शनिवार सुबह उठने के बाद राकेश और रीना चाय पी रहे है।

"रीना सर्दियां खत्म हो गई, मौसम सुहाना है अब सुबह की सैर शुरू की जाए।"

"आज से करो। हर रोज़ नही तो कम से कम छुट्टी वाले दिन शनिवार और रविवार तो कर ही सकते हो।"

"बिल्कुल ठीक, जैसे पहले किया करता था। प्रतिदिन तो संभव नही है, ऑफिस जाने के लिये भागम दौड़ होती है, छुट्टी वाले दिन तो अवश्य सुबह की सैर करनी है। चलो रीना आज से आरम्भ।"


राकेश और रीना दोनों डिस्ट्रिक्ट पार्क जाते है।


"रीना मुझे यह पार्क बहुत अच्छा लगता है। एक तरफ खूबसूरत फूलों से सजा हुआ गार्डन, और दूसरी ओर कच्ची पखडंडी जो ऊंचे-ऊंचे पेड़ों से घिरी हुई है और दोनों के बीच में बच्चों के खेलने का मैदान।"

"हां पेड़ों की झुरमुट के बीच धूप के समय भी सैर आराम से कर सकते हैं। गर्मियों में धूप जल्दी निकलती है तब भी आराम से सैर हो सकती है।"

दोनों कुछ देर बाद एक बेंच पर बैठते हैं।

"क्या बात है थक गए?"

"हां रीना बहुत दिनों बाद सैर की और वो भी कुछ लंबी सी, इसलिए थकान हो गई। आदत नही रही। दो मिनट में चलते हैं।"

"फ्रूट और सब्ज़ी लेते चलेंगे। पार्क के बाहर बढ़िया क्वालिटी की सब्ज़ी, फ्रूट मिलता है।"

"चलो उठो, फ्रूट सब्ज़ी लेते है। छुट्टी का दिन है आराम से दोपहर को आराम करेंगे।"


रीना और राकेश फ्रूट खरीद रहे थे, तब राकेश की पीठ पर एक दमदार मुक्का पड़ा। राकेश लड़खड़ा गया। राकेश इससे पहले कुछ समझ पाता कि मुक्का मारने वाले ने कहा।

"और सुना राकेश, कमजोर हो गया, जरा सा हाथ लगाया कि गिर पड़ा।" फिर रीना की ओर मुड़ कर कहा। "भाभीजी लगता है आप राकेश का ध्यान ठीक से नही रख रही।"


रीना और राकेश ने मुड़ कर देखा पीछे रमेश खड़ा था। रमेश और राकेश की रिश्तेदारी थी। राकेश रमेश को मेशी कह कर बुलाता था।


"मेशी क्या यार इतने जोर का मुक्का मारा कि आंख के आगे तारे नज़र आने लगे और तू कह रहा है कि हाथ लगाया।" राकेश ने नाराजगी जताई।

"छोड़ यार और क्या हो रहा है?" रमेश ने राकेश का हाथ पकड़ कर हिलाते हुए कहा।

"सुबह की सैर की और फ्रूट खरीद रहे है। और मेशी तू बता, आजकल कहां है, एक अर्सा हो गया मिले हुए।"

"अब तो तेरे नज़दीक आ गया। सेक्टर तीन में कोठी बना की।"

"गृह प्रवेश में मेशी तूने बुलाया ही नहीं। पता ही नही चला कब कोठी बनाई। सेक्टर तीन में तो बड़े प्लाट हैं।"

"बेटा राकेश पांच सौ गज के प्लाट में कोठी बनाई है, पूरे ढाई मंजिल की है।"

"बुलाएगा तब देखेंगे। एड्रेस, फोन नम्बर तो दे।"


दोनों राकेश और रमेश एक दूसरे को अपना पता और फोन नम्बर देते हैं।

"राकेश तूने घर नही बदला, वही पुराना एड्रेस।"

"और फोन नम्बर भी पुराना है। हम तो पुराने ज़माने के है, लेकिन तू तो मॉडर्न हो गया है।"

"घर आएगा तो बात करेंगे, अभी मैं जल्दी में हूं। फ्रूट यहां अच्छा मिलता है, वही लेने आया था। मैं तो हर रोज़ सैर को आता हूं, तू नज़र नही आता?"

"आज तो नज़र आ गया। वैसे मेशी मैं सिर्फ शनिवार और रविवार को सैर करता हूं, बाकी दिन समय नही मिलता।"

"कहां काम कर रहा है आजकल?"

"सारी बातें यही सड़क पर खड़े खड़े करेगा। चल घर चल, पास में भी है, आराम से बैठ कर बात करते हैं।"

"अभी तो जल्दी में हूं, राकेश मेरे पास आ, कोठी भी देख।"

"मुझे सिर्फ शनिवार और रविवार समय मिलता है।"

"चल कल आ जा सन्डे है। आराम से बात करते हैं।"

अगले दिन रविवार को मिलने की तय करके दोनों प्रस्थान करते हैं।


राकेश और रमेश रिश्तेदार हैं। रिश्तेदारी तो थोड़ी दूर की थी परंतु बचपन में दोनों के घर पड़ोस में थे और एक ही स्कूल में पढ़ते थे जिस कारण दोनों पक्के मित्र बन गए।

"राकेश तुमने देखा, रमेश ने गले में सोने की दो मोटी चेन पहनी थी। अंगूठा छोड़ बाकी उंगलियों में भारी भरकम अंगूठियां, लगता है काफी तरक्की कर ली।"

"सेठ बन गया है। शायद सात-आठ वर्ष बाद मिले होंगे, पहले तो छोटा काम था, अब लगता है कि अच्छा प्रॉफिट कमाया होगा। व्यापार में कब छप्पड़ फट जाए किसी को नही पता। हम नौकरी वाले तो बस कछुए की रफ़्तार से चलते पूरी ज़िन्दगी काटते हैं।"


शाम के समय रीना और राकेश रसोई और घर के सामान की खरीदारी मार्किट में कर रहे थे तभी मार्किट में राकेश और पंकज का आमना-सामना हो गया। तीन-चार साल पहले पंकज राकेश का सहायक हुआ करता था। लगभग एक साल नौकरी करने के पश्चात उसने नौकरी बदल ली थी। पंकज ने राकेश के हाथ सामान से भरे थैले देख कहा।


"क्या गुरु दुकान दुकान जा कर शौपिंग कर रहे हो। आज जमाना फ़ोन घुमा कर सामान घर मंगाने का है। ऑनलाइन शौपिंग करो गुरु।"

"पंकज हम ठहरे पुराने ज़माने के, दुकान पर सामान की क्वालिटी देख कर सामान खरीदने की आदत बन गई है। और कहो पंकज कहां हो?"

"गुरु हमने तो तीन साल में तीन जॉब बदल ली। मजे में हैं। तीन लाख रूपए महीने का पैकेज है। तुम सुनाओ गुरु वहीँ टिके हो?"

"पंकज सही अनुमान लगाया। मैं तो वही पुरानी कंपनी में काम कर रहा हूं।"

"कुछ देखो गुरु तुम्हारे जूनियर तुम्हारे से ज्यादा कमा रहे हैं और तुम वहीँ टिके हुए हो। मुझे देखो अब फिर जॉब बदल रहा हूं। चार लाख रूपए महीने का ऑफर है। पांच से कम नही जाऊंगा। दो जगह बात चल रही है। तुम भी देखो गुरु।" कह कर पंकज ने विदा ली


रीना पंकज की बात सुन कर आश्चर्यचकित हो गई।

"राकेश पंकज सही कह रहा था कि तुम्हे भी दूसरी जॉब देखनी चाहिए। तुम एक लाख के पैकेज में हो और तुम्हारे जूनियर पांच लाख के पैकेज पर पहुंच गए।"

राकेश सिर्फ मुस्कुरा दिया। रात को रमेश ने फोन करके सन्डे को लंच पर आमंत्रित किया। रविवार साढ़े बारह पौने एक बजे रीना और राकेश रमेश के निवास पहुंचे।


कोठी 500 वर्ग गज क्षेत्र में ढाई मंजिल की आलीशान बनी हुई थी। भूतल और प्रथम तल बंद पड़े थे। रमेश दूसरी मंजिल में रह रहा था। कोठी की भव्यता उसकी बनावट से प्रतीत होती थी। एकदम नई बनी कोठी अपने में मिसाल थी जो आसपास की सभी कोठियों से जुदा थी। रमेश और उसकी पत्नी रेशमा ने दिल खोल कर राकेश और रीना का स्वागत किया। खाने में कई प्रकार के व्यंजन बनाए हुए थे। कुछ व्यंजन बाजार से भी मंगाए हुए थे।


"रेशमा के हाथों में हमेशा से रस रहा है। आज वर्षो बाद रेशमा के हाथों का जादू फिर से देखा है।" राकेश और रीना ने खाना खाते हुए कहा।

"मेरे हाथों के जादू में रीना का भी बहुत बड़ा हाथ है। सारा श्रेय रीना तुम्हे जाता है जिसने शादी के बाद बढ़िया व्यंजन बनाने सिखाये।"

"मेशी खाना तो लाजवाब है, मज़ा आ गया। अब कोठी तो दिखा, नीचे बंद क्यों रखा है?"

"अभी नीचे लकड़ी का काम करवाना है। अब रह कर आराम से तसल्ली से बनवाऊंगा। इसलिए ऊपर रहने लगा। सामने बैठ कर काम करवाऊंगा। बढ़िया कारीगर की तलाश में था। अब मिल गया है, अगले सप्ताह से काम शुरू करवाऊंगा।"


दो दिन में रमेश और पंकज से मिल रीना विचलित हो गई कि राकेश जीवन की भाग-दौड़ में बहुत पीछे रह गया है। राकेश की तनख्वाह सिर्फ एक लाख रूपए महीना है। राकेश का सहायक जो बहुत जूनियर है, पांच लाख रूपए महीने की सैलरी पर है और रमेश व्यापार में करोडो रूपए कमा रहा है और शानदार कोठी बना ली। वह राकेश को नौकरी बदलने को कहने लगी। राकेश ने रीना को समझाया कि हमे किसी से तुलना नही करनी चाहिए। भले उसकी तनख्वाह कम है फिर भी संतोष है। पंकज में संतोष नही है। रमेश व्यापार करता है और व्यापार में कभी भी छप्पड़ फट सकता है। लेकिन रीना के कहने पर वह दूसरी नौकरी अधिक सैलरी वाली ढूंढने लगा।


तीन महीने बाद


सुबह के समय राकेश ऑफिस जाने के लिए तैयार हो रहा था और रीना ब्रेकफास्ट बना रही थी। राकेश का फोन बजा। पंकज का फोन था।

"हैलो पंकज।"

"गुरु दो मिनट बात हो सकती है?"

"हां पंकज, बात हो सकती है।"

"गुरु तुम्हारी कंपनी में कोई जॉब हो तो बताओ।"

"किसके लिए जॉब देख रहे हो?"

"गुरु अपने लिए।"

यह सुन राकेश चौंक गया। "पंकज तुम्हारा पैकेज तो पांच लाख रुपए का है, मेरी सैलरी सिर्फ एक लाख है। पचास-साठ हज़ार से अधिक तो हमारी कंपनी देगी नही। तुम्हारे मतलब की नौकरी तो मैं दे नही सकता।"

"नही गुरु पचास हज़ार वाली कर लूंगा। हमारी कंपनी में छटनी हो रही है। मुझे भी छोड़ने को बोल दिया है। इसलिए गुरु जो मिले कर लूंगा।"

"पंकज मेरी कंपनी में तो नही, कहीं और बात करता हूं।"

पंकज से बात करने के बाद राकेश ने रीना से कहा "मुझे यह नही मालूम था कि पंकज इतना बढ़ा गपोड़ी है। पांच लाख रूपए की तनख्वाह अब कह रहा है कि पचास हज़ार की भी कर लेगा। रीना मुझे लगता है कि वह एकदम झूठ कह रहा था और रौब डालने के लिए हवाबाजी कर रहा था। तीन साल पहले मेरी कंपनी में पच्चीस हज़ार की सैलरी थी उसकी, लगता है पचास-साठ हजार वाली नौकरी कर रहा होगा तभी पचास हज़ार की सैलरी पर राजी हो गया।"

"यकीन नही होता राकेश कि सिर्फ रौब डालने के लिए कोई इतना झूठ बोल सकता है। राई का पूरा पहाड़ बना दिया। पचास हज़ार का पांच लाख बना दिया और मैंने आपके ऊपर दूसरी नौकरी ढूंढने का दबाव बनाया। खुद भी तनाव में आ गई और आप पर भी दबाव बनाया।"

"कोई बात नही, कभी-कभी जीवन में न चाहते हुए भी तनाव हम खुद अपने ऊपर ओढ़ लेते है। ऑफिस की देर हो जाएगी, चलता हूं। शुक्र है कि हकीकत जल्दी सामने आ गई वरना हमारी ज़िन्दगी दूभर हो रही थी।"

"पता नही लोग बढ़-चढ़ कर क्यों बोलते हैं?"

"अपने को दूसरे से अधिक अच्छा साबित करने के लिए क्योंकि हमारे समाज में धनी व्यक्तियों को सलाम किया जाता है और निर्धनों का तिरस्कार, चाहे निर्धन अधिक बुद्धिमान हो।"


छः महीने बाद


"रीना मुझे ऑफिस टूर पर दो दिन के लिए चेन्नई जाना है। सुबह छः बजे की फ्लाइट है, सुबह चार बजे एअरपोर्ट के लिए निकलना होगा। परसो रात आठ बजे की वापिसी फ्लाइट है। घर पहुंचते रात के बारह तो बजेगें।"


राकेश जब चेन्नई एअरपोर्ट उतरा और मोबाइल ऑन किया, तब रमेश की कई मिस्ड कॉल थी। रमेश को क्या काम हो सकता है? बहुत दिनों से रमेश से कोई बात ही नही हुई। सबसे पहले उसने रीना को फोन किया कि वह चेन्नई पहुंच गया है।

"राकेश मेशी भाई साहब आये थे, आपका पूछ रहे थे।"

"मोबाइल पर मिस्ड कॉल हैं, कोई जरुरी काम था, कुछ बताया?"

"कुछ रुपयों की ज़रूरत थी कह रहे थे एक लाख रूपए चाहिए।"

"एक लाख रूपए?

"कह रहे थे कि बहुत सख्त जरुरत है।"

"तुमने क्या कहा?"

"मेरे पास कहां से आये इतने रूपए। घर खर्च के लिए चार हज़ार हैं। महीने के आखिरी दिन चल रहे हैं। मैंने कहा कि आप चेन्नई गए हैं ऑफिस टूर पर।"

"अच्छा रीना मैं बात करता हूं।"


राकेश रमेश से फोन पर बात करता है।


"मेशी क्या हुआ, घर भी गए थे?"

"यार एक लाख रुपये की सख्त जरुरत है। मदद कर।"

"मेशी, लाख रूपए तो मेरी तनख्वाह है, महीने का आखिर चल रहा है। पहली को तनख्वाह मिलती है, उसमे से होम लोन की क़िस्त, कार लोन की क़िस्त चली जाती है। बाकी में पूरा घर चलाना होता है। मेरे बस का यह मदद करना नही है, वैसे यार एक लाख की रकम तेरे लिए तो मामूली बात है। व्यापारी आदमी है, दो मिनटों में जुगाड़ हो जाता है।"

"राकेश तेरे से यह उम्मीद नही थी।"

"मेशी अभी तो चेन्नई में हूं, दिल्ली आ कर बात करते हैं।"


दो दिन बाद राकेश दिल्ली वापिस आता है, लेकिन ऑफिस के काम के कारण रमेश से बात नही कर सका। शनिवार छुट्टी वाले दिन राकेश और रीना रमेश से मिलने उसकी कोठी जाते हैं। वहां पहुंच कर दोनों हैरान हो जाते हैं, बाहर बहुत सारे व्यक्ति एकत्रित थे। रमेश के घर से सामान उतार कर ट्रक में रख रहे थे। रमेश और रेशमा चुपचाप एक कोने में खड़े थे।


"रमेश क्या हुआ?"

इतना सुन एक सज्जन राकेश से पूछ बैठे। "आप कौन?"

"मैं रमेश का भाई हूं।"

"तो भाई साहब अपने भाई की करतूत तो पता होगी?"

"मैं समझा नही?"

"पिछले छः महीने से घर का किराया नही दिया, इसलिए घर का सामान मैंने जब्त कर लिया है। किराया दे कर सामान छुड़ा लेना।"

"रमेश मैं क्या सुन रहा हूं, तुम किराये पर रह रहे थे। पर तुमने तो कहा था कि कोठी तुम्हारी है?"


यह सुन वे सज्जन जो कोठी के मालिक थे भड़क उठे। "क्या, अपने को मालिक बताता था। घोर कलयुग आ गया। एक तो किराया नही देते, ऊपर से अपने को कोठी का मालिक बताते हैं।"


रमेश कुछ नही बोला परंतु राकेश समझ गया कि किराया देने के लिए एक लाख रुपये मांग रहा था। रमेश भी झूठी शान का शिकारी निकला। घर में नही दाने, अम्मा चली भुनाने। इतनी शान किसको और किस लिए दिखानी है। जितनी जेब है, खर्च उतना ही करो। बढ़-चढ़ कर बातों का क्या फायदा। पंकज का झूठ भी अधिक दिन छुप नही सका और रमेश का भी सच उजागर हो गया। बड़े बूढे सही कहते है कि जितनी चादर हो उतने पैर फ़ैलाने चाहिए।


राकेश और रीना ने एक दूसरे को देखा, एक दूसरे का हाथ पकड़ा और घर के लिए रवाना हो गए।





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