फांस

यादों की पोटली में समय नई चलन के सिक्‍के फेंकता रहता।कभी लगता जैसे भीतर पड़े सिक्‍के हमें दिख नही रहे मगर अचानक आयीं आंधी ने सब कुछ तहसनहस कर डाला। अकेली ममता भी क्‍या करतीं ? उसने तो अपनी तरफ से पूरी कोशिश की मगर कहां किसी की बात पर ध्‍यान देता था सुगम ? सिर पर हाथ धरे अवश भाव से कमल अपनी पत्‍नी ममता का मुरझाया म्‍लान चेहरा ध्‍यान से देखने लगे।

रूनझुन पायलों की झनकार से जाना कि घर के सारे कामधाम निबटाकर ममता खूब देर से उनके पास आतीं मगर अपनी मीठी मुस्‍कराहट से दिल जीत लेतीं। उन हाथों का जादू ऐसा जबरदस्‍त कि जाड़ों के सीजन में दर्जनों अलग अलग रंग , डिजायन या लेटेस्‍ट स्‍टायल का स्‍वेटर बनाना उसकी कलात्‍मक अभिरूचि को दर्शाता था। हर स्‍वेटर दूसरे से जुदा, नायाब डिजायनों में बहुविध रंगों का संयोजन इतना निराला कि देखने वाला अभिभूत हो जाता। ऐसे ही कढ़ाई के बेहतरीन नमूने देखने आसपास वाले अक्‍सर आ धमकते और पूछते- ' कहां से खरीदे इतने सुंदर स्‍वेटर ? ऐसे में ममता की मुस्‍कान ओर चेहरे पर फैलती गौरवमयी दीप्ति देखते ही बनती थीं। जब सामने वाला निहोरा करने लगता तो वे रहस्‍यमयी मुस्‍कान को चौड़ा करते जवाब देतीं- ' पूरे मार्केट में इस तरह का दिख जाए तो बताना मुझे। ' ऐन मौके पर कमल के मुंह से अनायास निकल जाता- ' ये तो हमारी शरीकेहयात के हाथों की जादुई कारीगरी है , बस। ' अगर भूल से भी कोई उनकी टक्‍कर का या मिलता जुलता बना भी लेता तो वे रातोंरात उसे उधेड़ नयी चलन का स्‍वेटर तैयार कर डालतीं। उस जोड़ का कम से कम उस शहर में तो ढूंढे नही मिलता था। यही हाल रसोई का भी था। वे पूरी नफासत से न जाने कहां कहां से रेसिपी सीखकर आतीं ओर फिर घर आकर उसमें कुछ अपनी कला का सहमेल करके जो व्‍यंजन तैयार करतीं कि खाने वाले हाथ चाटते रह जाते। मंझोली कद की ममता की धाक समूची कॉलोनी में जमी थी। जो सुनता , कमल से तारीफ जरूर करता। किसी का जन्‍मदिन हो या शादी ब्‍याह या गृहप्रवेश पार्टी , वे हर गैट टुगेदर की मुखिया बनी ठाठ से सारा कामधाम संभाल लेती। कर्ता धर्ता होने का बोध इतना गहराता कि वे रात विरात जागकर पूरा काम निबटाकर ही घर लौटतीं। अपनी सुघढ़ता और हुनर के बलबूते उनका नाम चर्चा के केंद्र में रहता मगर इस नशे में अक्‍सर उनके घर की बागडोर तनिक ढीली पड़ती गयी जिसे वे चौकसी से अपनी मुट्ठी में दाबकर फिर से सब कुछ ठीकठाक करने की तरकीबें आजमातीं। जब आसपास वालों के घर बनने शुरू हुए तो उन्‍होंने भी अपने घर बनवाने का फैसला आनन फानन में कर डाला। सुगम और मेहा जैसे दो बच्‍चों की शानदार मां होने का गौरव भाव उनके चेहरे पर चस्‍पां रहता। चलिए , क्‍यों न बातें सुगम से ही शुरू की जाएं ?

इन दिनों सुगम के जीवन में बेशुमार रंगों का रंग विरंगा आसमान फैला था। अभी वह बारहवीं में ही तो था तभी उसका घर बनना शुरू हो गया सो उससे जुड़े अनगिनत कामों की जिम्‍मेदारी उसके मत्‍थे। फिर भी वह समय निकाल दोस्‍तों की संगत करने को कोई न कोई मौका तलाश ही लेता। दोस्‍तों संग सजी महफिल में सब के सब पूरे रंग में रंगे तरंग में बतिया रहे थे ।

–‘ क्‍यों बे सुगम तू कॉलेज के बाद इतनी जल्‍दी क्‍यों भाग जाता ? हर वक्‍त हमसे पिंड छुड़ाकर भाग जाता '

' वो , वो घर बन रहा है न , सो करने पड़ते हैं न घर के काम धाम भी ... तभी उसके घर से फोन आ गया जिसे कान से लगा बतियाने लगा वो - ' बस अभी तो क्‍लास छूटी है , आ रहा हूं , बाइक नही है , देर तो लगेगी ही। '

' इस ब्रेनी को देख जरा गौर से , कितना कम बोलता है , आंखें हमेशा किताबों पर चिपकी , साले अक्‍लमंद की औलाद , चल , तू मेरा भी प्रोजेक्ट पूरा करेगा अब , हो हो करते पुलकित ने विनय की पीठ पर धौल मारी।

' ऐई , उस पर और बोझ न बढ़ा प्‍यारे , देखा , कल किस कदर डैडी ( सीनियर साथी ) ने उस बेचारे पर पहले से ही अपने तीन साथियों के प्रोजेक्ट का बोझ लाद दिया था मगर बंदा है तो काबिल यार , चुटकियों में उनका काम निबटा दिया। गूगल सर्च मारा और यहां वहां से घटा बढ़ाकर या नया जोड़कर तैयार प्रोजेक्ट। '

' चल कमीने , निकाल आज की कॉफी समोसे के करकरे नोट , ओए , विनम्र , मेरे बाप, कल वो फुलझड़ी कैसे मुस्‍कयाकर बतिया रही थी तुझसे , ए लिसन , टैल मी , शी लव्‍स यू ? '

' इस पगले चश्‍मिस की गर्लफ्रेंड तो पूरी पटाखा है पुलकित , ब्रेनी बैट्री है न इसके पास , तभी तो लड़कियां खिची चली आती इसके पास। लड़कियों को ब्रेनी बॉय ही भाते हैं प्‍यारे , लिसन , दिस इज द रियलटी। '

ब्रेनी ने अपनी जेब से पांच सौ का नोट निकाला जिसे हवा में ही लपक लिया पुलकित ने - ' डिंग डांग डांग , वी बिल ड्रिंक टुडे , लैट अस सेलिब्रेट । देखा तो ब्रेनी का पटाखा , किसके साथ लदी कहां घूम रही है ये , मेंढक भी टर्राना सीख गए हैं इन दिनों , देखा उस मेंढक बने नितिश को , साला . . .

' गाइज , लिसन , से गुडवॉय टु पटाखा , शी हैज गॉन , गॉन , गॉन , गॉन . फॉर एवर ...

' रोते नही ब्रेनी , बहादुर बच्‍चा , रोते नही , कैम्‍पस में अभी और भी पटाखे हैं ,फुलझडि़यां भी कम नही , दिल छोटा नही करते डियर बुद्धू बक्‍सा .. .... हो हो करके हंसने लगे सभी। वे जोर जोर से बोल रहे थे , जोर जोर से हंस रहे थे , ड्रिंक हलक के नीचे उतरती जा रहीं थी तभी पुलकित का मोबाइल चमका-

' ओए , एमएमबी लिखकर आया है ( मैसेज मी वैक ) खल्‍लास

' इटस माई वीटी , व्‍हाट एबाउट यू ?'

' यू रियली लव मी ? एनी डाउट ? '

' डीडी, यू आर माई बीएसएफ ( बैस्‍ट फ्रेंड फॉर एवर )

' ओकेकेके . . . हम्‍म . . . '

' वैसे इन दिनों पढ़ाई व करियर की बातें कम करने लगा तू सुगम , बोल न , कब से चुप्‍पा खड़ा है , क्‍या बात है ? '

' घर बन रहा है यार। मम्‍मी फिलहाल मेरी पढ़ाई के लिए नही बल्कि घर बनवाने में उलझ गयी हैं। क्‍या करूं यार , इस घनचक्‍कर में मुझे घर जल्‍दी भागना पड़ता। '

' चल यार , तुझे घर छोड़ते है वरना तेरी मां तेरा कचूमर निकाल देंगी। '

डैडीनुमा लड़के ने सुगम को अपनी बाइक के पीछे बिठाया और तेजी से स्‍पीड पकड़ ली। इनकी बातचीत का बेलौसपन देखते ही बनता था। इनके हर अंदाज निराले। वे एक दूसरे पर अपनी जान छिड़कते। उनकी बातचीत में सचमुच बेपरवाही दिखती मगर पढ़ाई या करियर का दबाव इन सबके सिर पर सवार रहता। फिर भी वे खूब मौज मस्‍ती करने का कोई न कोई मौका झट से लपक लेते फिर बात बेबात पर खूब हंसते हंसाते मगर घर लौटते ही फिर सब के सब अपने अपने बंद कमरे के माहौल में पढ़ाई का खौफनाक भूत पीठ पर बेताल बनकर सवालों की झड़ी लगाता सवार हो जाता।

घर आते ही फिर से उन्‍ही कंटीले सवालों की बाड़ से घिर जाता सुगम। कभी मां तो कभी पापा।

' सुगम , हम तेरा भला चाहते है मगर तू पढ़ाई में मन क्‍यों नही लगाता ? क्‍या होता उन 70 परसेंट नंबरों से , यहीं कहीं एडमीशन भी मुश्किल से मिल पाएगा । '

' पापा , आपसे कई बार कह चुका , मुझे बाइक चाहिए , बस , वरना मैं कुछ नही पढूंगा , कभी नही पढूंगा , मेरे सभी दोस्‍तों के पास है , अभिनव , प्रांजल , सुलभ . . .

' चुप कर , ढंग की पढ़ाई की होती तब तो बाइक मांगने का हक भी बनता था तेरा । हुंह , किस मुंह से किसको क्‍या बताऊंगा कि तेरे कितने खराब नंबर आए हैं। नाक कटा दी तूने तो , जबकि तेरे साथ के सभी देास्‍तों के नंबर 90 प्रतिशत से ऊपर आए हैं। अब तो उसी डीकेबी में ही पढ़ना पढ़ेगा तुझे , और कहां मिलेगा एडमीशन ? ' ऐंठी आवाज में एक तरह की हिकारत का भाव शामिल था।

' मैंने कह दिया तो कह दिया , बस , नो बाइक , नो स्‍टडी । ' पैर पटकता सुगम सर्र से घर से बाहर छाए अंधेरे में एकाकार होता गया।

काफी देर सड़कों की खाक छानने के बाद घर लौटते हुए दिमाग में तनाव हावी था। घर पहुंचते ही मम्‍मी का लैक्‍चर चालू हो जाएगा , फिर मेहा से कंपेरिजन का टेप बजने लगेगा। मन ही मन बातों की लडि़यां जोड़ते गूंथते उधेड़ते हुए वह जब घर लौटा तो मां ने तरेरती निगाहों से उसे घूरा फिर पूछने लगीं- कहां था अभी तक ? तेरे दोस्‍त आए थे . . .

बिना कोई जवाब दिए वह अपने कमरे की तरफ जाने लगा तो बहन ने टोका - ' भैया , खाना तो खा लो , खिचड़ी बनायी थी मैंने। '

अभी उसने जूते के तस्‍मे उतारने शुरू ही किए थे कि पापा के कटखन्‍ने बोल कानों में गर्म पड़ते तेल की तरह खाल को जलाने लगे- ' आ गए साहबजादे , परोसो इन्‍हें खाना , दिन भर सड़कों की खाक छानकर लौटे हैं साहबजादे । '

उसने आव देखा न ताव , भड़ाक से दरवाजा बंद कर नो एंट्री का बोर्ड टांग लिया।

' खाना नही खाना है तो मत खाने दो। ममता , तुम्‍ही बिगाड़ रही हो इसे , हर बात पर शह देती रहती हो। मैं कहे देता हूं , ठीक नही ये बात। देख लेना , ऐसे बिगड़ैल बच्‍चे बेकाबू घोड़े की तरह लात मारने लगेंगे जो बाद में किसी काम के न होकर बोझ बनकर रह जाते। हां , याद रखना इसे।

पापा के बोल उसके भीतर देर तक बजते रहे। काफी देर दीवार की तरफ मुंह किए चुपचाप लेटा रहा। बीच बीच में मेहा व मां की आवाजें सुनाईं देतीं- ' पापा की बड़बड़ाने की आदत पड़ती जा रही। क्‍यों नही भैया को बाइक दिला देते , बोलती क्‍यों नही मम्‍मी ? '

' हमारे पास होते तो अब तक दिला चुके होते बेटे , हम क्‍या करें मेहा , वो कहां सुनते हैं मेरी बात ? ^

' मगर उसने जिद ठान ली है कि जब तक वो बाइक नही लेगा , वो कॉलेज नही जाएगा। भविष्‍य तो इसी का चौपट होगा न , इत्‍ती सी बात इसके भेजे में क्‍यों नही घुसती कि नुकसान तो इसी का हो रहा है फिर सबसे पढाई में पिछड़ जाएगा न , समझती क्‍यों नही इसे मम्‍मी? '

' सबके बच्‍चे कितनी अच्‍छी अच्‍छी जगहों पर पढ़ रहे है , एक यही नालायक निकला , पूरे परिवार की इज्‍जत से डुबोएगा ये एक दिन , देख लेना। ' अंदर बैठे पापा ने उनकी बातें सुनकर कमेंट किया। पापा के बोल फिर से उसके सीने पर पड़ते मूसल की तरह चोट करने लगे।

' हुंह , नही पढ़ना हमें , नो बाइक , नो स्‍टडी , अब सच में डूबेगी आपकी सोकॉल्‍ड इज्‍जत पापा . . . मन की मन बड़बड़ाता फनफनाता अपने से घंटों लड़ता रहा वह फिर थककर पता नही कब सो गया।

कुछ महीनों दोनों के बीच रस्‍साकस्‍सीं चलती रहीं। इसी तनाव में सुगम के फर्स्‍ट सेमेस्‍टर में पुअर नंबर आए। पढ़ाई में दोस्‍तों से पिछड़ने के चलते उसका पढ़ाई से तेजी से जी उचटता जा रहा था। बहन मेहा जो उससे बस एक साल पीछे थी , अब उसके साथ आ गयी जबकि उसके तमाम देास्‍त अगली क्‍लास में। उसके हिस्‍से का प्‍यार अब मेहा के हिस्‍से। वे उसकी तरफ हिकारत भरी नजरों से देखते , सुगम को लगता जैसे सभी उस पर तंज कस रहे हैं। उस छोटे शहर की सड़कों पर बेवजह साइकिल से यहां वहां जाते वक्‍त जब उसके साथ के यार दोस्‍त उससे कन्‍नी काटकर चले जाते तो उसका दिल बैठने लगता। एकाध बार मन किया , किसी से बात करें मगर ऐन मौके पर लगता कि वह उनकी नजरों में कितना गिर गया है। उसे देखकर एक सुर में यही राग अलापने लगते- मन लगाकर पढ़ाई कर , अभी भी कुछ नही बिगड़ा है। '

घर तक सीमित बात धीरे धीरे रिश्‍तेदारों में फैलने लगी। दूसरे सेमेस्‍टर में भी जब वह पास नही हो पाया तो वह सचमुच घबड़ा गया , अब क्‍या होगा ? सारा भविष्‍य चौपट। पापा उसे खा जाने वाली नजरों से देखते ही फट पड़ते। वह भी उनसे कन्‍नी काटने लगा। दोनों के बीच संवाद धीरे धीरे कम होते होते खत्‍म होने लगा। संवाद के फासले दिन ब दिन बढ़ते ही जा रहे थे। खुद पर झुंझलाहट होती , फिर निराशा के काले बादलों से घिर गया , ऐसे में एक दिन बड़े ताऊ जी आ धमके। ओफफो , अब फिर से वही प्रवचन , लंबे चौड़े उबाऊ लैक्‍चरों का अंतहीन सिलसिला वह सिर नवाए कड़वी दवा की तरह घूंट घूंट हलक से उतारता रहा। अचानक मां ने सुझाव दे डाला- ' तुझसे पढ़ाई नही होती , तो कोई बात नही। चल , ताऊ के बच्‍चों संग बिजनिस ही डाल ले झांसी चलकर। ' कहकर उसे झांसी ठेल दिया गया। वह बेमन से वहां गया भी मगर दो दिन में ही हजार तरह की नसीहतें व कड़ुवे तानों से पिंड छुड़ाकर लौट आया वापस। उनके कटखन्‍न्‍ो बोल सुनसुनकर घबड़ा गया सो चुपके से बिना कोई से कुछ कहे सुने लौट आया।

जैसे जैसे ट्रेन रफतार पकड़ रही थी , सुगम के दिमाग में ताऊ के बोल की घंटियां बज उठीं। उनकी कटूक्तियां याद करके , उनके ताने सोच सोचकर दिमाग थकने लगा। सच तो ये है कि वहां से घर लौटने का कोई इरादा नही था मगर बीच रास्‍ते में ही मां का फोन जो आ गया- ' सुगम , तू कहां है बेटा , झांसी से चल दिया न , मुझे तेरी चिंता खायी जा रहीं हैं , मुझे पता था , तेरे ताऊ वगैरा किसी काम के है नही , वो तो तेरे पापा की जिद थी। बेटा , तू सीधे यहीं चला आ, नाना के पास गया था न ? '

' आकर सब बताता हूं मम्‍मी ' . . मां की आवाज सुनकर राहत मिली। चलो , किसी को तो मेरे जीने मरने या होने न होने से फर्क पड़ता है। कित्‍ता घबराने लगी थी वो , भीड़ भरी ट्रेन में एक किनारे चुपचाप खड़े खड़े पैर थकने लगे तो उसे ऊपर वाली वर्थ खाली दिखी सो वहीं चढ़ गया मगर दिमाग में ताऊ ताई व उनके बच्‍चों के जहरनुमा बोल पूरे दिलोदिमाग में तैरने लगे।

' कितना चुप्‍पा मगर घुन्‍ना है ये , जब कुछ बोलेगा ही नही तो बिजनिस क्‍या खाक संभालेगा ? ममता ने लाड़ में बिगाड़ लिया इसे वरना इसकी बहन कितनी तेज है पढ़ाई में , नौकरी भी लग गयी उसकी तो। यही निखट्टू बना छाती पर मूंग दलने क्‍यों भेज दिया यहां कमल ने , क्‍या हमारे अपने बच्‍चे नही जो औरों के बच्‍चे को दुकान में बिठाएं। आज ये बैठेगा , कल के दिन हिस्‍सेदारी मांगने आ गया तो ? याद करो , पप्‍प्‍ूा की मदद की थी हमने , फिर हमारी ही दुकान पर अपना दावा ठोकने लगा था वो । '

' आहिस्‍ते बोल विनोद , वो सुन लेगा , बगल के कमरे में ही तो लेटा है , गलती कमल की नही , इसकी पढ़ार्इ पर कितने पैसे तो लगाए उसने। वैसे वो तो सुबह से रात तक दफतर में ही फंसा रहता , ममता को देखना चाहिए था ये सब। '

' पापा , कमल चाचा अपने इस एकलौते बेटे पर रेस के घोड़े की तरह पैसे का दांव चला बैठे फिर उन्‍हें जीतने से कम कुछ नही चाहिए। कितना चुप्‍पा , कितना घुन्‍ना बन गया ये तो। कितना भी कुरेदो , कुछ बोलता ही नही , बस हां , हूं , हां , कर लूंगा कुछ भी , कुछ भी . . . ऐसे दो बोलकर टाल देता हर सवाल को। डिप्रैशन की बीमारी लगती है इसे।'

' कितनी नई डिजाइन का घर बनवा लिया कमल ने मगर अपने बेटे पर ध्‍यान नही दे पाए। कहीं कोचिंग सेंटर भेजते तो शायद निकल जाता। बेचारा मन लगाकर पढ़ता तो कुछ न कुछ बन ही जाता। क्‍यों नही किसी मनोचिकित्‍सक से इलाज कराते इसका , बात करूंगी ममता से। ' इस बार ताईजी बोल पड़ी बीच में।

' कोचिंग सेंटर भेजा तो था मगर महीने भर में ही लौट आया। घर की याद आती है , खाना बेकार मिलता है , टॉपर्स के बीच कुछ न कर पाने की हताशा होगी जैसा किंशुक को भी तो हुई थी। जो बताता था - कितनी ग्‍लानि होती है जब हम बेहतर परफॉर्म नही कर पाते , ऊपर से मां का फोन उसे तोड़कर रख देता। '

' मतलब ? '

' मतलब ये कि मां की टेपनुमा बातें याद करके रो पड़ता था वो , यही कि देखो बेटा , पूरे परिवार की इज्‍जत तुम्‍हारे हाथों , हम तो पेट काटकर तुम्‍हें पढ़ा रहे हैं , इस बार पास होके दिखा वरना सारी मेहनत मिट्टी में मिल जाएगी , क्‍या करेंगे हम ? हो सकता है , सुगम इतनी बड़ी कंपटीशन का तनाव न झेल पाया हो । '

' तो हम क्‍या करें ? ' ताई ने निर्णायक लहजे में कहा- ' वहीं रहकर क्‍यों नही कुछ काम धंधा करने लगता वो ? '

रात दो बजे जब सुगम घर पहुंचा , बहन सो चुकी थी मगर मां जागते हुए उसकी राह देख रही थी। बिना खाना खाए वह चुपचाप कमरे में जाने लगा तो मां ने टोककर रोक लिया।

' सुगम , तू चिंता न कर बेटा , मैं अंतिम समय तक तेरा साथ दूंगी बेटा ,जब तक मेरी सांसों में सांसें है तुझे फिक्र करने की जरूरत नही। कल किसी डॉक्‍टर से दिखाते है तुझे , खामहखां उल्‍टी सीधी बातें सोचसोचकर माथा गर्म करता बेटा। ' बेटा की लाल सूजी आंखें , उदास चेहरे पर मुर्दनी के भाव देखकर ममता का कलेजा धक रह गया।

' मां , मुझे किसी डॉक्‍टर को दिखाने की जरूरत नही, इससे कोई फायदा नही। सॉरी मम्‍मी , मैं आपके सपने पूरे नही कर सकता . . . गहरे अंधेरे में सुगम अपने आंसू छिपाने की कोशिश करने लगा लेकिन मां ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा- ' बेटा , दिल छोटा नही करते , तुझे मेरी कसम। आज तू मेरे साथ डॉक्‍टर के पास चल रहा है बस , कहते हुए मां ने सुगम की हथेली अपनी हथेली में ले ली फिर सिर पर हाथ फेरते हुए बोलीं- ' तू इतना सोचता क्‍यों है ? बता , तुझे किस चीज की कमी है , जब तक मैं जिंदा हूं , दो कौर पहले तुझे खिलाऊंगी फिर अपने मुंह में निवाला डालूंगी बेटा । ' भावातिरेक में उनके भी आंसू निकल आए।

' मेहा ने डॉक्‍टर से एप्‍वाइंटमेंट ले ली है, पापा को कुछ नही बताएंगे , हां , बस हम चलेंगे दिखाने , होने दे पैसा बेस्‍ट . . उनकी रूआंसी आवाज में गहरी वेदना के अनगिनत धूसर रंग शुमार थे।

' मैं किसी पर बोझ नही बनना चाहता मां , मगर क्‍या करूं, कुछ भी पढ़ता हूं , दिमाग में धंसता ही नही। आई कांट हैल्‍प माईसैल्‍फ . . ; बोलते हुए सुगम सुबकने लगा। सारी रात खुली आंखों में काट दी। अंधेरा इतना गहरा कि घुप्‍प अंधेरे में सुगम जब भी अपने भविष्‍य का खाका बनाना चाहता कि हर आकृति पर काला रंग पुत जाता। कितना बेरंग , मनहूस हो चुकी ये जिंदगी , सोचते सोचते थक गया तो आंखें मूंद लीं।

मनोचिकित्‍सक के शानदार चैम्‍बर के बाहर कई मरीज प्रतीक्षारत थे। फिलहाल ममता को उन्‍होंने अकेले में बुलवाया। उनकी पूरी बातें सुनकर बोले- ' जो कह रहा हूं उन्‍हें ध्‍यान से सुनना समझना। आप बाहर से इस बात का अंदाजा नही लगा सकती कि आखिर इस बच्‍चे के अंदर क्‍या चल रहा है। कोचिंग करने वाले ज्‍यादातर बच्‍चे बेहद तनाव में रहते हैं और अक्‍सर इतने दबाव में रहते हैं कि कई बार आत्‍महत्‍या की कोशिशें कर चुके हैं। पिछले 3 महीने में 35 केस आए हैं , सबकी एक जैसी समस्‍या , पढ़ाई का प्रेशर , डिप्रेशन , एंग्‍जाइटी और रात रात भर जगकर पढ़ने के बावजूद मिल रही नाकामयाबी उन्‍हें तोड़ देती। सोचो जरा ,बच्‍चा साइंस नही पढ़ना चाहता मगर मांबाप के सपनों में इंजीनियर या डॉक्‍टर ही धंसे रहते। हजारों लाखों बच्‍चे कड़ी मेहनत करते रहते मगर नतीजा सिफर। जबकि लाखों बच्‍चों को अत्‍याधुनिक कोचिंग सेंटरों में भेजकर मां बाप निश्चिंत हो जाते मगर संघर्ष की आग में तपना पड़ता उसे मासूम को। रोज सौ बच्‍चे हमारे पास लाए जाते। पिछले महीने हमारे ट्रीटमेंट के बावजूद 3 बच्‍चों ने खुदकुशी कर लीं , सोचो जरा , समस्‍या कितनी सीरियस होती जा रही . . .

उनकी बातें ध्‍यान से घूंट घूंट पीते हुए ममता बीच में ही बोल पड़ी- ' डॉक्‍टर साब , हम क्‍या करें ? हम तो बस उसके बेहतर भविष्‍य की खातिर सोचते रहते , न पढ़ना चाहें , न पढ़ें मगर ये तो खुद ही कंफयूज्‍ड है। बीटेक फर्स्‍टईअर के बाद से ही ऐसी हालत हो गयी है कि न किसी से ढंग से बोलता बतियाता , न किसी की बात ध्‍यान से सुनता। बस , कमरे में अकेले गुमसुम पड़ा रहता बिस्‍तर पर। जितना खाना दे दो ,बस उतना गर्दन नवाए खा लेगा। हम अकेले क्‍या कर सकते हैं? पति बाहर पोस्‍टेड है , बेटी भी पढ़लिखकर बाहर निकल गयी , पढ़ाई में पिछड़ने के चलते एक यही बचा रह गया। '

' ऐसा लगता जैसे आज के मांबाप अपने भावुक बच्‍चों को साड़ों वाली भीड़ की रेस में दबने कुचलने छोड

देते है कि जरा सी चूक से ही आपका बच्‍चा हाथ से निकल पिचल सकता है। फांसी में लटकने वाले बच्‍चों के कितने मामले आए दिन सामने आते। सच में ऐसा लगता जैसे पेरेंटस उन्‍हें भीड़ में नही भाड़ में झोंकने की तैयारी कर रहे हों। मेरी बात मानो , उस पर प्रेशर मत डालो , किसी भी किस्‍म्‍ा का। '

अनजाना सा डर और घबड़ाहट के मारे हलक सूखने लगा ममता का। असहाय मनस्थिति में आंखें भर आयी। फिर किसी तरह हिम्‍मत जुटाकर बोली- ' आप बताइए प्‍लीज , हमें क्‍या करना है ? कैसे हैंडिल करें इसे ? '

' पहले तो इसकी पसंद के विषय दिलवाइए इसे। बीटेक न करना चाहे , न करे। इससे कभी इसकी राय पूछी है आपने ? '

' रोज रोज यही सवाल तो करती रहती इससे मगर कुछ बोलता ही नही। बस वही रटा रटाया जवाब , कर लूंगा, कुछ भी कर लूंगा मगर कैसे क्‍या करेगा , ये बताता ही नही। बाकी बच्‍चे तो ऐसे नही है . . . । '

' नो कंपेरिजन प्‍लीज , एक बात बताइए , क्‍या पढ़ाई लिखाई या करियर के अलावा का जीवन कोई जीवन ही नही होता ? मेरा मतलब , इसे थोड़ा मौज मस्‍ती कराओ कि ये हंसना सीखे। स्‍पॉर्ट एक्टिवटीज में भाग ले यानी आम बच्‍चों के बीच उछलकूद करे, बहन संग गेम्‍स खेले तभी उसका मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य मजबूत हो पाएगा। औरों के बच्‍चों से तुलना कभी मत करो। हर बच्‍चे की मानसिक बुनावट अलग अलग होती है। कुछ बच्‍चे पैदाइशी संवेदनशील होते है तो कुछ मजबूत व व्‍यावहारिक। जहां जाना चाहे , जाने दें। ज्‍यादा रोकाटोकी से बच्‍चे चिढ़ जाते है। बस उसकी बातें ध्‍यान से सुनो। वैसे ये दवाइयां सोने के पहले जरूर देना। पूरी नींद सोएगा तो सुबह फ्रेश होकर बेहतर सोचने समझने के मूड में होगा। '

' और हां , इससे ऐसी बातें भूलकर भी न की जाएं कि तुम्‍हारे न पढ़ने से पूरे घर की इज्‍जत पर बट्टा लग रहा है या ये करियर तुम्‍हारे लिए करो या मरो की लड़ाई है या तुम नाकाम हो गए तो सारे जीवन पर कालिख पुत जाएगी , ऐसी बातों से ये संवेदनशील बच्‍चे हताशा से घिर जाते और जब कुछ नही सूझता तो कुछ भी करने पर आमादा हो जाते। प्‍लीज , इसे प्‍यार से समझाना। खामहखां भविष्‍य का खौफ दर्शाने से उसी के बारे में निगेटिव सोच सोचकर फिर इसका माथा खराब होगा, अब और मानसिक टॉर्चर मत देना। क्‍या कोई गर्लफ्रेंड है इसकी ? '

' पता नही , हमसे खुलकर बात ही कहां करता है ? ' वे सकपकायी आवाज में बोलीं।

' यहीं तो सारी मुश्किलों की जड़ है कि हिंदुस्‍तानी बच्‍चों के मांबाप उनके दोस्‍त क्‍यों नही हो पाते ? हर वक्‍त हाथ में छड़ी लिए ताने मारने , भविष्‍य का आतंक दिखाकर डराने धमकाने या लैक्‍चर देने के पीछे क्‍यों पड़े रहते आप लोग ? कमाऊ पूत बनाने की तगड़ी साधना में दिन रात जुटे मांबाप थोड़ी सी भी संवेदना बरतते तो यही मेधावी बच्‍चे वैज्ञानिक , कलाकार , गायक या खिलाड़ी यानी जो चाहें बन सकते थे वशर्ते कि उनके पास चुनने का हक तो हो। मेरे नजरिए को समझने की कोशिश करें आप , ओके ? दवाएं रोज रेगुलर एक महीने तक लेना है । '

' फिर इसके बाद की प्‍लानिंग , करियर वगैरा में रूचि लेने लगेगा ये ? ' वे दवा लेते ही फटाफट नतीजा जानने को व्‍यग्र हो उठीं ।

' ऐसी बातें फिलहाल तो दिमाग से निकाल दें , उसे पहले नॉर्मल होने दें फिर वो खुद ही अपने बारे में आपसे बातें करेगा। हर वक्‍त ये करिअर का भूत दिमाग से निकाल फेंकें। इस बच्‍चे को भी जीने का हक दें प्‍लीज , हड़बड़ी मत करें आप , लाठी लेकर बच्‍चे के पीछे पड़ा रहना ठीक बात नही । वैसे 10 दिन बाद आकर रिपोर्ट करें। '

' डॉक्‍टर साब , ठीक हो जाएगा न सुगम , पहले जैसा . . .

ऐन मौके पर दूसरे मरीजों के लिए घंटी बज उठी सो उन्‍हें निकलना पड़ा! सुगम का हाथ थामे जब वे बाहर निकली तो धुआं खाया आसमान खोह में नीचे उतरने की तैयारी कर चुका था। वे कुरेद कुरेद कर सुगम से पूछती जा रही थीं- ' क्‍या कहा डॉक्‍टरसाब ने , क्‍या पूछा ? '

' कोई खास नही . . दोटूक जवाब देकर उसने फिर उसी चुप्‍पी का बाना पहन लिया था। घर पहुंचते पहुंचते रात के 9 बज चुके थे। घर के सामने उनका इंतजार करते सुगम के पापा खड़े थे।

' अरे , इतनी रात कहां से लौट रहे हैं मां बेटा ? ' उनकी आवाज में तंज छुपा था।

' ऐसे ही , अपनी एक सहेली के यहां निकल गयी थी। ' बेध्‍यानी में खोयी उन्‍होंने बात टालने की गरज से जवाब दे दिया।

' ममता , कब तक झूठ बोलती रहोगी ? तुम्‍हारी सारी सहेलियों को फोन कर चुका। कब तक इसे दूध पीता बच्‍चा समझ अपने मूंड़ पर ढोती रहोगी? पता ? छोटे भाई के सपूत ने कॉलेज टॉप किया है जबकि तुम्‍हारे इन साहबजादे ने , हुंह. . .'

' चुप रहिए आप , ' अचानक ममता भड़क पड़ी। आप तो महीनों नौकरी पर बाहर रहते सो आप क्‍या जानें हकीकत क्‍या है ? ये क्‍या , लौटते ही फटकारना शुरू ? ये गलत बात है। '

ममता के अंदर डॉक्‍टर के बोल बजने लगे- मां बाप अक्‍सर अपने बच्‍चे की तुलना दूसरों से कर डालते जिससे उन पर मानसिक दबाव पड़ता और वे मन ही मन मां बाप को अपना दुश्‍मन समझ घुटन में जीने लगते। किस कदर सुगम का आत्‍मविश्‍वास खत्‍म कर डाला आप लोगों ने अनजाने में ही सही , मगर वो ये मान चुका है कि अब वो कुछ नही कर सकता। और किेतना डांटेंगे आप ? क्‍यों जान लेने पर उतारू हैं ? पता , बाप के नाम पर जबरदस्‍त नफरत है उसे , सिर्फ और सिर्फ ताने कसने , फटकारने या मानसिक टॉर्चर करने के सिवाए और दिया है क्‍या है उसे आपने ? तभी तो उसके अंदर किसी के लिए न प्‍यार बचा है , न आदर। अपने को निरीह , कमजोर ,बेबस या दब्‍बू मान बैठा है वो । जो बच्‍चे इनमें से मजबूत होते , वही येन केन प्रकारेण गलत रास्‍तों से पैसा कमाने की तरकीबें निकालना सीख लेते।

' ममता , ममता , क्‍या हो गया तुम्‍हें ? कहां खोयी हो ? कुछ बोलती क्‍यों नही ? मैं कब से बोलता जा रहा ? '

' कुछ कहा आपने ? अरे , ध्‍यान कहीं और भटक गया था। चुप रहिए आप। बस बहुत हो चुकी बकवासवाजी या लैक्‍चरवाजी । ' गुस्‍स्‍ो की ज्‍यादती में ममता की ऊंची आवाज लपट बनकर तीखी होती गयी।

कैसा तो मटमैला सुस्‍त सा दिन था वो जब वह रोज की तरह धूप चढ़े सोकर उठा कि बैंग्‍लोर से बहन का फोन आ गया- ' भाई , यहां आकर मार्केटिंग का काम करेगा तू , शुरू में 10 हजार मिलेंगे मगर बाद में बढ़ाएंगे। '

' न मेहा , मार्केटिंग का काम नही होगा मुझसे , तू अपनी सोच , मेरा क्‍या ? '

' तू हर काम को फट से नकारता रहता , ये ठीक बात नही। अगले हफते मैं निर्देश के साथ घर आ रही हूं , कुछ न कुछ सोचते हैं तेरे वास्‍त्‍ेा और निकलेगा कोई रास्‍ता . . .'

मेहा की शादी इतनी जल्‍दी एक सप्‍ताह में हो जाएगी , ये सब अकल्‍पनीय था उसके लिए। ऐसे मौके पर सुगम के होने , न होने को सिरे से नकारते हुए ताऊ के लड़के ने भाई की रस्‍में निभाईं। वह कुरेद कुरेद कर मां से पूछता - ' मम्‍मी , चूंकिे मैं कुछ नही करता , बस इसी वजह से मेहा की शादी में मुझसे भाई की रस्‍में नही करवाई गई , साफ साफ बोलो न , चुप क्‍यों हो ? '

' ये फालतू की बातें सोच सोचकर काहे को अपना माथा खराब करता रहता तू ? कहा था न कि बीसीए कर डाल , फिर से क्‍यों नही करता शुरू पढ़ाई ? सुगम , तू साफ साफ क्‍यों नही बताता , तुझे करना क्‍या है ? क्‍या इरादा है तेरा ? ' न चाहते हुए भी वे बात बात पर फिर से झल्‍ला पड़तीं। गुमसुम खड़ा वह मां को एकटक घूरता रहा फिर बिना कोई जवाब दिए सर्र से निकल गया अनजान रास्‍तों की तरफ।

सोच की चकरघिन्‍नी मशीन तेजी से चलने लगी जिसमें उसका वजूद तार तार होने लगा। मेरी किसी को कोई जरूरत नही , बहन ने भी नकार दिया मुझे। मां बाप ने भी। पापा तो शुरू से ही नफरत करते थे। मेरी जिंदगी बर्बाद कर डाली पापा ने । किसी काम में मन नही लगता। पहले मेहा थी तो थोड़ा बहुत मन भी लगता था मगर शादी के बाद मेहा ने भी मेरे वजूद केा नकार दिया , कितना अलग थलग पड़ गया मैं तो , न , मुझे किसी के रहमोकरम की जरूरत नही। इस दुनियां में अब कौन है मेरा ? एक बार बचपन में पापा को फोन किया था स्‍कूल के प्रधानाचार्य ने तो पापा ने कितनी बुरी तरह डांटा था उसे , न कभी नही भूल पाता उनकी डांट फटकार- साला , नालायक , किस कुघड़ी में जन्‍म लिया तूने , सत्‍यानाश कर दिए हमारे सपने , क्‍या क्‍या नही सोचा था तेरे वास्‍ते मगर . . . तेरे से कई गुना बेहतर तो तेरी बहन निकली। मगर मां जरूर मेरी बेहतरी के बारे में सोचती है मगर इन दिनों वेा भी मेहा की सुख सुविधा की खातिर दिन रात एक किए रहतीं। मैं कहां जाऊं , क्‍या करूं , कैसे जिऊं ? मेरी शादी का खयाल तो किसी के मन में दूर दूर तक नही होगा। ऐसे उजाड़ खंडहर में जिसका जीवन तब्‍दील हो चुका हो , उससे भला कौन शादी करेगा ? कौन थामेगा मेरा हाथ ? तो क्‍या ताजिंदगी मैं अकेला पड़ा पड़ा यही इसी काली कोठरी में कैद रहकर मर जाऊंगा । उस सुनसान अंधेरे बंद कमरे में लेटे लेटे यही लगता जैसे चारों तरफ से कई नुकीले पैने दांतों वाले खुंखार जानवर उसे देख गुर्राने लगे हों या अंधेरे में आकार बनाते अनजाने शेर , चीता या गिद्ध एक साथ मिलकर उसे अपना शिकार बनाने की जुगत लगा रहे हों। कभी लगता जैसे वह खारे समुंदर के बीचोंबीच जा फंसा है जहां से कैसे भी बाहर निकलने की कोई युक्ति कारगर नही हो सकती, हाथ पैर फड़फड़ने की चाहे जितनी कोशिश करता रहे मगर जाल में फंसे बेबस पंछी की तरह तड़पने के सिवाए करे तो क्‍या करे वह ? लेटे लेटे लगा जैसे मम्‍मी कह रही हों , इतनी गर्मी में भी पंखा चलाने की सुधि नही रहती तुझे। समय का अंदाजा लगाने के लिए उसने अंधेरे में सिरहाने रखी घड़ी उठानी चाही जो तेज आवाज के साथ नीचे गिर गयी। हां , रात के दो बजे का समय चमक रहा था।

- सुगम , क्‍या हुआ ? ' मां की स्‍नेहासिक्‍त आवाज सुनाई दी। बेचारी मम्‍मी , कल ही तो कह रही थी , बेटा , इतनी उदासी ठीक बात नही। अपुन मिलकर कोई कामधंधा शुरू करते है। उसके पास मां के पूछे सवालों का जबाव नही सूझता सो वह कन्‍नी काटता हुआ पुराना घिसा पिटा जवाब दे देता या हां , हूं . . में टाल जाता। जब वे ज्‍यादा पीछे पड़ जाती तो वो फिर से दुहरा देता- ' कह दिया न , कर लूंगा कुछ भी , दिल्‍ली से ग्रेजुएशन की डिग्री वाला एड देखा था मां , वहीं से करवा दो मौसी से कहकर देखो न ।

' तेरे कहने से पहले ही बात कर चुकी बेटे , वे सब नकली डिग्रियां बांटते हैं , तेरे किसी काम नही आने वाली वो । ' अपने तरीके से मां भी साथ देने की कोशिश जरूर करतीं। उनका गुस्‍सा , रूआंसी आवाज और अपने प्रति चिंता देख उसके भीतर जमी बर्फ थोड़ी देर के लिए पिघलती और उनके चेहरे पर बेचारगी उतर आतीं मगर ऐन मौके पर फिर पापा की वही बातें - कब तक खटिया तोड़ता पड़ा रहेगा निखट्टू कहीं का , बेवकूफ कहीं का, जरा भी शर्म नही कि उसी कॉलेज से बहन पढ़कर बाहर निकल गयी मगर इसे देखो , दो साल बाद भी ग्रेजुएशन तक नही कर पाया। रिश्‍तेदारों के राक्षसी चेहरे और जानवरों की शक्‍ल लगाए सहानुभूति जताने वालों से चिढ़न होने लगती। सचमुच , ऐसे मतलबी , टुच्‍चे , घटिया पैसे वालों की बातें सुनसुनकर कोफत होने लगती। कई अंधेरी रातें उसे वही आवाजें सुनाई पड़ती जिनमें शुमार थीं नसीहतों की भारी भरकम ग‍ठरियां , न , अब और नही ढोयी जाती ये गठरियां।

कल वो पड़ोस का शिखर अपनी शादी का कार्ड देने आया था जिसे देखते ही मां की आंखें भर आयीं- ' पता नही मेरे नसीब में ये सुख लिखा है या . . . बिन कहे ही काफी कुछ कह दिया मम्‍मी ने। ' वैसे क्‍या कर रहे हो सुगम ? हमेशा की तरह चुप्‍पी का तनोवा तना रहा।

' अब तुम्‍ही समझाओ , हमारे समझाने का तो कोई असर नही पड़ता। ' सुनते ही सर्र से उसी अंधेरी कुठरिया में घुसकर फिर उन्‍ही अंधेरों से मुठभेड़ करने लगा। सभी अपनी अपनी जिंदगी में मस्‍त है , व्‍यस्‍त है , कामयाब हैं , एक वही सबस पिछड़ गया है कभी यह भी लगता कि घर से बाहर निकलते ही सब उसे हिकारत से देख रहे हैं या उस पर थूक रहे । सबके बीच वह किस कदर वैकफुट पर धकिया दिया गया है। ऐसे इस तरह कमरे में घंटों अकेले पड़े पड़े मुर्दो की तरह घुटघुटकर जीने से क्‍या फायदा ? न तो वह मरने में है , न जीने में , तो फिर , फिर क्‍या करे वह ? कहां भाग जाए ? इतनी बड़ी दुनियां में कौन है मेरा सच्‍चा मीत मन में दूर दूर तक नही होगा। ऐसे उजाड़ खंडहर में जिसका जीवन तब्‍दील हो चुका हो , उससे भला कौन शादी करेगा ? तो क्‍या ताजिंदगी मैं अकेला पड़ा पड़ा ऐसे ही घुटघुटकर मर जाऊंगा एक दिन , यही इस अंधेरे बंद कमरे में। इतनी बड़ी दुनियां में है कोई मेरा सच्‍चा मीत , साथी ? जाऊं तो कहां भाग जाऊं ? सचमुच यहां रहने का दिल नही करता अब तो , कतई नही , सोचते सोचते शाम ने कब रात के कपड़े पहन गाढ़े अंधेरे का दामन थाम लिया , पता ही नही चला। मगर हां , उस गहराती रात में टिक टिक चलती घड़ी के पेंडलुम पर जरूर उसकी निगाहें देर तक थमी रहीं। वाकई वह मां को दुख नही पहुंचाना चाहता था सो कई बार किताबें खोलकर पढ़ने की कोशिशें कीं मगर सारे अक्षर धुंधले पड़ने लगते। अपने से लड़ता लड़ता पस्‍त पड़ जाता। सोचते सोचते दिमाग कुंद हो उठता। बड़ी मेहनत से किताबों की लिखी इबारतों को जोर जोर से पढ़कर दिमाग में बिठाने की कितनी ही तरकीबें करके देख चुका मगर शब्‍दों की इबारतें धड़धड़ाकर गिरती बहुमंजिला इमारतों के मलबे में तब्‍दील होती जातीं। वह हैरान , परेशान , अवसन्‍न , हताश होकर टूटता बिखरता। मन करता , इन झमेलों से कहीं दूर , बहुत दूर निकल जाऊं । आई कांट हैल्‍प माईसैल्‍फ , कंपलीट फैल्‍योर , इन अनजान अंधेरों से उपजते अराजक जानवरों से जूझते जूझते थक गया , पस्‍त पड़ गया , सो इनसे दूर जाना ही होगा। कुछ पेट भरने लायक कर ही लूंगा । फिर वही अजगरी सवाल उसे डराने लगे थे मगर यहां इस कमरे की आवाजें उसे निगल जाएंगी सो इन्‍हें छोडकर जाना ही होगा उसे , कहीं भी , दूर , बहुत दूर। चलते समय घर के चारों तरफ उसने एक उड़ती उचाट नजर से देखा जिसे कितने चाव से बनवाया था मगर , किसका घर ? कौन है यहां मेरा ? चारों तरफ से उसके वजूद को नकारे जाने की यादें असहनीय हो उठीं। फिर क्‍या था ? बमुश्किल रोके कदम बाहर निकलने के लिए छटपटाने लगे। हाथ में वही छोटा सा बैग लिए बाहर निकलने को था तभी अपनी तरफ सवालिया नजरों से घूरती मां से बाहर निकलने का इशारा किया। ऐसे तो वह पहले भी कई दफे कई जगह आता जाता रहा है , सो वे कुछ कहेंगी नही। एक बार फिर वही खयाल , सुगम , हू केयर्स फॉर यू एंड व्‍हाई ? यू आर टवैटी एट , जस्‍ट ग्रॉन अप। घूम फिरकर आ ही जाएगा ,जाएगा कहां ?एक बार फिर से बाप के कडुवे बोल उसके भीतर जहर बनकर रगों में तैरने लगे थे। ....... ................... ....................

' चला गया होगा कहीं , आ जाएगा घूम फिरकर , काहे को अपना जी हलकान करती हो ? ' पत्‍नी ममता की घबड़ाती आवाज सुनकर कमल ने सांवत्‍ना का लेप लगाना चाहा।

' एक सप्‍ताह से ऊपर हो गया , मोबाइल भी यही छोड गया है , कहीं पुलिस में खबर कर दो , पेपर में फोटो वगैरा छपवा दो , कुछ करो तुरंत , मेरा जी घबरा रहा है , मेहा को खबर कर दिया , वो भी परेशान थी , कुछ करेा आप , प्‍लीज कुछ तो करो . . .

ममता की कातर पुकार सुनकर किसी की भी रूंह कांप जाए। वे कमल को झिंझोड़ने लगीं- अब किसे डांटेंगे आप ? हर वक्‍त बेचारे को डांटते फटकारते रहे आप , महीनों तक अनबोलना किए रहे उससे , आपने ही , हां , आपने ही कत्‍ल किया है मेरे लाल का , सुगम , ओ बेटा सुगम , तू जहां भी है , बस एक फोन कर दे अपनी मां को , लौटकर आ जा मेरे लाल , मेरा सुगम , मेरे कलेजे के टुकड़े , लौट आ जल्‍दी से आ जा , देख , तेरी मां ने तेरे वगैर कब से ठीक से खाना नही खाया , न जाने कितनी रातें जागकर काटीं हैं बेटे . . . '

दिन एक एक करके बासे कपड़े बदल धुले कपड़े पहन लेता। रात सुबह में , सुबह फिर से रातों में तब्‍दील होतीं रहीं मगर कहीं कुछ चमत्‍कार नही घटा। मंदिर , मस्जिद , गुरूद्वारे , चर्च या पीर फकीर के पास जाते जाते कई महीने बीतते रहे। जो नही होना था , वही हो गया। घर से गायब हुआ सुगम की कोई खैर खबर नही। कहां कहां नही ढूंढ़ा होगा उसे ? जहां किसी के पाए जाने की खबर मिलती , वे दौड़ पड़ती उसी तरफ। अखबार में पढ़ा चिल्‍ड्रन होम में कैद 40 बच्‍चे छुड़ाए गए, भागी दौड़ी जा पहुंची वहीं। वहां का सीन देखकर जलते कलेजे को ठंडक मिली। पूरे पांच साल बाद किसी मां बेटे का पुनर्मिलन देखकर वे खुद ही रो पड़ीं। किस्‍से के कुछ टुकड़े छन छनकर उनके पास आ रहे थे। ये सारी कहानी नमन के मुंह से ।

स्‍टेशन पर बैठे गुमसुम बच्‍चे देखकर वे समझ गए , लड़का भागकर आया है सो उसके पास पहुंच पट्टी पढ़ायी गई- घर लौटोगे तो खूब डांट पड़ेगी , चलो हमारे साथ दिल्‍ली , मुम्‍बई। पढ़े लिखे हो , होटल मैनेजर का काम तो कर ही लोगे। वहां से लौटकर घर पर बता देना तब वे खूब खुश होंगे। ' सब्‍जबाग दिखलाकर वे इसे कहीं ले जाकर बेचने की फिराक में थे मगर ऐन मौके पर पुलिस की नजरें उन पर पड़ गयीं। धर पकड़ी में घबराकर बच्‍चे से कहा गया कि अपना नाम बदल दो वरना . . . सो पुलिस रिकार्ड में उसका बदला नाम था। वहां से उसे शैल्‍टर होम लाया गया जहां बात बात पर उसे बैल्‍ट से मारा जाता। ऐसे सख्‍त माहौल में मां बाप की खूब याद आतीं। कई बार घर जाने की सोचा मगर उनकी बदकिस्‍मती कि किसी ने निकलने ही नही दिया उसे। पुलिस स्‍टेशन , बस स्‍टैंड या रेलवे स्‍टेशन और तमाम अखबारों में गुमशुदगी के इश्तिहार छपते मगर बदकिस्‍मती से सुगम का पता नही लग पाया। थाना इंचार्ज , एसपी , विजिलेंसटीम , जेल प्रशासन सब जगह फोटो भेजे गए , अपना अपना दर्द सुनाकर मांबाप लौट आते। अफसोस कि कहीं से सुगम का अता पता नही लगा।

मगर कभी कभी जिंदगी अजीबोगरीब तरीके से अपना खेल रचती रहतीं। जिस दिन शैल्‍टर होम से गुम हुए नमन को लेकर गाड़ी बाहर जाने को तैयार खड़ी थीं , ऐन मौके पर नमन के पापा भी उसी शैल्‍टर होम के बाहर अपनी गाड़ी रोक दीं। अभी वे पूछताछ करने के इरादे से गेट तक पहुंचे ही थे , तब तक नमन दौड़ते हुए उनके पास आ पहुंचा था। कितनी प्रताड़नाएं , कितनी तरह की यंत्रणाएं और क्‍या क्‍या नही झेलना पड़ता घर से भागे बच्‍चों को मगर काश कि बच्‍चे पहले ही समझ पाते इस हकीकत को। . . . ऐसे भावुक सीन पर टीवी पर बार बार दिखाए जा रहे थे जिसे देखदेखकर ममता की सूनी आंखों में फिर से लौटने की आस बंधने लगी। मेरा सुगम भी , शायद इसी तरह लौट आए किसी दिन , हे मेरे प्रभु , जहां भी हो , उसकी रक्षा करना। ममता के मन को समझ पाना सचमुच कठिन होता गया। उम्‍मीद का एक सिरा बंधता है तो कभी एक ही झटके में टूट भी जाता। बुझी आंखों में जीने की लौ दिपदिपाने लगती मगर दिन पर पैर टेके अगला दिन और फिर ऐसे कई दिन निकलते गए। कितनी अकल्‍पनीय छोटी छोटी बातों पर संवेदना के आघातों से किस कदर विचलित हो उठतीं वे। बार बार यहीं सोचने लगतीं , कितने अदेखे संकटों को झेल रहा होगा बच्‍चा, किस कदर आत्‍मविश्‍वास का संकट आन खड़ा होता होगा। हताश मन में भूले भटके यादों की कौंध चमकतीं , इस कड़ाके की ठंड में मेरा बच्‍चा न जाने क्‍या पहने कहां रह रहा होगा , बंगालन का भतीजा पूरे 7 साल बाद मुंबई से लौटा था , सो हिम्‍मत नही हारते , सोचते हुए वे फिर से अपनी सोच के अबूझ किस्‍म के अंधेरों से जूझते जूझते न जाने किन गहरी खोहों में खो जाती। सुबह होती है , सूरज की कंपती लौ के साथ नए सिरे से सूनी आंखों में हल्‍की सी उम्‍मीद की कौंध जगमगाने लगती फिर दिन बीतते बीतते न जाने कब , कैसे शाम होते होते वे फिर से घिरने लगती उन्‍हीं अंधेरों से जहां जाते ही उनका वजूद उसी अंधेरे में विलीन हो जाता । ओफ , पलकों के अंदर और पलकों के बाहर भी लेटते ही अजीब अजीब डरावनी आकृतियां घेर लेती उन्‍हें। अब समझ आया , मेरा बच्‍चा इन्‍ही आकृतियों से घबराकर भागा होगा , डिप्रेशन की बीमारी ऐसी अंधेरी गुफाओं की तरफ खींच ले जाती जहां से वापसी कभी मुमकिन नही लगती , तो , तो , क्‍या वे ताजिंदगी त्रिशंकु की तरह अधर में लटकी रहेंगी ? उसके लौट आने की चिर प्रतीक्षा ताउम्र चलेगी ? कहीं उसके कदम खुदकुशी की तरफ तो ? नही , नही , सोचते हुए उनके हलक के अंदर खूब गहरे धंसी मरणांतक फांस ऐसी तकलीफ पहुंचाती कि उनका मन करता , ये सब छोड़ छाड़कर वे कहीं दूर भाग जाएं या नदी नाले में सरक जाएं मगर उम्‍मीद का दूसरा सिरा उन्‍हें जीने की ताकत बख्‍सने लगता।

- ' यहां का जीवन बस यहीं इस मोड़ पर आकर थम जाता है सो इस गेट के बाहर पैर रखते ही बस आपकी दुनियां शुरू जहां कोई किसी का साथ देने नही आता और यहीं से शुरू होता है तुम्‍हारा अपना परिवार। एक बात की गांठ बांध लेना कमल , कुछ भी दुबारा शुरू नही किया जा सकता। ये जिंदगी है ही ऐसी जो बिना बताए झटका पर झटका देती रहतीं मगर हम धीरे धीरे इसके आदी होते जाते। कुछ हकीकतें को मान लो और उन्‍हें लेकर मातम मनाना बंद कर दो .' .. अपने विदाई समारोह में चंद दोस्‍तों संग बैठे कमल इस बाहरी शोरगुल के अलावा अपने अंदरूनी कोलाहल से घिरे थे। बेचैन अंतस में एक कचोटता अपरोधबोध उन्‍हें चैन से जीने नही दे रहा था। अकेले होते ही सूने अंधेरे घर में घुसते ही ममता का चेहरा देखते ही कलेजा कांप उठता। जिंदगी एक साथ इतने सारे काश , क्‍यूंकर दे जाती हैं ? कभी वे अपने भाग्‍य को कोसने लगते तो कभी विपरीत हालातों से घिरकर अपने से मुंह चुराने लगते। क्‍या सचमुच सारी गलती उन्‍ही से हुईं ? दफतर से घर जाने हेतु छुट्टी मंजूर ही कहां हो पाती थी ? जैसे तैसे आ पाते और बेटे की अराजकता देख गुस्‍से पर काबू न होता सो भड़क पड़ते। जब भी ममता उन्‍हें कटघरे में खड़ा करतीं तो वे बेचैनी से घिरे जाल में फंसे बेबस मछली की तरह छटपटाते हुए अधमरे से हो जाते। पस्‍त , पराजित और हताश कमल को कुछ नही सूझता तो बेटी की कामयाबी के बारे में सोचकर मन बहलाने लगते। अगर हमारी परवरिश में कमी होती तो मेहा का करियर कैसे इतना शानदार बनता ? न , उनका कोई कुसूर नही , सोचकर खुद को जस्‍टीफाई करते हुए उनके कानों में अनायास ममता की आवाजें सुनाईं दीं जो रा‍त विरात किसी भी समय जोर जोर से बड़बड़ाने लगती । रोज रोज नए सिरे से जीना-मरना शायद इसी को कहते है। मन घबराता तो रात में उठकर बेटे सुगम के कमरे में जातीं जहां वे अबूझ किस्‍म के जानलेवा अंधेरों से घिर जातीं। अब तो ये अंधेरे ही उनके संगी साथी हो गए है सो उनसे बतियाते हुए बड़बड़ाना शुरू हो जाता उनका - ' जब से सुगम गया है तभी से मेरे दिल में , मेरी रूंह में, तन मन में एक अजीब कांटा फंसा है , कौन निकालेगा उसे ? अरे , है कोई उसे निकालने वाला ? अरे , अरे , सुन रहे है न आप लोग ? बुला दो मेरे बेटे को प्‍लीज , कितने गहरे हलक में धंसा है वो कांटा जो ये मेरे लहू का शोर बन गया है जिसे लेकर ही मरना पड़ेगा मुझे। कैसे भी चैन नही मिल रहा। बहुत तेज चुभन सांस नही लेने दे रही। यहां देखो , यहां , हलक के नीचे , यहां , इस जगह , दिख रहा है न ? अरे , ऐसे क्‍या देख रहे हो ? अच्‍छा चलो , डॉक्‍टर के पास ही ले चलो मगर जल्‍दी करो , प्‍लीज . लगातार आती आवाजें आखिर उन्‍हें चैन से जीने क्‍यों नही देती ?

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