आदमी ही आदमी से दूर हो गया
पाई जो दौलत मगरूर हो गया
बोझ से गमों के ये चूर हो गया
स्वार्थ से कितना भरपूर हो गया

आदमी ही आदमी से दूर हो गया

पैसा ही इसका दस्तूर हो गया
जाने कैसा इसको फितूर हो गया
खो कर के रंगत बेनूर हो गया
पर हित को भूल खजूर हो गया

आदमी ही आदमी से दूर हो गया

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