गुब्बारे और ग़ुबार भाग 1

जब अनिकेत घर पहुंचा तो बहुत थका हुआ था I सुबह से शाम तक ऑफिस की मारा-मारी, उस पर घर लौटते वक़्त दिल्ली की जैम-पैक्ड सड़कें और धीरे-धीरे रेंगता ट्रैफिक – ऐसा लगता है मानो कोई वृद्ध धीरे-धीरे मौत की तरफ रेंग रहा हो ! कितने साल हो गए थे अनिकेत को उसी कम्पनी में काम करते-करते, मगर न जाने क्यूँ अपनी भरसक कोशिशों के बाद भी वो अपने ऊपर के लोगों को ख़ुश नहीं कर पाया था I उसके बाद ज्वाइन करने वाले लोग और जूनियर भी प्रमोशन लेकर आगे बढ़ गए थे I उसे सब कुछ आता था – चमचागिरी के सिवाय I और शायद इसी वज़ह से ज़िन्दगी की दौड़ में वो पीछे रह गया था या फिर ज़िन्दगी की रफ़्तार ही इतनी तेज़ थी वो उससे आगे निकल गयी थी I एक-एक रेड लाइट पर पंद्रह-पंद्रह मिनट का इंतज़ार और ऊपर से बारिश के जाम से उसका दिमाग़ भन्ना गया था I

आज कंपनी बोर्ड-मेम्बर्स की दोपहर को मीटिंग थी और उसे पूरी उम्मीद थी कि आज उसके प्रमोशन की सिफारिश ज़रूर हो जायेगी Iमगर फिर वही हुआ I कम्पनी की माली हालत ठीक न होने का बहाना बनाकर उन्होंने सिर्फ़ एक गुप्ताजी के साले का प्रमोशन किया था, बाक़ी को अगली मीटिंग के अजेंडे के लिए स्थगित कर दिया था I वो जानता था कि अगली मीटिंग में भी कुछ नहीं होने वाला है I ऑफिस में ही उसका दिमाग़ भन्ना गया था और काम करने का मन बिलकुल नहीं था I इसलिए उसने लंच के बाद ही अपना ब्रीफ केस उठाया और घर की तरफ चल पड़ा था I

आज वो ज़ल्दी घर पहुँच गया था I

घर पहुँच कर उसने चाबी ब्रीफ केस से निकाली और दरवाज़ा खोला तो देखा तो अंदर उसका बेटा मनु, जो क़रीब दस साल का था, अकेला ही क्रिकेट खेल रहा था I अक्सर वो ऐसे ही खेलता था – बॉलर, बैट्समैन, फील्डर और अंपायर सब कुछ ख़ुद ही होता था I क्योंकि एक तो अकेला बच्चा, ऊपर से मम्मी-डैडी दोनों जॉब करते थे I स्कूल-बस के स्टॉप से कामवाली उसे ले आती थी I घर की एक चाबी उसके पास रहती थी जिससे वो दरवाज़ा खोलकर मनु को अंदर करके दरवाज़ा फिर से बंद करके अपने दूसरे घरों के काम निपटाने चली जाती थी I कभी-कभी अनिकेत को लगता था कि ये बच्चे के लिए अति हो रही है I मनु स्कूल से आने के बाद कपड़े भी ख़ुद चेंज करता, हाथ मुंह धोता और सो जाता था I शाम के चार-पांच बजे तक कभी मम्मी तो कभी पापा उसे फ़ोन करके उठा देते थे और फिर वो होमवर्क पूरा करके ख़ुद ही खेलने लग जाता था I

न जाने क्यों अनिकेत को उस दिन क्या हो गया था I मनु को खेलता देखकर उसे अच्छा नहीं लगा था और उसे बहुत गुस्सा आ गया था I उसने घर के अंदर घुसते ही मनु से पूछा, “क्यों होम वर्क किया ?”

मनु ने उसकी बात पर ध्यान नहीं दिया और खेलते-खेलते उसकी तरफ बिना देखे अपना बैट हवा में घुमाया और चिल्लाया, “और वो देखो छक्का !”

“मैं तुमसे कुछ पूछ रहा हूँ, “अनिकेत ने कुछ तेज़ आवाज़ में उससे सवाल किया I

पापा की तेज़ आवाज़ सुनकर मनु सहम गया था I उसे यकीन नहीं हो रहा था कि पापा भी इतनी तेज़ आवाज़ में उसे डांट सकते हैं क्योंकि वो उसे बहुत प्यार करते थे, अक्सर उसके साथ खेलते भी थे और यदि कभी मम्मी उसे डांटती थी तो मम्मी को मना करते थे कि उसे डांटे मत I उसने सहम कर पापा की तरफ देखा तो पाया कि पापा का मुंह गुस्से से भरा हुआ था और आँखें बाहर को निकल रही थीं I पापा के इस रूप को, जो उसने पहले कभी नहीं देखा था, देखकर मनु डर गया था I

“बोलो ?” अनिकेत ने उसकी तरफ घूरते हुए पूछा I

“नहीं किया I” मनु धीरे से एक मुजरिम की तरह नीचे देखते हुए फुसफुसाया I

“क्यों?” अनिकेत ने उसके ऊपर दहाड़ते हुए पूछा I

अनिकेत की इस अकस्मात दहाड़ से मनु बहुत घबरा गया था I पहले कुछ देर कुछ नहीं बोला, पापा की तरफ देखता रहा, फिर बोला, “कल छुट्टी है, कल करूंगा I”

“हाँ तो ? कल छुट्टी है, कल दूसरा काम करना I आज क्यूँ नहीं किया ? सारा दिन खेल – बस खेल I” और अनिकेत ने झपट कर उसके हाथ से उसका बैट छीन लिया, फिर उसके ऊपर तानते हुए बोला, “अभी बताता हूँ छुट्टी किसे कहते हैं ?”

अपने ऊपर बैट को आते देख मनु बहुत डर गया I बस इतना ही कह पाया, “पापा !”

“हाँ बोलो ?”
“सू, सू ...”

“क्या हुआ ? निकल गया ?”

“हाँ !” मनु सहमते हुए और सकुचाते हुए बहुत धीरे से कह पाया I

“चलो – बाथरूम में जाकर चेंज करो I” और उसके बाद अनिकेत बैट एकतरफ फेंककर अपने बेडरूम में घुस गया I

*****

बेडरूम में घुसकर अनिकेत दरवाज़ा बंद कर वैसे ही बिना चेंज किये ही लेट गया I उसे पता भी नहीं चला कि कब उसे नींद आ गयी I काफ़ी देर बाद जब उसकी आँख खुली तो शाम हो चुकी थी I उसने घड़ी की तरफ देखा – छ बज रहे थे I दरवाज़ा खोलकर बाहर आया तो मनु भी सोफे पर लेटकर सो रहा था I उसका बैट वहीँ पड़ा था जहाँ उसने फेंका था I उसका सिर बहुत भारी हो रहा था, सोचा जब तक प्राची आये तब तक एक कप चाय पी लूं I चाय के साथ-साथ उसे याद आया की मनु के दूध पीने का टाइम भी हो गया है, इसलिए उसने अपने लिए एक कप चाय और अपने बेटे मनु के लिए एक गिलास दूध तैयार किया I

पहले अनमने दिल से चाय पी और फिर मनु को उठाया I

“लो, दूध पी लो I”

मनु उठा और बिना पापा की तरफ देखे गटागट दूध पीकर अपने रूम में चला गया I

अनिकेत ने देखा कि बच्चा अभी भी सहमा हुआ था और दूध पीते वक़्त डर से उसके हाथ अभी भी कांप रहे थे I

शायद उसे इतनी ज़ोर से उसको डांटना नहीं चाहिए था, उसने सोचा I

*****

उस दिन के बाद घर में अज़ीब सी शांति छा गयी थी I पहले अनिकेत जब भी थका-मांदा घर आता था तो मनु अक्सर खेलता रहता था और उसके आते ही खेलना छोड़कर उसके पैरों से लिपट जाता था तो उसकी सारे दिन की थकान ग़ायब हो जाती थी, मानसिक तनाव छूमंतर हो जाता था और वो हाथ-मुंह धोकर, थोड़ा पानी पीकर उसके साथ खूब खेलता था I थोड़ी देर बाद उसकी पत्नी प्राची भी ऑफिस से आ जाती थी I फिर वो थोड़ा आराम करके मनु को दूध देती और अपने दोनों के लिए चाय बनाती I दूध पीते-पीते मनु खूब बातें करता, कभी स्कूल की और कभी अपने दोस्तों की और जैसे वो आँखें निकाल-निकाल कर चेहरे पर अनेकों प्रकार के भाव ला-ला कर बातें करता तो उसके होठों पर बनी दूध से बनी मूछों का नृत्य देखकर वो दोनों खूब हँसते थे I कितनी ख़ुशी थी घर में I मगर दो-तीन दिनों से लगता था कि घर की हंसी-ख़ुशी कोई लूटकर ले गया था और बदले में छोड़ गया था एक अज़ीब सी शांति – सुनसान सन्नाटा I

एक हफ़्ता बीतते-बीतते प्राची को भी लगने लगा था कि कहीं कुछ गड़बड़ है I बच्चे का स्वभाव अचानक बदल गया है, न अब पहले की खेलता है, न बातें करता है I अचानक क्या हो गया है ?

“सुनो, तुमने कुछ नोट किया ?” प्राची ने सोते समय शनिवार रात को अनिकेत से पूछा I

“क्या ?” अनिकेत ने कुछ उदास स्वर में ज़वाब दिया I हांलांकि उसे पता था कि प्राची किस बारे में बात कर रही है I

“मनु का व्यवहार एकदम कितना बदल गया है I न कुछ बोलता है, न पहले की तरह से खेलता है I जब देखो अपने कमरे में ही रहता है और पढ़ता रहता है या फिर सोता रहता है I” प्राची ने आश्चर्य जताते हुए कहा I

अनिकेत ने कोई ज़वाब नहीं दिया – बस गम्भीता से शून्य में ही देखता रहा I

“और मैं तुम्हें भी देख रही हूँ – कुछ बोलते नहीं I कोई हंसी-मज़ाक नहीं I बस गुमसुम रहते हो और कुछ सोचते रहते हो I क्या ऑफिस में कोई प्रॉब्लम है ?” प्राची ने उसे उकेरते हुए पूछा I

“नहीं...”

“फिर ?”

“सब मेरी वज़ह से हुआ...”

“तुम्हारी वज़ह से ?”

“हाँ I पिछले हफ़्ते मैंने तुम्हें बताया था कि इस साल शायद मेरा प्रमोशन हो जाये – नहीं हुआ !”

“ओह ! कोई बात नहीं...ये सब तो चलता ही रहता है I” प्राची ने अनिकेत को सांत्वना देते हुए कहा I

“उस दिन जब मुझे पता चला कि बोर्ड-मीटिंग में सिर्फ़ गुप्ताजी के साले का प्रमोशन ही किया गया है तो मुझे बहुत गुस्सा आ गया था और मैं बीच में ही काम छोड़कर ऑफिस से घर की ओर चल पड़ा I रास्ते में भी यही सब कुछ सोचता रहा I जब घर आते ही मनु को खेलते हुए देखा तो...” कहते-कहते अनिकेत रुक गया I

प्राची ने उसकी तरफ देखा तो उसकी आँखों में आंसू तैर रहे थे जो किसी भी समय बाहर छलकने को तैयार थे I

“फिर ?” प्राची ने फिर से पूछा I वो जान गयी थी कि बात कुछ गंभीर है I

“फिर, बस न जाने क्यूँ मैंने अपना सारा गुस्सा उस मासूम के ऊपर उतार दिया I मैंने उसको बहुत सख्त आवाज़ में डांटा ही नहीं, उसका बैट छीनकर उसे मारने की कोशिश भी की I लेकिन मैंने अपने आपको रोक तो लिया मगर...” और आंसू उसकी आँखों से छलककर उसके गालों से लुढ़कते हुए नीचे गिरने लगे थे I

प्राची ने उसे अपनी तरफ खींचा, गले लगाकर उसके आंसू पोंछे और उसे ढाढ़स बंधाने की कोशिश की I मगर अनिकेत के अन्दर का गुबार आंसू बनकर उसकी आँखों से उमड़ पड़ा I वह रोते-रोते बोला, “प्राची मुझे माफ़ कर दो – प्लीज़...मुझसे ग़लती हो गयी...मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था I”

“अब छोड़ो...जो हो गया, सो हो गया I सब ठीक हो जाएगा I तुम उससे बात करो – सॉरी बोल दो I”

“ठीक है I मैंने कई बार सोचा, मगर अकेले उसके सामने जाने की हिम्मत नहीं हुई I चलो उसके कमरे में चलते हैं...तुम भी साथ चलो,” अनिकेत ने अपने आंसू पोंछते हुए कहा I

“दोनों साथ जायेंगे तो शायद कहीं घबरा न जाए I तुम पहले जाओ, बातचीत शुरू करो, एक-दो मिनट बाद मैं भी पहुँच जाऊँगी,” प्राची ने उसे समझाते हुए कहा I

“ठीक है I”

*****

अनिकेत धीरे-धीरे भारी क़दमों से चलते हुए मनु के रूम के बाहर ठिठककर खड़ा हो गया I उसने देखा कि मनु अपनी स्टडी-टेबल पर बैठा कुछ लिख रहा है I सामने टेबल पर एक क़िताब खुली पड़ी है I कुछ देर वो चुपचाप मनु को ऐसे ही देखता रहा, फिर एक बार पीछे मुड़कर देखा I पीछे कुछ दूरी पर प्राची खड़ी थी I प्राची समझ गयी थी कि अनिकेत की अंदर जाने की हिम्मत नहीं हो रही है I उसने उसको आँखों से ही अंदर जाने का इशारा किया I

अनिकेत ने थोड़ी हिम्मत जुटाई और धीरे से खंखारा I

उसकी खंखार सुनकर मनु ने पलटकर दरवाज़े की तरफ देखा I

“क्या हो रहा है मास्टर ?” अनिकेत ने हिम्मत करके अपने को सामान्य करते हुए धीरे से पूछा I

पापा को अचानक इस समय अपने कमरे में देखकर मनु सहमकर अपनी कुर्सी से खड़ा हो गया और धीरे से नीचे देखते हुए बुदबुदाया, “कुछ नहीं, पढ़ रहा हूँ I”

“कल छुट्टी है – कल पढ़ लेना ,” अनिकेत ने धीरे-धीरे उसकी तरफ़ क़दम बढाते हुए कहा I

मनु कुछ नहीं बोला या बोल नहीं पाया I बस नीचे की तरफ देखता रहा I उसकी अंगुलिया पेन से खेलने लगी थीं I उसे लगा आज फिर से पापा कटाक्ष कर रहे हैं कि कल छुट्टी है, आज पढ़ने की क्या ज़रुरत है ?

अनिकेत ने उसकी तरफ़ देखा I वो एकदम समझ गया था कि मनु के मन में क्या चल रहा है I इसलिए उसे तुरंत ही जो कहना है, कह देना चाहिए I

“मुझे कुछ कहना था,” अनिकेत हिचकिचाते हुए बोला I

मनु कुछ नहीं बोला I बस गुमसुम अपनी जगह खड़ा रहा I

अनिकेत भारी क़दमों से चलते हुए उसके बिस्तर पर बैठ गया I थोड़ी देर कमरे में चुप्पी छाई रही और एक अज़ीब सा तनाव कमरे में पसर गया I बिना कहे काम नहीं चलेगा और कहने की हिम्मत हो नहीं रही थी I फिर भी अनिकेत ने हिम्मत जुटाई और बोला, “सॉरी बेटा !” और कहते-कहते उसका गला रुंध गया, आँखों से झरझर आंसू बहने लगे I

पापा को रोता देख मनु उसके पास आया और उसको गले लगाकर बोला, “किस बात का ?”

“वो जो उस दिन मैंने तुम्हें बहुत ज़ोर से डांटा था – मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था I”

“कोई बात नहीं पापा,” ये कहकर मनु अपने पापा के आंसू पोंछने लगा I

बेटे की नर्म-नर्म हथेलियों के स्पर्श ने उसको सुकून तो बहुत दिया मगर आंसू थे कि थमने का नाम नहीं ले रहे थे I शायद बहुत बड़ा पत्थर था उसके दिल पर जो धीरे-धीरे पिघल कर बाहर आ रहा था I

“नहीं, उस दिन मैंने आपको बहुत चोट पहुंचाई – मैंने ग़लत किया I” अनिकेत ने फिर से कहा I

पापा के दिल की आवाज़ बेटे ने पहचान ली थी I वो शायद अपना दर्द भूल गया था I

“अरे पापा – आप भी ! चोट लग-लग के ही तो बहादुर बनते हैं I” मनु उसके आंसू पोंछते हुए बोला I

अचानक अनिकेत को पांच साल पुरानी बात याद आ गयी थी I एक दिन वो दोपहर को उसे स्कूल-बस से लेने गया था I उसने देखा कि मनु के दोनों घुटने छिले हुए थे, और खून निकल कर जम गया था I बच्चे को चोट लगी देख उसका कलेजा मुंह को आ गया था I

“ये चोट कैसे लगी ?” उसने तुरंत पूछा था I

“बस लग गयी – फुटबॉल खेलते हुए I कुछ नहीं – चोट लग-लग के ही तो बहादुर बनते हैं,” मनु ने कहा और उसकी तरफ ऐसा देखा था जैसे कह रहा हो – चिंता मत करो ये तो होता ही रहता है I

उसके इस मासूम ज़वाब पर उस दिन वो भी हंस पड़ा था I तब वो पांच-छह साल का ही था, मगर उसकी हिम्मत और सहनशक्ति ने उसको बहुत प्रभावित किया था I

आज भी वो बच्चा ही है I अनिकेत को लगा कि शायद वो आज उससे भी बड़ा हो गया है I पांच साल पहले के मनु में और आज के मनु में ज़मीन आसमान का अंतर था I आज उसके चेहरे पर मासूमियत नहीं गम्भीता थी I आज वो उसे एक बड़े आदमी की तरह समझा रह था कि चिंता की कोई बात नहीं है – वो बहादुर बन रहा है I

उसकी एक ग़लती ने उसके मासूम बेटे से उसका बचपन छीनकर उसे रातोंरात बड़ा कर दिया था, जिसका उसे बहुत दुःख था I

घर में मनोरंजन का एक ऐसा साधन था जिसे कोई कर नहीं देना पड़ता था, जो बिनाशर्त उन दोनों का भरपूर मनोरंजन करता था – वो अचानक कहीं खो गया था I और एक बार फिर उसकी आखों से अश्रुधारा बह निकली I

फिर से बेटे ने पापा के आंसू पोंछे I फिर से उसकी नर्म हथेलियों ने उसे जिंदगीभर का सुकून दिया I

प्राची दूर खड़ी उन दोनों को देख रही थी I उसने उन दोनों के बीच में बोलना ठीक नहीं समझा I बाप-बेटे के इस अद्भुत मिलन को देखकर उसकी आँखें भी नम हो गयी थीं I

“पापा, बहुत दिनों से आप मेरे साथ खेले नहीं हैं – चलो खेलते हैं I” मनु ने अपने हाथ से उसकी ठुड्डी ऊपर करते हुए कहा I

“हाँ...”

और उसके बाद वो दोनों बहुत देर तक एक-दूसरे के साथ खेलते रहे I

*****

कहानी अभी बाक़ी है I कृपया भाग 2 ज़रूर पढ़ें I

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राजीव पुंडीर

28 नवम्बर 2017

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