- हेमंत शेष की कुछ पुरानी कविताएं-

जब-जब मैं शहर जाऊँगा ---------------------------------------

जब मैं शहर जाऊँगा अफवाह की तरह लौट आऊँगा पहले से बिल्कुल भिन्न और बदला हुआ

कपडे़ बदलते हुए सोचूँगा अभाव में जीवित रहते हुए जमाना कितना बदल गया

खुदाई से क्या निकलेगा इस घर से अगर सभ्यता नष्ट हुई

जब जब जाता हूँ घर से शहर सवाल लिए लौटता हूँ शहर से घर

शायद कभी कविता के अक्षर उनका उत्तर दें जाने और लौट कर आने के बीच क्या है शहर का सच और अफ़वाह क्या ?

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चिड़िया -------------------------------------

काल का कौन-सा भाग एक उड़ती हुए चिड़िया के पंखों का 'समय' होता है ?

आकाश सिर्फ़ धारणा नहीं है

वह हवा ही की तरह एक सच है अनन्त तक जाता हुआ जिसके बीच कुछ ज़रूरी पड़ाव हैं पानी और भूख और ऊर्जा और ईंधन के

मृत्यु की परछाँई से बेख़बर पेड़ और पहाड़ के अन्तर से अनजान, अपनी अनश्वरता के उत्सव में भूल कर अपना चिड़ियापन, नश्वर अचानक विलीन हो जाती है जब वह आकाश में याद दिलाते- हमें हमारा यों मनुष्य होना। ***

होना, न होना ---------------------------

जीवन में अब जो-जो आएगा किस लोक का हिस्सा होगा ?

कहाँ रखेंगे हम- आगत और व्यतीत ? कैसे होंगे हमारे चेहरे, कैसा बालों का रंग? त्वचा में न जुड़ पाएँगे कुछ और जन्मदिन

आवाजें अटल थीं, रहेंगी| पृथ्वी की तरह शायद कभी देखें- हम भी अपनी चिन्ताओं का परिष्कार| दीप्त होंगी हमारी सूरतें संस्मरणों के आलोक से.... कभी होंगे विपन्न, अपनी अधूरी इच्छाओं और कभी प्रफुल्लित, अपनी उपलब्धियों के लिए|

समय के प्रति अनन्त तक अनुगृहीत हमारे भीतर एक प्रार्थनारत आदमी जागा हुआ होगा वही बतलाएगा- अब सोने का वक्त हो गया, मित्रो

सोओ, ताकि जाग सको भविष्य में|

रवि जैन , पर ऐसी नींद एक दुर्घटना है - वर्तमान और भविष्य - दोनों को अतीत में तब्दील करने की ....

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मिलना ------------------------

कितने साल हुए मित्रो हमें एक-दूसरे से मिले हुए सब की घड़ियाँ पीछे चल रही हैं समय से

अनुपस्थिति- जहाँ भी है हमारे भीतर- एक शून्य की तरह खाली है- वह जगह!

वहाँ विरह में गुज़ारे गए चुपचाप एकांत की सजावट है और पिछली बहुत सारी घटनाओं का हिसाब-किताब

आसमान का रंग बदला हुआ है कमरों से बाहर और डालियों से झर कर पत्ते बिछ गए हैं दालान में

कुर्सियों पर कौन बैठेगा हाथों में थामे हुए चाय के कप

अख़बार में दुर्घटनाओं की खबरें रोज़ छपती हैं हर सुबह आप पढ़ते हैं खून में छपे शब्द

कुर्सियाँ इन्तजार में ख़ाली हैं- हमारे भीतर एक अच्छे मुहूर्त की तरह

मित्रो! जल्दी ही हमें एक-दूसरे से मिलना चाहिए |

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घर लौटना ----------------------------------------

कोहरे और ओस से भरे दिनों को याद करता हूँ जैसे मैं फिर लौटता हूँ घर अकेला और निरुपाय पीछे छोड़ कर अपना असबाब

बन्द हैं दरवाज़े और चिड़ियों के चहचहाने की ध्वनि आ रही है सीढ़ियों को न जाने किसका इंतज़ार है

मुरझाती हुर्इ्र दूब और ज़मीन पर गिरते हुए पत्तों पर चल कर मुझे कहीं पहुँचना था

याद करता हूँ बचपन के पहले स्कूल की घंटी का स्वर खुल जाते हैं मुझ में पढ़ी जा चुकी किताबों के मुखपृष्ठ एक अदृश्य हाथ मेरे कंधे छू लेता है कपड़े वैसे ही तह किए मिलते हैं घर लौटने पर रसोई में उड़ रही होती है बासमती चावल पकने की सुगंध जो सारे शहर को अपनी गिरफ्त में ले लेती है

मुझे याद नहीं मैं कहाँ जाने के लिए निकला था कहाँ तक आ गया

घर न जाने कैसा आश्चर्यलोक है जहाँ से चलता हूँ

हर बार कविता में बस वहीं लौट आता हूँ

बतलाएगा कौन कि घर से जाने और लौट कर घर आने के बीच आखिर मैं कहाँ होता हूँ ?

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अर्थात एक ज़रूरी काम -------------------------------------

महाकाव्यों के दिन हवा हुए| आज दिन भर बस मैं एक कुतिया का पीछा करूंगा कहाँ जाती है क्या खाती क्या सूँघती है किस पर भोंकती किस पर गुर्राती है किस के तलवे चाटती है किस से इश्क लड़ाती है

आगे-आगे चलेगी कुतिया पीछे-पीछे कविता|

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निमिष के लिए कविता ------------------------------------------------

बचपन में बच्चा एक नसीहत है- प्रौढ़ चेहरों में बदलते हुए पत्थरों के लिए

क्षमा में सब कुछ भूलना उसकी सम्पत्ति है जिस आदत के लिए तरस जाना हमारी नियति

एक बच्चे को याद रखने के पाठ सौंपते हुए हम क्रूरता और बेवकूफ़ी, दोनों को साधते हैं- उसकी अर्थ भरी मुस्कान के विवेक से डरते हुए

हमें किसी दिन बन्द कर देना चाहिए- यों बिना परिश्रम बड़े होना और कहलाना ।

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यक्ष-प्रश्न -------------------------------------

घर लौट कर देखता हूँ बदला हुआ नक़्शा बिखरे हुए खिलौने जमा दिये हैं किसी ने

नल टपक रहा है रोशनियाँ ग़ायब और सन्नाटा....

निस्तब्ध फ़र्श पर गिरा है अभी-अभी चिड़िया का नन्हा-सा एक भूरा पंख

ज़रूर कोई रहता होगा यहाँ पिछले जन्म में

चाहता हूँ बार-बार जानना मेरा वह हमशक्ल आखि़र कौन है ?

कौन हैं आप ? पूछता हूँ

गूँजता प्रतिप्रश्न आप कौन हैं ? कौन हैं ?

प्रश्नकर्त्ता, घर और मैं अनेक जन्मों से तीनों मौन हैं।

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अकेला होना

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हिल गया हूँ

दृश्य में|

लौट कर

पीछे

छूटती सड़क

पर

फिर

अचानक- पेड़ |

घिरती आ रही है शाम.

-पक्षी है

कि कोई अनखुली सी गाँठ?

सोचता हूँ मैं अकेला-

इस समूचे खेल में यह दृश्य है क्या शह

या फिर

हमारी मात.

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इतना पास अपने

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इतना पास अपने कि बस धुंध में हूँ

गिर गए सारे पराजित-पत्र

वृक्ष-साधु

और चीलें, हतप्रभ

“हो कहाँ अब लौट आओ”- सुन रहा अपनी पुकारें

आवाज़ एक अंधा कुआं है, जल नहीं जिसमें बरस हैं

बस

जो गया- वह मृत्यु था

जो नया, वह बचा है - जल |

सुन रहा अपनी पुकारें मैं निरंतर-

दोगे किन्हें

ये पुराने स्वप्न-

अपने बाद, यायावर ?

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हवा नहीं हूँ , फिर भी चला हूँ

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खो चुके अक्षर पुराने, शब्द सारे गुम

हूँ नहीं उस दृश्य में, फिर भी नया हूँ

कैसा ये संसार हमारे हृदयों को छीलता सा

मोड़ से पुकारता कोई हमारा नाम

क्या हमारे थे चेहरे

जो चल कर साथ आये कौन से थे वे लोग जो बिसरा दिए

एक घड़ी उलटी अब निरंतर चल रही है

क्या समय है यह या कि कोई प्रश्न

याद नहीं रह गए पाठ

पुराने पहाड़े

धुंध गहरी-

और….. मदरसा बंद !

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वही पत्थर

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हां, वही पत्थर

जो कभी टूटता था महाकवि के हृदय पर

मैं भी शमशेर बहादुर सिंह के पत्थर को थोड़ा बहुत जानता हूँ

अगर एक कवि हूँ –

जानना ही चाहिए मुझे अन्य को भी अपनी ही तरह

अगर महाकवि होने की आकांक्षा में हूँ तो

अब तक कभी का टूट जाना था

पहले

शमशेर बहादुर सिंह से पहले वही पत्थर

मेरे हृदय पर!

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वृक्ष

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तुम्हारी हँसी में एक छायादार वृक्ष खड़ा है|

अँधेरा घिरता है आजकल बहुत जल्दी

और पक्षी डालियों पर लटकी अंधेरी गांठों जैसे दिखते हैं|

एक बहुत लम्बी सीली हुई सुरंग के मुहाने पर

मैं किसी के आगमन का इंतजार कर रहा होता हूँ|

उचटी उजड़ी नींदों में सूखे पत्ते उड़ते हैं

उड़ते चले जाते हैं |

अपनी देहों की नम घास को उलान्घते हुए

प्रेम में हम कहीं के कहीं चले जाते हैं|

आसमान से गिरते हुए बर्फ के पत्थरों से

याद आ जाती हैं कुछ लम्बी दुपहरियां

छोटी-छोटी छतें और घर के गमलों में रोपे गए

संतुष्ट दिन|

अनंत की खिड़की पर खड़े हुए मैं कहीं उड़ जाना चाहता हूँ|

मुझे बस यहीं रोकना -

एक उजास भरे आसमान की तरफ उगे घने छायादार पेड़|

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नींदड़-बेनाड़

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किस अक्षांश और देशांतर में बसा है ये ‘नींदड़-बेनाड़’ ?

पश्चिम रेलवे की पथराई पीली पट्टी है इस के ठहरे हुए भाग्यचक्र में- नींदड़-बेनाड़ समुद्र तल से ऊंचाई २१० मीटर

किसे आया होगा इन दो गांवों के लिए एक रेलवे-स्टेशन बनाने का विचार? हलचल के नाम पर सिर्फ दो थकी हुई सवारी गाड़ियाँ और पांच मालगाड़ियां कभी भी तबादले पर अन्यत्र न गया एक ठन्डे मूर्तिशिल्प जैसा स्टेशन-मास्टर (जो सवारियों को टिकट भी बेचता है) यहाँ प्लेटफार्म टिकट आज तक किसी ने नहीं लिया सरकारी बरामदे में एक आवारा गाय उकताई सी खड़ी है टी बी से लगातार खांसता एक पैटमैन है – हड़मान एक अधेड़ काला सिग्नलमैन श्योराम हमेशा नीली कमीज़ में रहने वाला कल्या जमादार जिसका काम लालटेन के कांचों को चमकाना है ताकि हरी रोशनी बहुत दूर से चमक जाए और दूसरी तेज़ रफ़्तार गाड़ियों को नींदड़-बेनाड़ की उपस्थिति से कोई खलल न पड़े

जा चुकी है शाम की आख़िरी डाक-गाड़ी भी और हरी–लाल झंडियाँ एक बण्डल के रूप में अब पुरानी जगह अपने निर्धारित कोने में खड़ी हैं

धुन्धुआती हैं दूर दो-चार पीली रोशनियाँ डूबते हैं अन्धकार में रेलवे के गिने चुने घर कोई जानता नहीं मुसाफिरखाने की घड़ी की सुइयां कब से रुकी हुई हैं सन्नाटा| अकेलापन| अनमने से तीन पेड़| अवसाद के काले धब्बे | पगडंडी सुनसान| समुद्र तल से ऊंचाई २१० मीटर|

बहुत कुछ इसी शैली में मेरे भीतर भी हमेशा रहता है कोई एक नींदड़-बेनाड़ !

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एक आसान-सी कविता --------------------------------

जिस जगह थी उसी जगह होगी वह जगह

वहाँ हवा भी होगी हवा जैसी

उसी तरह फूल खिलेंगे जैसे फूल खिलते हैं लोग होंगे लोगों जैसे और उदासी जैसी उनकी उदासियाँ

आत्मा की घास पर काँप रहा होगा एक पत्ता जिसे अगर कविता का नाम दें तो बात समझने में शायद आसानी रहे

आसानी जैसी हल्की-फुल्की चीज़ हर जगह है अगर तुम उसे खोज सको हर बात में हवा और घास में फूल में लोगों की उदासी में

जैसे वह और कुछ नहीं बस कोई पत्ता हो- कविता का!

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अमूर्त खबर --------------

हड्डियों की बातचीत हर पल खडखड़ाती है हर खात्मे की शुरुआत के बाद जीवन की रकाबी में कुतर रहा है हमें एक बीभत्स दांत गुर्राती है वह जगह जहाँ हमें होना था लो- खून से सने होंठ - तुम्हें लौटा दूं... एक दुधारी खंजर लटका है एन सर पर दिन अपनी भेड़िया- आँखों से ताकता है| सड़कों पर रक्त के झरने| गलियों में दुर्गन्ध| बुझा हुआ टीवी| वास्को पोपा की कविता में अब भी भाग रहे आठ पांवों वाले घोड़े! *****

कविता अचानक ---------------------

तुम्हारी हँसी में एक छायादार वृक्ष खड़ा है| अँधेरा घिरता है आजकल बहुत जल्दी और पक्षी डालियों पर लटकी अंधेरी गांठों जैसे दिखते हैं| एक बहुत लम्बी सीली हुई सुरंग के मुहाने पर मैं किसी के आगमन का इंतजार कर रहा होता हूँ| उचटी उजड़ी नींदों में सूखे पत्ते उड़ते हैं उड़ते चले जाते हैं | अपनी देहों की नम घास को उलान्घते हुए प्रेम में हम कहीं के कहीं चले जाते हैं| आसमान से गिरते हुए बर्फ के पत्थरों से याद आ जाती हैं कुछ लम्बी दुपहरियां छोटी छोटी छतें और घर के गमलों में रोपे गए संतुष्ट दिन| अनंत की खिड़की पर खड़े हुए मैं कहीं उड़ जाना चाहता हूँ| मुझे बस यहीं तो रुकना था |

एक उजास भरे आसमान की तरफ उगे घने छायादार पेड़| ***

सागर-कथा ---------------------------

समुद्र बहुत बड़ा था और सिर्फ़ एक थी नाव समुद्र के बीच था टापू टापू पर था मोतियों का खेत

हर आदमी दूसरे की हत्या कर अँधेरे में पहुँचा किनारे पर

खेता रहा पूरी रात नाव टापू पर सबसे पहले अकेला पहुँच जाने के लिए

हरेक ने देखा सूर्योदय पर नहीं बची थी तिल धरने की जगह टापू पर लोग ही लोग थे वे सब भी जो मारे जा चुके थे

जितने लोग थे उतनी ही थी नावें और टापू भी कैसा विलक्षण हर चीज़ थी वहाँ, हर चीज़

अगर नहीं था तो बस वही

एक- मोतियों का खेत !

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हवामहल ----------

कहाँ गए भांड भड़वे रंडियां सारंगिये मसखरे बहरूपिए कलावंत सन्यासी पहलवान और शिकारी ? नहीं है उनकी ओखलियों डोलचियों तंबूरों धनुषों घुंघरुओं का अता-पता |

ऊबे उकताए चेहरों वाले सैलानी दिख जाते हैं इस ‘मोखे’ से टिकिट-खिड़की के सामने क़तार में लगे- एक खोई हुई दुनिया को नाकामी से खोजते हुए |

बस कुछ सुनसान अलंकृत दालानों में पड़ी रहती हैं घने गहरे होते अतीत की हताश छायाएं |

कभी नहीं टूटती है चक्करदार सीढ़ियों पर सेंडिलों जूतों या

कविता की किसी भी चीख से नृशंस इतिहास की नींद!

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जयगढ़ के बहाने

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प्रिय विद्याधर, आप किस लोक में हैं ?

शस्त्र और शास्त्र दोनों अंततः हार ही जाते हैं और पुराने किलों के बुर्ज टिकट-खिड़कियों में बदल दिए जाते हैं

सिर्फ लोहा बूढ़ा होता है कपाटों का और काल-भैरव का अट्टहास गूंजता रहता है- बरसों तक बाद की ठहरी हुई हवाओं में।

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रामनिवास बाग़ --------------------

पूरे अट्ठारह साल बाद एक मुरझाते हुए बगीचे के कम व्यस्त कोने में फिर बैठा दिखा मैं यों अपने आपको: बेहद साधारण और अतिशय फुर्सत में रहने वाला निहायत अज्ञात पिचके गालों वाला निश्चिन्त कॉलेज-विद्यार्थी

सूखती हुई घास थी पिघलती हुई और जल रहा था पानी पेड़ों ने छोड़ दीं थी जड़ें और वे बिल्कुल मनुष्यों जैसे थे लाचार और सत्वहीन

सड़क के उस पार और फैंस के इधर एक लड़की थी एम ए की क्लास में मेरे साथ पढ़ी मेरे ठीक सामने चाय की पुरानी दुकान पर अपनी वाचाल माँ को मूर्ख बना कर शहर की तमाम अटपटी जगहों में जो लगभग हर दिन अपने उस प्रेमी से मिलने आया करती थी जिसका हुलिया पांचवीं और छठी पंक्ति में वर्णित है।

मूंगफलियों के छिलकों में बिखरा था समाज। कचरे के ढेर में पड़ी थीं दिनचर्याएँ। पत्तों में उड़ रहा था भविष्य मृत्यु हर कहीं थी और कहीं नहीं थी चाय के शीशे में अचानक दिखा सिर पर सफेद बाल एक काव्य-बिम्ब उभरा और डूबा

अचानक याद आया अपनी बेटी का चेहरा अचानक मैं हुआ उदास अचानक चाहा इस सब पर कविता लिखूँ

सफेद होते बालों वाले अपनी बेटी का भविष्य सोचते एक उदास आदमी की बदली हुई शक्ल में देख कर खुद को अट्ठारह साल पुराने एक मुरझाए हुए बगीचे में भूतपूर्व प्रेमिका को जहन में रखते मैंने प्रेम-कविता लिखी -

पूरे अट्ठारह साल बाद उसी बगीचे से बाहर आ कर।

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यमुना

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अनगिनत मन्दिर-शिखर शहतीरों की तरह जिस की आकाश-रेखा पर उग आए हैं उसी पौराणिक शहर में कंस के किले तक आ कर वह थोड़ी और दुबली थोड़ी थकी थोड़ी क्षिप्र लग रही है कृष्णप्रिया नदी

शाम यों घिरती है जैसे चढ़ता हो भांग का नशा संधिप्रकाश रात में डूब रहा है मथुरा का आसमान डूब रहे चूरण चटनी के ठेले धर्मशालाओं के गुजराती नामपट्ट डूब रहा गलियों का कादा-कीच देव-प्रतिमाओं से उतार कर सड़क पर फेंकी गई मालाएं भजन बजा रहा एक ग्रामीण बैन्ड दंड बैठक करते जवान प्रवचन करता मुश्टंड भागवताचार्य ब्रजवासी भिखमंगे कोढ़ी ललमुंहे वानर गोरे दूधिया चेहरों को मलमल की चादर में लिपेटे स्त्रियां सब के सब डूब रहे हैं

बजते हुए घंटे घड़ियालों के बीच डूब कर बुझ जाने से पहले तीर्थयात्रियों द्वारा बहाए गए सेंकड़ों दीप लाखों साल पहले के पानी पर इस तरह दिप रहे हैं जैसे पानी पर खींच दी हो किसी ने एक बहुत लम्बी अग्निरेखा

पुराना यह बंगाली घाट जहां शिनाख्त के लिए भरी दुपहर पुलिस वाले एक लावारिस शव को सीधा कर रहे थे होती हुई रात में अघाए हुए सांड और पंडे सुस्ता रहे हैं साथ-साथ

तट से बांध कर ज्यों अपनी रोजी रोटी इन नावों के मालिक धीवर और मल्लाह घर लौट गए हैं नदी के भरोसे पुरानी नौकाएं इस घाट पर किसी औरत की साड़ी के पल्लू में बंधे सिक्कों जैसी हैं

बुझ गया है रेल का वह पुल जिस पर से गुजरते चिंघाड़ते डीजल इंजन तीर्थयात्रियों को दूर ले जा रहे हैं खिड़कियों से निकाल कर सिर और हाथ वे अब उसी पानी में फेंक रहे हैं पैसे जिस में उन्होंने कल स्नान कर के धोए थे अपनी आत्माओं के कलुष जाने अनजाने पाप

अजस्र यह काली जलधार एक बहती हुई प्रायश्चित्त-महारेखा जो एक विराट् क्षमादान की तरह सदियों से बह रही है लगातार अस्त होते दिन की आखिरी आरती पूरी हो रही है विश्राम-घाट पर

कितना कम जानते हैं हम नदियों को कितना छोटा है हमारे दुःखों का संसार

घिरते हुए अंधेरे में अकेला बिजली के तारों पर पथराए हुए सैंकड़ों कबूतरों को निरखता यमुना के सदानीरा आंचल से बिना स्नान किए सती बुर्ज की सीढ़ियों से ऊपर चढ़ कर लौट रहा हूं मैं

सोचता हूं कितना कम जानता हूं यमुना के बारे में जो नदी होने के अलावा और भी बहुत कुछ है

उस का यह अतिरिक्त वह और बहुत कुछ होना क्या है शायद जानता हो सिर्फ इसका जल।

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लालटेन -------------------------------

दूर से जलते हुए केसरिया धब्बे की तरह दिपती थी वह

अगणित थे उसके होने के मायने- पिघलती हुई आर्द्र रोशनी में पास-पास बैठना और दीवार पर देर रात तक काँपती हुई परछाइयों को ताकते रहना

उसी के जलने से शुरू होती थी रोमांचक क़िस्से-कहानियों की रात सुख-दुःख की घड़ियाँ वह दिखाती थी सिर्फ़ हाथ भर दूर की चीज़ें पर जीवन भर लोग उस पर बेपनाह भरोसा करते थे

ऐसा नहीं कि अब दुनिया में लालटेनों का चलन नहीं है, पर खेद! लालटेन की आकृति में हमारे भीतर बुझ गयी है जिस आत्मीयता की लौ, सिर्फ़ किसी पछतावे भर से फिर नहीं जलाया जा सकता उसे।

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कुलधरा --------------------------------------------------------------------------------------

हमने कहीं देखे थे

वे घर

जिनमें अब कोई नहीं रहता

खुले पड़े दरवाज़े किस का इन्तजार थे और

सूखे हुए

पीपल के पत्ते सीढ़ियों का ढाँपे हुए

न सत्कार में जुड़े उनके हाथ नमस्कार थे

न किसी मेहमान का आगमन

एक खुशी भरी हलकी चीख़

किसी के लिए भी घर में

नहीं बन रही थी चाय

न संसार के किसी भी डाक-बक्से में कोई अपनी

चिट्ठी उस पते पर डाल रहा था

घर के बच्चे

वापस कभी न लौटने को ही

गये थे अपने बस्तों और जहाज़ों के साथ

रसोईघर एक बुझा हुआ चूल्हा था

जो साथ न ले जाया जा सका था

चुप्पी एक आवाज़ थी कमरों में बराबर

गश्त लगाती हुई

दीमकों ने निर्मित कर लिए थे

बिल और

वे

बराबर सक्रिय थीं फ़र्श पर

हमारे ठीक सामने

ठहरा हुआ था

राख जैसी हवा का डंक

हमने पाया

दरवाज़ों का बंद होना ताकि

खोल सके कोई उन्हें हमारे लिए

हमने सुनी ख़ुशी

जो हमारे आने से घर में जगी

हमने पी चाय जो निस्सन्देह बहुत स्वादिष्ट थी

बच्चों के गालों को छुआ

चूल्हे पर उतरती हुई गर्म रोटी को सूँघा

फिर सूने घरों में रहने वाले अदृश्य लोग

उन दीमकों को देख कर रो पड़े

फ़र्श पर कहीं नहीं थे

जिनके बिल.

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(टिप्पणी: जैसलमेर का एक उजड़ा हुआ गाँव है कुलधरा ) *******

त्रिभुवन एक पत्रकार नहीं

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अगर त्रिभुवन एक पत्रकार है

तो हमेशा की तरह खबर के पीछे क्यों है

किसी पांचतारा बार में क्यों नहीं

वह रोज़ रोज़ रोज़ रोज़ मुफ्त की शराब पी कर

हर एक को गालियां क्यों नहीं बकता फिरता

उस का पेट किसी ड्रम जैसा फूला हुआ क्यों नहीं

उस ने मुख्यमंत्री से मिल कर

अपने लिए सरकारी मकान क्यों नहीं हथिया लिया अब तक

वह नेताओं को धमकियां और अफसरों को घुड़कियां क्यों नहीं देता

वह रोज़ रोज़ पार्टियों में क्यों नहीं जाता

वह बस में टिकट खरीद कर यात्रा क्यों करता है

आखिर क्यों बिना पास के भी वह संगीत सुनने जाता है

सिनेमा देखता है तो पैसे दे कर क्यों

वह अपनी रिपोर्टिंग के खुद प्रूफ क्यों देखता है

क्यों उसने किसी सेठ किसी पुलिसिए

किसी भूमाफिया सरगने से दोस्ती नहीं गांठी

कितने जूनियर लिखते हैं उस के नाम से छपने वाली खबर

वह संवाददाता सम्मेलन में सब से आगे क्यों नहीं बैठा दिखता

वह शूद्र की व्यथा पर कविताएं क्यों लिखता है?

कैसा और काहे का पत्रकार है त्रिभुवन?

***

स्मृति २०१५

----------------------------------------------------------- यह कौन सा दिन है मेरे भीतर झिलमिलाता हुआ ? क्या यह एक प्रतीक्षा है किसी प्रेम के अँधेरे की, जिसमें तुम एक उजाले की शक्ल में दिखती हो, स्मृति ? बीते हुए कुछ मौसमों और भविष्य के काठ को छीलता हुआ समय हमारी इच्छाओं का काल है। एक बहुत लम्बा कछार, जिसमें बदलती हुई सूरतों के दरख्त हिलते हैं। पराजय, घास नहीं हो सकती। न वह पत्ता, जो मन के कुंड में किसी अपरिचित वर्तमान से झरता हो धुन्ध लगातार उड़ती है और बादल पानी के बोझ से फट कर बरसते हैं। कत्थई दिशाओं को इन्तजार का सरोंता काटता है। रेत के अंतिम छोर पर हिलता है गहरा केसरिया रंग। निश्चय ही वहाँ बुझते हुए जुगनुओं के दिये टिमटिमाते होंगे। पवित्रता एक शब्द ही है देह के सागर की कोई अनन्त तरंग। स्पर्शों के भीतर चले जाते हैं कुछ बेचैन और उदास वार। सुलता है एकान्त। उड़ कर जाती हुई चिड़िया की पीली चहचहाहट। पानी उलीचती हुई नाव हरे कच्चे सिंघाड़ों के तालाब को काटती है। बार-बार चिट्ठियों की बाट जोहना। शुभकामनाओं के वाक्य। रसीला और कुछ आर्द्र बहता रहता है हमारे भीतर। स्वाद के किनारे वह जो खड़ा है- स्तब्ध, जिज्ञासा जैसा, उसी से हमें शुरू करना होता है अपना जीवन| कष्ट कहाँ नहीं है ? प्रसन्नता और सुख दोनों में| शब्द में जो बहुत कुछ अनकहा है, किसी पहाड़-सा, उसी के हाथों में सोंप कर मैं अपना ‘होना’ तुम्हारी तरफ़ चलता दिखता हूँ ख़ुद को... तारीखे़ और वर्ष आँधी में उथल-पुथल होते जाते हैं। कौन बतायेगा लालटेन किधर रखी है ? आखि़र यह क्या है ? क्या ? जिसे सुविधा के लिए हम समय का नाम देना सीखते हैं अपने लिए बचाये गये जीवन में, अगर अँधेरे के भेस में वह एक रोशनी हो।

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मोर्चरी में शव ---------------------------------

निस्तब्ध और ठन्डे एकांत में पड़ी हैं कुछ लावारिस निस्पंद देहें सफ़ेद चादरों से ढंके हैं उनके मुंह जिन पर ताज्जुब शोक खेद हास्य और पछतावे की प्रेत-छायाएं मंडरा रही हैं| उनकी बंद आँखों को किसी भी आगंतुक का इंतज़ार नहीं |

इस मनहूस वार्ड में बस एक ही स्ट्रेचर है- चरमराता| कोने में ऊंघता स्ट्रेचर| जिस पर वे लदेंगे और ठिकाने लगा दिए जाएंगे|

बाहर सड़क पर जीवन बदस्तूर चल रहा है : मारामारी | छीना-झपटी | भागमभाग का जीवन|

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माँ ----------------------------------------

दुर्गम पहाड़ों के परे अबाध झरनों के पार बीहड़ जंगलों के आखिरी किनारे पर अकेली रहती है जो स्त्री वही शायद हम सब की माँ है

हम बहुत-सी चीज़ों को नहीं जानते हम ये भी नहीं जानते माँएँ अपने बच्चों के लिए क्यों दिन रात प्रार्थनाएँ करती हैं नि:शब्द क्यों रखती हैं वे आए दिन व्रत-उपवास और मन्नतें माँगती हैं

निर्जन वन में बिल्कुल अकेले रहते हुए भी कातती हैं दिन-रात वे हमारे लिए संस्कारों का सूत ये कपड़े जो हम लोगों ने पहन रखे हैं और जिन्हें पहन कर हम आज इतना इतरा रहे हैं माँ के काते सूत से ही बने हैं

हमने अर्से से उसे नहीं देखा सिर्फ़ उसके बनाए वस्त्र पहने हैं और उसकी दी हुई भाषा बोली है

सदियों से सोच रहे हैं हम अपनी कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए किसी दिन माँ से मिलने दुर्गम पहाड़ों से परे अबाध झरनों के पार बीहड़ जंगल के आखिरी छोर तक जाएँ

तभी से सामने हैं दो मामूली, किंतु अनुत्तरित सवाल- अपने ‘होने’ की कृतज्ञता के लिए बोलें माँ से किन शब्दों में ? और उपहार में उसके लिए आखिर कौन-सी चीज़ ले जाएँ ? ?

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सार्थकता -------------------------------------

किसी भी क्षण हम कह सकते हैं- देखो! देखते-देखते ये दुनिया कितनी बदल गई

पेड़ों के जिस्म लड़कियों की पोशाकें शहर के चौराहे दुकानों के शटर स्कूलों के परिसर मौसमों का मिजाज़ सिनेमा के पात्र नाटकों के शीर्षक संचार के साधन वार-त्यौहार मनाने के ढंग कस्बों के चेहरे हमारी आदतें और रिश्ते-नाते|

तुम संसार में आखिर किस चीज के सहारे इस शैली में जिन्दा हो ? यह खेल आखि़र कब तक चलेगा ?

यह महज इत्तफ़ाक नहीं बड़े-बूढ़े लोगों की याददाश्त में अब तक सिर्फ़ यही बात सजीव है- पुराने ज़माने कितने सस्ते थे सबसे महंगा कपड़ा भी तब तीन आने गज़ आता था !

नहीं। हमारा यह लक्ष्य नहीं- परिवर्तन के दौर में हम पढ़ी जा चुकी कुछ मामूली चिट्ठियों की तरह फालतू हो जाएँ|

हमें खोजना चाहिए काव्य में, और जीवन में जो-जो समानताएँ हैं, क्या उनके सहारे एक आदमी को पुरानी चिट्ठी में तब्दील होने से बचाया जा सकता है ?

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सुन्दर स्त्रियाँ ---------------------------------

सवेरे से सुन्दर स्त्रियाँ नल पर धो रही हैं वस्त्र सुन्दर स्त्रियाँ बस की कतार में बिना ऊबे घंटों से खड़ी हैं सुन्दर स्त्रियों को शुक्रवार की हाट से खरीदनी है कंघी अपने बालों के लिए सुन्दर स्त्रियाँ सड़क की तेज धूप में भी हाथों में भारी २ थैले लिए बतिया रही हैं सुन्दर स्त्रियाँ चारों तरफ़ खुशनुमा तितलियों की तरह उड़ रही हैं

वे हैं महज स्त्रियाँ- साधारण, भावुक, मामूली और घरेलू जो झगड़ना चाहती हैं पतियों से या गुस्से में भर कर पीटना बच्चों को देर तक चुपचाप रोने से ठीक पहले

स्त्रियाँ सुन्दर हैं- मामूलीपन की खूबसूरती और झगड़ने प्रेम करने धोने उड़ने और रोने की रोज़मर्रा घरेलू दुनिया में |

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अगर रेत कभी समुद्र था!

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लीन होता दिन अँधेरे की स्याही में

भभकती है दूर कोई लालटेन

चलता हूँ

पश्चिम के आकाश की तरफ रेत का समुद्र

निर्जन में बज रहा है कोई कमायचा

एक फफोले सा जीवन

हठ के अनगिनत पर्याय

जीवन वहीं है सूखे हुए तनों और पपड़ाती हुई धरती से फूटता!

एक रंग है लाल जो शाश्वत रेत से उगा है

और सूर्य तक चला गया है

एक आग है जो छाती में जलती है-

कुछ निशानियाँ भी हैं यहाँ और पदचापें

तुम कौन हो और किस उम्मीद में हरे हो ?

नष्ट होने के विरुद्ध काल के सिलबट्टे पर

एक जीवित आश्चर्य है यह जीवन-यात्रा !

जैसलमेर|

हेमंत शेष

40/158, स्वर्ण पथ, मानसरोवर, जयपुर-३०२०२०

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