नैनीताल कि खुबसुरत वादिओं के बीच अनामिका का सोर्न्दय मानो नैनी झील के समान उस पर उसकि बड़ी बड़ी खुबसुरत आखें जैसे नैनीताल कि खुबसुरती उसने अपनी आखों मे समेट ली हो शोख चंचल ओर अल्हड़पन जैसे कोई हिरनी उसके काले घने ओर लम्बे बाल मानों बर्फ़ कि चोटीओ को घनघोर घटा ने घेर लिया हो।

नैनीताल के बाजार मे उसके पिता कि लकडी के सजावटी समान कि दुकान पढाई खत्म कर के वो भी अपने पिता का हाथ बटाने दुकान पर चली आती है । सीजन

होने के कारण वो अकेले सम्भाल नही पाते थे । ऐसी ही एक शाम सैलानियो कि एक बस आ कर रुकती है। उसमे से लड़के लड़कीओ का झुन्ड उतरता है। जिसको देख अनु अनुमान लगाती है ।ओर चहक कर कहती है बापु मुझे लगता है आज़ हमारी अच्छी बिक्री हो जाएगी लड़के,लड़किया ऐसे समान बहुत पसन्द करतीहै ओर फ़टाफ़ट समान को करीने से लगाने लग जाती है । तभी लड़को की नजर अनु कि दुकान पर पड़ती है सभी उस तरफ़ पहुन्च कर समान देखने लगते है। पर समान से ज्यादा उनकि नजर अनु कि खुबसुरती पर होती है। तभी उनमे से एक बोलता है नैनिताल मे खुबसुरती तो बला कि है। अनु नजरे झुकाए समान दिखाती है ।वो लोग कभी कुछ कभी कुछ निकलवाते । अनु कुछ देर तो समान निकाल कर दिखाती रही पर उसेलगा की वो लोग उसको जान बुझ कर परेशान कर रहे है ओर अनु थोड़ा झलला कर बोलती है आप लोगो को कुछ लेना नही बस परेशान कर रहे हो ।तभी उनमे से एक लड़का जो काफ़ी देर से चुप चाप खड़ा था अनु को परेशान देख आगे आता है ।ओर लकड़ी के बने गुड़िया,ओर गुड्डे कि किमत पुछ्ता है । अनु उस को दाम बताती है ओर वो बिना कोई मोल भाव किए खरीद लेता है । अनु से सब कि तरफ़ से माफ़ी मागंता है । बहुत ही सुन्दर ओर सरल स्वभाव से उसकी सुन्दरता कि तारिफ़ करता है । अनु भी ना जाने क्यो शिष्ट्ता वश उसका शुक्रिया अदा करती है । वो लोग वहां से चले जाते है ।उन के जाने के बाद अनु समान को तरतीब से लगाने मे लग जाती है ।रात 8 बजे अनु ओर उसके पिता दुकान बन्द कर घर आ जाते है । आज़ अनु अपनी बिक्री पर काफ़ी खुश होती है । वो आज बहुत थक गई होती है । खाना खाकर तुरन्त बिस्तर पर लेट जाती है ,तभी उसकी आखों के आगे उसअजनबी का चेहरा उसकी बाते उसकी मुस्करहट आ जाती है अनु एक खिचाव सा मेहसुस करने लगती है ।सोचते -सोचते अनु को नीदं आ जाती है ।

दुसरे दिन सुबहा दुकान जाने से पहले अनु नहा धो कर मन्दिर पहुंती है।तभीउसको दुर जाना पहचाना सा चेहरा नजर आता है । अनु नजर अन्दाज करके आगे बढ्ती है पर अनु को महसुस होता है कोइ उसके पीछे आ रहा है ।वो पीछे मुड कर देखती है यह तो वही लड़का था वो अनु को नम्सते करता है ओर कुछ बात करने को कहता है ।पहले तो अनु मना कर देती है पर उसके जोर देने पर हां कर देती है ।

दोनो मन्दिर के पास ही मिलते है । औपचारिता के बाद दोनो अपना परिचय देते है ।

मै तुषार घोष लखनऊ के विश्वविधालय मे गणित का प्रोफ़ेसर हु ।कालेज कि तरफ़ से विधार्थीओ को नैनीताल घुमाने लाया हूं । वो क्या है । कि हम मैदान वासिओ को पहाड़ अपनी तरफ़ आकर्षित करते है।मेरे घर मे मेरी दो छोटी बहने मां-पिता जी है । पिता जी लखनऊ मे बैंक मे कार्यरत है । यह तो रहा मेरा परिचय अब कुछ अपने बारे मे बताओ । अनु एक टक तुषार को देखती है । जो इतनी सादगी से सब कुछ कह जाता है । अनु मेरे पास परिचय के रुप मे ज्यादा तो कुछ नही मेरा नाम अनामिका मुद्द्गल है मेरे घर मे दो छोटी बेहने ओर पिता जी है ।बैसे तो हम हिमाचल के रहने वाले है पर माँ नैनीताल कि थी तो पिता जी यहाँ आ कर बस गए ।

हम तीनो का जन्म यही हुआ मेरी शिक्षा यही से हुई मैने स्नातकोत्तर सायक्लोजी मे किया है । पर घर के हालात ठीक ना होने के कारण आगे पढाई नही कर पाई ओर पिता जी के काम मे हाथ बटाने लगी । तुषार अनु को बहुत ध्यान से सुन रहा होता है । जहां उसकी सुन्दरता उसको प्रभावित करती है वही उसका सरल मन उसे अपनी तरफ़ खिंचता है । तुषार अनु से कहता है कि मै बातो को घुमा फिरा कर नही करता इस लिए आप से साफ़ कहुगा कि मै आप को अपना जीवन साथी बना पुरी जिन्दगी आप के साथ जीना चाहता हुं।

पर यह मेरा फ़ैसला है आप किसी तरहा बाध्य नही ।पर वादा करता हूँ तुम्हे खुश रखुगा ।मै अभी यहाँ ओर पाचं दिन हूँ आप चाहे जेसे परख लो ओर उसके बाद जो फ़ैसला आप का होगा उसका दिल से स्वागत करुगा । यह मेरे घर का पता है ओर नम्बर है ,आप जिस तरह की तसल्ली करना चाहे कर सकती है ।ओर वो वहाँ से चला जाता है अनु स्तब्ध सी उसे जाते हुए देखती रह जाती है ।उसकी समझ मे नही आता इस असिम प्यार कि अभिव्यक्ति पर खुश होए या उसके परिवार को इस वख्त उसकि जरुरत है तो तुषार को मना कर दे ।इस तरह दो दिन बितते है अनु कुछ गुम सुम सी रहती है तुषार उसे कभी कभी दिख तो जाता है पर उसके रुबरु नही होता उसकी सन्जिदगी देख अनु उसके प्यार की गहराई को समझती है मन ही मन वो निर्णय लेती है की तुषार को अपनी सारी परिस्थिती से अवगत करा उसकी जीन्दगी से दुर हो जाएगी ।जाने से एक दिन पेहले तुषार अनु से मिलने आता है । अनु उसे अपनी परिस्थिती से अवगत कराती है ।ओर भरे हुए नयनो से कहती है आप जिसकी भी जिन्दगी बनेगे वो बहुत खुशनसिब लड्कि होगी पर शायद यह खुशी मेरे नसीब मे नही

तुषार अनु का हाथ पकड़ कर बोलता है तुम शायद मेरे प्यार को समझ नही पाई मै तुम्हे अकेले नही तुम्हारी हर खुशी ओर दुख के साथ अपनाना चाहता हूँ ।तुम एक बार सच्चे मन से कह दो की तुम मेरे साथ खुश रहोगी मै पुरी जिन्दगी इन्तजार करुगा ।बस किसी ओर की मत हो जाना ओर वहाँ से चला जाता है ।

अगले दिन तुषार अनु के घर पहुंचता है ओर अनु से वादा ले कि जब उसको लगे कि अब उसे शादी कर लेनी चाहिए वो तुषार को बता दे वो उसका इन्तजार करे गा ओर अलविदा ले एक ऐसे इन्तजार के साथ जो ना जाने कब खत्म होगा होगा भी कि नही

आज़ फिर वादियो मे टेसु के फ़ुल अपनी खुबसुरती बिखेर रहे है ओर अनु को तुषार के प्यार कि गहराई का एह्सास दिला रहे है। आज़ एक लाली अनु के चेहरे पर चार चाँद लगा रही है । आज उसका इन्तजार खत्म होने वाला है आज तुषार उसे ले जाने आने वाला है ………………………………………

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