2010-11, जब याहू अपनी बीमार स्थिति में आ चूका था और फेसबुक को अभी अभी जवानी चढ़ी थी, इसलिए सभी कॊ अपने आगोश मे लेने लगा था. फेसबुक पर अपने पडोसी कॊ देख कर भी ऐसा लगता था, जैसे सालो बाद कुंभ के मेले मे बिछड़ा हुआ कोई साथी मिल गया हो. इस फेसबुक की बीमारी सब स्टूडेंट्स के साथ साथ नए जॉब पाए हुए नौजवानों कॊ भी जकड सा ही लिया था. अब ज़माने के साथ तो चलना पड़ता ही है (हम जैसे अपने ही खयालो मे रहने वाले लोगो कॊ भी). नयी जॉब थी तो वर्क- प्रेशर कुछ ज्यादा नही होता था और अभी तक ट्रेनिंग (जो शायद कभी दी ही नही गयी हो, पिछले 4- महीनो से), चल ही रही थी. मुम्बई मे मार्च से जुलाई शुरू होने तक पकाऊ दिन होते है. मैं लंच के बाद के कानो मे हैड- फ़ोन लगाए, अन-मने मन से कंप्यूटर स्क्रीन कॊ बस देखती रहती, याद नही आ रहा लंच के बाद मैने कभी पढ़ा हो कुछ. दोस्तों से गपशप का कोई शौक नही, और इस टाइम सब बिजी होंगे. जब करने कॊ कुछ नही होता था तो एक- मात्र सहारा था, फेसबुक. "यूँ तो ऑफिस मे फेसबुक allow नही, पर बॉस कौनसा मुझे ही देखता रहता है ?", खुद कॊ कन्विंस कर के लॉगिन किया (हाँ, तब मेरे साथ भी कहानी same थी, हमेशा नोटिफिकेशन्स, या मैसेज होते थे).... पहले नोटिफिकेशन, थैंक यू ख़तम किये, मैसेज रिप्लाई किये. फिर मैन-पेज पर स्क्रॉल शुरू. आज कल जब भी फेसबुक देखो, एक नाम हर जगह दिख जाता, कभी उसने किसी म्यूच्यूअल फ्रेंड का फोटो लाइक/कमेंट किया तो कभी किसी ने उसके... साइड- बार मे भी "you may know".

जब फेसबुक पर आओ, मैं बाद मे दिखूंगी खुद कॊ, लेकिन वो नाम उछल कर सबसे ऊपर... मैं 10- मिनट तक चलती रही. मैंने तो कुछ पोस्ट किया ही नहीं था, पर यहाँ मेरे किसी दोस्त का भी कोई नया अपडेट नही है, अगर है तो बस उस नाम ने ये किया, वो किया. थक गयी थी मैं, कितने दिनों से ये ही चला आ रहा है. या तो फेसबुक खोलो ही मत, वरना इन्हे ही झेलते रहो. बाकी पिछले दिनों के जैसे बंद ही कर दिया "फेसबुक".

अगले दिन same मूड, same मौसम, same बोरियत से परेशान मैंने same खता की फेसबुक लॉगिन की. "आज अगर same हरकत हुई ना, मैं इसको मैसेज ही कर दूंगी", सोच लिया था मैंने पहले ही. शायद ऊपर वाला मेहरबान हुआ मुझ पर उस दिन, कोई अड़चन नही हुई, बन्दा गायब था आज. बस साइड- बार से ना हटने की ज़िद थी. "किस्मत नाम की खतरनाक मगर सहायक", कोई फीलिंग हम हमेशा अपने साथ रखते है, चाहे मेहनत ना करो, अगर परिणाम आपके फ़ेवर मे ना हो तो "किस्मत ही खराब है, मेहनत तो की थी" कह कर बचा जा सकता है. तो मैं भी थोड़ा सहारा लेती हूँ ये कह कर की "मेरी भी किस्मत खराब थी" की जाने ही क्यों, आज उसको गायब पा कर मुझे सुकून से ज्यादा आश्चर्य हुआ. आखिर मे पहली बार उस नाम पर जा कर, प्रोफाइल देखा. कुछ 5-7, mutual फ्रेंड सब मेरे कॉलेज के, क्लास के, सब करीबी लोग जिनके साथ 4- साल घूमने के चक्कर मे कितने ही लड़को कॊ बिना जाने, समझे हड़का दिया, किसी का प्रपोजल एक्सेप्ट नही किया. क्योंकि पता नही दोस्ती का नशा ज्यादा था या वो लड़के ही बुरे लगे थे मुझे या ये प्यार- व्यार मे कोई विशवास ही नही था कभी भी मेरा. इस लड़के का प्रोफाइल मे कुछ फोटो, कुछ स्टेटस. थोड़ा सा दिमाग लगा कर पता लग गया की कॉलेज सीनियर ही है. लेकिन. ..... मैंने तो कभी नही देखा. कभी रैगिंग भी नही ली इसने तो. रैगिंग ग्रुप भी फिक्स था मेरा तो, कुछ 2- 4 लड़कियां साथ होती थी हमेशा, तो सब साथ मे ही मारी जाती थी. और हम वो ग्रुप थे, जो रैगिंग देने के बिलकुल 5- मिनट बाद सीनियर से "प्लीज हेल्प, हमे स्टेशनरी तक जाना है, बट गार्ड नही जाने दे रहा" बोल लिया करते थे. इससे क्या होता था की अगली बार कोई रैगिंग नही लेता, आराम से कैंपस मे घुमा- फिरा जाता. और सीनियर लड़को कॊ लगता की हम वैल्यू दे रहे है, यहाँ हम उल्टा अपना फायदा निकलवा लेते थे. मैं यहाँ कहना चाहूंगी, की ऐसा करने मे एक एक्सपर्ट सहेली थी, इसलिये मैंने कभी किसी सीनियर से कोई फ़ेवर नही लिया. लेकिन सहेली कॊ सपोर्ट देना पड़ता था. खैर, बहुत घूम फिर कर भी ये फेसबुक वाला सीनियर याद नही आया. "खाली दिमाग, शैतान का घर", की कहावत कॊ साकार किया मैंने उसी वक़्त. मैसेज टाइप किया "सारे दिन आपके फेसबुक नोटिफिकेशन से पेज भरा रहता है, कोई और काम क्यों नही करते आप ?", कभी कभी सोचती हूँ, काश इन्टरनेट बंद हो जाता, या काश मेरे बॉस आ जाता या काश ....... पर किस्मत की खराबी. मैंने मैसेज सेंड कर दिया.

इस बात कॊ कुछ दिन निकल गए, मैं अपनी शान्ति भरी ज़िन्दगी मे ही चल रही थी, की एक दिन मैसेज आता है,

"you lucky girl, huhh ?".

मैं 10- मिनट सोचती रही की क्या जवाब दूँ, ऐसा नहीं की मैं जवाब देने से डरी, मगर "सीनियर्स आर ऑलवेज राईट, ऑलवेज रेस्पेक्ट सीनियर", का फंडा पसंद था मुझे, और कॉलेज से निकले हुए कुछ ज्यादा टाइम भी नही हुआ था, और मैं काफी शरीफ लड़की भी हूँ.

"no", कह कर मैंने निपटा दिया.

अगले दिन भी शांति और कोई मैसेज भी नही, कुछ 2- महीने निकल गए, और मैं पूरी तरह भूल गयी इस बात कॊ. एक दिन फिर मैसेज आता है.

"अब भी नोटिफिकेशन आते है तुम्हे ?",

"no", मैंने जवाब दिया.

" hmm... you are from alwar !!"

"yup, you are my college senior"

"ohh, which batch ?"

"2010, was with reema, aiet"... रीमा मेरी सबसे पहली और अच्छी दोस्त और पडोसी भी कह सकते है, जो मेरे पापा कॊ मेरे सब दोस्तों से ज्यादा पसंद थी क्योंकि वो कॉलेज and नयी बनी यूनिवर्सिटी टॉपर थी. हमारा कॉलेज, भारत(iet ) का हिस्सा हो कर भी जम्मू- कश्मीर(aiet) जैसा बना हुआ था.

"even, i was in aiet, पर तुम्हे कभी नही देखा, कॉलेज नहीं जाती थी क्या ? तुम पक्का city से आती होगी ? हॉस्टल की तो सब लड़कियों कॊ जानता हूँ मैं"

"आप भी अलवर से हो, सिटी से ही जाओगे"

"haha, मैं अलवर से ही हूँ, मगर रहता हॉस्टल मे था"

ये पढ़ कर मैं 5- मिनट सोचती रही, की ये कैसा मजाक था. हमारा कॉलेज काफी पास था सिटी से, फिर वो अपने घर ना रह कर हॉस्टल मे क्यों रहा ?

खैर...

"तुम यहाँ ? जॉब या पढना ?"

"जॉब, और आप ?" मैंने पूछा

"आवारागर्दी, और थोड़ा बहुत कहने कॊ मर्चेन्ट नेवी कोर्स, तुम्हारा ऑफिस कहाँ है ?"

"vashi"

"मेरे कुछ क्लास होते है vashi मे....लेकिन कॉलेज colaba साइड है, जानती होगी तुम, मुम्बई दर्शन तो कर ही लिया होगा. और और और. .... क्या पूछूँ अब ?"

"i have work, ओके बॉस bye, ". कॉलेज सीनियर्स कॊ बॉस बोलने की आदत अभी तक गयी नही थी, और नाम लेने का सोचा नही था अब तक.

"नॉट बॉस...... मैं यश ".

"yeah", भेज दिया मैंने, लेकिन पहले लिखा था "हाँ, 'भारत' माता की जय हो",और लोग- आउट हो गयी

.

.

.

"मैं हर बुधवार कॊ वाशी आता हूँ, ऑफिस कहाँ है तुम्हारा ?", अगली बार जब फेसबुक खोला तो मैसेज देखा,

मैं बैठ कर सोच रहा था, ये कहीं मेरे ऑफिस तो नही आ जायेगा ? ये अब मुझ पर लाइन नही मारना चाहिए ... मैंने कोई जवाब ही नही दिया. फेसबुक का ज्यादा आईडिया नही था इसलिये मान लिया की मैंने मैसेज देखा ही नही. उसका मैसेज फिर आया

" ऑफिस ?? कहाँ ???"

यहाँ मैं सोच रही हूँ "क्यों दूँ मैं ऑफिस का पता ? आ गया तो ? अरे, यार क्यों आएगा, तू कोई मिस इंडिया नही की जो देखे वही लाइन मारेगा. .. लेकिन फिर भी किसी कॊ ऐसे क्यों अपना पता दूँ ? नहीं ये. . नहीं वो" की कशमकश मे मैंने जवाब दिया

"india आप क्या करोगे मेरे ऑफिस का पता कर के ? रहने दो, मैं अपने ऑफिस का ध्यान खुद रख लूँगी"

"ok, लगता है काफी सवेंदनशील हो अपने ऑफिस कॊ ले कर, पर मैं आतंकवादी नही हूँ, चाहो तो कभी बुला कर सिक्योरिटी चेक करवा लेना"

"यस सर, bye now"

.

.

हर बार इसके पास कुछ ना कुछ पूछने कॊ होता था, इसलिये जब मैसेज करता कोई ना कोई सवाल ही होता, अगली बार था. .

"ऑफिस मे फेसबुक ? कोई रोक नही ?"

"मना है, मगर फिलहाल लंच के बाद थोड़ा ढील मिल जाती है"

"कौनसा ऑफिस है ? बता भी दो, अब मैंने क्या तुम्हारे ऑफिस के जरुरी कागजात चुराने है ?"

मैंने ऑफिस बिल्डिंग का नाम बता दिया बस ...

.

.

अगले ही बुधवार मैसेज मिला "मैं तुम्हारे ऑफिस बिल्डिंग के बाहर हूँ, क्या तुम आ सकती हो ?", ज़िन्दगी मे पहली बार किसी लड़के से बात करने कारण अफ़सोस हुआ था, क्योंकि इमेज भी कुछ ऐसी ही थी की कोई हिम्मत नही करता था बोलने की, और अगर किसी ने एप्रोच किया तो झाड़ देना ही सीखा था. मगर अब ? अब क्या करूँ ?

"पर अभी मैं काफी बिजी हूँ, आप ऐसे कैसे आ गए ?"

"अब आ ही गया हूँ यहाँ तक तो तुम भी बाहर आने का वक़्त निकाल लो"

मैं क्या करूँ ? सच कहूँ तो मैं बिलकुल नही जाना चाहती थी, क्योंकि मैं उससे बिलकुल नही मिलना चाहती थी, मगर ये बाहर खड़ा है, इसे जाने कॊ कैसे बोलू ? क्या करूँ ? मुझे जाना ही सही होगा, सोच कर मैं मैसेज करती हूँ, "ok, मैं आती हूँ"

नीचे जा कर कांच की दिवार से ही एक लड़का फोन मे देखता हुआ नज़र आता है... कुछ 2- सेकंड मे ही मुझे याद आता है की इसे मैंने देखा है कॉलेज मे. कब, कहाँ सब याद आ गया. मैं जब तक अपने 1st ईयर तक घूम कर आती हूँ, लड़का फोन कि दुनिया से बाहर असली दुनिया में आ कर सर ऊपर उठा कर देखता है, की मैं आयी या नहीं ? वहां अकेले मैं ही लड़की दिखती हूँ, और शायद फेसबुक फोटो से हिसाब लगा लिया की ये मै ही हूँ.

स्माइली दे कर हाथ आगे बढ़ा कर बोलता है, "hi"...

"hi", मैं भी हाथ मिला कर एक भी स्माइल रिटर्न कर देती हूँ. उसे बिल्डिंग के अंदर आने का रास्ता दिखाती हूँ.


to be continue .....





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