'गिरिया आज दो दिन बाद हस्पताल से आया है' गिरीश की माँ बरसती आँखों को पोछते हुए उरमी की माँ को ये खबर बताई. गिरीश की माँ की आवाज़ सुनते ही उरमी का मुंह बन गया. 'अब गंगा- जमुना बहा-बहा के माँ से कुछ पैसे मांग ले जाएगी' उरमी अपने में ही फुसफुसाई.

गिरीश अपनी माँ के साथ उरमी के पड़ोस में ही रहता था. आर्थिक हालत उतनी अच्छी नहीं होने के कारन गिरीश की माँ अक्सर उरमी की माँ से कुछ मदद माँगा करती थी. पर उरमी को लगता था ये सब उसके चोंचले हैं.

'बदन पीला हो गया है, मुंह सूख गया है, दो दिन में ही ५ केजी काम हो गए हैं' गिरीश की माँ ने फिर रोते हुए कहा.

'दो दिन में ५ केजी' सुन कर उरमी की आंखे फ़ैल गयी, मुंह खुल गया और कान बैठक की दिवार से जा चिपके.

'का जाने कहाँ से खा आया चाट, घर घुसते ही जो दर्द और पैखाना... शरीर टूट गया मेरे बच्चे का... बुहुहु....’ फिर एक लम्बी हिचकी.

उरमी के दिमाग में तो बस ये चल रहा था की आखिर कहाँ से आया वो चमत्कारी चाट, कि दो दिन में ५ केजी कम हो गए.

उरमी 24 साल की एक जवान और खूबसूरत लड़की थी. जी हाँ चेहरे की बात की जाय तो वो दीपिका पादुकोण से कम न थी, मगर बेचारी शारीरिक काया में मात खा जाती थी. ५ फुट २ इंच के कद पर ७५ केजी का बोझ. चरबी आपस में गुथमगुथा थे, और हर अंग से गरीब की आशीर्वाद की तरह बेमांगे छलक रहे थे. व्यायाम, प्राणायाम की बात कौन कहे उरमी तो इस आयाम से उस आयाम तक सारे उपाय कर चुकी थी. खाने-पिने पर भी खूब पाबन्दी लगायी, मगर जैसे की उसको छूने वाली हवा भी चरबी बन कर उसके बदन से चिपक जाती हो. दिन भर उपवास रखा जाता जिसमे दो-तीन केजी फल और आधा केजी खोया-रबड़ी, के अलावा कुछ न खाया जाता, मगर शाम को वजन मापक पर चढ़ो, तो घमंडी सुइयां, निचे आने की जगह और उछल कर ऊपर भागती। और यहाँ तो दो दिन में ही ५ केजी का सवाल था.

माँ से अनुमति ले उरमी गिरीश को देखने चली गयी, या असल में उस राज का पता लगाने चल पड़ी.

गिरीश ऑंखें बंद किये अपने बिस्तर पर पड़ा था. वह तो सच में सूख गया था, गाल सूखे पापड़ी की तरह पिचक गए थे.

'अहा, काश की मेरे गाल भी ऐसे हो जाय, दो किलो लड्डू चढ़ाउंगी गणेश जी' उरमी ने मन्नत की.

'गिरीश कैसे हो तुम?' उरमी की आवाज़ पर गिरीश ने ऑंखें खोली.

'अब बहुत अच्छा हूँ, माई की दो दिन की सेवा...'

'हाँ हाँ हाँ.. ' उरमी ने बिच में ही उसे टोका। मायीगाथा में उसे विशेष दिलचस्पी नहीं थी. उसे तो उस राज को जानना था.

'कहाँ? कहाँ खाया वो चाट तुमने?' उरमी सीधे मुद्दे पर आयी. लेकिन तुरंत ही उसे अपनी गलती का एह्साह हुआ.

'मेरा मतलब, मैं भी वहां चाट न खालूं, वरना मेरी माँ को भी तुम्हारी माई की तरह तकलीफ होगी न और मुझे भी' उरमी ने बात संभाली.

'हाँ, वो तो है. वो चौपाटी पर है न रमता ठेला, वहीँ खायी थी मैंने, पापड़ी चाट, वहां कभी मत खाना' गिरीश ने हिदायत दी.

'हाँ-हाँ, उसके आस-पास तो मैं फटकूं भी ना. अच्छा गिरीश मैं चलती हूँ, शाम हो रही है ना, तुम आराम करो'

उरमी का मिशन पूरा हो गया था, वहां रुकना अब बेफजूल था. सो वो निकल गयी.

उरमी के मन में बड़े बड़े तरंग उठ रहे थे, खूब मसालेदार चाट बनवाएगी, जितना ज्यादा मसाला होगा, पेट में उतनी ही गड़बड़ी और उसके लिए उतना ही फायदेमंद.

'अगर एक प्लेट से काम न बना तो, आखिर हूँ भी तो मैं गिरीश से ज्यादा मोटी। ना ना मोटी नहीं, गिरीश से बस एक -दो केजी ही ज्यादा होगा। अच्छा दो प्लेट खा लुंगी, काफी तीखी बनवाकर.' उरमी सपने देखते हुए रमता ठेले पर पहुंच गयी थी.

ठेले पर अभी कोई न था, अपने हिसाब का दो फुल मसालेदार, फुल प्लेट बनवाकर खाने पर भी उसके चित को शांति न मिली, लगा कहीं कुछ रह गया है, तो एक प्लेट और आर्डर मार दिया. अब अगले प्लेट के लिए न पेट में जगह बची थी, न बटुए में पैसे, सो आज यहीं पूर्णविराम लगाना परा.

घर पहुंचते - पहुंचते मेरे पेट में जोर का दर्द होगा, फिर मैं पोट्टी करने जाउंगी. १०० ग्राम- १०० ग्राम हर बार कम होगा, तो एक दिन में २५ बार जाना होगा, तब २ दिन में ५ केजी कम होंगें। मगर एक दिन में २५ बार गुशलखाने के दर्शन... सोच का उरमी का दिमाग चक्कर खाने लगा. नहीं नहीं भगवान एक बार में कम से कम २०० ग्राम, नहीं नहीं २५० ग्राम तो कम होना ही चाहिए. '

उरमी एक घंटे से खुद को गुसलखाने में बंद कर के बैठी थी. 'गिरीश को तो घर में घुसते ही पेट दर्द सुरु हो गया था’ उसने सोचा. मगर उरमी तो एक घंटे से दर्द शुरू होने की मिन्नत कर रही थी. अचानक उसे लगा की पेट में सच में थोड़ा दर्द हो रहा है, जो दर-असल मसालों के कारन होने वाली जलन थी.

'आह कितना तेज मगर मीठा है ये दर्द' उरमी ने अपनी कल्पना में हलके जलन को भीषण दर्द का रूप दे दिया. मगर पोट्टी को ना आना था सो ना आया.

आज तीसरे दिन भी उरमी रमता पापड़ी चाट खा रही थी, आखिर धैर्य ही तो सफलता की चाबी है. प्लेटों की संख्या और मसालों की मात्रा दिन-प्रतिदिन बढाती जा रही थी. मगर बेचारे पेट के पचाने की भी सीमा होती है. और चौथे दिन घर पहुंचते पहुंचते उरमी सच में पेट पकड़कर बैठ गयी.

उस भीषण दर्द के बीच भी गुशलखाने में घुसने से पहले और निकलने के बाद बैठक में जाकर वजन देखना न भूली| मगर ये क्या सुइयां टस से मस न हुई. 'मगर पोट्टी भी तो न हुई ज्यादा, बस ढेर सारा पानी ही तो निकला शरीर से बाहर। अगली बार शायद ज्यादा पोट्टी होगी, फिर मशीन दिखायेगा असली वजन' उसने सोचा|

माँ पिताजी उसे लेकर अस्पताल गए. मारे दर्द के तो उसका बुरा हाल था, पर फिर भी अंदर कहीं एक ख़ुशी भी थी की, अब उसकी तपस्या फल लाएगी. उरमी की हालत ज्यादा ख़राब होने के कारन उसे चार दिनों तक अस्पताल में रहना पड़ा. इन चार दिनों में वो कितनी बार पोट्टी के लिए गयी और कितना वजन कम हुआ उसे कुछ नहीं पता. वो तो हर बार अपना वजन देखना चाहती थी, मगर अस्पताल में ऐसी सुविधा मौजूद न थी. काश की अस्पताल आते वक्त मैं अपना मशीन भी ले आती, उसने कई बार ऐसा सोचा था.

उरमी सच में बहुत कमजोर हो गयी थी. न चल सकने की हालत में भी किसी तरह गिरते परते अपने वजन मापक पर पहुंची. ‘चार दिन में १० केजी.. चार दिन में १० केजी…’ बुदबुदाते हुए वो मापक पर चढ़ी. अब १० केजी तो नहीं, किन्तु ६८ की संख्या के साथ, मापक ने पहली बार दोनों बाहें खोल कर उरमी का स्वागत किया था. उरमी के तो सारे दर्द, सारी तकलीफ जैसे गायब हो गयी. जो काम बड़े बड़े पांव चक्की (ट्रेडमिल) और अंडाकार मशीने(एलिप्टिकल ट्रेनर) न कर सकी थी, वो रमता ठेले की छोटी सी पापड़ी चाट की प्लेट ने कर दिखाया था|

उरमी दिन भर माँ के हाथ से फल, दवाइयां खाती और जल्दी से ठीक होने का इंतज़ार करती, ताकि वो मिशन २ पर लग सके. आखिर एक हफ्ते बाद उसकी हालत इतनी सुधर गयी कि अब वो कुछ भी खा सकती थी.

शाम को उरमी रमता ठेले पर जाने के लिए तैयार थी. सोचा जाने से पहले वजन नोट कर ले. मापक पर चढ़ी तो, मापक चीर सत्य की तरह ७५ की ग्रा पर अटकी पड़ी थी. उसे अपनी आँखों पर विश्वास ना हुआ. वो बार बार मापक पर चढ़ती, उतरती. उसे ठोकठाक कर ठीक करने की कोशिश की, लगा मुआ मशीन में ही कुछ गड़बड़ी होगा. फिर चुपके से अपने कुत्ते टूना को उस पर चढ़ाया, जब उसका वजन सही दिखाया तो उसे विश्वास हो गया की नियति ने बड़ा छल किया उसके साथ| उरमी का दिल टूट गया था, एक धोखा खाये प्रेमिका की तरह चुप चाप बाजार जाने वाले कपडे बदले और व्यायामशाला के कपड़ो में आ गयी.


उरमी अब वजन कम करने के लिए रमता ठेले पर नहीं जाती, व्यायामशाला ही जाती है. मगर उसने एक काम किया है, वजन मापक को बैठक से हटा कर गुशलखाने के सामने लगवा दिया है. आज भी जब भी वो गुशलखाने में पोट्टी करने जाती है, तो जाने से पहले और निकलने के बाद अपना वजन जरूर मापति है. अब पता नहीं वो अपना वजन मापति है, या अभी अभी निकले हुए पोट्टी का वजन.

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