कोई नया काम सीखना तब तक बहुत ही मुश्किल या यूँ कह लीजिये कि पहाड़ चढ़ने जैसा लगता है जब तक वह आ ना जाये चाहे वह सायकिल चलाना या स्कूटर सीखना ही क्यों ना हो।मैं यह सोचती हूँ कि जिस तरह यह सबके लिये एक छोटी सी बात होती है क्या मेरे लिये भी उसी तरह थी?बिल्कुल भी नहीं।ना जाने कितना कुछ सहना पड़ा।ना जाने कितने पापड़ बेलने पड़े।मुझे याद है जब 2005 में शिक्षिका के रूप में मेरी प्रथम नियुक्ति शहर से करीब 35 किलोमीटर दूर के गाँव में हुई।कुछ नौकरी पाने की खुशी या जोश ही कह लीजिये कि आनन फानन में मेरे विवाह सालगिरह के उपहार के बहाने एक नयी एक्टिवा आ गयी मेरे घर में।सायकिल चलाया था काॅलेज के समय में इसलिये यह सोचकर सीखने जाने लगी कि यह भी कुछ वैसा ही होगा।पर यह तो बहुत ही मुश्किल लग रहा था।लगा कि खरीद कर गलती कर दिया है पर अब पीछे हट भी नहीं सकती थी।एक ही ट्रैक पर गोल गोल घुमाना तो सीख लिया था पर दिल्ली अभी भी दूर थी।मन में डर बहुत था इसलिये अभी भी बस से ही स्कूल जाती थी।2 वर्ष बाद पास का स्कूल तलाश किया गया और मेरा तबादला घर से 6किमी दूर के स्कूल में ही हो गया।अब मेरे पास कोई बहाना नहीं बचा था क्योंकि दूर के स्कूल में होने पर हमेशा मेरा यह जुमला होता था कि दूरी है,हाइवे है इसलिये डर लगता है और खतरा भी है।पास तो आ गयी थी।पर आत्मविश्वास की इतनी कमी थी कि राज(पतिदेव) बेचारे 2 साल तक मेरे साथ स्कूल आते जाते रहे।हालांकि शहर से बाहर निकलते ही मैं हैंडिल थाम लेती और पतिदेव जी पीछे बैठ जाते।मैं अच्छे से ले जाती।वो स्कूटी लेकर वापस आते।छुट्टी के समय लेकर जाते फिर मैं चलाकर घर लाती।राज में बहुत धैर्य था पर 2 साल बहुत होते हैं धैर्य की परीक्षा के लिये।रोज आॅफिस से उठना भी उनके लिये मुश्किल बनता जा रहा था।आखिरकार उनका धैर्य जवाब दे गया।एक दिन सुबह सुबह बम फटा घर में।साफ साफ दो टूक शब्दों में बोल दिया गया कि अब मैं नहीं जा पाउँगा।तुम्हे ले जाना हो तो ले जाओ नहीं तो कोई व्यवस्था खुद कर लो।मैं मुँह लटकाये बैठी रही।इस बेवफाई की उम्मीद मैंने कभी नहीं की थी इनसे।उधर स्कूल का टाइम हो रहा था इधर ये टस से मस नहीं हो रहे थे।चाभी भी बड़ी बेरुखी से मेरी तरफ फेंक दी गयी थी।मेरे आत्मविश्वास का हाल तो देखिये।उठी,चाभी उठाकर कैबिनेट पर रखा,घर से निकलकर रिक्शाॅ किया।बड़ी मुश्किल से 100रू पर दोपहर तक रुकने को राजी हुआ।मैं स्कूल पहुँचकर पूरे दिन अपनी बेबसी पर कुढ़ती रही और सोचती रही कि क्या सचमें मैं खुद चलाकर नहीं ले जा सकती?कब तक ऐसा चलता रहेगा।पूरी नौकरी का सवाल है दूसरों पर निर्भरता ठीक नहीं।खुद पर रोना आ रहा था।मैं ज्यादा धार्मिक नहीं हूँ पर मैं उन दिनों में सभी देवी देवताओं को भी याद करने और उनकी शक्तियों को आजमाने लगी थी।कुछ तो करो भगवन्।मेरी लाज रख लो।अब तो आस पड़ोस के लोग भी हम पर हँसने लगे थे।मैं करती भी क्या?कुछ चीजें किसी के बस में नही होती।अब तो शायद भगवान ने भी यह सोचकर मुझसे मुँह फेर लिया था कि तुम्हारी समस्या तुम ही जानो।मैं नहीं कर सकता कुछ।खैर एक रिक्शा वाला खोजा गया कुछ महीनों के लिये।यह सोचकर कि इतने समय में तो मैं खूब प्रैक्टिस करके पक्की हो जाउँगी।हालाँकि रिक्शे से समय भी बर्बाद होता और उसके नखरे अलग से।इन्तेहा तो तब हो गयी जब एक दिन वापसी में स्कूल के पास ही रिक्शे की रिम टूट गयी।पति को फोन मिलाया पर नेटवर्क की समस्या?फिर क्या था.... आगे आगे रिक्शा ढकेलता रिक्शेवाला पीछे पीछे बैग सम्हाले मैं।2 दिन तक पैरदर्द के कारण स्कूल जाने के काबिल नहीं रही।आखिरकार राज पसीजे।फिर वही पुराना रुटीन शुरू हुआ।पर समस्या वही की वही।कब तक ऐसे?
एक बार माँ ने बताया था कि "या देवि सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता..."मंत्र का जाप करने से मन को शक्ति मिलती है और भय जाता है।मरती क्या ना करती।विज्ञान की शिक्षिका हूँ। इन सब बातों पर कभी विश्वास नहीं था पर आखिरी हथियार के रूप में मैंने इसे भी इस्तेमाल किया।दिन रात इसी तनाव में जी रही थी कि वह आत्मविश्वास कहाँ से लाऊँ?मैंने उठते बैठते काम करते इस मंत्र का भी कई बार जाप किया और दिल से,पूरी श्रद्धा से किया।शायद कुछ असर हुआ पर अप्रत्यक्ष रूप में।मैं एक दिन रोज की तरह ही स्कूल के लिये निकली।शहर की भीड़ वाले इलाके से निकलते ही राज ने स्कूटी रोकी।मैंने आगे की सीट सम्हाल कर स्टार्ट किया और चल पड़ी।पर असली परीक्षा अभी बाकी थी।भगवान को मेरे तनाव कुछ कम लग रहे थे शायद।लगभग आधी दूरी तक जाने पर पता लगा कि पीछे की सीट पर कोई है ही नहीं।मैं अकेली ही हूँ।यह क्या हो गया मेरे साथ?पतिदेव जी कहाँ छूट गये?मैं रास्ते भर बात भी करती रही पर यह क्यों नहीं सोचा कि पीछे से कोई जवाब या प्रतिक्रिया क्यों नहीं आ रही?विकट समस्या यह थी कि अब क्या करूँ?आगे जाया जाये या पीछे लौटा जाये?रोक दिया तो पता नहीं फिर स्टार्ट कर पाऊँ या नहीं?भारी कशमकश के बाद आखिर अपने जीवन का बहुत बड़ा फैसला लिया कि अब आधी दूर तो आ ही गयी हूँ तो आगे ही चला जाये।वापसी का वापसी में ही देखा जायेगा।हँसिये मत।जीवन का बड़ा फैसला इस लिये कह रही हूँ कि शायद इसी फैसले ने मुझमें बहुत बड़ी हिम्मत भरी।और मेरे जीवन को एक सकारात्मक दिशा दी।राम राम करते रास्ते भर यही मनाती रही कि सामने कुछ ना आये।ना ही इंसान ना ही जानवर और ना ही ट्रैक्टर मोटरसायकिल।शायद आज ऊपर वाला भी कुछ सोच कर बैठा था इसलिये पूरा रास्ता जैसे मेरे लिये ही खाली कर दिया गया था।निश्चित था कि आज कुछ तो नया हो रहा था मेरे साथ।आज की पूरी स्क्रिप्ट बहुत सोचसमझ कर लिखी थी उस परमशक्ति ने।
मैं जब अपने गाँव में पहुँची तो मेरे एक साथी शिक्षक मुख्य सड़क पर ही मेरा इंतजार करते मिल गये।उन्होंने स्कूटी अपने कब्जे में करली।शायद राज ने पहले ही उन्हे सूचित कर दिया था कि आज मैं अकेली ही आ रही हूँ।पूरा स्टाफ बहुत चिंतित था मेरे लिये।मेरे पहुँचने पर सबने चैन की साँस ली पर मेरा गुस्सा सातवें आसमान पर था यह सोचकर कि शायद इन्होने जानबूझकर मेरे साथ यह खेल किया।अगर मुझे कुछ हो जाता तो?गुस्से में ही मैंने फोन लगाया।तुरंत उठा फोन।मेरे कुछ बोलने से पहले ही उधर से राज की आवाज आयी"गुस्सा मत होना प्लीज।मैं आवाज देता रहा और तुम स्टार्ट करके चली गयीं।मैं बैठ भी नहीं पाया था।क्या करता?पर जो कुछ हुआ अच्छा ही हुआ।देखो आज तुम अकेली ही ले गयीं।कोई परेशानी हुई क्या?नहीं ना।खामख्वाह डर था तुम्हारे मन में।"अब कैसे बताती कि रास्ते भर कैसे मेरी जान अटकी रही।पर इनकी बातें सुनकर गुस्सा ना जाने कहाँ चला गया।सही ही तो कह रहे थे।थोड़ा शान्ति से सोचा तो लगा कि यह खेल इन्होंने नहीं किसी और ने ही किया था।यह चमत्कार किसी शक्ति से ही था।शायद ऊपर वाला भी मेरी दयनीय स्थिति देखकर तरस खा गया था।खैर छुट्टी में भी मैं खुद ही डरते डरते आयी।और दूसरे दिन भी राज को खुद ही मना कर दिया साथ जाने से यह कहते हुये कि फोन स्विचआॅफ ना रखना ,बस।आज करीब 15 साल हो गये हैं इस घटना को।यद्यपि कई बार दुर्घटना में चोट भी लग चुकी है पर आत्मविश्वास में कभी नहीं डिगा।सदैव मेरी इच्छासूची में दो कार्य बेहद कठिन रहे हैं जो मेरे लिये असंभव से लगते रहे हैं।एक तो इंगलिश स्पीकिंग और दूसरा ड्राइविंग।जो आज तक नहीं हो पाया।बस इसी तरह के कुछ और चमत्कारों की दरकार है ऊपर वाले से।अगर ऐसा हो गया तो मैं यह दोनों उपलब्धियाँ भी शायद हासिल कर सकूँ कभी।कोशिश तो मुझे ही करनी होगी पर स्क्रिप्ट वो लिखेगा।
बाद में मैंने कई नये सीखने वालों को यह कहकर हौसला दिया कि जब मैं सीख सकती हूँ तो कोई भी सीख सकता है।सच है जीवन में चमत्कार कहीं भी कभी भी हो सकता है।मैंने उसी दिन परमशक्ति के अस्तित्व का अनुभव किया।यह मात्र संयोग भी हो सकता है पर संयोग भी तो यूँ ही नहीं हुआ करते।ना जाने क्यों यह घटना मुझे एक चमत्कार का संकेत करती है।

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