लोकसभा अटेण्ड करने से ज्यादा मुश्किल है,शोकसभा अटेण्ड करना!

हमारे महान देश के महान प्रतिनिधियों की वजह से, लोकसभा का नजारा हम और आप रात दिन देखते रहते हैं। हालत ये हैए कि हर सांसद को लगता है, कि लोकसभा अटेण्ड करना एक बेहद मुश्किल काम है। एैसा ही दूसरा मुश्किल काम है, शोकसभा अटेण्ड करना। सबसे पहले तो आपके पास एक जोड़ी शुभ सफेद कपड़े होने चाहिए। ताकि लगे कि आप भी शोक में हैं। एक जोड़ी न भी हों तो आधा जोड़ी तो बेहद जरूरी है। पैंट कलर वाली हो मगर शर्ट तो सफेद पहनिए। वरना लोग क्या कहेंगे? फिर समय पर पहुंचना भी आवश्यक होता है जिसके हम आदी नहीं होते। ऊपर जाने वाला भले ही समय पर अपना असबाब समेट कर निकल गया हो, लेकिन हम समय पर पहुंच ही नहीं पाते, क्योंकि उसी दिन, उसी समय हमें अपने 370 गैर जरूरी काम याद आ जाते हैं। कई लोग तो सही कंपनी न मिलने की वजह से नहीं आ पाते। टुम्मन जी मिलें तो जुम्मन जी निकलें, वरना आते-जाते समय रास्ते में बोर होंगे। अब जैसे तैसे पहुंच भी गए, तो सबसे पहले नजरें ये ढूंढ़ती हैं कि कौन कौन नहीं आया? अरे भाई जब हम आए हैं, तो इतना भी पता न करें कि कौन कौन नहीं आया? और सवाल ये भी तो है ना कि सदन की पिछली सीट पर बैठकर बातें क्या करेंगे? जाहिर है, जो नहीं आया उसी की करेंगे। ‘‘बांगडूजी शरद जी के समय तो आए थे, शैल जी के समय नहीं आए?’’ - ‘‘हां भई। बागडू जी व्यंग्य के ज्यादह करीब हैं। हास्य के तो घोर विरोधी हैं अपने बांगडू जी।’’ - ‘‘हां जी। मैंने भी बांगडू जी का एक लेख पढ़ा था - ‘‘व्यंग्य को सजा दो - हास्य को हटा दो’’ - काफी अच्छा लिखा था बांगडू जी ने।’’ अमूमन शोक सभाओं मं गु्रप बनकर निजी बातचीत करने का रिवाज होता है। मंच से बातें नहीं होती। लेकिन कोई व्यक्ति विशेष चला जाए और अलग विधा का हो, तो मंच से भी सब बोलते हैं। काका हाथरसी जी की तो इच्छा ही अनोखी रहीं। श्मशान घर में हास्य कवि सम्मेलन हुआ और ठहाकों के बीच वो हास्य ऋषि रुखसत हुए। तो मंच का कार्यक्रम भी होता है। अब मुश्किल ये कि कौन बोले, कौन न बोले? एैसे समय जिनका स्वर्गवासी व्यक्ति से 100.100 किलोमीटर दूर तक कोई संबंध नहीं होता, वे बोलने के लिए आतुर पाए जाते हैं। तय किए हुए लोग तो खैर बोलते ही हैं लेकिन शिकायती माहौल यहां भी वैसा ही होता है, जैसा किसी अन्य सभा में। ‘‘हमें गलत टाइम पे बुलाया बोलने को’’ - ‘‘वक्त भी कित्ता कम दिया। हम तो साढ़े तीन घंटे की स्पीच लेकर आए थे।’’ - ‘‘ सभा ठीक है, लेकिन संचालक ठीक नहीं है। इसको अकल ही नहीं है कि कब किसको बुलाना और कित्ता टेम देना।’’ - ‘‘ जानेवाला खुद आज यहां होता ना भाई साब, वोे चाहता कि हम 55 मिनट बोलें। सच्ची बोल रहे हैं।’’ -‘‘हमें सुन सुनकर ही तो मरा है।’’ - तो ये तमाम बातें चलती रहती हैं जो आसान नहीं होतीं। कुछ लोग तो अपने व्यक्तिगत रिलेशन कैश भी करना नहीं भूलते। एक साहब को मंच दिया, तो उन्होंने अपने उद्बोधन में सदन में उपस्थित अपने 36 परिचितों का पहले नाम लिया। फिर गेटकीपर, वाॅचमैन, माइकवाले से अपने घनिष्टतम संबंध गिनवाए। इस उठा पटक में वे भूल ही गए कि आज का अवसर क्या है? आयोजन क्या है? और उन्हें किसके बारे में बोलना है। हां 36 और 3त्र39 लोगों को उन्होंने खुश कर दिया, जो जीवनभर उनके काम आएंगे। एक और साहब एक सभा में बोले। पता नहीं किस मानसिकता से आए थो। उन्हें जानेवाले की 998 विशेषताएं याद नहीं रहीं, उसकी दो असफलताओं को बढ़ा चढ़ाकर बताते रहे। लोग अपना सर धुनते रहे और वे शब्दों का जाल बुनते रहे। सफलता-असफलता किसके साथ जुड़ी नहीं होती? जो बोल रहे थे वे भी सैकड़ों मोर्चे पर असफल थे, पर अपनी भड़ास निकाल रहे थे। और मरने वालों के परिजन उनके भी गुजर जाने की कामना कर रहे थे। शोक सभाओं का आयोजन एक रस्म ही सही, एक औपचारिकता ही सही, लेकिन वहां जाकर पता चल जाता है, कि अपना कौन है? पराया कौन ? कौन मन से जुड़ा है , कौन फोटो खिंचवाने आया है और कौन जबरदस्ती का हमदर्द और रिश्तेदार बना हुआ है। अब सवाल ये है कि अगर शोक सभाओं में जाना इतना ही मुश्किल काम है तो लोग शोक सभाओं में जाते ही क्यों हैं? शायद इसलिए, ताकि अपनी संतानों को ये ताकीद करके जा सकें, कि उनकी शोक सभा में उन्हें, किस-किस को बुलाना है और किस-किस को नहीं?

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