प्रकाशन से पूर्व कुछ खास पाठकों की उपन्यास पर टिप्पणियां

‘‘न्यूक्लियर फेमिली के दौर में सुख-दुख बांटने का चलन खत्म हो रहा है। कभी हम दिल की बात कहना चाहते हैं तो सुनने वाले नहीं मिलते, कोई सुनने के लिए आगे आता है तो हम सुनाने में संकोच करते हैं। इंसान के अंदर इससे कुंठा और अवसाद बढ़ता है। यदि हम अपने आसपास गौर से देखें तो बहुत से लोग अंदर ही अंदर सुलगते मिल जाएंगे, कुछ लोग तो आत्महत्या जैसा कदम भी उठा लेते हैं। इस उपन्यास में डा. विद्या शर्मा ऐसे ही जीवन से हारने वालों को प्यार बांटती हैं। फेमिलियर होने की जो फिलासफी उन्होंने इजाद की है, वह जादू की तरह असर करती है।’’

एम. अनवारुल हसन, रेडियो जॉकी, शायर


‘‘दो युवाओं के बीच के रोमांस को ही अक्सर लोग प्रेम समझ लेते हैं, जबकि प्रेम तो मानवता का विस्तार है। यह दिव्य और सर्वजन हिताय है। कबीर ने अपने ढाई आखर के प्रेम को इसी भावार्थ में लिपिबद्ध किया है। इस उपन्यास में भी उसी प्रेम का विस्तार है।’’

तनु नारायन, ‘आर्ट ऑफ लिविंग’ टीचर


‘‘लवगुरु’ एक ऐसी लड़की में प्यार जगाते हैं, जो पति की शहादत के बाद नन्हीं सी बेटी को पालते हुए अपनी लंबी जिंदगी के लिए रास्ते की तलाश में है। दुनियादारी सिखाने के दौरान प्रेम, जिंदगी और संगीत की जो केमेस्ट्री वह पाहुन को समझाते हैं, वह मार्वलस है।’’

स्तुति राज, स्टुडेंट, बीबीए


‘प्रेम करने वाली लड़की’ की एडिटिंग करनी थी, लेकिन जितनी बार पेंसिल उठाता, डा. विद्या शर्मा का कैरेक्टर मुझ पर हावी हो जाता। वह कभी मां लगती हैं, कभी काउंसलर, डॉक्टर तो वह हैं ही। जो भी उनके प्रभामंडल में इंटर करता है, कुंदन की तरह पवित्र हो जाता है।’’

नवीन घोषाल, वरिष्ठ पत्रकार


‘‘विद्या शर्मा जितनी डायनामिक हैं उतनी ही आकर्षक भी। दरिया कुमार और समुद्र मोहन जैसे ‘विलेन कैरेक्टर’ भी उनका साथ पाकर बदल जाते हैं। मजदूर आंदोलन के दिग्गज लीडर रहे डा. अजय शर्मा गिर कर संभलने की कोशिश करने वालों के लिए आदर्श हैं। डा. अजय की मिमिक्री और कनेर और अराफात जैसे बच्चों की हाजिरजवाबी से सीरियस कहानी को ह्यूमरस टच मिलता है।’’

अमूल राज सिंह, कमिश्नर




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