एक थी सिन्धी बोली

कल्पना रामानी की सिंधी ग़ज़लों का अनुवाद


दुनिया के हर प्राणी की है अपनी बोली

मिली हमें भी है सिन्धी, इक प्यारी बोली


सबसे रही पुरानी हमारी सिन्धु-सभ्यता

और सुता, सिन्धी है उसकी सयानी बोली


झुला उसी ने पलना, लोरी देके सुलाया

किस कारण फिर हमसे वो ही बिसरी बोली


ताने देते नित्य नई पीढ़ी के बच्चे

क्यों न सिखाई दादी, हमें ये मीठी बोली


प्रेम सहित सब सिन्धी-पर्व मनाओ सखियों

कायम ज्योंकि रहे पुरखों की थाती बोली


गीत-भजन संतों के गाए, सुनो-सुनाओ

कविताएँ, ग़ज़लें भी रचें यह सोहनी बोली


छूटा सिंध, मगर है अब भी फ़र्ज़ हमारा

कभी न छूटे अपनी अमर निशानी बोली


काश ‘कल्पना’! आए न वो दिन, सिन्धी-वंशज

अंग्रेज़ी में पढ़ें- एक थी सिन्धी बोली


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