मेरा पहला क्रश - भाग १

लड़कों से यार लगाके बात करने का मतलब जानती भी है क्या तू... कुछ समझती तो है नहीं .... मैं बड़ी बहन हूँ तेरी... क्या गर्दन हिला रही है... कुछ समझ भी आया क्या? हिमानी दी हर रोज़ की तरह मुझे डाँट लगा रही थी। वो अक्सर कुछ इस ही तरह की हिदायतें देती रहती थी।

वो गर्ल्स स्कूल में पढ़ती थी इसीलिए कुछ अजीबोगरीब किस्म की बातें करती रहती थी। वो मुझसे उम्र में दो साल बड़ी थी इसलिए मैं उनकी बात पे जवाब देने से बचती थी, लेकिन मेरा और मेरी सोना दी का स्कूल को- एड था यानि कि हम लड़के और लड़कियां साथ पढ़ा करते थे, उस समय लड़के लड़कियों का साथ पढ़ना बहुत आम बात नहीं थी पर मेरे घर में हम दोनों बहनों को ये मौका मिला था.... अब चूंकि मेरे शुरुआत से ही लड़के भी क्लासमेट रहे थे तो दोस्त भी थी कुछ लड़के। मेरी बड़ी बहन सोना दी.... कद में लंबी.. छरहरी काया ... हसमुख स्वभाव और आत्मविश्वास से भरी हुई। सोना दी मुझसे पांच साल बड़ी थी... इसके बावजूद भी वो शैतानी में मुझसे बहुत आगे थीं... खैर जो भी था.. वो मेरी सबसे प्यारी सहेली थीं।

हम दोनों एक ही स्कूल में पढ़ते थे... वो बारहवीं में.. और मैं सातवी में। यूं तो सोना दी पढ़ाई में भी अच्छी थी पर स्कूल में भी उनकी शैतानियां कम नहीं होती थी... इसलिए अक्सर घर में उनकी शिकायत आया करती थी... खैर उन्हें किसका डर पड़ा था। वो मस्तमौला ज़िन्दगी जीने में विश्वास रखने वाली... थोड़ी मस्तियों के कारण डाँट पड़ भी जाती है तो पड़े उनकी बला से।

क्रश.... ये शब्द पहली बार सोना दी के मुँह से ही सुना था... इस साल उनकी क्लास में एक नये लड़के की एंट्री हुई थी... के. के. लाठा (कृष्ण कान्त लाठा) ... जिसका नामकरण दीदी ने केकड़ा किंग लाठा किया हुआ था... अक्सर सोना दी के मुँह से यह नाम सुनने में आया करता था। आज संडे था और सोना दी की सहेली घर आने वाली थी... नेहा। खैर कोई नयी बात नहीं थी.. नयी बात तो तब होती थी जब वो खुद के घर जाती थी। वो सोना दी की दोस्त होने के साथ साथ दूर के रिश्ते से हमारी बुआ भी लगती थी, रिश्तेदारी के साथ साथ दी की दोस्ती भी थी, तो दिन भर हमारे घर में आना जाना लगा ही रहता था।

नेहा बुआजी... पहली बात तो ये कि उन्हें बिलकुल पसन्द नहीं था कि मैं उन्हें बुआ बुलाऊँ... उनका कहना था, कि वे सोना दी की उम्र की हैं तो मुझेउन्हें भी दीदी बुलाना चाहिए। खैर उन्हें बुआ बुलाने का असल कारण तो यही था कि मैं जानती थी कि उन्हें बुआ सुनना पसंद नहीं है। शायद वो मुझे ज्यादा पसंद नहीं थी, पर उन्हें न पसन्द करने के पुख्ता कारण भी थे मेरे पास... सबसे पहला तो यह कि वो जब भी आती तो ज़ोर से दरवाज़ा खोलती... धड़ाम... और तो और दरवाज़े पर से ही चिल्लाती- "सोना... मैं आ गयी"।

जैसे न जाने कितने बरसों बाद आई हैं... और बताना भी ज़रूरी रह गया कि मैं आ गयी नहीं तो हमें पता कैसे चलना था। दूसरा कारण यह कि घर आते ही सोना दी से चाय की फरमाइश करती... और चाय मुझे बनानी पड़ती... क्योंकि जब मेरी सहेलियां घर आती तो सोना दी चाय बनाती थी। पर मेरी सहेलियां तो मुश्किल से दो तीन महीने में एक बार आती थी। तीसरा और सबसे बड़ा कारण वो जब भी आती थी तो सोना दी कमरे में बैठकर उनसे गपशप लगाती थी और मुझसे बात ही नहीं करती थी।

जलन .... हाँ ... शायद जलन ही थी... पर होगी भी क्यों न.. एक सन्डे ही तो मिलता था हम दोनों बहनों को बतियाने का... बाकि के दिन तो स्कूल ट्यूशन होमवर्क वगैरह.... । खैर किया भी क्या जा सकता था... वो सोना दी की दोस्त थी.. और बुआ भी। पर आज तो कमाल ही हो गया था... शाम ढलने को थी पर अब तक नेहा बुआ जी हमारे घर की परिक्रमा को नहीं आई थी । मैं अपना ड्रीम सन्डे एन्जॉय कर रही थी... दिन भर दी के साथ खूब गपशप लगाई थी ... टी पार्टी की थी... और शाम होते होते नींद के आगोश में समां गयी थी। मैं सो ही रही थी तभी धड़ाम की आवाज़ आयी... किसी ने जोर से दरवाज़ा पटका था... मैं समझ गयी ... आ गयी मेरी दुश्मन। मैं सोने का नाटक करने लगी... और करती भी क्या... अगर उठटी तो मुझे चाय जो बनानी पड़ती।

मुझे सोया हुआ जान कर सोना दी और नेहा बुआजी नें गपशप लगानी शुरू कर दी। हे भगवान। कहाँ फस गयी... मैंने खुद से कहा... मुझे उन दोनों की बातों में ज़रा भी रुझान नहीं था। बड़ी लड़कियों की बातें न जाने क्यों इतनी बोरिंग होती हैं... शायद इंटरस्टिंग हों... पर समझ भी तो आए। तभी मैंने सुना सोना दी कह रही थी- "जो भी है.. केकड़ा किंग है तो क्यूट" ,पता है मुझे उसकी सबसे अच्छी बात क्या लगती है? दी नें पूछा।

क्या?? नेहा दी ने सवाल के जवाब में सवाल किया।

"उसका ड्रेकुला टूथ" सोना दी ने जोर से हंसते हुए कहा (ऊपर वाले जबाड़े का साइड वाला दांत कुछ उठा होने के कारण)

ओह्ह न्यू क्रश.. रहने दे सोना जब तक उसका दिल तुझ पर आएगा तू ही कहती फिरेगी.. गधा है...ही इज़ नॉट माय टाइप... नेहा बुआजी ने जवाब दिया। तू चुप रह.... प्यार और क्रश दो अलग फीलिंग्स हैं.... दी ने कहा। वो कैसे.. नेहा बुआजी ने पूछा। अर्रे पगली... क्रश तो मुझे सलमान खान पर भी है तो क्या... और वैसे भी यह तो तेरी और मेरी मस्ती की बातें हैं.. ऐसे क्रश तो हर महीने बनते और क्रश हो जाते हैं.... हाहाहाहा दोनों ने ठहाका लगाया। दी की हलकी फुलकी बातें सुनकर मुझे बड़ा मजा आने लगा था... और मैं सोचने लगी... कोई लड़का कभी मुझे भी पसंद आएगा क्या... लड़का.. मेरी क्लास में भी कितने लड़के हैं.. क्या उनमें से कोई... पर उन सब को तो मैं कभी न कभी राखी बांध चुकी हूँ।

हमारे स्कूल का भी अजीबोगरीब रिवाज था... हर रक्षाबंधन पे क्लास के लड़कों को लाईन में लगा के राखी बांधनी होती .... शायद इसी के चलते रक्षाबंधन के आगे पीछे वाले दिन स्कूल में लड़कों की संख्या बहुत ही कम होती ... फिर भी कुछ नाम तो निकल ही आएँगे जिनको अबतक राखी न बांधी हो... पर क्या ये संभव है... जिन लड़कों को बचपन से मैंने मार खाते देखा है... आपस में गाली गलौज करते, लड़ते देखा है... और तो और मुर्गा बनते भी देखा है, उस पर क्रश कैसे आ जाएगा। तो मतलब मेरी क्लास में भी एक नई एंट्री होगी... जो बनेगा मेरा फर्स्ट क्रश। अरे वाह सोच कर ही अच्छा लग रहा है। खैर अभी तो नया साल आने में ग्यारह महीने बाक़ी है... मैं खुद ही से बतिया रही थी।

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