सुबह के 07:35 बजे थे और मैं स्टेज पर सावधान में खड़ा होकर कमाण्ड दे रहा था। सामने मेरे 600 विद्यार्थी थे, पर नजरें मेरी उसी पर थी।

उसकी आँखें सजीली और होंठो पर मुस्कान रहती थी हमेशा। एक क्लास सीनियर थी मुझसे वो, दिखाई तो रोज दे जाती थी पर नजरें 7-8 बार ही मिली थी हमारी।

गर्मी गई, सर्दी गई और फिर साल निकला। वो बारहवीं पास कर के चली गई और एक साल बाद मैं भी। लगभग तीन-चार साल बाद फेसबुक पर उसका एकाउंट मिला, मेरे द्वारा फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजी गई, उसके द्वारा स्वीकार की गई, मैसेज आदान-प्रदान हुए, फिर नम्बर और फिर ना खत्म होने वाली बातों का सिलसिला शुरू हुआ।

पूछती थी हमेशा कि मैंने खाना खाया या नहीं, अब उसे कौन समझाए कि उसकी आवाज सुनने के बाद भूख किसे याद रहती हैं। मेरी बातों पर बहुत हँसती थी वो और उसको हँसता देख लगता था मानो मेरा दिल हँस रहा हैं। उसको हँसाना और उसकी हँसी सुनना ही मेरे पागल दिल की तमन्ना रहती थी और मुझे बस अपने दिल की ख्वाहिश पूरी करनी रहती थी। लगता था जैसे मेरी धड़कनें उसकी हँसी से जुड़ी है, जितना वो हँसेगी, उतना ही मेरा दिल धड़केगा।

पर एक दिन मेरे दिमाग ने अपना दिमाग लगाया और उससे पूछ बैठा,"तुम्हारी जिंदगी में, मैं क्या हूँ, क्या जगह हैं मेरी" और इंतज़ार करने लगा उसके लफ़्ज़ों का। उसने कहा "तुम जोकर हो यार, हँसाते बहुत हो" ये कह वो खिलखिला कर हँस पड़ी। उसकी हँसी सुनकर मेरी धड़कनें दौड़ना चाहती थी पर पता नहीं, आज दिल को क्या हो गया था, वो उसकी हँसी सुनकर खुश होने के बजाय रो रहा था और रोक रहा था मेरी धड़कनों को धड़कनें से। शायद वो टूट कर बिखर गया था और अब किसी को हँसाने की बजाय जोड़ना चाहता था खुद को धीरे-धीरे।

आज भी मेरा दिल किसी को नहीं हँसाता, पर जब कभी दिमाग से हँसा देता हूँ लोगों को। तो इस डर से मेरे दिल की धड़कनें धीमी हो जाती हैं कि कहीं हँसती हुई भीड़ से कोई ये ना कह दे - "तुम जोकर हो यार , हँसाते बहुत हो।"

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