काली जुबान

चंदू : माँ ज़ोरों की भूख लगी है कितनी देर लगेगी और ?

बिंदिया : बस बेटा पांच मिनट आटा ही गूंद रही हूँ | चंदू : ठीक है माँ ......अरे माँ देखो तो आज की बारिश से क्या हाल है | पापा कैसे आयेंगे घर आज ?

बिंदिया : बुदबुदाई न आयें तो अच्छा ही है | और रोटी बना चंदू को खाना परोसती है | और उसे सुला देती है |

गहरी नींद में चंदू को सोता देख मन में हज़ारों ख्याल ,सवाल ...कैसा होगा इसका भविष्य , कैसे होगी इसकी पढाई - लिखाई ,क्या करूँ की इसको ये नर्क सी ज़िन्दगी न भुगतनी पड़े | मेरी तो ज़िन्दगी निकल गयी लोगों के बर्तन ,झाड़ू ,पोचा कर के | जो कमाती हूँ इसका शराबी बाप शराब में उड़ा देता है | अच्छा हुआ घर नहीं आया नहीं तो फिर वही गाली गलोच , मार पिट और वहशी की तरह जिस्म पर टूटना | मौत से भी बतर ज़िन्दगी की परछाई से भी कैसे दूर रखूं अपने लाडले को |

इन्हीं ख्यालों की उथल पुथल में न जाने कब आँख लग गयी और दरवाज़े की खट- खट से ही आँख खुली तो देखा सूरज चढ़ आया था | आँखें मलते मलते दरवाज़ा खोला तो पुलिस के साथ काफी भीड़ थी | तभी नंदू भी उठ आया आंखें मलते हुए “ माँ कौन है और पापा कहाँ हैं “ ..ये भीड़ कैसी ? बिंदिया क्या जवाब देती क्योंकि उसे खुद कुछ समझ नहीं आ रहा था |

तभी थानेदार ने कड़क आवाज़ में बोला : दरवाज़ा तो खोल और लाश की शीनात कर ले ..हमें और भी काम हैं | वैसे ही सारी रात ख़राब कर दी इस मनहूस ने | पी कर सड़क पर पड़ा था गाड़ी ने कुचल दिया और किसी तरह पूछते पूछाते इस गन्दी बस्ती तक पहुंचे | अब दरवाज़े पर क्या खड़ी है बाहर निकल और देख तेरा ही मर्द है क्या ? बिंदिया सहमी सी हिली आगे बड़ी तो चंदू भी उसका पल्लू पकड़े पीछे पीछे हो लिया | लोगों का भी मुंह चल पड़ा ..बेचारा अभी उम्र ही क्या थी , अब चंदू का क्या होगा , रोज़ का ही लड़ना झगड़ना था इस बिंदिया का तभी तो इतना पीता था , और आज देखो बेचारा मर ही गया मुक्ति मिली इस नर्क से | डरते डरते बिंदिया ने सामने पड़ी लाश से सफ़ेद चादर उठाई तो चंदू चीख पड़ा “ पापा पापा ..क्या हुआ आपको उठो न , ऐसे क्यों लेटे हो ..उठो न मुझे गोद में उठाओ न .. पक्का अब मैं आप से कुछ नहीं मांगूगा ..उठ जाओ न “ |

बिंदिया सुन्न ये क्या था , क्यों था कुछ भी तो समझ नहीं आ रहा था | तभी थानेदार ने पूछा तेरा ही मर्द है न , ये ले पंचनामा इस पर अंगूठा लगा हम चलें | कहकर उसने बिंदिया का अंगूठा लगवाया और चल पड़ा ..लोग भी तितर बितर होने लगे और अब बचे थे बिंदिया ,चंदू लाश के सिरहाने बैठे | चंदू का रो रो कर हाल बुरा था और बिंदिया की आँखों से न एक आंसू गिरा न जुबां से एक लफ्ज़ |

तभी पड़ोस के कुछ लोग आये और बोले कब तक लाश के सिरहाने बैठे रहोगे माँ –बेटा ..क्रिया क्रम की तैयारी करो वरना कटी - फटी लाश से बदबू आने लगेगी | और आगे बढ़ कर बिंदिया का सिन्दूर पोंछा और चूड़ियाँ तोड़ दी ...ये कहते हुए पति को तो खा गयी अब किसके लिए करेगी ये शिंगार |

शाम होते होते अंतिम संस्कार भी हो गया और रात के सन्नाटे में सफ़ेद साड़ी में लिपटी बिंदिया एक कोने में और चंदू पापा की तस्वीर हाथ में लिए एक कोने में |

एक ही रात में ये क्या हो गया , मरती तो मैं रोज़ ही थी पर आज ये सब ....तभी उसे याद आया की उसी के मुंह से तो निकला था “न आयें तो अच्छा ही है” तो अब जब वो हमेशा के लिए कभी नहीं आएगा तो ये छटपटाहट क्यों ,ये बैचनी ,ये उदासी क्यों ...अब तो उसे मुक्ति मिल गयी थी जिसका गिला वो रोज़ ही भगवान के आगे करती थी ..फिर अब क्यों ? तभी अचानक से बिंदिया ज़ोर जोर से चिलाई और सिर पीटने लगी ..सत्यानाश हो इस काली जुबान का जो बोली “न आयें तो अच्छा ही है” और भगवान तू : वैसे तो कोई बात सुनता नहीं , कुछ करता नहीं ..ये बड़ी जल्दी तुझे सुनाई दे गया | कैसे नज़र मिलाऊँ चंदू से ,कहाँ से लाऊँ उसके पापा , कैसे खुद को बचाऊँगी गिद की तरह नोचने को तैयार लेनदारों से , कहाँ जाऊँ ,क्या करूँ , एक दलदल से निकल न जाने कितने दलदल राह देख रहे हैं ....काश ये काली जबान बंद रहती तो ये नौबत तो न आती | एक कवच तो था ये सिन्दूर और चंदू की हंसी जो कभी लौटा भी पाऊँगी या नहीं |

अब न दिन लौट सकता था , न रात और न वो शब्द जो अनजाने में ही निकले सच हो गए थे ..दे जीवन का काला कारावास और कभी न खत्म होने वाली जंग - बिंदिया और चंदू की |

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