रात और रास्ता

दिसम्बर की सर्द रात हलकी हलकी बारिश हो रही थी आलोक ठण्ड मैं थीठुरता हुआ जल्दी जल्दी अपने कदम बड़ा रहा था आज ट्रेन लेट हो गई थी शाम के 5 बजे के बजाय रात १ बजे स्टेशन पर लगी थी उस छोटे से कसबे मैं इतनी रात कोई सवारी का साधन मिलना मुश्किल था अलोक का ब्याह कुछ दिन पहले ही हुआ था उसके २-4 सहयात्री स्टेशन पर ही रुक गए थे पर आलोक अपनी नई दुल्हन से मिलने की जल्दी मैं अकेला ही चल पड़ा था 8-9 किलोमीटर ही तो है यु ही कट जायगे जब घर पहुच कर बीना का चेहरा देखूगा तो सारी थकान उड़न छु हो जाऐगी मन ही मन मुस्कुराते हुए अलोक ने अपने कदम और तेज कर दिए

घर पहुचने की जल्दी मैं अलोक ने मुख्य सड़क छोड़ कर घंटाघर वाली गली पकड़ ली दिन मैं तो यहाँ मार्किट मैं कितनी चहल पहल रहती है और रात के इस पहर कितनी शांती बारिश की वजह से आवारा कुत्ते भी कही दुबके पड़े थे आलोक बारिश की वजह से हुए कीचड़ मैं अपने ही पैरो की पदचाप सुनते हुए चल रहा था

आगे पुराने टाउन हाल वाले चोराहे पर पहुचते पहुचते अलोक हल्का सा हाफ्ने लगा था सामने रामखिलावन का चाट का ठेला कैसे उजाड़ सा पड़ा था पिछले हफ्ते जब वो बीना को चाट खिलने यहाँ लाया था तो कैसे गोलगप्पो के तीखेपन ने उसकी आँखों मैं पानी ला दिया था और नाक लाल कर दी थी बीना की उस दिन वाली शकल याद आते ही वो हँस पड़ा फिर एकदम चौंक गया मैं क्या इस सुनसान जगह खड़े खड़े हंस रहा हु मानव मन भी ना वो फिर गीत गुनगुनाते हुए आगे बढने लगा अलोक अपनी धुन मैं चला जा रहा था तभी उसकी पदचाप के साथ किसी और की भी पदचाप ताल मिलाने लगी अलोक ने पीछे मुड कर देखा कोई नहीं था उसे लगा शायद उसे धोका हुआ है वो थोडा सा सतर्क होकर चलने लगा थोड़ी दुरी पर फिर से किसी के पेरो की आवाज उसके साथ साथ आ रही थी इस बार वो थोडा डर गया कोई चोर तो नहीं है एकदम से पीछे मुड़ने की हिम्मत वो नहीं जुटा पाया बनिस्पत अपनी रफ़्तार जरुर बड़ा दी पर वो पदचाप भी उसी रफ़्तार से उसके पीछे पीछे आ रही थी अबकी बार उसने पीछे मुड़ कर देखा तो कोई भी नहीं था आसपास ऐसी जगह भी नहीं था जहा कोई छुप पाए डर के मारे अलोक के माथे पर पसीना चुह गया वो मन ही मन हनुमान चालीसा का पाठ पदने लगा वो लगभग भागने लगा था तभी सामने उसे एक बकरा खड़ा दिखाई दिया इतनी रात को लगता है कही से रस्सी तुड़ा कर भाग आया है इस एकाकी पन मैं एक जानवर का दिखना भी उसे राहत भरा लगा कोई तो है मेरे अलावा यहाँ .. वो जैसे जैसे आगे बढता रहा वो बकरा कद मैं बढने लगा और अब वो एक गाय जितना दिखने लगा था अलोक अवाक था यह क्या छलावा है, यह है क्या, अलोक जैसे ही थोडा और आगे बड़ा वो जानवर अपने पिछले दो पैरो पर खड़ा हो गया और गुर्राते हुए आलोक की तरफ बड़ा उसके बड़े बड़े खुर अँधेरी रात मैं भी चमक रहे थे अलोक अपनी जान हाथ मैं लेकर दौड़ पड़ा उसे जहा रास्ता दिखा वही भागा पीछे पीछे उस जानवर की गुराने की आवाज भी कई बार तो बिलकुल अलोक के कान पर उस आवाज के साथ साथ उस जानवर कि गरम सांसे भी आज आलोक जितनी तेजी से भाग सकता था भागा कूचा गुलाबी पार करते ही अचानक वो जानवर गायब हो गया आलोक ने सामने देखा तो पुराना शिवमंदिर था वो उसके गेट पर जा कर रुक गया वो बुरी तरह हाफ रहा था उसने मन ही मन भगवान का धन्यवाद दिया किस आफत से बच गया उसने सुन रखा था ऐसी उपरी हवाओ का भी इलाका होता है अपने इलाके से आगे वो नहीं बदती –

आज तो बच गया वो इधर उधर देखने लगा बारिश रुक गई थी ठंडी हवा अपने पुरे जोर पर थी पर दौड़ने की वजह से अलोक पसीना पसीना हो रहा था हिम्मत जुटा मंदिर मैं माथा टेक वो फिर आगे बढने लगा इस बार वो फिर से मुख्य सड़क पर आ गया इक्का दुक्का ट्रक सड़क से गुजर रहे थे अलोक की जान मैं जान आई वो कुछ मीटर ही आगे बड़ा था की एक दुकान के शटर के निचे एक रिक्शा वाला कम्बल डाले सो रहा था अलोक बुरी तरह थक चूका था उसने रिक्शे वाले को आवाज लगाई रिक्शा वाला उठ खड़ा हुआ का है सोने भी नहीं देत हो दिन भर रिक्सा खिचत खिचत गौड़ पीर गेन अलोक उस से मनुहार करते हुए बोला भैया बहुत मेहरबानी होगी अगर नयी नहर कॉलोनी छोड़ दोगे बहुत दूर से पैदल आ रहा हु – टेम का है रिक्शा वाला बोला – ढाई बज गए है अलोक का ध्यान भी पहली बार समय पर गया डेढ़ घंटा बीत गया था स्टेशन से चले काश वही रुक जाता – अलोक लगभग गिर्याता सा बोला भाई बहुत मेहरबानी होगी घर पंहुचा दो रिक्शा वाला उसे घूरते हुए रिक्शा निकालने लगा अलोक रिक्शा पर सवार हो गया रिक्शा वाला कम्बल ओढे ओढे रिक्शा खीचने लगा – अलोक नींद और थकावट से बोझिल हो चला था रिक्शा अपनी रफ़्तार से आगे बड रहा था रात अँधेरी थी कही कही लेम्प पोस्ट की रोशनी पड़ती और बाकि सडक अँधेरी आधे से ज्यादा लेम्प पोस्ट काम नहीं कर रहे थे अलोक के मुह से एक भद्दी सी गाली निकली रिक्शा वाला बोला क्या बात है भाई इत्ती रात कहा से आ रहे हो अलोक ने फिर रेलवे वालो को गाली देते हुए बात बतानी शुरू की वो अपनी घबराहट पर काबू पा चूका था अब उसने टाउन हॉल वाले चोराहे पर उस उपरी हवा से मिलने की बात भी बतानी शुरू कर दी बोला भाई तू नहीं जानता आज किस आफत से बच कर आ रहा हु अगर और कोई होता तो वही खड़े खड़े मूत देता अपन पहलवानों के कुनबे से है हनुमान जी की कृपा है रिक्शा वाला बोला अरे कोई पागल सांड रहा होगा आप अँधेरे मैं डर गए होगे अलोक एकदम से ताव मैं आ गया अरे ऐसी आफत ऐसी चीज़ ना कभी देखि ना सुनी उस आफत के खुर ऐसे थे जैसे जैसे ........ अलोक शब्द खोजने लगा तभी रिक्शा वाला एक शैतानी सी मुस्कराहट लिए पीछे मुड़ा और कम्बल हटाते हुए बोला कैसे ? ऐसे .....अलोक की आँखे अचरज से फट सी पड़ी उसके हाथ के पंजो की जगह खुर थे वैसे ही चमचमाते हुए अलोक चिल्लाते हुए रिक्शे से कूद पड़ा वो बेतहाशा भागा पीछे से रिक्शे वाले के अट्टहास उसे लगातार सुनाई दे रहे थे नहर वाली पुलिया पार करते ही उसे आवाज आनी बंद हो गई उसने पीछे मुड़ कर देखा तो ना रिक्शा था ना रिक्शे वाला

अलोक अब रोने को था उसने अपने होश थोड़े संभाले अब उसका घर ज्यादा दूर नहीं था नहर के साथ साथ सड़क थी आगे सुगर मिल के बाद ही उसकी कालोनी शुरू हो जाती है अलोक ने एक लम्बी सांस ली और दौड़ लगा दी वैसे वो कोई खास कसरत नहीं करता था पर आज डर ने उसके पैरो मैं पंख लगा दिए थे वो लगातार भाग रहा था हवा से नहर की साथ उगी हुई झाडिया भी डरावनी लग रही थी ऊपर से तेज चलती हवा उसके कानो मैं फुसफुसा रही थी अलोक बार बार हनुमान चालीसा का पाठ कर रहा था पर चाह कर भी वो डर अपने दिल से नहीं निकल पा रहा था उसे लगातार लग रहा था जैसे उसके पीछे पीछे भी कोई भाग रहा हो सामने मिल के गेट पर लगे बल्ब की रोशनी अलोक को अब दिखने लगी थी उसने अपना पूरा जोर लगाया और दौड़ पड़ा तभी उसका पैर किसी चीज़ से टकराया उसका संतुलन बिगाड़ा और वो ओंधे मुह गिर पड़ा उसे लगा जैसे किसी ने उसका पैर पकड़ रखा हो वो डर के मारे चिल्लाने लगा सुगर मिल की तरफ से एक चौकीदार कौन है कौन है करता हुआ उसकी तरफ बड़ा अलोक उठने की कोशिश कर रहा था चौकीदार ने डंडा हवा मैं लहराया अलोक चिल्लाया मैं हु राहगीर हु अलोक के कपडे और मुह बुरी तरह से कीचड़ मैं सन चुके थे अलोक बोला भाई जरा हाथ दो चोकीदार ने हाथ आगे बदाया पर यह क्या उसकी हथेली की जगह भी खुर थे अलोक की चीख उसके हलक मैं ही दब के रह गई वो गु गु करता हुआ एक और को लुडक गया चौकीदार भी शैतानी हँसी हँसते हुए बोला का हुआ बाबु जी , अलोक को लगा डर के मारे उसका दिल रुक जायेगा उसने अपनी रही सही हिम्मत जुटाई और दौड़ पड़ा - उसका दिल इतनी तेज़ धड़क रहा था जैसे उछल कर बाहर ही आ जायेगा वो बेतहाशा भागा डर के मारे उसे दिखना भी बंद हो गया था वो चिल्लाना चाहता था पर उसकी आवाज गले मैं ही अटक गई थी वो भागता हुआ सीधे अपने घर के सामने जा पंहुचा उसकी आखरी आस घर आ गया था उसने पुरे जोर से दरवाजा पीटा और वो लगातार दरवाजा पीटता ही गया एक एक पल उसे सदियों के समान लग रही थी कुछ देर बाद दरवाजा खुला सामने उसकी बीवी थी अरे क्या हुआ तुम्हे यह क्या हाल बना रखा है अन्दर आओ अलोक ने कदम बडाये उसकी पत्नी ने उसे सहारा दिया उसे लगा जैसे उसकी पीठ मैं कुछ चुभ रहा है जो उसके मांस को चीर देगा उसने उजाले मैं नजरे घुमाई तो उसकी बीवी के हथेली की जगह वो ही चमचमाते हुए खुर थे और उसके होठो पर वहशी मुस्कराहट अलोक के आँखों के आगे अँधेरा छा गया वो अचेत हो वही आँगन मैं गिर गया



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