ग़लत हो व्याकरण या हो अलग इजहार की भाषा,

समझते हैं सभी दिल की,नजर की, प्यार की भाषा .

नहीं आती खुशामद या किसी दरबार की भाषा,

मेरे लब से निकलती है फकत फनकार की भाषा.

मेरा बाजार भी औरों से कोई कम नहीं होता,

अगर मैं सीख लेता बोलना बाजार की भाषा.

मोहब्बत या मुरौव्वत से न उनका वास्ता कोई,

जो व्यापारी , समझते हैं फकत व्यापार की भाषा.

बहुत से क्रीमीनल भी कैबिनेट में जाके बैठे हैं

समझते हैं जो वादों का गणित इकरार की भाषा.

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