दाड़िम

पूरे आठ साल बाद लौट रहा दाड़िम रेल की खिड़की से पीछे छूटते दृश्यों के साथ अतीत की ओर लौटता है -

....... "जा रहे हो ?" "हाँ उरमा , जा रहा .... तुम्हारी खातिर , आने वाले बच्चे की खातिर।"

"सुनो! यही कोई काम धंधा नहीं कर सकते ? मैं भी मजूरी कर लुंगी ; गृहस्थी चल जायेगी ,जैसे तैसे |मत जाओ |"

"नहीं उरमा!यहाँ कुछ नहीं होगा, मजूरी के नाम बेगारी करनी होगी,और फिर कौन सा बहुत दिन के लिए जा रहा चार महीने बाद कटनी पर लौट आऊंगा, हफ्ता दस रोज़ की खातिर।जाने दो मुझे उरमा, बढ़िया नौकरी है, पूरा अट्ठारह सौ की पगार और रहने को खोली। मजे की बात ये की अपने भगत काका की रुक्मिनिया के मरद मनेजर है वहाँ |"

(उरमा निरुत्तर हो दरवाजे की ओट जा लगी है ) ---------------- "चाय! चाय!!" (चायवाले की कर्कश आवाज दाड़िम का सपना तोड़ देती है )

"एक चाय दो भाई" "हम्म" "कितने?" "पांच" "फुटकर दो" "फुटकर तुम्ही रख लो"

(दाड़िम उसको जल्द से भगा के सपने में लौटना चाहता है )

हाथ में चाय का ग्लास लिए दाड़िम खिड़की की रॉड पर सर टिका लेता है |

"सुनो,थोड़े से पैसे हैं हमारे पास, रख लो |अबकी विदाई पर अम्मा ने दिए थे | रख लो, वहाँ भूखे मत रहना | राह में चाय वाय पी लेना |"

"उरमा!पैसे देकर भगा रही हो? हमारे जाते ही अम्मा के घर भाग जाने का इरादा है क्या?"

"धत्त!!"

(दाड़िम अपनी चुहुल पर हो हो करके हंस पड़ता है )

"उरमा सुनो!बेशक चली जाना , अकेले कहाँ रहोगी यहाँ ? किसके सहारे??" "हाँ लेकिन कटिया के दिनों में आ जाना जरूर |" "मैं चाहता हूँ कि जब मैं शाम सात बीस मेल से लौटूं तो काली चौरे पर तुम मुझे लेने आओ |" ...................

"बहुत देर से ठहरी है ये गाडी | आज तो इसने बैलगाड़ी को भी तार दिया |" "हाँ भाई एक तो पहले से चार घंटे लेट है, अब यहाँ सन्नाटे में आ खड़ी हो गयी|"

(खिड़की के पार दूर धुंधलके में एक गाँव दीखता है, दाड़िम की आँखें टिमटिमा जाती हैं ) -------

"सुनो !मैं वहीँ मिलूंगी , काली चौरे पर ही , तुम्हारी प्रतीक्षा में |"

"रात हो गयी तो?"

"तब भी, मेरी लालटेन साथ होगी न !!"

"अब जाने दो , अपना ख़याल रखना और अम्मा के घर को कल सुबह ही निकल जाना |" (दाड़िम मुस्कराता है) ---------- शहर आया दाड़िम हैरान है, हजाहज़ भीड़ .... रुकमिनी का मरद ... उसकी बिल्लौरी आँखें , टेढ़े पीले दांत, पानी के जहाज की उसकी मुनेजरी .... अँधेरी रातों में दरिया का सफ़र , पानी पर उतरते चढ़ते अनजान बक्से | पुलिस / गोली अंधाधुंध भागता उसका जहाज / समंदर के तीन दिन और चार रात नयी रेतीली जमीन / अजीब सी भाषा बोलते लोग मुनेजर की मक्कार आँखें ... दिन / महीने/ साल भागते छिपते ...... ओह!(दाड़िम सर झटकता है )

"मुनेजर ! हम मर जायेंगे अब , घर कैसे लौटेंगे ?" "उरमा ..... उसको तो पता भी न होगा |"

"घबडा मत दाड़िम, किसी तरह छुपते छुपाते दुबई तक पहुँच गए तो समझो बच गए |" .............

बकरियों के झुण्ड / ऊंटों के रेलों में लुकते छिपते आखिर दुबई / दुबई का शेख वापिस भेजने की दिलासा ; मगर पहले सात साल का कॉन्ट्रैक्ट फैक्टरी के भीतर का रहना / खाना सात साल बाद मुलुक वापसी और हाथ में पांच लाख |

(दाड़िम कसमसाता है , पेंट की जेब में पडी सोने की चूड़ियाँ खुनक पड़ती हैं ) ----------------------- (सिग्नल फेल हुआ है तभी तो आगे न जा रही ये गाड़ी / टोपी लगाए गार्ड हाथ में लालटेन ले इंजन की ओर जा रहा ) दाड़िम की आँख में काली चौरा और उरमा की लालटेन चमक उठी

'ओह!उरमा ! कैसी होगी अब तू , तेरा .... हमारा बच्चा अब सात साल का होगा .......'

ट्रेन रेंग पड़ी है / दाड़िम डिब्बे की चाल के साथ हिलता जा रहा

--------- "कुली ! कुली!"

"कौन सा स्टेशन बाबू ?"

"पठखौली |"

"पठखौली??" दाड़िम चिहुक उठता है, जल्दी जल्दी सामान उतारता दाड़िम हैरान है, इतना बदल गया अपना पठखौली ?

दाड़िम हैरान हो स्टेशन के सामने की कच्ची डहर खोजता है ......

"कहाँ जाओगे बाबू?"

"बेदिया पुर "

"बेदियापुर?? पुराने हो का? अब ऊ गाँव का नाम देविया पुर हो गया है, बीस लगेंगे कहाँ उतरोगे ?"

"काली चौरे पर उतार देना |"

"तऊ तुमहू दर्शन खातिर आये हो??" (दाड़िम रिक्शेवाले को अनसुना कर देता है और औचक हो आस-पास देखता है )

कच्ची डहर अब पक्की सड़क बन गयी है .... किनारों के खेतों में फूट आई हैं इमारतें .... ओह यहाँ तो एक कुआँ होता था / ऊंची जगत का कुआँ ..... दाड़िम हिलकते कलेजे के साथ भागा जा रहा काली चौरे का दीया ; उरमा के नाक की महीन लौंग ; लालटेन ...सब मानो टिमटिमा रहे !

"आ गए बाबू |" "सांझ गहरी है , कहो तो गाँव माँ छोड़ दूँ ? एक धरमशाला है |"

"नहीं नहीं , बस |"

दाड़िम, एक बार फिर भौचक होता है , चबूतरे पर बैठी काली माई की जगह अब उस बाग़ में दो दो मंदिर हैं, अंदाजे से एक में सर नवाते हुआ जा घुसा। सामने चबूतरे पर सुपरिचित काली माई को देख अधीर हो सर टिका दिया।

शाम के धुंधलके में मंदिर की नीरवता भंग होने की भनक मिलते ही मंदिर का चौकीदार अन्दर झांकता है।

"कौन गाँव से हो बाबू ?"

"बाहर गाँव "(दाड़िम अपनी पहचान को कुछ और देर छिपाना चाहता है)

"बड़ा भव्य मंदिर है, कब बना ?"

"सात साल हुए बाबू, सामने ऊ मंदिर के साथ ही |"

"सामने किसका मंदिर है?"

कान पर हाथ रखते हुए चौकीदार का उत्तर - "सत्ती माई |"

(दाड़िम आज की रात अपने सपने के काली चौरे के साथ बिताने और सुबह सुबह उरमा को हैरान कर देने की नीयति से चौकीदार के साथ बाहर की चौकी पर आ बैठता है)

"ई सत्ती माई का क्या चक्कर है ?"

"ना ना बाबू ! चक्कर न कहो , बड़ा सिद्ध मंदिर है | सात साल पहले हमरे गाँव की देवी माई यहीं सती भई थीं |कटनी के उन दिनों बम्बई दंगे में माई के पति की अधजली लाश के साथ |"

(दाड़िम अपनी स्मृति में साथ बम्बई निकले चेहरों की तलाश करता है )

"पता है बाबू ...... माई को जैसे पहले से भाखा हुआ रहा हो, सती होने से पहले माई इहाँ इसी काली चौरे पर महीनो पूरी पूरी रात इसी काली चौरे पर अपनी लालटेन के साथ बैठी रहती , मानो उसको पता था की क्या होने वाला है |हर चौमासे आने वाली कटनी पर यहाँ भव्य मेला लगता है, लोग कहते हैं कि उन दिनों माई की लालटेन खुद से भभक के जल उठती है , इहाँ चढ़ावे में छोटे बच्चों के कपडे चढ़ते हैं, माई के पेट में उन दिनों आठ माह का बच्चा था .........".

(चौकीदार किसी गिस्सगो की तरह बोलता जा रहा और दाड़िम है कि घुलता , पिघलता , बिखरता जा रहा )

दाड़िम सत्ती माई के मंदिर में भागता है, टिमटिमाती लालटेन परिचित सी दिखती है, चबूतरे पर लगे पत्थर पर हाथ फेरता है।

माई उरमा देवी , बाबा दाड़िम और उनके अजन्मे बच्चे की पवित्र समाधि 18 अप्रैल सन 1984

सत्ती चौरे की लालटेन भभक पड़ती है, दाड़िम चबूतरे पर निढाल है। ------- आधी रात को चौकीदार गाँव की ओर हांक लगाता भागता है - "दौड़ो | दौड़ो |सत्ती चौरे पर एक परदेशी आया है हालत बहुत खराब है, काका | वैद जी को लाओ |निढाल हो बेसुध है |अभी शाम में आया है | हमसे बात की तो ठीक था , सत्ती चौरे में अकेले घुसा था ........"

सत्ती चौरे पर दाड़िम मुंह के बल गिरा था , सोने की चूड़ियाँ ... बिंदी .. कंगन और एक अदद आठ सेल वाली टोर्च जलती हुयी बिखरी थी आस पास!

चौरे की लालटेन मानो अब बुझी की तब |

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