यों तो उस पार्क को लवर्स पार्क कहा जाता था पर उसमें टहलने वाले ज्यादातर लोगों की गिनती वरिश्ठ नागरिकों में की जा सकती थी । युवाओं में अलस्सुबह उठने, जूते के तस्मे बांधने और दौड़ लगाने का न धीरज था, न जरूरत । वे उस अभिजात्य इलाके के पंचसितारा जिम में शाम को पाये जाते थे - ट्रेडमिल पर हांफ हांफ कर पसीना बहाते हुए और बाद में बेशकीमती तौलियों से रगड़ रगड़ कर चेहरे को चमकाते और खूबसूरत लंबे गिलासों में गाजर चुकन्दर का महंगा जूस पीते हुए । लवर्स पार्क इनके दादा-दादियों से आबाद रहता था ।

सुबह सबेरे जब सूरज अपनी ललाई छोड़कर गुलाबी चमक ले रहा होता , छरहरी सी दिखती एक अधेड़ औरत अपनी बिल्डिंग के गेट से इसी पार्क में दाखिल होती , चार पांच चक्कर लगाती और बैठ जाती । अकेली । बेंच पर । वह बेंच जैसे खास उसके लिये रिज़र्व थी । तीन ओर छोटे पेड़ों का झुरमुट और सामने बच्चों का स्लाइड और झूला जिसके इर्द गिर्द जापानी मिट्टी के रंगबिरंगे सैंड पिट खांचे बने थे , जहां बच्चे अगर स्लाइड से गिर भी जायें तो उनकी कुहनियां और घुटने न छिलें । यह बेंच उसने अपने लिये क्यों चुनी थी , वह खुद भी नहीं जानती  थी । शायद इसलिये कि यह बेंच सैर करने आने वाले वाशिंदों के रास्ते में नहीं पड़ती थी और वह इत्मीनान से सैर पूरी करने के बाद घुटने मोड़कर प्राणायाम की मुद्रा पर आ सकती थी । भ्रामरी प्राणायाम का ओ--म् करते हुए भी, सैर करते लोगों की बतकही, उसकी एकाग्रता में खलल नहीं डालती ।

तीन महीनों से लगभग रोज़ ही वह इस वक्त तक बेंच पर अपना आसन जमा चुकती थी। उस दिन आंखें मूंदे हुए लंबी सांस भीतर खींचते अचानक जब उसने हाथ बदला तो पाया कि दाहिने हथेली की मध्यमा उंगली लाॅक हो गई है । अक्सर ऐसा हो जाता था । उसने आंखें खोलीं और बायी उंगलियों से उस उंगली को थोड़ा नरमाई से घुमाया तो देखा उसके सामने की रोशनी को एक सफेद आकार ने ढक लिया था । झख सफेद उजला कुरता पायजामा पहने वह बूढ़ा किसी साबुन कम्पनी की सफेदी का इश्तहार  मालूम होता था । सिर पर दोनों कनपटियों पर बस नाम भर को थोेड़े से सफेद बाल। आर.के.लक्ष्मण के कार्टून के काले बालों पर सफेदी फिरा दी हो जैसे ।   

‘‘साॅरी , लेकिन इट्स नाॅट द राइट वे टू डू प्राणायाम !‘‘ बूढ़े ने अंग्रेजी में कहा तो औरत की तंद्रा टूटी । उसने समझा कि बूढ़ा उससे कुछ कहना चाहता है ।

‘‘प्लीज़ कम दिस साइड! ‘‘ औरत ने अपनी उंगलियों को बायें कान की ओर ले जाकर इशारे से बताया कि सुनाई नहीं दे रहा, वे दाहिनी ओर आकर बताएं ।

थोड़ा खिसक कर बेंच पर खाली जगह पर बूढ़ा दाहिनी ओर बैठते ही बोला, ‘‘ मैं रोज तुम्हें देखता हूं , आज अपने को रोक नहीं पाया ! उंगलियों की मुद्रा ऐसी होनी चाहिये ... ‘‘ बूढ़े ने तर्जनी और अंगूठे का कोण मिलाकर बताया ।

‘‘ओह अच्छा ! शुक्रिया ! ‘‘ औरत ने तर्जनी और अंगूठे का कोण मिलाया - अब ठीक है ? ......

‘‘यस ! गुड गर्ल ! चलूं .......?‘‘  बूढे़ ने उसकी पीठ थपथपाई जैसे किसी बच्चे को शाबाशी दे रहा हो , फिर उठने को हुआ कि तब तक फिर औरत की उंगली ने, ऐंठ कर दोबारा अपने को बंद कर लिया -  ‘‘ओह ! यह फिर लाॅक हो गई । डबल लाॅक ! ‘‘

‘‘मेरी भी हो जाती थी ।‘‘ ..... उठते उठते बूढ़ा फिर बैठ गया । ‘‘ कम्प्यूटर पर हर दस-बीस मिनट बाद उंगलियों को हिलाते डुलाते रहना चाहिये । यह माॅडर्न टेक्नोलाॅजी की दी हुई बीमारियां हैं।‘‘ बूढ़ा हंसा ,‘‘ आर यू वर्किंग ?‘‘

‘‘ नहीं, ऐसे ही घर पर थोड़ा काम करती हूं ! लैप टाॅप पर ! ‘‘ औरत ने दोबारा उंगली को आहिस्ता से खोला !

‘‘ टेक केअर ! साॅरी, तुम्हें डिस्टर्ब किया ! ...... चलूं, मैंने राउंड नहीं लगाये अभी । आर यू आॅलराइट नाउ ? सी यू.....!‘‘ बूढ़ा अब अपनी उम्र से ज़्यादा तेज़ चाल मंे सैर वाले रास्ते पर निकल गया ।

0

अगले दिन फिर प्राणायाम करते करते औरत की आंख खुली तो बूढ़ा सामने था । ओफ ! यह पता नहीं कब से खड़ा है । औरत झेंपी । फिर सरक कर अपने दाहिनी ओर उसने जगह बनायी । अब ?

‘‘ और ..... पीठ ऐसे सीधी रखो ‘‘ बूढ़े ने जैसे ही उसके दोनों कंधों को अपने दोनों हाथों के दबाव से पीछे किया , पीठ पर दर्द की चिलक सी उठी ।

‘‘ओफ़! ‘‘ उसके मुंह से दर्द के मारे एक सीत्कार सी उठी । बूढ़ा जबरदस्ती उसके योग षिक्षक की भूमिका में आ रहा है । वह खीझी ।

‘‘ ओह साॅरी, साॅरी ! स्पाॅन्डिलाॅसिस है या .......?‘‘ बूढ़ा हंसा जैसे उसके पीठ दर्द का मखौल उड़ा रहा हो, ‘‘क्या क्या है तुम्हें - इतनी सी उम्र में ?‘‘

‘‘ कुछ खास नहीं, कभी कभी दर्द उठ जाता है ! ‘‘ औरत ने कांपते होंठों से कहा ।

‘‘ व्हेन ब्रेन कान्ट होल्ड एनी मोर स्ट्रेस, इट रिलीजे़ज़ स्पाज़्म टु द बैक ( जब दिमाग़ अतिरिक्त तनाव को झेल नहीं पाता तो उस जकड़न को नीचे पीठ की तरफ सरका देता है ) तब आपकी गर्दन और आपके कंधे अकड़ जाते हैं और दुखने लगते हैं । आप कंधे का इलाज करते चले जाते हैं जबकि इलाज कंधे की जकड़न का नहीं , दिमाग़ में जमकर बैठे तनाव का होना चाहिये ।‘‘..... बूढ़ा रुक रुक कर बोला ।

- हूं .... औरत भौंचक सी उसे देखने लगी । यह सब इसने कैसे जाना । क्या मेरेे चेहरे पर तनाव लिखा है ?

औरत ने एक चौड़ी सी मुस्कान चेहरे पर जबरन सजाकर कहा, ‘‘चेखव कहते थे ..... चेखव ....नाम सुना है?‘‘

‘‘हां, हां ! द ग्रेट रशियन राइटर ! क्या कहते थे ?‘‘

‘‘ डाॅक्टर थे न ! डायरिया के लिये कहते थे - योर स्टमक वीप्स फाॅर यू ..... मन उदास और बेचैन होता है तो पेट सिम्पथी में रोने लगता है ! ‘‘

‘‘ ग्रेट ! सच है ! पता है, अगर बहुत नेगेटिव फीलिंग्स एक दूसरे को ओवरटेक कर रही हों और आप उन्हें हैंडल न कर पायें तो एक्ज़ीमा हो जाता है । आपका स्किन बता देता है कि रुको, इतना काम-क्रोध ज़रूरी नहीं । .... और अंदर ही अंदर गुस्सा, नफरत दबाये चलो तो पाइल्स, अल्सर,ब्रेन स्ट्रोक न जाने क्या क्या हो जाता है । सप्रेशन इज़ द रूट काॅज़ आॅफ़ आॅल सिकनेस । एंग्री पाइल्स , एग्रेसिव अल्सर ! तो इलाज की ज़रूरत तो इसको है, इसको .....!‘‘ बूढ़े ने चलते चलते दिमाग़ को दो उंगलियों से ठकठकाया । 

औरत ने बताने की एक फि़ज़ूल सी कोशिश की कि वह तो ..... ठीक है ! यानी ऐसा कुछ नहीं । पीठ और कंधो पर तो अक्सर दर्द उठ जाया करता है।

‘‘ साॅरी, मैं बिना मांगे ज्ञान दे रहा हूं ! ‘‘,  बूढ़े ने कहा और झेंप गया !

‘‘ठीक है।‘‘ औरत ने अपनी मुस्कान समेटकर हाथ उठा दिया - बाय !

‘‘ साॅरी अगेन। कंधा दुखाने के लिये ! ‘‘

‘‘ नहीं, कोई बात नहीं । नत्थिंग सीरियस ।‘‘

अगले दिन वह औरत जब पार्क के अपने पांच चक्कर पूरे कर बेंच पर पहुंची तो बूढ़ा पहले से बेंच पर बैठा था । उसको देखकर उसने सरककर जगह बना दी । औरत ने कहा - ‘‘नहीं , आप बैठें , मैं दूसरी जगह बैठ जाती हूं।‘‘

‘‘अरे, मैं तुम्हें प्राणायाम के सही पोस्चर सिखाने के लिये बैठा हूं। और तुम ... नहीं सीखना चाहती तो कोई बात नहीं ।‘‘

‘‘ अच्छा तो आप इस तरफ बैठ जायें । मुझे बायें कान से ...... सुनाई नहीं देता, इसलिये .....!‘‘

‘‘ अच्छा ? ओह ! ‘‘ बूढे़ ने इस ओर सरक कर अपने बाईं ओर जगह बना दी ।

उसके बैठते ही बूढ़े ने कहा - ‘‘उंगलियों में, कंधे में, अब कान में भी कुछ प्राॅब्लम है ? इतनी कम उम्र में ....... क्या उम्र है तुम्हारी । आय नो ! औरतों से उम्र नहीं पूछते, फिर भी ....‘‘

‘‘पैंसठ ! ‘‘

‘‘ कि-त-नी ?‘‘ बूढ़ा चैंक कर बोला जैसे उसने ठीक से सुना नहीं .....

‘‘ सिक्स्टी फाइव ! ‘‘ औरत ने दोहराया और कान की ओर इशारा किया - ‘‘क्या आपको भी .......?‘‘  ......‘ कम सुनाई देता है ‘...... वाक्य पूरा करते करते उसने बीच में ही रोक लिया ।

‘‘नहीं-नहीं ! आय ऐम पर्फेक्ट । मुझे दोनों कानों से सुनाई देता है । तुम ..... आप.... आप तो लगती ही नहीं ....‘‘

‘‘ नहीं, तुम ही कहिये, तुम ठीक है ! आप मुझसे बड़े हैं ।

‘‘ हां, सिर्फ चार साल ! ..... लेकिन आप, पचास से ऊपर की नहीं लगतीं, बिलीव मी !

‘‘ उससे क्या फर्क पड़ता है !

बूढ़े ने बात बदल दी - ‘‘अच्छा, आप रहती कहां हैं ?

‘‘यहीं सामने ! ‘‘ उसने अपनी बिल्डिंग की ओर इशारा किया ।

‘‘ मैं इसमें .... बगल वाली बिल्डिंग में .... आप कौन से माले पर ....

‘‘ इक्कीसवें ....

‘‘ अरे, स्ट्रेंज ! मैं भी वहां इक्कीसवें पर .... फ्लैट नं ?

‘‘ इक्कीस सौ दो ! ‘‘

‘‘ डोंट टेल मी । मेरे बेटे का भी ......... फ्लैट नं - इक्कीस सौ दो ... और इंटरकाॅम ?‘‘

‘‘ स्टार नाइन सेवन टू वन टू ! ‘‘ औरत ने मुस्कुराकर कहा - ‘‘अब ये मत कहियेगा कि फोन नंबर भी वही है ! ‘‘

‘‘अनबिलिवेबल ! बस , एक डिजिट का फर्क है - थ्री वन टू ! .... याद रखना कितना आसान है न ! ‘‘

‘‘ आपका नाम जान सकता हूं ?‘‘

‘‘ शिवा ! ‘‘ औरत ने ऐसे कहा जैसे नाम बताने को तैयार ही बैठी थी ।

‘‘ शिवा मीडियम ?‘‘ बूढ़ा हंसा ! 

‘‘ वो क्या है ? ‘‘

‘‘ नहीं , स्माॅल , मीडियम , लार्ज वाला नहीं । शिवा मीडियम फाॅन्ट । मेरी पोती हिंदी फिल्मों में स्क्रिप्ट राइटर है । हिंदी में संवाद लिखने के लिये यह फाॅन्ट इस्तेमाल करती है । ‘‘

‘‘ अच्छा, हिंदी के बारे में मेरी इतनी जानकारी नहीं ! औरत फीकी हंसी हसकर बोली - आपका नाम ....?‘‘

‘‘ मैं आशीष कुमार । शॉट फाॅर्म - ए.के. । सब ए.के. ही बुलाते हैं। मेरा बेटा अनिरुद्ध कुमार । उसे भी उसके दफ्तर में ए.के. ही कहा जाता है। मेरे बंगाली दोस्त मज़ाक में कहते हैं - एई के ? मतलब कौन है यह ? मेरे दो पोते , एक पोती है । इक्कीसवें फ्लोर के दो फ्लैट्स को एक कर बड़ा कर लिया है । फिर भी बच्चों को छोटा लगता है । हरेक को अपने लिये अलग कमरा चाहिये । यहां तक कि कामवाली को भी । क्या खूब मुंबई के नक़्शे  हैं .....! अच्छा, आपके घर में कौन कौन हैं ?‘‘

यह बूढ़ा उसका भूगोल इतिहास जानना क्यों चाह रहा है । घर में इतने सदस्य कम हैं क्या ?

‘‘नहीं , नहीं बताना चाहें तो कोई बात नहीं ...... मैंने तो ऐसे ही पूछ लिया । ‘‘

‘‘ मेेरी दो बेटियां हैं। दोनों जाॅब करती हैं - एक न्यू जर्सी में । छोटी मेरे साथ है यहां ! ‘‘

‘‘ और आपके पति ?‘‘

‘‘ हैं .....‘‘ वह कुछ अटकी, फिर बोली - ‘‘पर नहीं हैं .......‘‘

‘‘ मतलब ?‘‘

‘‘ वह मेरे साथ नहीं .....‘‘

‘‘ ओह ! ‘‘ बूढे ने अकबकाकर सिर हिलाया - हैरानी में और उससे ज्यादा घबराहट में । यह औरत झूठ भी तो बोल सकती थी । लेकिन सच है, उसने सोचा ऐसे खुलासे अजनबियों के सामने यकायक हो उठते हैं ।

‘‘ आप जो प्राणायाम करती हैं न, उसमें एक एडीशन करता हूं । ‘‘ ,बूढे ने ऐसे इत्मीनान से कहा जैसे औरत के अपनी जि़ंदगी के खुलासे को उसने तवज्जोह दी ही नहीं ! - ‘‘ देखिये , ओ--म्  तो आप करती ही हैं ! उसके पहले का हरी ई ई ई ..... खींचकर उसी अंदाज़ में करिये ! इससे वायब्रेशंस यहां ब्रह्मतालू पर होते हैं जहां छोटे बच्चों के सिर पर टप टप होती देखी होगी, वहां ! ओ--म् से तो कनपटियों के पास, दिमाग़ के दायीं बायीं ओर की नसें रिलैक्स होती हैं पर इन दोनों से तो पूरा दिमाग़ - आपका ब्रह्मां--ड !...... ‘‘

‘‘आप योग प्रशिक्षक हैं या....... यह आपका इन्वेंशन है ?‘‘ षिवा उसके बयान का अंदाज़ देखकर हल्की हो आई जैसे किसी साथ चलते ने रास्ते के उस पत्थर को - जिससे टकराकर वह गिरने ही वाली थी, हटाकर रास्ते को साफ और सुरक्षित कर दिया हो ।

‘‘थैंक्यू सो मच । कल से इसे भी करूंगी । ‘‘

‘‘ओके ! चलूं मैं अब?‘‘

बूढे ने ऐसे पूछा जैसे उसके न कहने से वह कुछ और प्राणायाम विधियां बताने के लिये रुक जायेगा ।

शिवा ने हाथ जोड़ कर एक बार और थैंक्यू कहा !

शिवा ने जाने को तो कह दिया - ‘आप चलें अब’ का संकेत थैंक्यू की सौजन्यता में लपेट कर - पर अपने को उसे जाते हुए देखता पाया, जब तक बूढ़े की वह आकृति घुमावदार रास्ते का मोड़ लेकर आंख से ओझल नहीं हो गयी ।

0

घर लौटकर आज शिवा ने व्हाइट साॅस में ब्रोकोली बनायी और बनाते हुए सोचती रही कि शायद साल भर हो गया इसे बनाये। वही हुआ । छोटी बिटिया काम से लौटी और जैसे ही खाना मेज़ पर देखा , बोली - ‘‘व्हाउ ! आज क्या है माॅम ! किसी का बर्थ डे है ? ‘‘ वह सिर खुजाने लगी और याद करते बोली - ‘‘मुझे तो याद नहीं आ रहा । ‘‘.....

‘‘नहीं रे । ऐसे ही मन हुआ बनाने का ! ‘‘ शिवा ने झेंपते हुए कहा । बेटी ने फुर्सत से उंगलियां चाटने की आवाज़ को भी नहीं रोका । एटीकेट्स के चलते खाने की मेज़ पर जिसकी मनाही थी ! खिली हुई मुस्कान के साथ बोली - तो मन से कहो , कभी कभी ऐसा हो जाया करे । शिवा मंद मंद मुस्काती रही । बेटी कितना ख्याल रखती है उसका । आॅफि़स के टेंशन कभी उससे षेअर नहीं करती । अपनी दोस्तों से जब फोन पर बात करती है तभी उसके जाॅब के तनाव उस तक पहुचते हैं । जब-तब छुट्टी के दिन किसी अच्छी फिल्म की दो टिकटें ले आती है और अपनी दोस्तों के साथ न जाकर अपनी मां के साथ एक वीकएंड बिताती है। और वह है ..... कि बरसों इस इंतज़ार में रही कि बेटी का किसी से अफेयर हो जाये तो कम से कम इसकी शादी तो वह भर आंख देख ले । एक लड़का उसे पसंद आया भी पर जब तक शिवा उसे पसंद कर अपने घर का हिस्सा बनाने को तैयार हुई, वह लड़का बेटी की ही एक दोस्त पर रीझ बैठा और बेटी को पैरों के एक्ज़ीमा का महीनों इलाज करना पड़ा । शिवा ने बेटी की शादी के सुनहरे सपनों से तौबा कर ली और खाली वक्त में दोनों मां-बेटी स्क्रैबल खेल कर या सुडोकू के खाने भर कर संतुष्ट होती रही । तब से जिंदगी एक व्यवस्थित पटरी पर चल रही थी।

सुबह , बेटी के टिफिन में गाजर के परांठे के साथ लहसुन का अचार रखना, शिवा नहीं भूली और बेटी ने रात की ब्रोकोली के एवज में गले में बांहें डालकर विदा ली - ‘‘आज भी कल की तरह कुछ डैशिंग बना लेना माॅम ! मूड न हो तो मैं चायनीज़ लेती आउंगी । जस्ट गिव मी अ टिंकल ! ‘‘ शिवा की मुस्कान आंखों की कोरों तक खिंच गई ।

0

बेटी को भेजकर उसने पार्क का रुख किया । अपनी उसी बेंच पर, सैर के चक्कर पूरे करने के बाद वह बैठी थी । पांच दस मिनट वह राह तकती रही । फिर दूर से बूढ़ा आता हुआ दिखा । झक सफेद कुरता पाजामा पास आकर ठिठक गया । उसने मुस्कुराकर देखा तो वह बेंच की एक ओर बैठ गया लेकिन बैठते ही उठ कर दूसरी ओर जाते बोला - ओह ! मैं भूल गया था कि आपको इस कान से सुनाई नहीं देता । ...... मेरी वाइफ़ भी एक कान से थोड़ा कम सुनती .....

शिवा सकते में आ गई -‘‘ क्या ----?‘‘ उसे झटका लगा । जैसे कोई उसके दिमाग़ की सारी शिराओं को अस्तव्यस्त कर रहा था -‘‘ क्या आप ......? आप भी ......‘‘

बूढ़ा अटका - ‘‘अरे नहीं नहीं । आप गलत सोच रही हैं । मैंने उस पर कभी हाथ नहीं ..... मैं तो .....‘‘

शिवा ने सूखी आवाज़ में अटपटाकर पूछा - ‘‘तो फिर आपको कैसे मालूम कि हाथ उठाने से ..... कान का पर्दा फट जाता है ?‘‘

बूढ़े ने गला खंखारा - ‘‘मेरी बीवी एक एन.जी.ओ. में मदद करने जाती थी । बताती थी कि डोमेस्टिक वायलेंस की शिकार अस्सी प्रतिशत औरतों के कान के पर्दे फटे होते हैं । लेकिन उसे हियरिंग की प्राॅब्लम थी । उसने हियरिंग एड लगा रखा था।‘‘

शिवा ने सशंकित निगाहों से बूढ़े को आर-पार देखा ! वह जैसे आश्वस्त नहीं थी , ‘‘ यहां ? किस एन जी ओ में ....?‘‘

‘‘नहीं नहीं ..... हम मुंबई में नहीं रहते.....‘‘

शिवा की आवाज़ में थकन थी - ‘‘नये आये हैं इस इलाके में ......?‘‘ 

‘‘नहीं, पहले भी आ चुके हैं कई बार । बेटा यहां रहता है । हम तो आसनसोल रहते हैं । ....... रहते थे । ..... माय वाइफ पास्ड अवे ! .... छह महीने पहले । ......‘‘ बूढ़ा बोलते बोलते रुका और उसने आंखें झुका लीं । झुकाने से ज़्यादा फेर लीं कि आंखों की नमी कोई देख न ले ।

‘‘ ओह साॅरी ! साॅरी ! ...... ‘‘

‘‘..... तो बेटा जिद करके अपने साथ ले आया - पापा अकेले कैसे रहेंगे । यहां पोते पोतियां , नौकर -चाकर , ड्राइवर -माली सब हैं । चहल-पहल है । पर .....‘‘

‘‘आपकी बीवी .....बीमार थीं ?‘‘

‘‘ बस, दस दिन । ......कभी बताया ही नहीं उसने कि तकलीफ है उसे कहीं । डाॅक्टर के पास जाने को तैयार ही नहीं । अपनी डाॅक्टर खुद थी वो । खुद ही आयुर्वेदिक होमियोपैथिक खाती रहती थी । चूरन चाटती रहती थी । जिस दिन उल्टी में खून के थक्के निकले, उस दिन कहा - डाॅक्टर बुलाओ । लास्ट स्टेज में बीमारी डिटेक्ट हुई । उसने कभी शिकायत ही नहीं की । पता ही नहीं चला कि कैंसर पूरे पेट से होता हुआ लंग्स तक पहुंच गया है। उसके मां बाबा दोनों कैंसर से गुज़र गये थे। जब कैंसर डिटेक्ट हो गया तो कहती थी - आशी , मुझे ज्यादा याद मत करना , नहीं तो वहां भी चैन से रह नहीं पाऊंगी । वह मुझे आशी कहती थी । ‘‘

आशी ! - बूढ़े ने बिंदा की आवाज़ को याद करते अपने को पुकारा । पुकार के साथ ही चेहरे पर गहराते बादलों की धूसर छाया पसर गई -‘‘ हमेशा कहती थी कि मैं धीरे धीरे मरना नहीं चाहती , बस चलती फिरती उठ जाऊं आपके कंधों पर ..... वही हुआ । मेरे साथ वाॅक करते करते अचानक लड़खड़ा गई । मैंने बांहों का सहारा दिया तो मेरी ओर ताकते एक हिचकी ली और बस ..... सब कहते हैं - ऐसी मौत संतों को आती है ..... पर जाने वाला चला जाता है , पीछे छूट जाने वालों के लिये ऐसी विदाई को झेलना आसान होता है क्या ?..... ‘‘ कहते हुए बूढ़े के चेहरे पर स्मृतियों में डूब जाने की जो रेखाएं उभरीं , संवाद वहां से आगे नहीं जा सकते थे । चुप्पी में ही, बग़ैर हाथ हिलाये, विदा की मुद्रा में बूढ़ा उठा और चल दिया ।

0

शिवा घर पहुंची तो साढ़े दस बज चुके थे । बातों बातों में वह भूल ही गई थी कि शनिवार की सुबह बड़ी बिटिया न्यू जर्सी से फोन मिलाती है। शुक्रवार रात को वह फुर्सत से बात करती है क्योंकि शनिवार उसे काम पर जाना नहीं होता। जब फोन की लंबी सी घंटी बजी तो उसे वार याद आ गया । फोन उसने लपक कर उठाया । उधर से खीझी हुई आवाज़ थी - क्या मां , फोन क्यों नहीं उठा रहे हो ? शिवा ने अटकते हुए कहा - आज ज़रा पार्क में देर हो गई । उधर से सुरीले सुर में डांट डपट थी - कितनी बार कहा है मां , मोबाइल लेकर जाया करो । माॅम से मां बनी शिवा ने इतराकर कहा - अपना वज़न उठा लूं, वहीं बहुत है। उसके बाद आदतन उसने सारी दवाइयों के लिये पूछा - कैल्शियम  ले रहे हो रेगुलर या भूल जाते हो ? यह बेटी अब उसकी मां के रोल में आ गई है जैसे स्कूल से लौटे हुए बच्चे का कान पकड़ कर मां पूरे दिन का ब्यौरा पूछती है - कुछ कुछ उसी अंदाज़ में यह बेटी उसकी खूराक , दवाइयां, मालिश और व्यायाम के बारे में दरियाफ्त करती है । खासियत यह कि फोन पर उसकी आवाज़ भर से वह पहचान जाती है कि मां झूठ बोल रही है और दवा अक्सर भूल जाती है। उससे झूठ बोला ही नहीं जा सकता ।

बेटी ने एक हिंदी फिल्म देख ली थी और वह उसके बारे में बताती रही । बात के बीच में एकाएक उसने टोका - अं अं ..... कहां हो आप ? डिस्ट्रैक्टेड क्यों हो ? ध्यान कहां है ? फोन पर जैसे आईना लगा हो । सही वक्त पर मां के हुंकारा न भरने पर दो सेकेंड मे बेटी पहचान जाती थी कि मां कुछ और सोच रही है । देर तक दोनों फिल्म के बारे में बात करते रहे। फोन रखते हुए उसने पूछा - और मैक कहां ? .... कहां होगा भला - अपने रिहर्सल पर गया है । आये तो उसे मेरा प्यार देना - शिवा ने कहा। बेटी एकाएक चहकी - ओह, आप सुधर गये हो मां । एकदम से-न वाॅयस । नाॅट सिनिकल एनी मोर । शिवा मुस्कुराई । बहुत डांट खाई है उसने मैक को लेकर । मां , आप ऐसे नाम लेते हो उसका जैसे आपका बड़ा लाड़ला दामाद है । और हो भी, तो लाड़ को अपने तक रखो । ही इज़ नाॅट माय हस्बेंड । और होने का कोई चांस भी नहीं है । ही इज़ अ गुड फ्रेंड । वो हमेशा  रहेगा । लेकिन शिवा तो शिवा । कोंचती रही - इतने सालों से साथ हो, कितना आजमाओगे एक दूसरे को, अब तो शादी कर लो। एकबार तो बेटी ने तल्खी से कह दिया था - शादी करके अपना हाल देख देख कर जी नहीं भरा अभी जो अपनी बेटी को शादी की सलाह दे रहे हो।  ...... आज वही बेटी चहक कर बोल रही थी - लव यू मां। जाओ , नाश्ता  करो । मुझे भी बहुत नींद आ रही है । अब सोऊंगी । यू हैव अ नाइस डे। 

शाम को छोटी बेटी चाइनीज़ खाने का पार्सल लेते हुए आई। शिवा की पसंद के मोमोज़ और उसकी अपनी पसंद का वेज हक्का और पनीर मंच्यूरिअन ।

एक बेटी मां कहती है, दूसरी ‘माॅम‘ और दोनों उस पर जान छिड़कती हैं । फिर भी शिवा बादलों के साये से बाहर नहीं आ पाती । उसका बीता हुआ सामने अड़कर खड़ा हो जाता है। शिवा ने चाहा, आज वह खुलकर मुस्कुरा ले । थैंक्यू - उसने बेटी का माथा चूमा और कमरे में सोने चली गई ।

0

अगले दिन जब शिवा पार्क में दाखिल ही हुई तो दूर से ही उसने देखा कि बूढ़ा उसे उंगलियों के इशारे से बुला रहा है। शिवा पास गई तो उसने बेंच पर बैठने का संकेत दिया । शिवा ने कहा - ‘‘पहले चक्कर लगा आऊं ।‘‘

‘‘ आज रिवर्स कर लो। पहले बेंच ! फिर सैर ! ‘‘

शिवा कुछ अनमनी सी जैसे उसके इंगित से परिचालित हो बैठ गई । वहीं - जहां उसने जगह बनाई थी । बूढ़े ने अपनी जेब में हाथ डाला , अपना वाॅलेट निकाला और उसे ऐसे खोला जैसे बंद फूलों की पंखुरियां खोल रहा हो -     ‘‘ देखो , यह है मेरी वाइफ़ - बिंदा ! ‘‘

शिवा ने देखा - सफेद सलेटी बालों में एक खूबसूरत सी औरत की तस्वीर - उसके चेहरे के पीछे के बैकग्राउंड से जितने फूल झांक रहे थे , उससे कहीं ज़्यादा उसके चेहरे पर खिले थे । बूढ़े ने सफ़ेद प्लास्टिक पर चढ़ी धूल की महीन सी परत को उंगलियों से ऐसे पोंछा जैसे अपनी बिंदा के माथे पर आये बालों को लाड़ से पीछे सरका रहा हो ।

‘‘बहुत खूबसूरत है !‘‘ शिवा ने कहा और अपने भीतर एक टीस को महसूस किया । फिर तस्वीर धुंधली हो गई और जाने कैसे उस साफ़ चौकोर प्लास्टिक शीट के नीचे उसने अपना अक्स देखा जो नीचे से झांकने की कोशिश कर रहा था । पर आंखों की नमी जैसे ही छंटी - वहां बिंदा थी - अपनी भरे पूरे अहसास के साथ ! मटमैली सी शिवा उसके सामने खड़ी थी ।

‘‘सुंदर है न!‘‘ बूढ़े ने फिर पूछा और इस बार धूल पुंछी तस्वीर को निहारता रहा । 

‘‘बहुत !‘‘ शिवा होंठों को खींचकर मुस्कुराई और अपने में सिमट गई ।

शुरु जनवरी की ठंडक हवा में थी । सुबह और रात को एक हल्के से स्वेटर के लायक ! बूढ़े ने भी आज एक स्वेटर पहन रखा था । झख सफेद कुरता और ठीक बीचो बीच क्रीज़ किया हुआ सफेद पायजामा । लेकिन स्वेटर जैसे किसी पुराने गोदाम से धूल झाड़कर निकाला हो । नीचे के बाॅर्डर में कुछ फंदे गिरे हुए और फंदों के बीच से बिसूरता दिखता छेद ! यह स्वेटर किसी भी तरह बूढ़े की पूरी पोशाक से मेल नहीं खाता था ।

शिवा सैर और प्राणायाम निबटा कर अपनी बेंच पर आ जमी । बूढ़ा आकर पास खड़ा हो गया ।

‘‘बैठने की इजाज़त है या .....?‘‘

‘‘ आइये न!‘‘ शिवा बेंच पर थोड़ा सरक गई । बूढ़े के बैठते ही उसकी निगाह स्वेटर पर गई ।

‘‘उधड़ गया है ..... यह स्वेटर .......‘‘ शिवा ने झिझकते हुए कहा ।

‘‘ हां , बहुत पुराना है। एंटीक पीस ! ‘‘

‘‘ इसको ठीक क्यों नहीं कर लेते। एक फंदा गिर जाये तो फंदे उधड़ते चले जाते हैं।‘‘

‘‘ऐसे ही ठीक है यह ! ‘‘ बूढ़े ने उधड़ी हुई जगह पर अपनी पतली पतली उंगलियां ऐसे फेरीं जैसे किसी घाव को सहला रहा हो ।

‘‘किसने बुना ? आपकी .....?‘‘

‘‘ हां , मेरी वाइफ़ - बिंदा ने बिना था यह स्वेटर मेरे लिये ...... शादी के बाद । बाद में बेटे बेटियों , नाती पोतों के लिये स्वेटर बिनती रही । इस बार सर्दियां आने से पहले गरम कपड़ों का ट्रंक खोला तो यह हाथ आ गया । कितना सुंदर डिज़ाइन है न ! ‘‘ बूढ़े ने जैसे अपने आप से कहा !

- हूं ..... शिवा बस सिर हिलाकर और मुस्कुरा कर रह गई , कह नहीं पाई कि आखिर आपकी बिंदा की उंगलियों ने बिना है , सुंदर तो होगा ही !

‘‘ मेरी बिंदा मुझसे दो साल बड़ी ही थी पर कोई कह नहीं सकता था कि ...... । इस उम्र में भी तुम सोच नहीं सकतीं कि वह कितनी खूबसूरत लगती थी। ‘‘

‘‘ जरूर लगती होगी।‘‘  शिवा ने कहा नहीं, सिर्फ सोचा - जिसको अपने पति से इतना प्रेम मिलता रहा हो, उसे हर उम्र में खूबसूरत दिखने से भला कौन रोक सकता है।   

शिवा अपने मटमैलेपन में खो गई थी । लग रहा था एक बार फिर संवाद के सारे सूत्र यहां आकर समाप्त हो गये हैं । अब आगे जुड़ नहीं सकते । बिंदा की उजास पूरे माहौल को चमका रही थी ।

तभी शिवा ने सुनी बूढे की आवाज़ - उसे अपने सन्नाटे से उबारती सी - ‘‘आपकी दो बेटियां हैं न ! शादी नहीं की उन्होंने ?‘‘                                                                            

‘‘नहीं । ‘‘

‘‘ दो में से किसी एक ने ....?‘‘

‘‘हां , दो में से किसी ने भी नहीं .....!‘‘ शिवा ने एक एक षब्द पर ज़ोर देकर कहा और मुस्कुराहट को होंठों के एक सिरे पर उभरने से पहले ही झटक दिया । जैसे मखौल उड़ा रही हो किसी का ।

‘‘क्यों भला ? ऐनी ग्रजेज़ अगेंस्ट मैरेज ?‘‘

‘‘ हां , वे कहती हैं - नो मैन इज़ वर्थ अ वुमैन ! ‘‘ ( कोई भी मर्द एक औरत के लायक नहीं होता )

‘‘ कौन सी बेटी कहती है ? बड़ी या .....? ‘‘

‘‘ दोनों ! .......‘‘ सवाल के पूरा होने से पहले ही उसने जवाब दे दिया ! बोलते हुए शिवा को लगा - वह अपनी कुढ़न बेवजह इस बूढ़े तक क्यों पहुचा रही है !

‘‘ अजीब बात है !..... ‘‘ बूढ़े के चेहरे पर असमंजस था ।

‘‘ वैसे दे आर ओपन टू इट ! कोई सही मिल गया तो ....!‘‘ उसने ‘‘सही’’ को दोनों हथेलियों की तर्जनी हिलाकर इन्वर्टेड काॅमा में होने का संकेत दिया । और अपनी तल्खी को छिपाने में कामयाब हो गई । 

‘‘हम्म्.....वेटिंग फाॅर मिस्टर राइट ! .......आय टेल यू ...... दिस जेनेरेशन इज़ गोइंग हेवायर ......‘‘ ( यह पीढ़ी बदहवास हुई जा रही है )

‘‘नो , दे आर मोर एक्यूरेट अबाउट देअर च्वाॅयसेज़ ‘‘ (नहीं , वे अपने चुनाव के बारे में ज्यादा सही हैं ) ‘‘.........वो अपने कान का पर्दा फटने देने के लिये तैयार नहीं हैं! ‘‘, शिवा ने महसूस किया कि उसका अपने पर से नियंत्रण छूट रहा है और मुस्कुराकर अपने स्वर के तंज को बेरोकटोक उस ओर पहुंचने दे रही है । मुस्कुराहट भी इतनी तल्ख होकर बहुत से राज़ खोल सकती है, उसने पहली बार जाना ।

‘‘ ओह यस ! आॅफ कोर्स ! आय नो ! मेरा बेटा कभी मेरी बहू को डांटता था तो बिंदा उसे झिड़क देती थी - खबरदार जो मेरी बहू से ऊंची आवाज़ में बोले । आदर्श  सास थी बिंदा जिसमें मां का ही प्रतिशत ज्यादा था ! कभी बहू से रार- तकरार नहीं । मेरी बहू भी, अपने पति की हर शिकायत, अपनी सास से ऐसे करती जैसे वह मां हो उसकी । ..... बूढ़ा एकाएक रुका - साॅरी ! मैं बहुत बोलता हूं न बिंदा के बारे में ?‘‘ 

‘‘ कोई बात नहीं, मुझे सुनना अच्छा लगता है!‘‘ शिवा ने डूबते स्वर में कहा ।

बूढ़े ने शिवा के चेहरे पर उदासी की लकीर खिंचती देख ली और उसके कंधे पर हाथ रखा , ‘‘लाइफ़ नेवर स्टाॅप्स लिविंग, शिवा !‘‘  बूढ़ा कंधा थपथपाकर चला गया -‘‘सी यू टुमाॅरो ! चीअर अप, शिवा !‘‘

शिवा !

शिवा ने कंधे से अपना नाम उठाकर अपने चेहरे पर सजा लिया और खुश  दिखने की कोशिश की । अब वह शिवा थी - एक जीता-जागता नाम । बूढ़ा अपने पीछे अपनी बिंदा का अहसास छोड़ गया था - बिंदा ये थी, बिंदा वो थी । इन बोगनबेलिया के लहलहाते फूलों की तरह । इन हरे हरे पत्तों से झुकी शाख की तरह । इन शाखों पर बहती दिसम्बर की भीनी सी ठंडक लिये महक से भरी हवा की तरह। उस बूढ़े की सांस सांस में बिंदा बसती थी । ...... और एक शिवा - जिसे पति का प्रेम कभी मिला ही नहीं और हिटलर पति की दहशत से कभी उसने अपनी ओर आंख खोलकर देखा तक नहीं । इन लहलहाते फूलों-पत्तों में एक अदना सा ठूंठ! कितना बदसूरत सा लगता है इस हरी भरी आबादी के बीच ! इस पार्क में जहां हंसते खिलखिलाते जोड़े हाथ थामे जब सामने से निकल जाते हैं तो शिवा की हथेलियां अपने सूखेपन से अकड़ जाती हैं और उसके बाद धुधली आंखों के सामने सारी हरियाली धुंधला जाती है ।   

बच्चों के लिये पीले चमकदार प्लास्टिक से बने खूबसूरत स्लाइड और गेम स्टेप्स के क्यूबिकल्स देखकर शिवा सोचती रही कि जि़न्दगी हमारे लिये जापानी तकनीक के ऐसे सुरक्षित सैंड पिट क्यों नहीं बनाती कि हम गिरें तो हमारे ओने कोने लहूलुहान होने से बच जायें !

बस, फिर अतीत के धूसर सायों ने इस कदर छा लिया शिवा को कि उसी शाम हरारत सी महसूस होने लगी और अगले दिन बुखार हो आया । जब मन और दिमाग पर कोहरा छाता है तो शरीर पहले अशक्त होने लगता है , फिर अनचाहा तापमान सिर से शुरु होकर पूरी देह को गिरफ्त में ले लेता है । वह तीन दिन इस बुखार से लस्त-पस्त पड़ी रही । शिवा को लगा, पार्क में जाकर बैठने की उसकी हिम्मत जवाब दे रही है ।

0 0

छोटी बेटी का टिफिन तैयार कर, शिवा अब अपने चाय के कप के साथ बाल्कनी में बैठी थी । इस बाल्कनी के साथ सुबह की बहुत सारी यादें जुड़ी थीं । कभी कभी वह अपने पति और अपनी तीनों बेटियों के पिता के साथ इस बाल्कनी में बैठकर चाय पीते हुए भरसक इस कोशिश में रहती कि बेटियां रात का कोई भी निशान उसके चेहरे या गर्दन पर पढ़ न लें । इस कोशिश में वह अपने चेहरे पर एक मुस्कान को ढीठ की तरह अड़ कर बिठाये रखती पर बेटियों के स्कूल , काॅलेज या नौकरी पर जाते ही वह मुस्कान अडि़यल बच्चे की तरह उसकी पकड़ से छूट भागती और वह जि़न्दगी के गुणा-भाग में फिर से उलझ जाती । ..... अब मुस्कान के उस खोल की ज़रूरत नहीं रही, उसने सोचा और बग़ैर शक्कर की चाय के फीके घूंट गले से नीचे उड़ेलती रही । कमरे की ठहरी हुई हवा में नय्यारा नूर की आवाज़ में फ़ैज़ की नज़्म तैर रही थी -

जिस घड़ी सीनों में डूबे हुए दिन                                                                      

आस्तीनों में निहा हाथों की राह तकने लगे                                                                     

आस लिये                                                                                                   

जब न कोई बात चले                                                                                        

जिस घड़ी रात चले                                                                                            

जिस घड़ी मातमी सुनसान सियाह रात चले                                                                 

तुम मेरे पास रहो ......

कब बेटी उससे कह कर चली गई - ‘‘ओ.के माॅम ! गोइंग । योर माॅर्निंग वाॅक फ्रेंड इज़ कमिंग टू सी यू ।  आय हैव केप्ट द डोर ओपन ! ( जा रही हूं । आपके सुबह की सैर वाले फ्रेंड मिलने आ रहे हैं । मैंने दरवाज़ा खुला छोड़ दिया है ! )‘‘ उसने सुना तक नहीं ।

अपनी कुर्सी के हत्थे पर एक झुर्रियों वाला हाथ देखकर शिवा चैंकी , ‘‘ अरे , आप कब .... ! ‘‘                                                         

‘‘मैं यहां एक मिनट नहीं ..... तो चालीस सेकेन्ड से तो खड़ा ही हूं । तुम्हारी बेटी ने इंटरकाॅम पर मेरा स्वागत किया और कहा - ममी ठीक हैं, चाय पी रही हैं, यू कैन गिव हर कम्पनी ! ....... लेकिन आप कहां खोयी हैं मैम ? ‘‘ , बूढ़े ने लाड़ भरे स्वर में कहा , ‘‘लाॅस्ट इन द स्काय ? आय हैव डिस्टब्र्ड यू .....परहैप्स .....!‘‘  फिर रुक कर किंचित मुस्कुराते हुए वाक्य पूरा किया ,‘‘ शायद मैंने आकर तुम्हारी दुनिया में खलल डाला ! ‘‘

शिवा ने आंखें ऊपर नहीं उठाईं ।

बूढ़े ने अब धीमे से कहा , ‘‘ मुझे लगा, तुम कहीं बीमार न हो, इसलिये देखने चला आया तुम्हें ।‘‘

‘‘साॅरी ! ‘‘ उसने माफी मांगी पर शब्द बुदबुदाहट में सिमट कर रह गये, बायें हाथ की उंगलियों ने उठकर धीरे से दूसरी कुर्सी की ओर इशारा किया , ‘‘ बैठ जाइये प्लीज़ ! ‘‘

बूढ़े ने सुना नहीं और कुर्सी पर अनमनी सी बैठी शिवा की आंखों में झांका ।

शिवा ने एकाएक महसूस किया कि उसकी आंखों की कोरों पर बूंदे ढलकने को ही थीं । ये आंसू भी कभी कभी कैसा धोखा देते हैं - बिन बुलाये मेहमान की तरह मन की चुगली करते हुए आंखों की कोरों पर आ धमकते हैं और बेशर्मी से गालों पर ढुलक कर मन के बोझिल होने का राज़ खोल जाते हैं ।

शिवा ने जैसे ही आंखें उठायीं, उसकी पनियाई आंखों से एक बूंद ढलक गई। बूढ़े ने उन आंखों में अपना अक्स देखा और धीमे से अपनी हथेलियां उसके चेहरे की ओर बढ़ा दीं ! उस मुरझाये चेहरे को दो बूढ़ी हथेलियों ने भीगे पत्तों की तरह जैसे ही थामा, चेहरे ने अपने को उस अंजुरी में समो दिया। गुलाब की पंखुरियों सा इतना मुलायम स्पर्ष जैसे कोई रूई के फाहों से घाव सहला रहा हो। हथेली के बीच आंसू अब पूरी नमी के साथ बेरोकटोक बेआवाज़ बह रहे थे । कोई बाड़ जैसे टूट गई थी । शिवा को लगा यह वक्त जिसका उसे सदियों से इंतज़ार था, यहीं थम जाये । बूढ़े की उंगलियां उसके बालों में हल्के से फिर रही थीं । उन अंगुलियों की छुअन कानों की लवों तक पहुच रही थी ! ..... शिवा भूल गयी थी कि एक फ्लैट की बाल्कनी होने के बावजूद यह एक खुली जगह थी - दायीं बायीं ओर बने टावरों की बाल्कनी में खड़े होकर या इसी इमारत के दूसरे बरामदों से उन्हंे देखा जा सकता था । जो अपने आंसुओं को अब तक अपने से भी छिपाती आई थी, वह आज इस तरह अपने को उघाड़ क्यों रही है। लेकिन उन हथेलियों की नमी थी कि शिवा अपने को हटा नहीं पा रही थी।

कमरे में हवा लहराने लगी थी । आंसुओं से भीगे चेहरे पर ताज़ा ठंडी हवा की छुअन पाकर शिवा ने अपनी मुंदी हुई आंखें खोलीं। उसके ज़ेहन में एक पुरानी भूली बिसरी पंक्ति बजी - टू डाय एट द मोमेंट आॅफ सुप्रीम ब्लिस ..... ।

जि़न्दा रहने के लिये सिर्फ़ इतनी सी छुअन ज़रूरी होती है, उसे नहीं मालूम था । इस छुअन को पाने की साध इतने बरसों से उसके भीतर कुंडली मारे बैठी थी और उसे पता तक नहीं चला । एक खूबसूरत सपने से जैसे लौट आई थी वह । उन हथेलियों पर अपनी पकड़ को वह कस लेना चाहती थी पर अचानक उसने पूरा जोर लगाकर अपने चेहरे को आज़ाद कर लिया ।

बूढ़ा अब बाहर फैले शून्य में ताकता हुआ खड़ा था । मुट्ठी बांधे अकबकाया सा । पास रखी खाली कुर्सी पर ढहते हुए उसने कहा, ‘‘आय‘म साॅरी ! ‘‘

कहने के बाद उसने बंधी मुट्ठी खोली और हथेलियों से अपने चेहरे को ढक लिया । भीगे  चेहरे को छिपाये वह बुदबुदाया , ‘‘आय‘म साॅरी , शिवा ! ‘‘ कुरते की जेब से रुमाल निकाला और अपने भीगी आंखों को पोंछा । बिना उसकी ओर देखे उसने जैसे अपने आप से कहा , ‘‘शिवा , मुझे क्यों ऐसा लगा जैसे बिंदा लौट आई है !..... मेरी बिंदा ! छह महीने से मैं उसे ढूंढ रहा था और वह यहां बैठी थी मेरे सामने । ....... शिवा, मुझे माफ कर देना ! मुझे आज वो बहुत दिनों बाद दिखी तो मैं अपने को रोक नहीं पाया ...... ‘‘ , और वह फफक कर रोने लगा ।

शिवा जैसे पत्थर की शिला हो गई। पथरायी सी वह उठ खड़ी हुई । चाय लाती हूं । उसके होंठ हिले और वह रसोई की ओर मुड़ गई ।

बिंदा ! तो यह छुअन शिवा के हिस्से की नहीं थी । शिवा के लिये नहीं थी । बिंदा के लिये थी ।

एक पनीले सपने से बाहर आते हुए उसके भीतर बार बार वह वाक्य बज रहा था - मुझे क्यों ऐसा लगा जैसे बिंदा लौट आई है ! यह गुलाब की पंखुरियों सा स्पर्श  शिवा तुम्हारे लिये नहीं था ! ज़ाहिर है । उसके हिस्से ऐसे मुलायम स्पर्श तो कभी आये ही नहीं । उसके हिस्से में पहला पुरुश स्पर्श  उस चुंबन का था जो होंठों पर जबरन प्रहार की तरह था - उसके अपने फूफा का - जब उसकी उम्र सिर्फ़ बारह साल थी , जिसके बाद होंठ तीन दिन तक सूजे रहे थे और वह अपनी मां, पापा, सबसे अपने होंठों को छिपाती रही थी जैसे कितना बड़ा अपराध कर डाला था उसके होंठों ने । उसे लगा था जैसे अब वे होंठ फिर से पहले जैसे होंठ कभी बन नहीं पायेंगे । लेकिन नहीं, ऐसा नहीं हुआ । वह फिर से लौट आई थी, जब उसकी शादी हुई , और उसने अपने वजूद को उतना ही नम पाया - फिर से एक भीगी सी छुअन के लिये तैयार ! पर शादी के बाद की वह पहली खौफनाक रात ...... पूरी देह पर जैसे चोट देते ओले पड़ रहे थे । उसके बाद वैसी ही अनगिनत रातें और बीहड़ चुंबन । होंठों ने दोबारा, तिबारा ,सौ बार, हज़ार बार धोखा खाया । खाते रहे । सालों साल । वे सारे चुंबन ऐसे थे जैसे उसके होंठ, अनचाही लार और थूक से लिथड़ लिथड़ कर बार बार लौट आते हों । वह उन्हें कितना भी पानी से धोती , तौलिये से पोंछती पर थूक और लार की लिथड़न उसके भीतर एक उबकाई की तरह जमकर बैठ जाती - उतरने से इनकार करती हुई । उसके बाद स्पर्श की नमी को तो भूल ही गई थी वह । सबकुछ भीतर जम गया था । नहीं सोचा था कि कभी यह बर्फ़ पिघलेगी । .....

........पर स्पर्श ऐसा भी होता है -हवा से हल्का , लहरों पर थिरकता हुआ और गुलाब की पंखुरियों सा मुलायम .....यह तो उसने पहली बार जाना । अब तक वह अपने जीने की निरर्थकता को स्वीकारती आई थी । आज उसे पल भर को लगा था कि अब वह मर भी जाये तो उसे अफसोस नहीं होगा । ...... पर यह तो ग़लती से एक नक्षत्र उसकी झोली में आ गिरा था । जब तक उसकी चमक को वह आंख भर सहेजती, उसकी झोली को कंगाल करता हुआ, नक्षत्र वापस अपने ठिये से जा लगा था ।

बरामदे में दो कुर्सियों के बीच की छोटी सी तिपाई पर उसने चाय का कप रख दिया । बूढ़ा जा चुका था ।

चाय का प्याला बरामदे में पड़ा पड़ा उसके सामने ठंडा होता रहा । उसने चाय को उठाकर अंदर वाॅश बेसिन में उलट दिया ।

0  0

अगले दिन वह पार्क गई । उसी बेंच पर बैठी । देर तक प्राणायाम की कोशिश में लगी रही पर अपने मन को एकाग्र नहीं कर पाई । जैसे ही आंखें बंद करती, लगता वह सफेद कुरता पास आकर खड़ा है । उसकी खुशबू भी हवा में घुलकर उस तक पहुंच रही थी । खुशबू को छूने के लिये वह आंखें खोलती तो वहां कोई नहीं होता । बस, पेड़ों की शाखों में हिलते हुए पत्ते थे । बीच में टहलने के लिये बने रास्ते पर एक के बाद एक अधेड़ अपने ट्रैक सूट में तेज़ चल रहे थे, दौड़ रहे थे पर वह ए.के. कहीं नहीं था ।

किसी तरह वह अधूरे प्राणायाम लेकिन सैर के पूरे बदहवास चक्कर लगाकर लौट आई । शिवा अपनी उम्र के पैसठ साल फलांग गई थी। उसने कहा था - वह पचास की लगती है। पैंसठ की हो तो भी क्या!  शिवा ने सोचा - उम्र से कहीं कोई फर्क नहीं पड़ता।

दो दिन। तीन दिन। चार दिन। आंखें उन नर्म कांपती हथेलियों को ढूंढती रहीं जिनमें उसका चेहरा था उस दिन । शिवा बेचैन हो उठी । रोज़ दिखता आसमान जैसे ढक गया था , बदली गहरा आई थी लेकिन उसके पीछे छिपे हुए सूरज की किरणें तेज़ थीं जो शिवा के भीतर जमे ग्लेशियर को पिघला रही थीं ।

पांचवें दिन शिवा के कदम खुद ब खुद उस सफेद कुरते और उधड़े हुए स्वेटर की उंगली की दिशा  में उठ गये। वही इक्कीसवां माला। फ्लैट नम्बर वही जो उसका है। फोन नम्बर में सिर्फ एक का फर्क। बस, बिल्डिंग का नाम अलग। ढूंढ पाना मुश्किल नहीं था ।

0

लिफ्ट का दरवाज़ा खुला और शिवा सकुचाते हुए बाहर निकली । क्या कहेगी । क्यों आई यहां । क्या वैसे ही जैसे सफेद कुरता चला आया था उसके घर, जब वह पार्क में कुछ दिन नहीं दिखी थी । क्या लौट जाये वह ?

शिवा दुविधा में थी ।

फ्लैट के बाहर ही चंदन की अगरबत्तियों का धुंआ और भीनी सी खुशबू आ रही थी । सामने खूब सारी चप्पलें पड़ी थीं । आखिर पोते पोती , नाती नातिनियों वाला घर है । उसके घर की तरह उजाड़ नहीं कि एक जोड़ा चप्पल न दिखे कभी । ......

फ्लैट का दरवाज़ा खुला था और सामने इतने सारे सिर - अड़ोसी पड़ोसी , नाते-रिष्तदार !

‘‘क्या हुआ ?‘‘  उसने हैरत से पूछा ।

‘‘ ए.के. के फादर नहीं रहे । रात को सोये तो बस, सुबह उठे ही नहीं ! ‘‘ एक सज्जन ने सूचना दी ।

क्या-आ ? शिवा की सांस थम गई । ऐसा कैसे हुआ ! उसे तो किसी ने यहां बुलाया नहीं था । आज ही उसके पैरों ने इस घर का रुख क्यों किया ? क्यों ? इस मलाल से कहीं बड़ा मलाल था कि उसके पैरों ने इस घर का रुख इतने दिन क्यों नहीं किया ? पूरे पांच दिन । रोज़ उसकी निगाहें पार्क में ही क्यों ढूंढती रहीं उसे । ये पैर पहले भी तो इस ओर मुड़ सकते थे । क्या उसकी उम्र आड़े आ रही थी ? शायद ..... शायद वह पहले यहां आ गई होती तो बिंदा से मिलने की ऐसी अफरा तफरी न होती इन ....इन ए.के. को ?....... गले के भीतर रुलाई का एक गुबार सा उठा जिसे नीचे धकेलने की कोशिश में उसका सिर वज़नी हो रहा था । मन ने चाहा कि यहीं से अपने को लौटा ले पर पैर अपने आप सामने खड़े लोगों के बीच से राह बनाते आगे को बढ़ चले , जहां ज़मीन पर एक रंगीन चटाई पर सफेद चादर से ढका वह चेहरा लेटा था - शांत , निस्पंद । कसकर भिंचे हुए पतले पतले होंठ !

शिवा एकटक आशीष कुमार के चेहरे को निहारती रही , जहां अब ‘आय एम साॅरी !‘ का कोई माफीनामा नहीं था । ‘कोई बात नहीं’- अब वह किससे कहती ! किस तक पहुंचाती जो वो कहना चाह रही थी और न कह पाकर अपने गले तक कुछ फंसा हुआ महसूस कर रही थी ।

ज़मीन पर बिछी हुई एक रंगीन चटाई पर लेटे हुए उस चेहरे पर एक अपूर्व शांति थी - कोई इच्छा, आकांक्षा, लालसा जहां बची न हो। खुली हुई मुट्ठी ऐसे खुली थी जैसे सबकुछ पा लेने के बाद, सबकुछ छोड़कर चले जाने की तसल्ली !

सहसा शिवा की निगाह उनके कंधों पर गई । वही क्रीम और ब्राउन धारियों में, उनकी अपनी बिंदा के हाथ की उंगलियों का बुना हुआ स्वेटर । ऐसे स्वेटर का बिना जाना और ऐसे सहेजते हाथों में उस स्वेटर को पहुंचा पाना , जि़न्दगी की नायाब हकीकत है । कितनी औरतें अपने पतियों के लिये ऐसे स्वेटर बुनतीं हैं पर वे उधड़ने के बाद भी ऐसे सहेजने वाले हाथों में कहां पहुंच पाते हैं। सारे स्वेटर हवा में तैरते रहते हैं और कोई हाथ उन्हें लोकने के लिये आगे नहीं बढ़ता । एक दिन वे सारे स्वेटर पूरे आसमान को ढक लेते हैं और उजाले की एक किरण को भी धरती तक पहुंचने नहीं देते । उसके गले तक आया रुलाई का गुबार आंखों के रास्ते बह निकला जैसे कोई बढ़ती आती लहर सूखी रेत को दूर तक भिगो दे। और फिर भिगोती चली जाये ।

आखिर अपनी बिंदा के पास वे इस उधड़े हुए स्वेटर को पहने बिना कैसे जा सकते थे । शिवा ने सोचा और अपने को तसल्ली दी । नहीं, उनकी जगह वहीं थी जहां वे इस वक्त चले गये हैं । क्या सचमुच - अपनी बिंदा के पास ?

शिवा एक साये की तरह मुड़ गयी। जैसे अपने को वहीं छोड़ आई हो।

पैरों ने अपने फ्लैट की ओर का रुख किया। जहां बाल्कनी की कुर्सी पर चाय का अनछुआ कप जैसे बरसों से अब तक वहीं 

hindi@pratilipi.com
+91 8604623871
सोशल मीडिया पर हमें फॉलो करें।
     

हमारे बारे में
हमारे साथ काम करें
गोपनीयता नीति
सेवा की शर्तें
© 2017 Nasadiya Tech. Pvt. Ltd.