आज भी वह जब बाथरूम से निकली तो गीले बदन से चिपके हुए मैले सफ़ेद कमीज को झट से तौलिये से लपेट ली और घर में ऐसे घुसी जैसे शिकारी के पंजे से पंछी भाग निकलता है। उसको पता था सामने वाले बंगले में से वो आँखें आज भी उसे अख़बार के पीछे से साध रही थी। हमीरा एक छोटे से गरीबखाने में रहती अपने छोटे भाई की इकलौती आश थी। आलिशान बंगले के पीछे लाइन से लगे टूटे फूटे घरों में उसका चौथे नंबर का था।


"सेठ ने आज जल्दी बुलाया से.. उनका डिब्बा भरने के वास्ते मैं जाऊ सु। जल्द वापस आती सु। लल्ला, तू खाणो खा लेना।" कहती हुई हमीरा टूटे हुए दरवाजे के पीछे टंगे दुपट्टे को झट से शरीर पर डालकर लगभग भागती हुई घर से निकल गई।


"देर हो गई ?" घर के नौकरो से कभी मुहँ नहीं लगानेवाले सेठ ने रसोई में छिपकर घुसने में असफल हमीरा को पिछले बरामदे में ही पकड़ा ।


"जी साब .. " दुपट्टे को दायीं और मुहँ में हमीरा ऐसे चबाए जा रही थी मानो जैसे उससे वह अदृश्य हो जाएगी।


"जल्दी से सफाई ख़तम करो और मेरे कमरे में आओ, कुछ काम है।" सेठ की आँखे हमीरा को ऊपर से नीचे तक तकती हुई बीच में स्थिर हो गई।


हमीरा के लिए यह हररोज का था, पल पल खुद को बचाना और सेठ के इरादों से खुद को चुराना उसके लिए नाहते वक्त साबू रगड़ने सा आम था । कभी कभी तो इतना सोचती की ऐसा लगता की आज तो दुपट्टे की छोर से उत्पन्न होते रस से ही उसका पेट भर जाएगा। झट से रोटी सेखना था उसे लेकिन मन ही मन उम्मीद कर रही थी की चूले में से आ रही आग नपुंसक बन जाए और रोटी को कभी न सेख पाए। कभी जब कंकडों को देखती रास्तों पर तो खुद भी उनमे से एक बनने का ठानती लेकिन कुछ अधिक सोचे उससे पहले ही लल्ले के शब्द कान में दोहराने लगते -
"जीजी, मैं यु बड़ो हो जाऊंगो और दागतर बणूगो। पछी तारे कथ्थे जाणो न पड़ेगो। तू सोवेगी और मेहतरानी तारे पैर को घी पिलावेगी।" और हमीरा को एक और दिन काटने को हिम्मत मिल जाती।

लेकिन आज तो जैसे आसमान फट के माननेवाला था। इतना डर उसे सेठ ने मासा के पीछे जब उसको दुपट्टे में से चुंटा काटा था तब भी नहीं लगा था।
ऐसे में वह खुद से उलझी हुई थी - " बस एक दफा कानजी बारिस ला दे, थारो घणो घणो आभार मानेगी ये नापाक... "

जबकी हर बारिश में उसका घर घुटनों तक डूब जाता था और घंटों तक वह झाड़ू लेकर लग जाती फिर भी रात को दोनों भाई बहन को प्लास्टिक का सहारा लेना पड़ता था। लेकिन आज उसकी गिनती के आप बचाव में सिर्फ इकलौता रास्ता यही दिख रहा था क्योंकि मासा को भी मंदिर से लौटने में कमबख्त समय फुरसद से पेश आ रहा था।
रोटी पक गई थी और वह मटके में से पानी भर कर बंजर गले को सोंख रही थी तभी एकदम से उसके शरीर को सो वॉल्ट का झटका लगा हो वैसे काँप उठी। सफ़ेद मलमली आस्तीन में छिपे बैठे वह कर्कश हाथों ने उसे जकड लिया था। वो चैंक गई, ना हिली ना डुली, बस होनेवाली हरकतों से सावधान हो गई। कुछ देर तक कुछ नहीं हुआ। वह हाथ वैसे ही उसको लपेटें, जकड़ें रहें। तभी गले के नीचे बालों में गरम हवा फेंकी गई और बंद होती हुई हमीरा की गर्म आँखोने मौसम ही पलट दिया। हवा चली जोरों से, खिड़कियाँ पटकने लगी, पैड ऐसे झटकने लगे एक दूसरे से जैसे पैर गवा बैठे जवान को एक दिन के लिए पैर मिल गए हो। बारिश की बुँदे जमीं तक पहुँचते पहुँचते कंकड़ बन कर गिरी। जैसे सभी निर्जीव जन मोर्चा लगाए थे। और तभी पल के पाँचवे प्रहर में हमीरा ने उन कंकडों को गिरते हुए सुन लिया और वह पल थम गया। दूसरे पल के द्रश्य में लहू था, गर्वीले हाथों से गिरा हुआ चाकू था, सफेदी को कस के थप्पड़ लगाए बैठे दाग थें, ज्वालामुखी से उगले गए लावा ने चारों और फैलाई हुई ठंडक और ख़ामोशी थी।

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