बड़ा वाला लड़का नितेश आठवी में और 6 साल का छोटा वाला बेटा नितिन कॉनवेंट स्‍कूल में पहली कक्षा में पढ़ता है। जब से अपर्णा अस्‍पताल में भर्ती हुई तब से पूरे परिवार का रूटीन बदल गया। पिछले एक महीने से अजय ऑफिस नहीं गया । अपनी बीमार पत्‍नी की दवादारू में ही व्‍यस्‍त रहा। शहर में एकल परीवार की यही सबसे बड़ी दुविधा है, दुख-सुख सब कुछ अकेले ही भोगना होता है। गाँव से माँ को बुलाना ही पड़ा, जब से अपर्णा की सासू माँ घर आई हैं तब से बच्‍चे फिर से स्‍कूल जाने लगें, नहीं तो उन्‍हें सुबह उठाना, तैयार करना और उनके लिए टिफिन बनाना अजय के बस का काम नहीं था।


अस्‍पताल के लेडीज-वार्ड के आखिरी मुहाने पर लगे बिस्‍तर पर लेटी हुई अपर्णा की हालत दिनों-दिन बिगड़ती जा रही थी। अजय और उसके दोनों बच्‍चे अपर्णा को घेर कर बैठे हुए थे । वार्ड के हालात कुछ वैसे ही थे जैसे किसी सरकारी अपस्‍ताल में होते हैं। मर-मर कर चलते हुए पंखें । खिड़कियों की जालियों में जमी हुई रेत और उन पर जाले बनाती हुई मकड़ियाँ। एक दूसरे से सटी हुई बैडिंग्‍स। भिनभिनाती हुई मक्खियाँ। मरीजों के रिश्‍तेदार जमीन पर ही अपना डेरा जमाए हुएं । बैड पर रोगी को घेरकर बैठे उनके परीजन किस्‍सागोई करते हुएं । फर्श पर यहाँ-वहाँ बिखरा हुआ फलों का कचरा। बिस्‍कुट पैकट और चॉकलेट के रैपर छितरे हुएं । एक मुक्‍कमल सरकारी अस्‍पताल जिसके हर एक कोने में कई कहानियाँ दबी हुईं । यह सब देखकर कर भी जानबूझकर समस्‍याओं से अंजान बने हुए डॉक्टर वार्ड में रूटीन जांच के लिए आए हुए थे। सफेद अप्रिन पहने डाक्‍टरों की टोली एक बैड से दूसरे बैड तक चक्‍करघिन्‍नी कर रहे थे।


डॉक्‍टर के जाने के बाद अपर्णा ने अपनी आँखें बंद कर ली। बगल के बैड पर लेटी हुई पीतज्‍वर से ग्रसित महिला की देखभाल में लगी बुढ़िया ने पूछा "क्‍या पास लग रही है......?" अपर्णा ने नकारते हुए धीमे से गर्दन हिला दी ।


जब तक सासू माँ नहीं आई थीं तो अजय को किसी न किसी काम से मुझे अकेले छोड़कर जाना पड़ता, तब इस अजनबी बुढ़िया ने मेरी सारसंभाल की था। हॉस्पिटल में सौ काम होते हैं, कभी दवाई लाओं, कभी जांच कराओं। बुढ़िया अपनी पीतज्‍वर से बीमार बहु की तीमारदारी में जी-जान से लगी हुई हैं, ऐसे तो कोई सगी माँ भी अपनी बेटी की फिक्र नहीं कर पाती.. । दुनिया भी अजीब है, सगे रिश्‍ते नातों में दूरियाँ आ जाती है और अजनबी अपने बन जाते हैं और अपने बेगाने । जिंदगी रूकती नहीं चलती रहती है, चलती का नाम ही तो जिंदगी है। कुछ लोग वहीं रह जाते हैं जहाँ वे थे और कुछ लोग बहुत आगे निकल जाते हैं। बहुत कम लोग जानते हैं जिंदगी में जितने भी पल हैं उनको कैसे जीया जाए। कुछ लोग समस्‍या के संबंध में बात करने से ही भागते हैं जो लोग समस्‍याओं पर बात करते हैं वे लोग उलझे धागों को सुलझाने की कोशिश करते हैं। एक दूसरे से हम मोह के धागों से ही तो बंधे हैं जो कभी-कभी उलझ जाते हैं, इन उलझनों को ही तो रिश्‍ते कहते हैं, कुछ नाम वाले रिश्‍ते तो कुछ बेनामी रिश्‍ते। आँखें बंद कर लेटी हुई अपर्णा के दिमाग में विचारों के तूफान बड़ी तेज गति से उमड़-घुमड़ रहे थे।


सभी चुप थे, लेकिन वह अपने आप से ही बाते किए जा रही थी । उसकी बरसो की सोच, उसके जीने के ढंग को काट-काट कर छिल रही थी । अपने संबंधियों ने उससे क्‍या कहा... उसने उनसे क्‍या कहा, एक-एक शब्‍द आँखों के आगे नाच रहे थे । सभी चित्र एक साथ एक-एक कर इस तरह आँखों के सामने घूम गएं जैसे कोई पिछले जन्‍म का कोई वृतचित्र देख रही हो। क्‍या-क्‍या न कहा था मैंने माजी को ... उनको अकेला छोड़कर पति के साथ आ गई, अपनी जिंदगी जीने के लिए... यह भी न सोचा कि गाँव के इतने बड़े घर में अकेली कैसे रहेगी... ससुर जी के देहाँत के बाद कितना अकेली पड़ गई होगी.... काश उस रोज मैं उन्‍हें भी अपने साथ शहर ले आती । अपनी बड़ी बहनों को अपना हमराज समझती थी, उनका कहा न माना होता तो शायद ये अनुभव न होता । जिनको कटु शब्‍द कहे वह आज मेरी सेवा कर रही है। मेरी बीमारी का सुनते ही सब-कुछ छोड़कर मेरे घर को संभालने आ गई। जो मेरे सच्‍चे रिश्‍तेदार होने का दंभ भरते थे, मैं उनकी राह ताकते ही रह गई। अपर्णा की बंद आँखों में विचारों के बादल उमड़ रहे थे, जब वे बरसते तो उसकी कनखियों से रह-रह कर आँसू छलक पड़ते।


अजय बार-बार उसकी आँखों से गिरते आसुओं को पौंछ देता । इस बार अपर्णा ने अपनी आँखें खोली और अजय की तरफ देखते हुए कहा "अजय...एक रोज गर्मियों के दिनों में एक गौरया मेरे कमरे में आ गई । वह बार बार उड़ने का प्रयास करती पर कमरे में चल रहे तेज पंखे की हवा के सामने बेबस हो गई। बार-बार खिड़की के कांच से जा टकराती । दरवाजा खुला था, फिर भी न जाने क्‍यों वह दरवाजे की ओर नहीं जा रही थी, शायद मौत ने उसको अंधा कर दिया था । उसे दरवाजा दिखायी ही नहीं दिया । जब मैंने आगे बढ़कर कर खिड़की के कांच खोल दिए तो गौरया दूसरी खिड़की की ओर भागी जहाँ कूलर चल रहा था । कूलर से आ रही ठंडी हवा में शायद उसको सुकून मिला होगा पर वही सुकून उसकी मौत का कारण बन गया । तेज चलते कूलर के पंखें के दूसरी ओर उसे गहरा अंधकार दिखायी दिया होगा और अंधकार में अपने आपको छुपाने के प्रयास में उसने अपनी जान दे दी। कूलर के पंखों ने उसके शरीर को चाकुओं की तरह रोंद डाला । कमरे में चारों और गौरया के पंख छितरा कर फैल गए । नहीं... नहीं मैंने नहीं मारा उसे... मैंने तो उसे बचाने की पूरी कोशिश की ... उसकी मौत ने ही मारा उसे.."


हाँ हाँ... तुमने नहीं मारा उसे... गौरया को हम आदमियों की तरह समझ कहा होती है, उसे तो उसकी नादानी ने मारा... तुम बेवजह इतना मत सोचो । अजय ने अपर्णा की बात पर हाँ में हाँ मिलाते हुए कहा ।


शायद उस रोज भी मौत मेरे पास आई थी जब मैं ग्‍याहर साल की थी। पीत ज्‍वर के कारण मैं लगभग मरणासन्‍न पर थी, मेरी आँखों में पीलापन इस कदर भर गया था कि चारों और पीला-पीला नजारा था । मेरी माँ मेरे पास बैठी रही, एक रोज मैंने माँ से कहा 'खिड़की के पर्दें खोल दो.....' मैं खिड़की के बाहर पीले-पीले सरसों के फूलों को देखकर मोहित हुए जा रही थी । सभी जगह पीलापन था पर सरसों के गहरे पीले फूल सच्‍चे लग रग रहे थे । मैं साफ देख रही थी चारों और पीले रंग में लिपटी वस्‍तुओं के बीच एक काले रंग का साया मुझे चारों पहर घेरे रहता था । शायद वह मेरी इंतजार कर रहा था, मैं उससे डरी नहीं । उस रोज वह मुझे अपने साथ नहीं ले जा पाया पर इस बार वह मेरे पास पूरी ताकत के साथ खड़ा है... इस ओर .. क्‍या तुम उसे देख पा रहे हो? कहते हुए अपर्णा के चहरे पर भय की रेखाएं खिंच आई।


कुछ भी नहीं है वहाँ…...तुम्‍हारा वहम है। अजय ने खिड़की के पर्दों को खोलते हुए कहा । खिड़की के पर्दों के खुलते ही अपर्णा के बिस्‍तर के आस पास धूप भर गई और धूप के कुछ टुकड़े उसके बिस्‍तर पर जा गिरे ।


क्‍या मैं नव निर्माण के दौर से गुजर रही हूँ? अजय.....तुम समुद्र के किनारों पर मेरे बिना ही जाना.... अनुभव करना सागर की लहरों के शोर में शायद मैं बसी हूंगी । घर अहाते में मिट्टी के नीचे पड़े हुए बीज के प्रसव के बाद उपजे नवाकुंर को तुम ध्‍यान से देखना शायद मेरे पुनर्जन्‍म का अनुभव हो आए । क्‍या पता मैं हवा में घुल जाऊं, बादलों से गिरने वाली बूंदों में समाकर तुम्‍हारे तन को भिगो जाऊं। शायद हमारे घर की चौखट पर बिखरी रेत का कण बन जाऊं और हर रोज तुम्‍हारे चरण का स्‍पर्श सुख पाऊं । कहते हुए अपर्णा ने जोर से श्‍वांस भरी ।


अजय ने अपर्णा की बात का जबाब देना उचित नहीं समझा वह खामोश रहा ।


सुनो अजय....तुम दोबारा शादी कर लेना, ऐसी लड़की के साथ जो मेरे बच्‍चों की माँ बन जाए । उन्‍हें कभी मेरी याद न आने दे । मेरी परछाई बन जाए । सूर्य देव की दूसरी पत्‍नी छाया की तरह । अपर्णा ने धीमी आवाज में अजय के हाथ को अपने हाथों में भरते हुए कहा ।


बस... और कुछ भी शब्‍द नहीं प्‍लीज... अजय ने अपर्णा के होठों पर अपना हाथ रख दिया और आँखों के इशारे से चुप रहने का ईशारा किया ।


छाया कौन है माँ....। अपर्णा के छोटे बेटे नितिन ने उत्‍सुकता से पूछा और अपर्णा के बैड से सटकर खड़ा हो गया।


नितिन मेरे पास आ बेटे........। तुमने अपनी साईंस की किताब में पढ़ा होगा सूर्यदेव प्रचंड तेजवान है, जिनके तेज से दिन-रात बनते हैं और जिस प्रकाश के बल पर यह प्रकृति अपने जीवित रूप में हैं। सूर्यदेव की पहली पत्‍नी संज्ञा बड़े कोमल स्वभाव की थी। बिचारी संज्ञा अपने पति सूर्यदेव के तेज़ को बड़े कष्ट से सहन कर पाती थी। उसके लिए वह तेज़ असहनीय था। एक रोज संज्ञा ने अपनी परछाई को सूर्यदेव की सेवा में छोड़कर स्वयं पिता के घर चली गई। अपनी ही परछाई से साकार हुई छाया हुबहु संज्ञा जैसी थी। उसने संज्ञा की कमी को पूरा कर दिया था। इसी तरह जब तुम्‍हारी नई माँ आएगी न ....तो वह भी मेरी कमी को पूरा कर देगी। बोल बेटा तू रहेगा न अपनी नई मम्‍मी के पास ? अपर्णा ने नितिन के सर के बालों को प्‍यार से सहलाते हुए कहा।


नहीं.... मैं तो तुम्‍हारे पास ही रहूंगा, जहाँ भी तुम जाओगी तुम्‍हारे साथ चल दूंगा। पिछली बार भी आप बहाने से अकेले बाजार चले गए थे... मुझे नहीं ले गए। पता है मैं कितना रोया... पर इस बार तो मैं आपका हाथ पकड़े रहूँगा, आपको अकेले कहीं नही जाने दूंगा । नितिन अपनी बालसुलभ जिद करते हुए अपने कंधों को ऊपर-नीचे करता हुआ बोला।


और तुम नितेश....? अपर्णा ने अपने बड़े बेटे नितेश की आँखों में झांकते हुए पूछा।


माँ आप इतनी ही जिद कर रहे हो तो ठीक है मैं नई माँ के साथ रह लूंगा । नितेश ने शरारत भरे अंदाज में मुस्‍कुराते हुए कहा । अपर्णा भी बातुनी नितेश की शरारत को भांप गई और उसके सूखे हुए होठ मुस्‍कान से तर हो गए।


पापा...... मैं अपनी मम्‍मी के साथ.... और नितेश भैया अपनी नई मम्‍मी के साथ रहेगा .... पापा.... आप किसके साथ रहेंगे ? अपने पापा अजय की गोद में बैठते हुए नितिन ने जिज्ञासावश पूछा। अचानक निशब्दता छा गई।


हम्‍मम... जब सब अपनी अपनी मम्‍मी के पास रहेंगे तो मैं भी अपनी मम्‍मी के पास रहूँगा । अजय के इतना कहते ही अपर्णा की आँखें सजल हो गई और होठों पर मुस्कान तैर गयी।


अच्‍छाssss…. तो इस मकसद से लाएं हैं आप अपनी मम्‍मी को यहाँ । अपर्णा ने अपनी मद्धम मुस्‍कान को बनाए रखते हुए अजय के हाथ पर चिकौटी काटते हुए कहा। हरे रंग की चादर के नीचे निढाल और निश्‍चल होकर लेटी हुई अपर्णा चिड़िया की तरह दुबकी हुई थी । ग्‍लूकॉज की टप-टप कर गिरती हुए बूंदे जैसे उसे चिढ़ा-चिढ़ा कर बता रही थी कि पाइप के सहारे उसके हाथ की रक्‍त वाहिनियों से गुजरती हुई ये ग्‍लूकॉज की बूंदें धीरे-धीरे उसके शरीर पर अपना एकाधिकार कर रही हो। भरा पूरा शरीर जैसे मिट्टी की ढेरी में बदल रहा हो। अपनी मर्जी से जीने का गुमान करने वाली अपर्णा आज अपनी मर्जी से खिलखिलाकर हँस भी नहीं पा रही थी।


® Whole rights reserved to writer
© Copyright to the writer

👣

लेखक
डॉ.ललित सिंह राजपुरोहित

hindi@pratilipi.com
080 41710149
सोशल मीडिया पर हमें फॉलो करें।
     

हमारे बारे में
हमारे साथ काम करें
गोपनीयता नीति
सेवा की शर्तें
© 2017 Nasadiya Tech. Pvt. Ltd.