वो ख़तों का दौर था..."ब्लू टिक्स" से ज़्यादा नीली मुहरों का मोल था।

सवाल-जवाब, खाकी पहने..साइकल पर लुढ़कते शख़्स के थैले में सफर कर के पहुँचा करते थे।

किसी रहस्य की पोटली सा लगता था लिफ़ाफ़ा, जिसमें क़ैद चिट्ठियां...माँ की फ़िक़्र, पिता की सलाह, बहन का आग्रह और जाने क्या क्या समेटे रहतीं।

और महक, बिलकुल जानी पहचानी सी...कभी पन्ने के कोर पर अचार का तेल, शायद माँ ने ख़त को जाँचने के इरादे से...अचार की बरनी भरते समय उठा लिया होगा। या कभी फूलों सी महकती स्याही, उससे भी आगे ख़ुद पन्ना, कस्तूरी के इत्र से लिपटा सा।

और हर्फों के दरम्यान गीलेपन के निशाँ, आँसू अक्सर नहीं छुपते।

मतलब, लिफ़ाफ़ा खुला और एहसास गूँजे।
किसी की ख़ुशी ये चिट्ठियां, किसी की चिंता...तो किसी का रास्ता, उस ख़ास के दिल तक पहुँचने का ज़रिया।

और चिट्ठियां तो ख़ैर पहुँच ही जाती थीं, बस पता सही लिखना होता था, क्योंकि कोई किसी को "मुझे तुमसे बात नहीं करनी" कहकर ब्लॉक नहीं कर सकता था।

उसी दौर में ऐसे ही किसी ख़ास का ख़ास बनने की जद्दोजहद में था राकेश! नज़रों से काम न बना, ज़ुबान ने साथ नहीं दिया तो काग़ज़ का सहारा लिया।

पर साहब, कलम रोज़ कागज़ पर ठहरती, दिल "प्रिय रागिनी" लिखने को कहता और दिमाग सिर्फ़ "रागिनी", इस द्वन्द्व में कई पन्ने शहीद हो चुके थे। क़लम बस कागज़ का चुम्बन ही ले रही थी।

राकेश को पक्का यक़ीन था की रागिनी उसे पसन्द करती है, अब तिरछी निगाहों की भाषा कोई तिरछी निगाह रखने वाला आसानी से समझ जाता है न।

उस दिन राकेश ने दो ख़त लिखे, एक प्रिय रागिनी वाला, दूसरा सिर्फ रागिनी वाला...दोनों की तुलना कर ही रहा था की पिताजी ने अपने तबादले की ख़बर दी। दिमाग और दिल का द्वन्द थम गया, और
"साथ रह नहीं सकते तो इज़हार का क्या फ़ायदा, हाँ हो भी गयी तो दूरी बहुत दर्द देगी!"

इस तर्क के साथ दिमाग ने द्वंद्व रोक दिया, पर पागल दिल अब राकेश से उलझा हुआ था...कह रहा था, कम से कम ये तसल्ली तो कर लो की वो चाहती है या नहीं तुम्हें! फिर आगे का सोचना...लेकिन कहाँ इतनी हिम्मत, एक तो इतने सालों में इज़हार भी करो और फिर दूर भी हो जाओ...न, जाने दो, जैसा है चलने दो।

वो दौर ही ऐसा था।

तीन दिनों में घर समेट लिया गया, आखिरी बार राकेश कॉलेज गया तो रागिनी नहीं मिली।

"ठीक ही है, आज दिख जाती तो शायद दिल फिर से इज़हार की क़वायद करता...इस बार पुरजोर ढंग से इतनी ज़ोर से की दिमाग का हर तर्क अनदेखा हो जाता।"

आँखों की कोरों से टिमटिमाता गीलापन, पोंछता हुआ वो तेज़ क़दमों से चलने लगा।
डिग्री, नौकरी, घर, मूलतः ज़िन्दगी...वो चलता रहा, और जब एक दिन फुरसत में थमा तो, वही पागल दिल...फिर रागिनी का नाम रटने लगा, जो नाम इन बारह सालों के सफर में ज़रा दब गया था, ज़िम्मेदारियों तले।

आज बारह साल बाद, ख़ुद को ढूंढता हुआ वो यादों की गलियों में भटकता रहा, उन गलियों के हर मकान के हर दरीचे से रागिनी झांकती दिखती।

सम्भाल के रखे उन दो ख़तों को उसने फिर निकाल कर पढ़ा, सोचा काश भेज दिया होता...पर कौन सा वाला? क्या फ़र्क़ पड़ता है...अब सोच के क्या मिलने वाला है, न तो वो दौर रहा न चिट्ठियों की ताक़त, अब तो वो क्या कहते हैं? "फेसबुक" आ गया है।

फ़ेसबुक!! क्या रागिनी होगी फेसबुक पर? इस सवाल के जवाब के लालच ने राकेश को नीले सफ़ेद, आभासी संसार में खड़ा कर दिया। वो हर उस "दीवार" पर जाता जहाँ रागिनी की परछाई हो सकती थी।
रागिनी तो नहीं मिली, उसकी सहेली मिली, प्रतिभा। पूछने पर पता चला, रागिनी अब पति के साथ कहीं बाहर रहती है...कहाँ, कैसे कुछ नहीं पता। उसकी शादी के बाद, उसके माँ बाप भी किराए का मकान छोड़ कहीं और बसने चले गए।

राकेश की हर उम्मीद छिन गयी थी, जो उसे रागिनी तक ले जा सकती थी।

"तुमने भी तो उसके ख़त का जवाब नहीं दिया!" प्रतिभा का सन्देश आया था।
ख़त! कैसा ख़त?

"वही जो उसने तुम्हें लिखा था...और फिर ये सोच कर हफ्ते भर कॉलेज नहीं आई की तुम क्या सोचोगे!"

राकेश सन्न रह गया। पुराने पते पर पिछले बारह सालों से कोई नहीं रहा था!

क्या लिखा था उस ख़त में, रागिनी ने?
"वो तो नहीं पता, राकेश!"
**************
शायद ख़त बचा हो सोच वो अगले ही दिन पुराने पते पर पहुँचा।

जाने क्या लिखा होगा उसने...कैसे शुरुआत की होगी, सिर्फ नाम या फिर...
पर तमाम भाव, एहसास समेटने वाले लिफ़ाफ़े की कहाँ इतनी हैसियत होती है, की बारह साल तक मज़मून की हिफाज़त करे।

फिर भी, हैसियत से बढ़ कर ख़ुद को फ़ना कर के एक टुकड़ा उस एक युग से बन्द घर में टेबल के पाँव तले दबा था...जिसमें बस इतना ही लिखा था-

"कहना चाहिए था"

न इससे पहले कुछ न इसके बाद! राकेश की ग़लती का प्रतिबिम्ब था वो टुकड़ा, उसी चिट्ठी का...शायद।

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