तोड़ के चले दिल वो हमारा तो कोई बात नहीं,

तहस-नहस कर गये मंजर सारा तो कोई बात नहींI


रेत पर बनाया था घर टूट गया हम क्या करें?

रेत का था बिखर गया बेअदब तो कोई बात नहींI

चन्द मायुसियाँ शक्ल-ओ-सूरत बिगाड़ देती है,

बिगड़ना ही था तो बिगड़ गई तो कोई बात नहींI


हर लफ्ज़ लड़खड़ा जाते हैं उसका नाम सुनकर,

ये बात अब वो ना समझ पाये तो कोई बात नहींI


किसी ने कहा क्या मुहब्बत कर पाओगे मुझसा?

उसके जैसी मेरी किस्मत नही तो कोई बात नहीI


दीदार उनके कर पाते इसलिए उस चौक पे गये थे,

हमने शाम कर दी वो ना आये तो कोई बात नहींI


कभी रूबरू हो जाए तो कहना थोड़ा याद कर ले,

कर ले याद तो ठीक है ना करे तो कोई बात नहीं I


बाज़ीचा दिल को समझ वो खेल गये तो क्या हुआ?

अब्तर-ए-ख़्वाब बस मेरे हो गये तो कोई बात नहींI


अब्सार राहों पे बिछा रखे पलकें उनके आरज़ू को,

आक़िबत में आश्ना भी ना मिले तो कोई बात नहींI


आब-ए-चश्म पीने को मजबूर हो गये जाने क्यों?

आब-ए-तल्ख़ गर जान ले भी ले तो कोई बात नहींI





आब-ए-तल्ख़= आंसू, शराब
आब-ए-चश्म=आंसू , आश्ना= प्रेमी, आरज़ू= आशा, अब्सार= आंखें

बाज़ीचा= खिलौना, अब्तर= बिखारा हुआ, आक़िबत= अन्त I

नोट- ग़ज़ल विधा में यह मेरी पहली रचना है, अतः त्रुटी को नज़रंदाज़ कर आपके सुझाव अपेक्षित हैI

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