माया महाठगिनी हम जानी

तीन तिरिक्का तीस: न जाने किस मनहूस घड़ी में बाउजी ने नाम धर दिया था - बेचन प्रसाद, वरना श्रीमान् अपने तन-बदन के किसी कोने से बेचन टाइप के नहीं बुझाते थे। न चेहरे-मोहरे से, न चाल-ढाल से, न ही व्यवहार-बात से। अब यह बात और है कि उनमें सौदेबाजी के तमाम सद्गुण किशोरावस्था से ही फूटने लगे थे। मसलन 63 के संबंध को 36 बनाकर दम लेना। 6 को डायरेक्ट 9 बना कर सिद्ध कर देना। तीन में तेरह भिड़ा देना और तीन तिरिक्का तीस साबित कर देना। तो श्री बेचन प्रसाद की दोनांे आँखें बज्र काले रंग की थीं। चेहरे के दोनों गाल इस कदर भरे-पूरे मानो महोदय प्रतिदिन हलवा, पूड़ी, तस्मई और घी में नाक डुबोए रहते हों। तिस पर रेशम की तरह चमकदार आबनूसी दाढ़ी के रौब का क्या कहना ? उमिर भी तो कुछ खास नहीं थी। यही कोई 25 के कुछ इधर-उधर। अपनी ऐंठन और रोबदाब में बेचन प्रसाद उच्च कुलोत्पन्न जान पड़ते थे। ठीक अंगूठी के मानिंद गोल-गोल घूमे हुए बालों को ऐसे संवारते मानो पृथ्वीराज चैहान के सगे भांजे हों। सिर से पाँव तक वे बला के खूबसूरत आतंक थे बाप। कुछ कमी थी, तो बस एक ही, कि पते की बात कहते समय उनकी दाईं आँख अनायास ही दब जाती थी, हाँ अनायास ही। जान-बूझकर थोड़े। इतना ही नहीं, उनके ऊपरी और निचले होंठ दाहिना कोने पर बड़ी अदा से दबकर आँख से कदमताल मिलाते। यह भी ईश्वर का कोई चक्र ही होगा जो बेचन प्रसाद अपने गुण, स्वभाव और व्यवहार के विपरीत आकर फंस गये साहित्य में। बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से बी. ए. उŸाीर्ण होकर जब वे स्नातकोŸार करने के लिए महानगर की ओर मुँह किए, तो यह उनके मुड़े हुए बालों के सीधे होने के दिन थे, चेहरे से दाढ़ी और मूँछ की विदाई के दिन थे। भेाले-भाले गालों के सख्त होने और बनारस की गलियों में चप्पल चटकाने की जगह रीबोक का जूता गांठने के दिन थे। इस महानगर को बेचन प्रसाद ने न जाने किस निगाह से देखा कि धीरे-धीरे उनकी ही आँखें उल्टी होने लगीं। पांवों पर खड़े होने का अभ्यास भले ही अपने बज्र देहाती गाँव से किया हो, किन्तु इस माया नगरी में अपना पता सही-सही नहीं बताते थे। किसी को भी अपना पता देते समय बनारस से नीचे उतरते ही नहीं थे। पूछने वाला बाल की खाल निकालता ‘प्रापर बनारस में ?’ उŸार उसे नपा-तुला मिलता - ‘एक दम, एक दम।’ किसी की मजाल क्या जो बेचन प्रसाद के पिता का व्यवसाय जान ले। वैसे इस रहस्य से पर्दा उठा ही दिया जाय कि महोदय के पिताश्री प्राइमरी स्कूल के मास्टर थे। तीन तिरिक्का नौ पढ़ाने वाले, बच्चों को गाय का मतलब माता समझाने वाले और घर से सीधे स्कूल, फिर स्कूल से सीधे घर जाने वाले।

बात यह है कि बेचन प्रसाद को यह महानगर ऐसा जंगल बुझाया जिसमें शेर, चीता, भालू, बाघ या सांड़ का रूप धारण किया जा सकता था । मौके की नजाकत भांपते हुए उन्हें बिल्ली, कुŸाा, सियार या गीदड़ बनने से भी कोई परहेज नहीं था। ‘जैसा देश, वैसा भेष’ का मुहावरा इन पर खूब सटीक बैठता था। यह महानगर उन्हें धरती पर साक्षात् स्वर्ग भी नजर आया, जहाँ वे आसमान से तारे तोड़ सकते थे। देवताओं के दर्शन पा सकते थे, ईश्वर के सिपाहियों से हाथ मिला सकते थे, छŸाीसों व्यंजन का मजा लूट सकते थे और अप्सराओं के केश से उड़ती हुई खुशबू में पागल हो सकते थे। शत प्रतिशत संभावना है कि बेचन प्रसाद को महानगर खुला मैदान नजर आया हो, जिसमें वे भर तबियत दौड़ सकते हैं, दण्ड मार सकते हैं, मन मुताबिक साधना कर सकते हैं और अपनी दुकान चमका सकते हैं। महानगर की हवा का प्रथम स्पर्श पाते ही बेचन प्रसाद काल्पनिक आनन्द की सिहरन से भर उठे। आठों दिशाओं से अथाह रोशनी में नहाता हुआ महानगर। जहाँ न जमीन दिखती है, न आसमान। न सुबह दिखती है, न शाम, न आगे दिखता है, न पीछे। बेचन प्रसाद को वैसे भी साफ चीजों से एलर्जी थी। यह महानगर उनकी चाहत के अनुसार फिट बैठ गया। फिर देरी किस बात की ? बेचन प्रसाद इस महानगर के हो गये और यह शहर बेचन प्रसाद का। चूर-गांठ फिट बैठी। बोलिए प्रेम से महानगर की...........? महानगर के नामी विश्वविद्यालय में दाखिला मिलना किसी कम्पटीशन में बाजी मारने से कम नहीं था। बेचन प्रसाद सफलता के मामले में अपनी क्षमता से ज्यादा अपनी वाणी पर भरोसा करते थे। कहाँ, कब, किस मौके पर क्या-क्या बातें करके कठिन से कठिन स्वभाव वाले इंसान को पटा लेना है- यह कला उनके रोम-रेाम में बसी हुई थी। एम. ए. हिन्दी प्रथम वर्ष के प्रथम मास में ही वे कई विभागीय शिक्षकों के चहेते बन गये। गुरुवर के क्लास से बाहर होते ही बेचन प्रसाद किसी शिकारी जीव की तरह लपक पड़ते। गुरुवर से मद्धिम टोन में संबंध साधने की शुरुआत होती किसी साहित्यिक प्रश्न से और समापन होता उनके सादर चरण स्पर्श से। बातचीत के बीच-बीच में वे अपनी उन उपलब्धियों का बखान करना न भूलते, जिसकी वे बार-बार कल्पना करते या उसको हासिल करने लायक खुद को अवश्य मानते। इतना ही नहीं, बेचन जी अपनी विद्वता का भी प्रदर्शन करते रहते, भले ही पक्के ज्ञान के अभाव में उसमें नमक-मिर्च लगाना पड़े। मौन भक्त की तरह पीछे-पीछे चलने वाले शिष्य भला किस शिक्षक को प्रिय नहीं लगते ? बेचन प्रसाद ने अपनी शरीर की किसी कमजोर नस को पकड़़ा हो या नहीं, मगर शिक्षकों की कमजोर नस को बखूबी पकड़ लिया था। पकड़ तो यह भी लिया था कि सेवा-मेवा और सत्कार के मामले में भी गुरु लोग दुर्बल होते हैं। इसीलिए बेचन प्रसाद कभी अपने गुरुवरों का बैग उठा लेते, कभी फल-सब्जियाँ खरीद लाते और कभी बाइक पर बैठाकर मार्केट घुमा लाते। जहीन से जहीन विद्यार्थी क्यों शिक्षकों की उपेक्षा झेलते और बेचन प्रसाद, गोबर दास होकर भी शिक्षकों के चहेते शिष्य बने रहते- यह खुला रहस्य था। साल भर के अन्दर बेचन प्रसाद ने गुरु भक्ति के सारे रिकार्ड तोड़ दिए और परले दर्जे

की निर्लज्ज मूर्ति बन गये। इससे उन्हें क्या फर्क पड़ता था उन्हें कैसी निगाहों से देखा जा रहा है ? उनको लेकर कैसे-कैसे मुहावरे गढ़े जा रहे हैं ? उनके व्यक्तित्व को किन-किन उपमाओं से विभूषित किया जा रहा है ? पहला वर्ष पूरा होते-होते बेचन प्रसाद रिझाने, पटाने और खुश करने की कला में सिद्धहस्त हो गये, बादशाह हो गये। उनकी इसी कला ने उन्हें एम. ए. प्रथम वर्ष प्रथम श्रेणी में उŸाीर्ण कराया। इसी कौशल के बूते उन्हें वाद-विवाद प्रतियोगिता में द्वितीय पुरस्कार मिला और इसी हुनर के बल पर वे स्कालरशिप भी हथियाने में सफल रहे। विभाग के गुरुओं द्वारा मिलता हुआ कई किलो आशीर्वाद और स्नेह बेचन प्रसाद को कर्महीन, रीढ़हीन, विचारहीन बनाने के लिए काफी था। अब तो वे गाहे-बगाहे दोस्तों के बीच अपनी ऊँची पहुँच का रोब गांठने का कोई मौका न चूकते। बिना परिश्रम के सफलता पाने वाले का दिमाग सबसे ज्यादा चढ़ता है। आए दिन महाशय आउट आॅफ कन्ट्रोल होने लगे। मित्र मण्डली में शेखी बघारने लगे। आँखों में धूल, कान में मिर्च और मन में जहर घोलने लगे। अपने-अपने गाँव की ठेठ गालियाँ मन में बकने के बावजूद किसी बबुआ के अन्दर कलेजा नहीं था, जो बेचन बाबू की बात काट सके, उनकी भभकी का जवाब दे सके या उनके गुब्बारा-ज्ञान पर सवाल खड़ा कर सके। ‘नाचे गावे तूरे तान, ताकर दुनिया राखे मान’ मुहावरा खास बेचन के लिए ही बनाया गया था। धीरे-धीरे मित्रों के बीच लाइलाज बला का दूसरा नाम बन गये बेचन प्रसाद। एम. ए. पूरा होते-होते उनमें नये सद्गुणों ने प्रवेश किया। विश्वविद्यालय की कैन्टीन या ढाबों पर 4-6 यारों के साथ बैठाकर धुँआ फेंकने लगे। शुरुआत खों-खों-खों से हुई और सफलता मिली सामने बैठे हुए दोस्त के मुँह पर धुँआ मारने के रूप में। जबकि दिन-दूनी रात चैगुनी प्रगति के रास्ते पर बेचन प्रसाद चल पड़े थे, तो विराम क्यों लगता ? अचानक किसी रात उन्हें आत्मज्ञान मिला कि किसी सुकन्या से सत्संग के बिना जीवन बेमानी है, अकारथ है। मगर इसमें एक भारी अड़चन थी- मनी। आजकल पैसे के बिना युवतियां अपना नाम तक नहीं बतातीं। मगर सनक भी किसी नशे का नाम है कि नहीं ? बेचन प्रसाद ने अपनी स्कालरशिप के पैसे जुटाकर दो-तीन महीने के अन्दर एक सेकेण्ड हैंड पल्सर बाइक खरीद ली। यह लीजिए, ठीक अगले महीने एक सुकन्या बेचन प्रसाद के साथ उड़ने को तैयार। री-बोक ब्रांड जूता पहले से कसते ही थे, युवती की सिद्धि प्राप्त करते ही चश्माधारी भी हो गये बबुआ। सुकन्या की आँखों से बात करते-करते आँखें ऐसी फिरीं कि बेचन प्रसाद अपने दोस्तों के चेहरे और नाम तक भूल गये। अब अपने मित्रों के बीच बैठकर वक्त गंवाना बेचन प्रसाद पृथ्वी का सबसे निरर्थक काम समझते थे। गुरुओं को भी बेचन प्रसाद की असाधारण सफलता की खबर लगी, जिनमें से एकाध चिन्तित हुए, किन्तु अधिकांश ईष्र्या के मारे जल-भुनकर बुŸा बन गये। ‘‘इ बेंचना ? इसके लच्क्षन तो शुरू से अच्छे नहीं दिख रहे थे। चला दोस्ती गांठने, वो भी पैसे पर मुस्कुराने वाली लड़कियों से। चार-छः महीने में होश ठिकाने न आ जाय- तो कहना।’’

गुरुभक्ति का फल कितना स्वादिष्ट होता है बेचन प्रसाद ने इसकी कल्पना दो साल पहले ही कर ली थी। उन्हें अपनी कलम पर संदेह हो सकता था, मगर गुरुओं की कलम पर ? सवाल ही नहीं उठता। एम. ए. विशुद्ध प्रथम श्रेणी में उŸाीर्ण हुए बेचन प्रसाद। चायबाजी हुई, धुंएबाजी चली, मिठाइयों का भी दौर चला, किन्तु सफलता के गुरूर को कैसे ठण्डा करें कुछ समझ में नहीं आ रहा था। आखिर वह स्वर्णिम दिन भी आ गया, जिसका बेचन प्रसाद दिवा स्वप्न देखा करते थे। बुलाया एक शाम अपने करीब दस सहपाठियों को, सबके सब जूनियर बेचन प्रसाद। कान काटने में एक से बढ़कर एक। फोकट में जहर मिले तो गटक जाने वाले। बाबू बेचन जी ने आज खासमखास इन्तजाम कर रखा था। हल्के लाल पानी की पाँच बोतलें, चार पैकेट नमकीन, चिकन फ्राई और सलाद। कोई तख्त पर, कोई स्टूल पर, तो कोई चटाई फैलाकर नीचे ही बैठ गया, मानो किसी जग्ग परोजन में भोज करने आया हो। सबका पैग बेचन प्रसाद ही बना रहे थे। सबने पैग कुछ ऐसे हाथ में लिया, मानो चरणामृत पीने जा रहे हों। चार घूंट मारते ही अधिकांश का दिमाग चढ़ने लगा। बीच में किसी ने कुरेद दिया- ‘का भयवा, गुरु जी लोगों को खूब पटाया, मार लिया बाजी।’ मानो बेचन प्रसाद को बहकने का दांव मिल गया- ‘तेरे में इतना दम है, जो मेरे जितना गुरुओं की सहता। बहुत झेलना पड़ता है, पूछ मत।’ इसी बीच किसी और को दारू-देवता चढ़ गये थे - ‘‘तू सचमुच में गुरुओं का सम्मान करता है ? या फिर.........?’ प्रश्न को सुनते ही बेचन प्रसाद ऐसे हँसे मानो रेफरी को बेवकूफ बनाकर रेस जीती हो, बोला - ‘तुम्हें मैं इतना लल्लू लगता हूँ ? सब बन्दे का खेला था। आजकल दिल से टीचरों की इज्जत कौन करता है ? तू करता है ? बता ? अरे, टीचर हमसे अपना काम निकालते हैं और मैं उनसे अपना। हिसाब बरोबर। बीच में इज्जत-विज्जत की बात कहाँ से आती है ? ‘कबे बड़ा धूर्त है तूँ, अपने गुरुओं से स्वार्थ साधते हुए तुम्हें शरम नहीं आती ? ‘बेटा ! छोड़ शरम-वरम की बात और मजे कर। कुच्छ नहीं रक्खा है- नैतिकता, सीधेपन, सच्चाई और निष्ठा में। ये सब क्लास में पढ़ाए जाने वाले ढकोसले हैं। तुझे क्या लगता है, जो टीचर वेदव्यास की तरह बोलते हैं - वे क्या ऋषि-मुनि के अवतार होते हैं ? आजकल वे भी नौकरी की लालच में सरकार का हुकुम बजाते हैं।’’ ताक् धिना धिन् सफलता, दारू और दौलन का नशा एक ही ढंग से चढ़ता है। बेचन प्रसाद अब बच्चू भैया कहलाने लगे। इसी बीच अचानक न क्या सूझा कि दाहिने हाथ में ‘जय माता दी’ का चुल्ला पहन लिया, हल्की दाढ़ी रख ली और गले में छोटी गुरियों वाली तुलसी की माला डाल ली। सामने वाले पर अपनी दिव्यता का ऐसा रंग जमाते कि हर कोई एक बारगी सहम जाता- बाप रे, यह विद्यार्थी है या छंटा हुआ.........? बाइक पर पीछे गर्लफ्रेंडांे को हवा खिलाने, गुरुओं की भक्ति करने और बेहोश करने वाली पानी की बोतलें खाली करने के बाद भी बच्चू भैया का मन नहीं भरा तो रात-दिन लगे नयी तरकीब सोचने।

जिस रास्ते पर चलकर उन्होंने एम. ए. पास का डंका बजाया था, उसी रास्ते उन्होंने मास्टर आॅफ फिलासफी में प्रवेश कर लिया। हिन्दी साहित्य के पन्ने पलटते-पलटते वे खुद कविता-कहानी के गुर सीखने लगे। पृथ्वी के प्रत्येक युवा कवि की तरह बच्चू भैया भी प्रेम की नहर में छपकोइया मारने लगे। बड़े-बड़ों को साधने के सिद्धहस्त खिलाड़ी थे ही- सम्पादकों, सरनाम कवियों, कथाकारों और आलोचकों को पटाना कौन सी बड़ी बात थी ? आखिर लम्बी साधना के बाद असंख्य लघु मानवों को रिझाने का आत्मज्ञान जो प्राप्त किया था। इस महानगर में जिधर जाइए वहीं सम्पादक, जिस काॅलोनी से गुजरिए वहीं एक-दो नामी कवि-कथाकार, जिस सड़क से निकलिए वहीं आजू-बाजू एकाध आलोचक। बच्चू प्रसाद रात में धुँए का छल्ला बनाते हुए घुंआधार प्रेम कविताएं लिखते और दिन में अव्वल दर्जे के सम्पादकों को साधने में लग जाते। साहित्यिक पत्रिकाओं के सहृदय सम्पादकों को भी मानो ऐसे नायाब हीरे की तलाश थी, जो एक से बढ़कर एक रसदार लतीफे सुना सके, चासनी में लपेटकर प्रशंसा की बारिश कर सके और गाहे-बगाहे ब्रांडेड कम्पनी की बोतलों का .................। फिर तो एक मुश्त पाँच प्रेम कविताओं का ठीक अगले अंक में प्रकाशन पक्का जी। बेचन प्रसाद जब भी किसी कवि, सम्पादक या आलोचक के घर या दफ्तर जाते तो रस ले जाना कŸाई न भूलते। उनकी सबसे कमजोर नस पकड़ना नजदीकी साधने का महामंत्र था। पहली सीढ़ी पार करने के लिए बेचन प्रसाद जाल फेंकते थे। व्यक्ति, पद और मौके के हिसाब से उनके पास दर्जनों जाल थे। किस प्रकार की भाषा में किस पर कौन सा जाल फेंकना है, यह केवल बेचन प्रसाद ही जानते थे। इसी जाल से उन्होंने मछलियां फंसायीं, फूल फंसाए और अब लघु मानव फंसाने की तैयारी में थे। साहित्य की किसी भी अव्वल पत्रिका में छपना उनके दाएं-बाएं का खेल हो गया। बन्दे ने साल भर के अन्दर कई प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में छपकर मित्रों की नाम, कान, आँख में दम कर दिया। चर्चा भी मिलने लगी और ईष्र्या भी उसी अनुपात में। बेचन प्रसाद की खाल न जाने कब की बहुत मोटी हो चुकी थी। वे लगातार इन द्वन्द्वों से ऊपर उठते जा रहे थे। फिक्र रहती थी तो बस इतनी कि कल किस कवि, सम्पादक या आलोचक के लिए किस ब्रांड की बोतल खरीदनी है। शहर के साहित्यिक जंगल में दहाड़ने वाले तमाम युवा कवियों के बीच बेचन प्रसाद की बोली सबसे अलग थी। बच्चू ने अभी साल भर पहले कविता पर हाथ आजमाना शुरु किया था, और आज दर्जनों सम्पादकों, विख्यात कवियों, धुरंधर आलोचकों के चहेते, परम प्रिय शिष्य, आँखों के तारे। सुबह हो या शाम, दिन हो या रात, जाड़ा हो या गर्मी - बेचन प्रसाद जरूरत पड़ने पर किसी साहित्यिक के घर एक पाँव पर खड़े रहते, इसीलिए तो उन्हें श्रद्धा का फल सबसे मीठा मिलता था। ठीक दो साल के अन्दर बेचन प्रसाद ने अपने मन-मिजाज के अनगिनत युवा शब्दवीरेां की मण्डली बना ली। स्मार्ट फोन पर गुफ्तगू करते हुए सभी आपस में साहित्यिक माहौल का जायजा लेते। कौन उनके साथ आने योग्य है और कौन उनके खिलाफ आवाज उठा सकता है, इसकी बारीक से बारीक

पड़ताल करते। किस प्रिय बन्धु की रचना किस पत्रिका में छपी है- इस जानकारी का आपस में आदान-प्रदान करते और शहर के किस साहित्यिक समारेाह में किन-किन का नाम उछलवाना है- इसकी विधिवत् योजना बनाते। प्रचार को वे उस अंजाम तक पहुँचाना चाहते कि एक कहानी, एक कविता या एक लेख की कम से कम छः महीने चर्चा हो। इन्हें मर कर अमर होने में रŸाीभर यकीन न था। ये चाहे जैसे, खूब चर्चित होकर तत्काल अमर होना चाहते थे। ये फटाफट अमरता के एडिक्ट थे। बूढ़े होकर या मृत्यु की गोद में जाकर अमर हुए तो क्या हुए ? असल अमरता तो वह है जो भरी नौजवानी में मिले वो भी आँखों के सामने। ‘कौन जीता है तेरे जुल्फ के सर होने तक।’ समारोहों, गोष्ठियों में आते-जाते बेचन प्रसाद को एक और ज्ञान प्राप्त हुआ। वह यह कि महानगर की एक नहीं कई युवा कवयित्रियाँ और लेखिकाएँ लालपानी की भक्तिन हैं। उन्होंने साक्षात् अपनी आँखों से कई नामी लेखिकाओं को जाम थामे और अधेड़़ साहित्यकारों की आँखों में उतर कर बतियाते हुए देखा था। बेचन प्रसाद ने समझ लिया कि लेखिकाओं के साथ जाम टकराए बग़ैर साहित्यकार कहलाना बेमजा है। लेखिकाएँ भी किसी परिपक्व चेहरे की तलाश में रहती हैं- फिर बेचन प्रसाद क्या बुरे थे ? महोदय ने यहाँ भी बाजी मारी और बन गये चार-छः युवा कवयित्रियों के मित्र। महीने-दो महीने पर कहीं न कहीं, घर-रेस्तरां या समारोह में महफिलें जमतीं, निर्लज्ज भाव में एक दूसरे पर फब्तियों की बौंछार होती, एक दूसरे के कंधे से कभी हाथ, कभी सिर, कभी कंधे टकराते। किसी एक ही कथाकारा के दिल में उतरने की सबमें होड़ मच जाती, हथेलियों पर ही किसी एक कवयित्री का मोबाइल नम्बर नोट करने की सबको सनक सवार हो जाती। जुगाडू़ सफलता की अनन्त सीढि़याँ चढ़ते-चढ़ते बेचन प्रसाद उस मुकाम तक पहुँच गये, जहाँ वे पुरस्कारों के निमीता, न्यायाधीश और प्रधानमंत्री सबको अपने मायाजाल में फंसा सकते थे। कोई साधक साधना के सात चक्रों को पार करते हुए इतना सचेत न रहता होगा, जितना बच्चू भैया। आश्चर्य यह कि तीन-तिकड़म, गुणा-भाग, जोड़-घटाना के प्रत्येक मामले वे पास हो जाते। साहित्य के मैदान में कदम रखने के महज तीन साल के भीतर उन्हें वह धांसू सफलता हाथ लगी, जिसका प्रत्येक युवा कवि दिवा स्वप्न देखा करता है। बेचन प्रसाद को युवा कविता का सबसे चर्चित, स्थापित और लोकप्रिय पुरस्कार मिला। इसके निर्णायक मण्डल में साहित्य के एक से बढ़कर एक ईश्वर सम्मिलित थे। बेचन प्रसाद को जिस विलक्षण कविता पर यह उपलब्धि हासिल हुई - वह कविता थी - ‘‘मन की बांसुरी पर नाचते तन का विलाप।’’ केवल शीर्षक से मर्म पकड़ में नहीं आएगा। पूरी कविता की नस पकडि़ए -

मन पर पड़ रही है अहर्निशि पराजित आंसुओं की बौंछार भीग रही हैं नसें, भीग रही हैं साँसें डूब रहा है जिस्म। डायन सी सफेद रात खड़ी है निर्लज्ज पुकारता हूँ मुक्तिबोध पुकारता हूँ सूरज जपता हूँ एक नया मंत्र दिशाओं के दरवाजे खुलते क्येां नहीं ? कहाँ खो गयी आकाश-कुसुम की महक ? धरती की पीठ पर ये काली-काली धारियाँ कैसी ? मन की बांसुरी पर मेरे तन की हड्डियाँ आज क्यों थिरकना चाहती हैं ? रूस से टालस्टाय कब के भाग चुके हैं, माच्चू-पिच्चू पर्वत का सौन्दर्य पाब्लो नेरूदा की मुस्कान में भीग गया है नदियों की कोख में प्रसव की ऐंठन होने लगी है, शताब्दियों से खड़े-खड़े पहाड़ भरभराकर गिर रहे हैं मेरी स्मृति में वृक्षों के शिखरों से आंसुओं का झरना देखा नहीं जाता, सह नहीं सकता दरवाजे पर खड़ी पृथ्वी की चीख कविता में कहने की आदत नहीं पर कह दूं- मन की बांसुरी पर नाचता है तन का विलाप।

कविवर बेचन प्रसाद की प्रस्तुत कविता के सपोर्ट में निर्णायक मण्डल की ओर से जो कसीदा गढ़ा गया, वह भी कुछ कम काव्यात्मक नहीं था - ‘‘अपने समय से गहरे संवाद करती यह कविता एक साथ कई अर्थ छवियों की गूंज-अनुगूंज लिए हुए है। यह कविता जितनी ही देशज है उतनी ही वैश्विक भी। नयी सदी के जिन युवा कवियों की कविताओं में नये अर्थों का टटकापन, अनछुए प्रतीकों और बिम्बों की रौनक और समयानुकूल शिल्प की तराश नजर आती है - उनमें श्री बेचन प्रसाद अग्रगण्य हैं। यथार्थ के अन्तः चरित्र को समर्थ और सर्वथा नवीन भाषा-शैली में उद्घाटित करने के लिए पुरस्कार समिति उनकी कविता - ‘मन की बांसुरी पर नाचते तन का विलाप’ को पुरस्कृत करने का निर्णय लेती है।’’ घोषणा होने मात्र की देरी थी, चैबीस घण्टे के अन्दर श्री श्री बेचन प्रसाद अपनी दढि़यल फोटो के साथ फेसबुक पर छा गये। गिरे 400 के लगभग स्पामे और 250 के करीब कमेन्ट्स। कविता के जो युवा स्वर आॅफ द रिकार्ड बेचन प्रसाद का नाम तक सुनना नहीं पसन्द करते थे, उन्हें भी स्पाम करने पड़े, और दो लाइन कमेन्ट्स मारना पड़ा, जल-भुनकर ही क्यों न सही। 7 रातों-रात साहित्य के आकाश में दैदीप्यमान नक्षत्र की तरह चमक उठने वाले बेचन प्रसाद अभी भी जमीन पर चलता हुआ किसी को दिखें, यह कल्पना से बाहर की बात थी। घोषणा के ठीक दूसरे दिन बेचन प्रसाद की ‘बोतल संस्था’ ने जश्न मनाने का निर्णय लिया, जिसमें शहर के वे सभी युवा शब्दकर्मी शरीक हुए, जिन्होंने बेचन प्रसाद को इस मुकाम तक पहुँचाने में दिल-जोड़ कोशिश की थी। शामिल तो उन्हें भी होना पड़ा, जिन्होंने जुगाड़ू सफलताओं की सीढि़यां चढ़ने के गुर सिखाए थे, जो हाल ही के वर्षों में खुद किसी और से गुरुमंत्र लेकर इस जादुई शिखर को हासिल किए थे। इसमें आश्चर्यजनक रूप से वे कवयित्रियाँ भी सम्मिलित हुईं जिन्हें अभी-अभी कविता हांकने का शौक लगा था, जो प्रतिष्ठित पुरस्कार पाकर रातोंरात सितारा बन जाने का सपना देख रही थीं, या जिन्हें अपनी कलम से ज्यादा बेचन प्रसाद की कलाकारी में आस्था थी। जुटी बोतलें, जुटे नमकीन-ड्राईफ्रूटस के पैकेट, काटे गये किलो भर सलाद। बेचन प्रसाद ने अपने क्वार्टर के तिमंजिला मकान वाले छत पर सारी व्यवस्था चकाचक की थी। समकालीन कविता के लगभग बीस भविष्य वर्तमान साहित्य की खाल खींचने बैठे थे। लगभग सभी के हाथ में लाल पानी से आधी भरी हुई गिलास। किसी ने एक घूंट, किसी ने दो घूंट, किसी ने.........। आधे घंटे में अद्भुत पानी का नशा जश्न के बहाने चढ़ने लगा। फिर हुआ यह कि कविता की फरमाइश होने लगी- प्रेम कविता की, केवल प्रेम कविता की। युवा कवियों के पास प्रेम कविता न हो, हो ही नहीं सकता। मुन्ना कवि भी अपनी पाकेट में रेडीमेड 4-6 प्रेम कविताएँ लिए घूमता है। अरे तो बंध ही गयी न समां। कइयों ने देखते ही देखते कविता में इतने आँसू बहाए कि लैला-मजनू, शीरी-फरहाद, हीर-रांझा भी फीके पड़ गये। अचानक दो कवि त्रिभंगी लाल की मुद्रा में खड़े हो गये, साक्षात् नर्तक की मुद्रा में - तक् तक् तक् तक् ताक् धिना-धिन्, उठ उठ, उठ जा, उठ जा विरहिन। जब कवयित्रियाँ साथ में हों तो कवि का अकेले नाचना अपराध है। फिर तो खड़ी हो पड़ी एक नव लेखिका। ऐन इसी वक्त बेचन प्रसाद को आत्मज्ञान हुआ कि वे गायक भी हो सकते हैं। यह पुरस्कार का जोश था या लाल पानी का चमत्कार बेचन प्रसाद सचमुच सुरताल में गाने लगे, वो भी कुशल गायक की भाव-भंगिमाओं के साथ। आधे होश में और आधे बेसुध शब्द साधकों को लगा कि कवि बेचन प्रसाद में बैजू बावरा भी अवतार ले चुका है। मनचाही सफलताओं की कल्पना कितनी मादक होती है ? कितनी मीठी ? तन-मन को बेसुध कर देने वाली। बेचन प्रसाद की महत्वाकांक्षा में कल्पना के दो-दो पंख ऐसे लगे, कि उनका चिŸा गगन में उड़ान भरने के लिए अकुला उठा। वे देख रहे हैं कि प्रतिष्ठित कवि जगह-जगह सिर्फ उन्हीं का भजन गा रहे हैं। मंच पर बोलने वाला प्रत्येक साहित्यकार बात-बात में उनका नाम लेने को बेताब है। उनकी प्रत्येक कविता में छिपे मर्म का उद्घाटन करने के लिए वाद-संवाद आयोजित हो रहे हैं। अरे वाह रे भक्ति की माया ! अब तो बेचन प्रसाद का साक्षात्कार लेने के लिए सम्पादक होड़ लगाने लगे हैं। लगभग हर सामयिक मुद्दे पर उनकी टिप्पणियाँ ली जा रही हैं। उनके द्वारा कही गयी 8 बातों को सर्वाधिक प्रमुखता से छापा जा रहा है। साहित्यिक समारोहों के संचालक तड़प जा रहे हैं बेचन प्रसाद को बुलाने के लिए। उन्हें शाल, पुष्पगुच्छ और स्मृतिचिह्न से सर्वत्र सम्मानित किया जा रहा है। बेचन प्रसाद देख रहे हैं उन्हें निराला का सच्चा उŸाराधिकारी घोषित किया जाने लगा है। चारों ओर बेचन प्रसाद का ऐसा शोर मचा है कि जैसा आज तक किसी युवा कवि का नहीं मचा और मचेगा भी नहीं। भारतीय अनुवादकों की ओर से उन्हें सीधे आॅफर मिलने लगे हैं। एक साथ दर्जनों भारतीय भाषाओं में उनकी कविताओं के अनुवाद की आंधी चलने लगी है। इतना ही क्यों ? जानी-मानी विदेशी भाषाओं में भी उनकी रचनाओं के अनुवाद का सिलसिला चल निकला है। जहाँ देखिए वहीं बेचन प्रसाद, जिधर देखिए उधर बेचन प्रसाद। बेचन प्रसाद युवा कविता के पर्याय बन चुके हैं। बेचन प्रसाद को पक्का यकीन हो गया कि एक न एक दिन वे साहित्य अकादमी और भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार हासिल करके रहेंगे। सुबह हुई, बीत गयी। बेचन प्रसाद कल्पना में बरसते हुए लड्डुओं के आनन्द से बाहर आए। जगकर लेटे-लेटे छत पर नजर दौड़ाई तो सारे यार-दोस्त जा चुके थे। थकान, आलस्य और अधकचरी नींद के मारे बेचन प्रसाद को उठा नहीं जा रहा था। छत पर उठकर बैठै-बैठे भकुआई नजरों से पूरब के क्षितिज में लाल गोला निहार ही रहे थे कि बगल के कमरे में रहने वाले किराएदार ने बेचन प्रसाद को उनके पिता की आत्महत्या की सूचना दी। तीन तिरिक्का नौ पढ़ाने वाले बेचन प्रसाद के पिता ने आत्महत्या कर ली, जिसने यह जान लिया था कि उनका इकलौता बेटा शहर में कई वर्षों से ‘तीन तिरिक्का तीस’ पढ़ रहा है।

9

hindi@pratilipi.com
080 41710149
सोशल मीडिया पर हमें फॉलो करें।
     

हमारे बारे में
हमारे साथ काम करें
गोपनीयता नीति
सेवा की शर्तें
© 2017 Nasadiya Tech. Pvt. Ltd.