अतीत - एक नामुमकिन सच


मानव और प्रिशा ढलते सूरज की और देखते हुए विक्टोरिया मेमोरियल की बेंच पर बैठे हुए थे. सूरज की लालिमा सामने तालाब के पानी में गिर रही थी जो सचमुच इस पल को कुछ ज्यादा ही रोमांटिक बना रही थी. ऐसे मौसम में, नज़ारे में ही तो प्यार जवां होता है. पर प्रिशा इन सबसे दूर, बेखबर, अपनी ही दुनिया में खोयी हुई थी. नज़रें शून्य की और, किसी को तक रही थी. इससे अनिभिज्ञ, मानव, रोमांटिक होता हुआ उसे अपनी और खींचते हुए अपनी बाँहों में जकड़ लेता है.

मगर प्रिशा तो जैसे बेजान बुत बनी बैठी थी. उसकी आंखें शून्य के घेरे में थी. अपने प्यार के प्रयास की कोई प्रतिक्रिया न मिलती देख मानव भी उसकी इस अवस्था से सोच में पड़ गया.

मानव और प्रिशा की मुलाक़ात एक मशहूर वैवाहिक वेबसाइट पर हुई थी. या फिर यूँ कहा जाये की दो अजनबियों के एक नए रिश्ते की शुरुआत उस वैवाहिक वेबसाइट से हुई थी. काफी लम्बे समय तक दोनों की बातचीत सिर्फ ऑनलाइन यानि इन्टरनेट पर इमेल्स से होती रही या फिर फ़ोन पर संदेशों या कभी कभी बातों के जरिये होती रही. पर इस दरमियाँ दोनों ही एक दुसरे से मिलने से कतराते रहे. बिलकुल अजनबी से अचानक इस तरह, एक रिश्ता बन जाना शायद उनके और समाज के विश्वास से परे था.

और फिर मानव को अपने काम के सिलसिले में शहर से काफी दूर जाना पड़ा. और यही कुछ महिनों की दूरी उनके पास आने का शबब बन गयी. एक ही शहर में रहते हुए भी उन्होंने अभी तक कभी मिलने की कोशिश नहीं की और अब जब ये चंद महीनों की दूरी आई तो उन्हें एक दुसरे से जुदाई का एहसास होने लगा. दोनों के दिल में मिलने की तलब जाग उठी. घंटो फोन पर बातें होती रहती पर फिर भी जुदाई का ग़म सताता था. अगर दोनों में से कोई एक भी अपने ऑफिस के काम में व्यस्त होता या फोन पर बातें होना नामुमकिन होता तो वो एस.ऍम.एस का सहारा लेते. पर एक दुसरे को किसी न किसी कड़ी से जोड़े रखते.

और आज करीब ५-६ महीनों बाद आखिर दोनों ने विक्टोरिया में मिलने का फैसला किया था. मानव के लिए प्रिशा का चेहरा बिलकुल अजनबी था क्यूंकि आज तक कभी उसने प्रिशा की एक तस्वीर तक नहीं देखी थी. हालाँकि, ये और बात थी की मानव की कई तस्वीरें प्रिशा ने इन्टरनेट पर देखी थी इसलिए मानव को पहचानना उसके लिए बड़ा आसान था.

मैदान मेट्रो स्टेशन के बहार खड़े मानव को उसका इंतज़ार करते हुए अभी मुश्किल से १५ मिनट ही हुए थे की स्टेशन की सीढ़ियाँ चढ़कर गेट से बहार आती एक लड़की पर उसकी नज़रें जम गयी. चाह कर भी वो उस लड़की पर से अपनी आँखें नहीं हटा पा रहा था.

गहरे डेनिम रंग की केप्री में पीले रंग की हलके जरी काम वाली कुर्ती पर पतली शाल जैसा दुपट्टा लिए हुए, गोरी कलाइयों पर इन्द्रधनुषी कड़ा पहने, प्रिशा बहुत ही खुबसूरत लग रही थी. जरा भरावदार बदन होते हुए भी वो इन कपड़ो में बहुत जँच रही थी. आँखों में भुरे फ्रेम के चश्मे डाले हुए चेहरे पर मेक अप के नाम पर सिर्फ कानो में २ बालियाँ थी. बिना साजो श्रृंगार के भी कोई लड़की इतनी ख़ूबसूरत दिख सकती है यह सिर्फ उन्ही को विश्वास आएगा जो उसे एक बार देख ले.

पता नहीं क्यूँ पर मानव को वो चेहरा कुछ जाना पहचाना सा लग रहा था. बावजूद इसके की वो उस लड़की को पहली बार देख रहा था, उसका दिल बार बार यही आवाज़ दे रहा था की कहीं न कहीं उस लड़की से उसका कोई नकोई रिश्ता है.

बाहर आते ही उसकी नज़रें किसी को ढूंढ़ रही थी, ये बात मानव की आँखों से बच नहीं पाई. उसे भी लगा की वो शायद उस चेहरे को कुछ ज्यादा ही एहमियत दे रहा है जबकि वो किसी और के इंतज़ार में वहां पर खड़ा है. और वैसे भी वो किसी को ढूंढ़ रही थी तो जाहिर सी बात है की वो अकेली नहीं होगी. उसने अपना ध्यान उस लड़की की और से हटाना चाहा पर तभी उसने गौर किया वो लड़की किसी को फ़ोन कर रही थी. वो पलट कर थोडा आगे चलने लगा. शायद प्रिशा अगली ट्रेन से आएगी ये सोच कर वो समय काटने के लिए पास की चाय की दूकान पर चाय पीने जाने लगा की तभी उसके मोबाइल पर वही प्यारा गुजराती गाना "तारी आँख नो अफिनी" बजने लगा. ये गाना उसने प्रिशा के नंबर के साथ सेट कर रखा था. जब भी वो गाना बजता उसके हाथ एक पल भी गंवाएं बिना फोन रिसिव करने के लिए झपट पड़ते.

मोबाइल स्क्रीन पर इस गाने के साथ वो नाम देख कर मानव के होठों पर मुस्कान की एक लहर आ गयी. इससे पहले की वो फोन रिसिव करे, फ़ोन कट चूका था. उसे खुद पर गुस्सा आया की प्रिशा का फोन आते ही उसे ऐसा क्या हो जाता है की वो कहीं खो जाता है. खैर, अपने आपको गालियाँ देते हुए उसने मोबाइल में रीडायल का बटन दबाया और अचानक ही उसकी नज़रें मेट्रो स्टेशन के बाहर खड़ी उसी लड़की की तरफ गयी. उसके चेहरे पर कुछ झुंझलाहट साफ़ झलक रही थी. शायद वो जिससे मिलने आई थी उसके लेट आने के कारण से नाराज़ होगी. मानव ने उस लड़की को नज़रंदाज़ करते हुए प्रिशा को फ़ोन लगाया की तभी उस लड़की का भी फ़ोन बज उठा. मानव चौक उठा. उसे पता चल गया की जिस लड़की पर से उसकी नज़रें नहीं हट रही थी वो और कोई नहीं उसकी प्रिशा ही थी.

अब तक जिसको सिर्फ कल्पनाओ में देखा था, खवाबों में अक्सर जिसके साथ मुलाक़ात हुआ करती थी, ये वही परी है. एक पल में उसका दिल हज़ार बार धड़क चूका था. वो सोच में ही था की प्रिशा की नाराज़गी भरी आवाज़ ने उसकी तन्द्रा भंग कर दी. वो उस पर लेट होने के लिए गुस्सा किये जा रही थी और मानव उसके बगल में जा कर खड़ा हो गया था.

एक और प्रिशा उस पर नाराज़ हुए जा रही थी और वो था की उसे चिढ़ाए जा रहा था. वो प्रिशा को तंग करने का ऐसा मौका हाथ से नहीं गंवाना चाहता था. वो प्रिशा के बगल में खड़ा खड़ा मुस्कुराये जा रहा था. जब प्रिशा ने गुस्से में फोन काट दिया तो उसके मुंह से जोर की हंसी निकल गयी जिसे सुन कर प्रिशा बड़े गुस्से में उस आवाज़ की और पलटी. उसे लगा की पास खड़ा बंदा उसकी बातों को सुन रहा था और उसका मजाक उड़ा रहा था. जैसे ही वो उस तरफ पलटी सामने मानव को खड़ा देख और उसे हँसते हुए पाकर सब कुछ समझ गयी की किस तरह मानव उसकी टांग खिंच रहा था.

मानव को पास खड़ा पाकर और पहली बार रूबरू देख कर उसने एक अजीब से सनसनाहट अपने तन बदन में महसूस की. पर वो अपनी भावनाओ पर काबू करके बनावटी गुस्सा दिखाते हुए मानव को बुरा भला कहनी लगी. पर इसके बाद जो हुआ उसकी उसने कभी ख्वाब में भी कल्पना नहीं की थी.

भरी भीड़भाड़ वाले इलाके में, सैकड़ो लोगो के सामने ही, मानव अपने दोनों हाथ जोड़ कर उसके सामने घुटनों के बल बैठ कर उससे माफ़ी मांगने लगा. सब लोगो को उनकी और घूरते देख उसे थोड़ी शर्म आने लगी. पर मानव की इस हरकत उसे बड़ी प्यारी भी लगी. "ओके बाबु, अब चलो" सिर्फ इतना ही उसके मुंह से निकला.

"बाबु" ये शब्द सुनते ही मानव अपने बीते कल में चला जाता था. कोई और भी था उसकी ज़िन्दगी में जो उसे इसी नाम से बड़े प्यार से पुकारा करता था. २ साल का लम्बा समय बीत चूका था उससे जुदा हुए मानव को, पर लाख कोशिशों के बावजूद हालात कुछ न कुछ ऐसा कर देते की वो उसकी नज़रों के सामने आ ही जाती. पर वो प्रिशा को अभी ये सारी बातें नहीं बताना चाहता था. और इसीलिए उसने झट से अपने दिमाग से पुरानी यादों को निकाल फैंका. वो उसका बिता कल था और मानव अपने बीते कल को भुला कर, भविष्य की चिंता छोड़ कर, अपने वर्तमान में जीना चाहता था. बिता हुआ कल उसके लिए एक डरावना सपना था, आने वाला कल किसने देखा था, यही वो पल था जो उसका अपना था.

दोनों वहां से आगे चल पड़े. साथ साथ चलते हुए भी दोनों के बीच कुछ और भी चल रहा था…ख़ामोशी. घंटों बातें करने वाले २ इंसान, जिनकी बातें कभी ख़त्म होने का नाम

नहीं लेती थी, बातें करते करते जिनका तन थक जाता था पर मन नहीं थकता था, आज वो दोनों इंसान बिलकुल चुपचाप थे, एकदम खामोश. ऐसा लग रहा था जैसे उनकी सारी बातें ख़त्म हो चुकी थी. पर नहीं. ये वैसी ख़ामोशी नहीं थी. ये ख़ामोशी थी प्यार के आने वाले बवंडर से पहले की. प्यार के ऐसे तूफान से पहले की जिसमे दोनों कहीं दूर तक उड़ जाने वाले थे. वो कहते है न की जब एक लड़का और लड़की साथ हो और खामोश हो तो उन दोनों के बीच कहने सुनने को बहुत कुछ होता है.

आख़िरकार, चुलबुली सी और बेहद बातूनी, पर बच्चों सी मासूम प्रिशा ने ही इस ख़ामोशी को तोडा.

प्रिशा: बाबु आखिर इतने महीनों के अनदेखे रिश्ते के बाद हम लुकाछिपी का खेल खत्म करके आज आमने सामने आ ही गए.

मानव: आमने सामने नहीं, पास आ गए प्रिशा.

प्रिशा: ओये, हमने तो बस ऐसे ही बोला, तुम इतने भावुक क्यूँ हो गए?

मानव: अरे नहीं. मैं भावुक नहीं हुआ. वो तो मुझे लगा की तुम कुछ गलत बोल रही हो तो सोचा चलो तुम्हारी गलती को सुधार लिया जाए.

प्रिशा: ओये हेल्लो, मैं गलती नहीं करती, हाँ?

जिस तरह से चुटकी बजाते हुए, ऊँगली दिखाते हुए प्रिशा ने ये बात कही, मानव को हँसी आ गयी. पर दिल ही दिल में उसे प्रिशा की ये अदा बहुत प्यारी लगी. मानव को मुस्कुराते देख प्रिशा भी मुस्कुरा दी. पर उसकी मुस्कराहट में मानव से शर्म की एक छोटी सी झलक छुपी न रह सकी. ऐसे ही छोटी मोटी नोंकझोंक करते हुए दोनों विक्टोरिया मेमोरियल पहोंचे.

दोनों वहां बेंच पर जा बैठे. सामने तालाब के ठहरे हुए पानी पर सूरज की तेज रौशनी गिर रही थी, और इसी वजह से तालाब का पानी भी सूरज के रंग में रंग कर सुनहरा लग रहा था. पानी में बहते, पेड़ो से गिरे हुए सूखे पत्ते, फूल, प्रिशा और मानव के अन्दर प्यार के फूल खिला रहे थे. दोनों दिल ही दिल में एक दुसरे को पसंद करने लगे थे पर दोनों ही अपने स्वाभाव के कारण इस बात को स्वीकार नहीं कर पा रहे थे. शायद दोनों ही अपने अतीत से इस तरह झुलसे हुए थे की उन्हें अपने इस आज और आने वाले कल से डर लग रहा था. कहीं इतिहास अपने आप को न दोहरा दे. दोनों अपनी भावनाओ का इज़हार करना चाहते थे पर उनका डर उनको पीछे खिंच रहा था.

फिर भी अपने सारे डर, सारी सोचों को अपने अन्दर से निकाल फैंका मानव ने. और बड़े ही प्यार से, हौले से उसने प्रिशा का हाथ थाम लिया. सामने पानी की और तकती प्रिशा इस अचानक से हुई मानव की हरकत के लिए तैयार नहीं थी. उसे मानव के स्पर्श से एक झटका सा लगा. पर इस स्पर्श ने प्रिशा के दिल के तारों में एक संगीत पैदा कर दिया. ऐसा नहीं था की प्रिशा के लिए, उसके हाथों पर किसी पुरुष का ये पहला स्पर्श था. अपनी नौकरी के सिलसिले में उसे हर रोज़ सैकड़ों लोगो से हाथ मिलाने पड़ते थे. पर मानव के इस प्रथम स्पर्श की बारिश में वो भींग गयी थी. उसे लगा की वो इस बारिश में मात्र भींगना नहीं पर पूरी तरह से नहा लेना चाहती है.

प्रिशा की हालत अगर ये थी, तो मानव भी कोई अछुता नहीं रहा था इस प्यार की बारिश से. प्रिशा का हाथ थामते ही उसके भी तनबदन में एक तरंग सी दौड़ गयी. प्रिशा के गरम हाथों को स्पर्श करते ही उसे लगा जैसे उसने किसी के हाथों में अपना दिल निकाल कर रख दिया हो. अद्भुत आनंद की इस अनुभूति से वो अलग ही दुनिया की सैर में चल पड़ा था जैसे. उसी पल उसने मन ही मन सोच लिया की अब जो हाथ थामा हैं उसे सारी उम्र नहीं छोड़ना है.

मानव उसे अपलक निहारे जा रहा था. अपने चेहरे से जुल्फें वो हटा रही थी, लग रहा था जैसे घटाओं से चाँद निकल रहा हो. कितना मासूम है उसके ये चेहरा, लग रहा जैसे कोई गुलाब हो. अपने बालों को वो लहरा रही थी, जैसे घटा छा रही हो. अपने लबों से वो कुछ बोल रही थी, जैसे कोई गीत गुनगुना रही हो. अँधेरे में भी उजाला कर दे, लग रहा जैसे कोई चिराग जला रही हो. वो हंस हंस के बातें कर रही थी, लग रहा था जैसे दीवाना बना रही हो.

खैर, दोनों के मन में अपनी ही सोच चल रही थी. पर दिल से एक दूसरों के प्यार से भींगे हुए थे. दोनों को ही लग रहा था की वक़्त भी कभी कभी क्या खेल खेलता है कोई समझ नहीं पता. कभी दोनों ऐसे ही माहौल में किसी और के साथ बैठे थे और आज वो दोनों.

और अचानक ही मानव की सोच से परे, प्रिशा ने अपना सर उसके कंधो पर रख दिया. वो समझ नहीं पाया की क्या हुआ? वो नहीं समझ पा रहा था की प्रिशा के मन में क्या चल रहा था. पर जो भी हो, उसे प्रिशा की इस हरक़त से उस पर बहुत प्यार आया. उसके हाथ प्रिशा के बालों से खेलने लगे. प्रिशा को भी अपने बालों में मानव का यूँ हाथ फेरना बहुत अच्छा लग रहा था. अपने दायें हाथ की उँगलियों को उसने मानव की उँगलियों में फंसा दिया. दोनों ही एक दुसरे के हाथों को हौले हौले दबाने लगे. जुबां पर ख़ामोशी थी मगर कहीं प्यार अपने उफान पर था. दोनों को एक दुसरे का साथ जैसे जहाँ भर की खुशियाँ दे रहा था. दोनों की खामोश जुबां ढेर सारी प्यार की बातें कर रही थी. सदा बकबक करने वाले दो इंसान इतने चुप भी रह सकते हैं, यह यहाँ देख कर भी कोई नहीं मान सकता.

एक बार फिर से प्रिशा ने ही ख़ामोशी तोड़ी.

प्रिशा: बाबु, इतना प्यार सारी ज़िन्दगी हमारे साथ रहेगा ना? कहीं यह सपना बनकर टूट तो नहीं जायेगा?

मानव: प्रिशा, हम दोनो ही इस वक़्त यथार्थ में जी रहे है. और ये बात शायद तुम भी महसूस कर रही होगी. तो सपना बनने की तो कोई बात ही नहीं रह जाती. रही बात प्यार की, तो ये मेरा वादा है तुमसे, की तुम्हारे लिए मेरा ये प्यार कभी कम नहीं होगा. मेरी ज़िन्दगी रहे ना रहे, तुम्हारे लिए ये प्यार हमेशां ही ऐसा रहेगा.

प्रिशा ने मानव के होठों पर अपनी ऊँगली रखते हुए उसे ऐसी अशुभ बातें करने के लिए मना किया. मानव ने उसकी ऊँगली को चूम लिया.

प्रिशा (शरमाते हुए): एई बाबु, क्या कर रहे हो?

मानव: क्या कर रहा हूँ? अपने प्यार को थोडा प्यार ही तो कर रहा हूँ.

प्रिशा (बनावटी मुंह बिगाड़ते हुए): हुं...खाली बोलते हो. अभी अगर कोई और खुबसूरत लड़की मिल गयी और दो मीठी बातें कर ली तो हो जाओगे शुरू.

मानव (उसे और चिढ़ाते हुए): किसी और खुबसूरत लड़की का तो पता नहीं, पर हाँ, अगर कटरीना ने प्यार से कुछ कह दिया तो मैं ना तो नहीं कर पाउँगा ना?

प्रिशा: शट अप...जान ले लुंगी अगर ऐसा कुछ सोचा भी तो.

मानव: हाई...जान तो पहले ही ले चुकी है हमारी जान, अब और क्या बाकी रह गया?

प्रिशा: उफ़ तुमसे तो कुछ कहना मतलब पागल होना.

मानव: हाँ तो कौन कह रहा हैं कुछ कहो. बस प्यार करो ना. कहने सुनने को तो सारी उम्र पड़ी हैं. और वैसे भी शादी के बाद तो सिर्फ तुम्हें ही बोलना और मुझे सुनना हैं.

प्रिशा: ओहहोहो…मेरे प्यारे पति परमेश्वर. कितने भोले भाले.

और इसी बात पर दोनों खिलखिला कर हँस पड़े. प्रिशा को इतनी खिलखिलाते हुए मानव पहली बार देख रहा था. इतनी प्यारी लड़की, जितनी खुबसूरत दिखने में, उससे कहीं ज्यादा मन की. चेहरे पर छलकती मासूमियत पर ये हँसी तो बस देखते ही बनती थी. मानव की जगह कोई ऋषि मुनि तो क्या साक्षात् भगवान भी उसे इस वक़्त देख ले तो उससे प्यार कर बैठे. ऐसा आकर्षण था प्रिशा में. अपनी और प्यार भरी गहरी नज़रों से देखते हुए प्रिशा हँसते हुए मानव से पूछ बैठी,

प्रिशा: क्या हुआ बाबु? ऐसे क्या देख रहे हो? और गाना गुनगुनाने लगी- इस प्यार से मेरी तरफ ना देखो प्यार हो जायेगा.

मानव: देख रहा हूँ की कोई लड़की इतनी प्यारी कैसे हो सकती है? और तो सब कुछ ठीक हैं पर क्या सचमुच में भगवान की सबसे प्यारी मूर्ति मेरे लिए ही बनी हैं या भगवान मुझे जागते हुए में कोई ख्वाब दिखा रहा है?

प्रिशा: एईई बाबु, तुम्हें नहीं लगता की तुम कुछ ज्यादा ही मेरी तारीफ़ कर रहे हो? देखो, यह सच है की नॉर्मली लड़कियों को अपनी तारीफ़ सुनना बहुत पसंद होता हैं, पर मैं उनमें से नहीं हूँ. मैं कोई आसमां से उतरी हुई परी नहीं हूँ. इंसान हूँ. एक सीधी साधी साधारण लड़की. और जो सिर्फ तुमसे प्यार करती हैं बस.

मानव: सच कहूँ प्रिशा? मैं तुम्हारी इसी सादगी पर मर मिटा हूँ.

प्रिशा: अरे हाँ बाबु, तुमने तो मुझे कभी देखा ही नहीं था. आज तुम मुझे पहली बार देख रहे हो, पहली बार मिल रहे हो, फिर तुमने मुझे कैसे पसंद कर लिया? आइ मिन, बिना देखे, बिना जाने तुम मुझे पसंद करने लगे?

मानव: बिना देखे तो सही, पर बिना जाने नहीं प्रिशा. देखो ना इतने लम्बे समय से हम दोनों एक दुसरे को जानने में ही तो लगे हुए हैं ना? और रही बात देखने की, तो तुम्हें मैंने पहले ही बताया था की मैंने कभी भी बाहरी दिखावे को महत्व नहीं दिया हैं. और जब पहली बार हम दोनों की बात हुई थी फ़ोन पर मैं उसी वक़्त तुम्हारा दीवाना हो गया था. मुझे उस समय ही लगा था की, जिसकी बातें इतनी मीठी हो, जिसकी सोच इतनी प्यारी हो, वो खुद कितनी प्यारी, कितनी मीठी होगी? और उसके बाद तो जैसे मैंने सोच ही लिया था, चाहे तुम दिखने में कैसी भी हो, मुझे कोई फर्क नहीं पड़ेगा. और देख लो, मैं कितना सही था.

प्रिशा बिना पलक झपकाए, एकटक मानव को बोलता हुआ देखे जा रही थी. अपनी तारीफ़ करते हुए मानव उसे अच्छा लग रहा था लेकिन जिस बात पर मानव पर वारी जा

रही थी वो थी मानव के आँखों से झलकती सच्चाई. इतना कुछ बोलते हुए भी मानव की आँखों में जो सच्चाई की चमक थी वो उसके दिल को छू गयी थी. हमेशां फ़िल्मी पात्रों में जीने वाला, फ़िल्मी कलाकारों की तरह बोलने वाला, स्टाइल मारने वाला, डाइलोग की भाषा में बात करने वाला मानव आज कितनी सफाई से, सादगी से, बिना कोई डाइलोग बोले, कितनी आसानी से अपने दिल की बात बोल गया.

मन ही मन अपने नसीब को, मानव को अपनी ज़िन्दगी बनाने के लिए शुक्रिया कह रही थी. मानव फिर एक बार प्रिशा को कही खो जाते हुए देखता है. हलके से प्रिशा के गालों पर अपना हाथ मारते हुए पूछता है की वो कहाँ खो गयी?

प्रिशा: ओये शर्म नहीं आती किसी लड़की को छुते हुए, उसे गाल पर यूँ मारते हुए?

मानव: किसी और लड़की की बात हो तो शर्म आती है मगर हमारी ज़िन्दगी के गालों को छूने में शर्म कैसी? वैसे बड़े नर्म, कोमल है तुम्हारे गाल. कौनसा क्रीम लगाती हो?

प्रिशा (आँखें तरेरते हुए): तुम्हें मालूम है ना मैं मेक अप नहीं करती. (फिर हँसते हुए) ओह, तुमने तो क्रीम के बारे में पूछा ना? वो तो मैंने आज स्पेशल क्रीम लगायी है. क्यूंकि एक तो किसी स्पेशल इंसान से मिलना था और दुसरे, तुम मेरे गालों पे हाथ लगाओ तो हाथ फिसल जाये.

मानव (आंख मारते हुए): अच्छा हुआ हाथ लगाया और वो फिसल गया. नियत लगाता तो?

प्रिशा (अपने हाथ दिखाते हुए): ये देखे है? देखने और छूने में तो तुम्हें बड़े कोमल लग रहे है ना. जब पड़ेंगे ना तब सब रोमांस भूल जाओगे मि. आशिक.

मानव: हाईईई, काश ऐसा हो जाये. दोनों फिर से ठहाके लगाकर हँस दिए.

और फिर हँसते हँसते कब दोनों के हाथ एक दुसरे के साथ बंध गए उन्हें पता ही नहीं चला.


दोपहर हो चली थी और हमेशां की तरह मानव के पेट में आन्दोलन छिड़ गया था. उसे भूख लगने लगी थी. मानव की हमेशां से एक कमी रही थी, वो कभी भी जरा भी भूखा नहीं रह सकता था. भूख उसे जरा देर भी बर्दास्त नहीं होती थी. पर आज प्रिशा से मिलने की चाह में वो सुबह सुबह घर से बिना कुछ खाए ही भाग निकला था. और यह बात प्रिशा को मालूम नहीं थी. इस लिए मानव ने उसे पूछ ही लिया की लंच के लिए वो कहाँ चलना पसंद करेगी? पर प्रिशा ने उसे यह कह कर टाल दिया की उसे भूख नहीं है. पर जब मानव ने उसे जोर देकर कहा तो वो मान गयी और दोनों बहार कुछ साउथ इंडियन खाने के लिए निकल गए. पास ही के मशहूर रेस्तराँ में पहोंच कर एक कोने की टेबल में जा कर आमने सामने बैठ गए. प्रिशा के कहने पर मानव ने वेटर को बुला कर एक ढोसा लाने का आर्डर दे दिया.

यह देख प्रिशा पूछ बैठी: क्यूँ एक? तुम लाये हो लंच के लिए और तुम नहीं खाओगे?

मानव: किसने कहा मैं नहीं खाऊंगा?

प्रिशा: तो फिर सिर्फ एक ढोसा क्यूँ मंगवाया? तुम क्या खाओगे?

मानव: तुम्हें किसने कहा की वो तुम्हारे लिए मैंने आर्डर किया है? वो तो मैंने अपने लिए मंगवाया है.

प्रिशा:तो मेरे लिए?

मानव: ठीक है तो हम दोनों शेयर कर लेंगे.

प्रिशा मुस्कुरा दी मानव की इस बात पर. वो समझ रही थी की मानव क्या चाहता था. और कुछ हुआ भी यही. जैसे ही उनका आर्डर आया, मानव अपनी जगह से उठ कर प्रिशा के बगल में जा कर बैठ गया. उसने प्रिशा की खुर्शी भी अपनी और घुमा ली. प्रिशा कुछ समझे इससे पहले ही मानव के हाथ में निवाला उसके मूंह तक पहोंच गया था. जिस प्यार से मानव ने वो निवाला प्रिशा की और बढाया वो मना नहीं कर पाई और उसने वो निवाला मानव के हाथों से ही खा लिया. और अब बारी उसकी थी. उसने भी एक निवाला तोड़कर मानव की और बढाया और मानव...... वो तो यही चाहता था. और अंत तक यही सिलसिला चलता रहा.

रेस्तराँ में बैठे कई लोग इन दो प्रेमी पंखियों को एक दुसरे को प्यार से खिलाते देख रहे थे. पर इन दोनों को जैसे इन सब से कोई निस्बत ही नहीं थी.

अपने लंच से फारिग होकर दोनों वहां से फिर विक्टोरिया की तरफ चल दिए. रास्ते में मानव ने एक आइसक्रीम ली जिसे दोनों ने साथ मिलकर खायी. दोनों वापस उसी बेंच पर आकर बैठे. धुप भी कुछ कम होने लगी थी.

इधर जैसे ही दोनों बेंच पर बैठे मानव ने प्रिशा को अपनी आगोश में ले लिया. प्रिशा भी बिना किसी झिझक के मानव की बाँहों में समाती चली गयी. और इसी मुद्रा में बैठे दोनों

अपने बारे में, एक दुसरे के परिवार के बारे में, दोस्तों रिश्तेदारों के बारें में बातें करने लगे.

और फिर इधर उधर की बातें परे रख कर दोनों एक दुसरे के साथ फिर एक बार प्यार के सागर में गोते लगाने लगे. इस सागर की लहरें उफ़ान पर थी. दोनों ने ही एक दुसरे को अपनी बाहों में बाँध रखा था. जिस मजबूती से दोनों ने एक दुसरे को बाँहों में बाँध रखा था, उससे ऐसा ही प्रतीत हो रहा था जैसे दोनों को ये डर सता रहा हो की यही आखरी मौका है अपने साथी को बाहों में लेने का और फिर दोनों को बिछड़ जाना है.

मानव प्रिशा के चेहरे पर गिरती हुई लटों को अपनी दो उँगलियों से हटाता है. मानव की उँगलियों का उसके गालों पर स्पर्श पाते ही प्रिशा फिर से सिहर उठी. यहाँ मानव उसके गालों पर लगातार अपनी उँगलियाँ फेर रहा था. और प्रिशा ने अपने हाथ से मानव के हाथों को अपने हाथों में लेते हुए अपने होठों से चूम लिया. उसने मानव के हाथों को अपने गालों पर दबा लिया. दोनों के ही दिल प्यार के सागर की लहरों में हिलोरे खा रहे थे. दोनों में से कोई कुछ समझ पाता इससे पहले ही दोनों के होंठ एक दुसरे के होठों से जुड़ चुके थे. और फिर एक लम्बा प्रगाढ़ चुम्बन. दोनों के निष्छल प्रेम की निशानी. दोनों ही बेतहासा एक दुसरे के होठों को चूमे जा रहे थे. पर ये सिर्फ एक पवित्र प्रेम की निशानी ही थी. कही भी किसी भी सूरत में वासनारूपी पाप का नामोनिशां नहीं था. और आखिर १० मिनट के लम्बे चुम्बन के बाद दोनों एक दुसरे से अलग हुए. प्रिशा ने अपने आपको पहले व्यवस्थित किया. फिर मानव की और रुख करते हुए पूछती है,

प्रिशा: बाबु, मुझे लगता है हमदोनो ने बड़ी गलती कर दी?

मानव: नहीं प्री, ऐसा कुछ नहीं है. हमदोनो ने कोई गलती नहीं की है. हमने तो सिर्फ एकदूसरे से प्यार बांटा है.

प्रिशा: पर तुम्हें नहीं लगता भावनाओ में बहकर हमने कोई जल्दबाजी कर दी?

मानव: हाँ प्री, हमदोनो भावनाओ में जरूर बह गए थे पर हमने कोई जल्दबाजी नहीं की. तुम नाहक ही सोच सोच कर परेशान हो रही हो. गलती, जल्दबाजी तो तब कह सकते थे जब हम और थोडा आगे बढ़ते. तुम शायद समझ ही रही हो मैं क्या कहना चाह रहा हूँ? पर हमदोनो को ही अपनी अपनी मर्यादाओं का ख्याल है और हम अपनी मर्यादा नहीं लांघ सकते. है ना? और एक दुसरे को चूमना, प्यार बांटना ही तो है. सो रिलेक्स.

प्रिशा: हाँ बाबु, तुम ठीक ही कह रहे हो. हमने तो सिर्फ प्यार बांटा है. (और फिर मानव को छेड़ती हुई) चलो इससे एक बात तो और मालूम पड़ गयी. जितने तुम रोमांटिक हो, उससे कही ज्यादा अच्छी तरह तुम किस्स करते हो. हाहाहाहा.

मानव: हटटट पगली...

प्रिशा: ईसससस क्या शर्मा रहे हो...

प्रिशा जो से खिलखिला कर हंस पड़ी. वो पहली बार किसी लड़के को शरमाते हुए देख रही थी. पर वो समझ रही थी की इस बडबोले लड़के के पीछे एक बहुत ही भोला भला मासूम सा इंसान छिपा है जिसके अन्दर सागर से भी ज्यादा गहरा प्यार भरा पड़ा है. वो भी मानव को हद्द से ज्यादा प्यार देना चाहती थी.

पर अब वो अपना अतीत मानव से छुपाना नहीं चाहती थी. वो उसे सब कुछ बता देना चाहती थी. पर इस बात का डर उसे सता रहा था की कही मानव उसे गलत न समझ बैठे, कही उसको अपने से अलग न कर दे. मानव का हर स्पर्श, उसकी हर बातें, उसको हर पल बांधे जा रही थी. मानव की बाहों में उसे ऐसा शुकुन मिल रहा था जो आज से पहले कभी महसूस नहीं किया था. मानव की बाहें उसे दुनिया की सबसे सुरक्षित जगह लग रही थी.

मानव को अपने कन्धों पर प्रिशा का सर रखना बड़ा प्यारा लग रहा था. वो अपना सपना सच होते हुए देख रहा था. उसने हमेशां से एक सपना देखा था की कोई तो उसका साथी होगा जो उसकी बाहों में खुद को सबसे ज्यादा सुरक्षित महसूस कर सके. जो अपना सर उसके कंधो पर जब रखे तो उसे दुनिया में फिर किसी और ख़ुशी की जरूरत ही न लगे.

अपने कंधो पर रखे प्रिशा के सर को वो बड़े प्यार से सहलाते हुए अपनी सोच में खोया हुआ था, कभी प्रिशा के बालों में, कभी उसके गालों पर हाथ सहलाना उसे मीठा लग रहा था. दोनों ने अपने एक हाथ एक दुसरे के हाथों से बाँध रखे थे. मानव की सोच को उसके प्यार को प्रिशा की आवाज़ ने तोडा.

प्रिशा: बाबु, मै तुम्हें अतीत के बारे मे बताना चाहती हूँ.

मानव: अरे प्री, मैंने कभी तुमसे तुम्हारे अतीत के बारे मे पूछा है? मुझे कोई निश्बत नहीं तुम्हारे अतीत से. चाहे जैसा भी, जो भी. हमे अपने अतीत को भुला कर अपने भविष्य के बारे मे सोचना चाहिए ना प्री?

प्रिशा: बाबु, अतीत उस लड़के का नाम है जो कभी मेरी ज़िन्दगी मे आया था. जो कभी मेरा सबसे अच्छा दोस्त हुआ करता था और मन ही मन मुझसे बहुत प्यार करता रहा पर मुझसे कभी इस बात का इकरार तक नहीं किया.

मानव: था से तुम्हारा मतलब? अब वो कहाँ है? और जब उसने तुम्हें कभी यह नहीं कहा की वो तुमसे प्यार करता है तो फिर तुम्हें ये बात कैसे पता चली? मेरी समझ मे कुछ नहीं आया.

प्रिशा: क्या तुम्हें शुरू से सारी कहानी बता सकती हूँ अगर तुम बुरा ना मानो तो?

मानव: अरे प्री, कैसी बातें कर रही हो? तुम्हें हो क्या गया है? चलो बताओ क्या बात है?

प्रिशा: मैं और अतीत, दो दोस्त, नहीं सिर्फ दोस्त नहीं, सबसे अच्छे दोस्त. जो बाकी सब चीजों के साथ साथ अपना जन्मदिन भी बांटते थे. हाँ, हम दोनों का जन्म एक ही दिन, एक ही महीने, और एक ही साल में हुआ था. नहीं हम दोनों बचपन के दोस्त तो नहीं थे पर जहाँ तक मुझे याद है हम दोनों की पहली मुलाक़ात स्कूल के एक फंक्शन में हुई थी. हम दोनों एक ही क्लास में पढ़ते थे पर उस दिन से पहले हम आमने सामने नहीं हुए थे. क्यूंकि वो हमेशां से ही क्लास के समूह से दूर रहता था, खास कर जहाँ लड़कियां होती थी वहां आस पास तो भूले से भी नही जाता था.

खैर उस फंक्शन के दिन मैं किसी चीज़ को लिए अपने क्लासरूम की और दौड़ी चली जा रही थी की अचानक मुझे ठोकर लगी और मैं गिर पड़ी. मेरे पैरों में जोर की चोट लगी थी. मैं ठीक तरह से चल नहीं पा रही थी. जैसे तैसे लंगड़ाते हुए मैं क्लास की तरफ जाने लगी. तभी सामने से मुझे अतीत को लंगड़ा कर आते हुए देखा. मुझे बड़े जोरों का

गुस्सा आया. कितना बद्तमीज़ लड़का है. एक तो मुझे चोट लगी है और वो मेरी नक़ल उतार रहा है. पास आते ही जैसे ही उसकी नज़रें मेरी नज़रों से एक हुई उसने अपनी नज़रें नीचे झुका ली और लंगड़ाते हुए ही आगे बढ़ने लगा. मुझे और जोरों से गुस्सा आया और मैंने उसे आवाज़ देकर रुकने को कहा. वो रुक कर मेरी और रुख करते हुए बोला: हाँ बोलो. अभी भी उसकी नज़रें इधर उधर भटक रही थी पर मुझसे नज़रें नहीं मिला रहा था. मैं उसे मेरी नक़ल करने के लिए खरी खोटी सुनाने लगी. मैं दर्द के मारे गुस्से से और उबल रही थी और उसे बेफाम बुरा भला कहती जा रही थी. पर वो सब कुछ चुपचाप सुनता जा रहा था. उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं थे. अपने मुंह से एक भी शब्द नहीं निकाल रहा था, बस इधर उधर देखे जा रहा था. मुझे एक पल के लिए कुछ अजीब लगा.

मैं उसे इतना बुरा भला कह रही हूँ, गालियाँ दे रही हूँ, और ये बंदा है की बिलकुल बर्फ की तरह ठंडा खड़ा है. ना चेहरे पे कोई हाव भाव, ना ही वहाँ से चले जाने का कोई मन, न मन में कोई रोष. बस बुत की तरह चुपचाप सब सुने जा रहा है. मेरा गुस्सा ठंडा होने लगा, वो मुड कर जाने लगा, बिना कुछ बोले. मैं सोच में पड़ी वही खड़ी रह गयी. फिर अचानक ही एक आवाज़ ने जैसे मुझे नींद से झकझोड़ कर उठा दिया. वो अतीत की आवाज़ थी. वो कब वापस आकर मेरे सामने आकर खड़ा हो गया मुझे पता ही नहीं चला. यह उसकी आवाज़ थी. बहुत ही सधी हुई, धीमी सी.

उसने कहा: आप को चोट लगी और जाहिर सी बात है की जब दर्द बहुत हो रहा हो और अचानक ही कोई आपके सामने आकर इस तरह करने लगे तो गुस्सा तो आएगा ही. मुझे भी आपको लंगड़ाते देखकर बहुत गुस्सा आया की आप मेरी नक़ल उतार रही है पर जब मेरी नज़रें आपके पैरों पर आपकी सलवार पर से निकलते खून की तरफ गयी तो मुझे समझ आया की आपको अभी अभी चोट लगी है. पर अपने शर्मीले स्वभाव के कारण से मैंने आपको मदद के लिए भी नहीं पूछा. सोचा की आप क्या सोचेंगी, की एक लड़की की मज़बूरी का फायदा उठाना चाह रहा है. और यही सोचकर मैं नज़रें झुका कर आगे बढ़ गया. आइ ऍम सॉरी.

ये कह कर वो वापस जाने लगा. मैं उसके निर्दोष चेहरे को देखती रही. उसकी बातें मेरे कानों में गूंजने लगी. फिर अचानक ही वो वापस मुड़ा और कहा: और एक बात. मैं आपकी नक़ल नहीं कर रहा था. चार दिन पहले ही मेरा एक्सिडेंट हुआ था, जिसमे मेरे दाहिने पैर पर प्लास्टर आया है. और इसी कारण से मुझे चलने में तकलीफ हो रही थी. इन चार दिनों में तो मैं स्कूल नहीं आया पर आज के फंक्शन का लालच मुझे मजबूर करके यहाँ तक खिंच लाया. मैं चलता हूँ. बाय. अपना ख्याल रखना और क्लासरूम के कपबोर्ड में फर्स्ट ऐड बॉक्स रखा है, दवाई लगा लेना.

मैं आत्मग्लानी से भर गयी. मुझे बहुत अफ़सोस हुआ और अपने आप पर बहुत गुस्सा भी आया. अपने तेज़ मिजाज़ वाले स्वभाव पर मुझे बहुत बुरा लग रहा था. बिना कुछ सोचे समझे, बिना कुछ जाने किसी को इस तरह से बेइज्जत करना कहाँ की इंसानियत थी. उसकी बातें मेरे व्यक्तित्व पर एक खासा असर कर गयी. उसके प्रति मेरे मन में आदर आ गया. क्या सुलझी हुई सोच, एक एक शब्दों का

प्रभाव जैसे मेरी मनःस्थिति को अचंभित कर गया था.

जिस तरह से उसकी गहरी नज़रों ने मेरे बहते खून को पहले ही देख लिया, कुछ बोलने से पहले सोचना, समझना, जानना, और सामने वाले इंसान के दर्द को समझने के, उसके इस व्यक्तित्व ने मेरे अन्दर एक अनजानी भावना को जन्म दे दिया था. बहुत बड़ी बात, इंसानियत की सिखा गया था वो इस अल्हड, बेफिक्र, बिंदास लड़की को.

क्लासरूम में आकर मैंने सबसे पहले फर्स्ट ऐड बॉक्स निकाल कर दवाई लगा ली. पैरों में दर्द तो काफी हो रहा था पर मेरे अंतर्मन में जो चोट लगी थी, अतीत को बिना कुछ जाने समझे, बदतमीजी करने की जो गलती मैंने की, उसकी चोट मुझे ज्यादा तकलीफ दे रही थी. बस कैसे भी अतीत को ढूंढ़ कर सबसे पहले उससे हाथ जोड़ कर माफ़ी मांगनी थी.

बाहर मैंदान में आकर सैकड़ो छात्रो की भीड़ में मेरी नज़रें अतीत को ढूंढ़ रही थी पर वो कहीं भी दिखाई नहीं दे रहा था. अपने दोस्तों, सहेलियों की बातों को, सवालों का अटपटे मन से जवाब देते हुए या टालते हुए, मैं पागलों की तरह अतीत को ढूंढ़ रही थी. जब वो मुझे कही नहीं दिखा तो मेरे मन में टीस सी उठी. लगा शायद उसे मेरी बातों का इतना बुरा लगा होगा की वो फंक्शन छोड़ घर चला गया होगा. अपने आप को मन ही मन कोसती हुई मैं एक कोने में अकेले जाकर बैठ गयी. मेरी आँखों से ग्लानी के आंसू निकल पड़े. मुझे बहुत दुःख हो रहा था अपनी गलती का. पैरों में प्लास्टर होने के बावजूद कितनी चाह से वो फंक्शन में शामिल होने आया था और मेरे कारण वो वापस चला गया. अब मेरा भी मन वहां रुकने को नहीं कर रहा था.

मैं उठी और मेन गेट की तरफ चल पड़ी, यह सोचते हुए की अगली बार जब वो स्कूल में मिलेगा तो बेझिझक सबके सामने उससे अपनी गलती के लिए माफ़ी मांग लुंगी. और उसके व्यव्हार से मुझे इतना विश्वास था की वो मुझे माफ़ कर देगा. पर अचानक मेरी नज़र मेन गेट से आगे लाइन से बने हुए खाने के स्टाल्स में से एक चाय की स्टाल के बहार रखी खुर्शी पर बैठे उस इंसान पर पड़ी. मुझे बहुत ख़ुशी हुई. उसे देखकर तो मेरा दर्द जाने कहाँ गायब हो गया था. वो अतीत था. अकेला वहां बैठा चाय पी रहा था. मैं दौड़ कर उसके पास पहोंच जाना चाहती थी पर मेरे पैरों के दर्द ने मुझे रोक दिया. लंगड़ाते हुए मैं उसके पास पहोंची. उसने नज़रें उठा कर मेरी तरफ देखा और बस मुस्कुरा कर वापस चाय पीने लगा. मुझे लगा वो तक मुझसे खफा है. और उसका नाराज़ होना भी जायज़ था. मैंने ही बात शुरू की.

"पैरों में दर्द है, क्या मुझे भी थोड़ी सी चाय शेयर करने मिलेगी?" सुनकर उसने मेरी और देखा और बड़े ही प्यार भरे अंदाज़ में मुस्कुराते हुए बोला- "ये चाय तो मैंने जूठी कर दी है पर मैं तुम्हारे लिए स्पेशल चाय आर्डर करता हूँ." मैंने कहा की नहीं मुझे इसी में से शेयर करनी है और स्टाल वाले से खाली कप लेकर मैंने उसके कप में से आधी चाय खुद ही ले ली. वो मुझे एकटक देखे जा रहा था. मैंने उससे कहा की दोस्तों के बीच कुछ भी झूठा नहीं होता. वो सकपका गया: दोस्त? उसकी सवालिया आँखें ही बता रही थी की उसको मेरी बातों पर विश्वास नहीं हुआ था. और खास तो आज पहली बार ही मिले थे तो दोस्त बनने का तो सवाल ही नहीं उठता था.

"वो, मैं, तुमसे माफ़ी मांगना चाहती थी. मैं अपने किये पर काफी शर्मिंदा हूँ. मुझे यूँ बिना सोचे समझे, बिना सच को जाने तुमसे इस तरह से दुर्व्यवहार नहीं करना चाहिए था. आइ ऍम सॉरी."

अतीत: अरे नहीं प्लीज़. ऐसा मत सोचो. तुमने कुछ भी गलत नहीं किया. तुम्हारी जगह कोई और भी होता तो वो भी यही करता. तुम्हारा गुस्सा बिलकुल वाजिब था.

मैं: नहीं ऐसा नहीं है. तुम चाहते तो मेरी बदतमीज़ी का जवाब भी तुम उसी तरह दे सकते थे पर तुमने ऐसा नहीं किया बल्कि मेरी तकलीफ को समझते हुए मुझे दवाई की सलाह देकर चले आये. तुम सचमुच बहुत अच्छे इंसान हो.

और उसकी तरफ हाथ बढ़ाते हुए बोली: फ्रेंड्स?

और उसने भी मुझसे हाथ मिलते हुए मुस्कराहट के साथ कहा: फ्रेंड्स!

ये थी शुरुआत हमारी गहरी दोस्ती की. सबसे अलग, सबसे प्यारी दोस्ती की. और फिर जैसे तो रोज़ का नियम हो चला था. सुबह स्कूल जाने को घर से निकलते ही मुझे आवाज़ दिया करता. ये उसका नित्य क्रम बन गया था. रोज़ वो मुझसे पहले ही उठ के तैयार हो जाया करता था और मुझे बुलाने पहोंच जाता था. हमदोनो की दोस्ती हमारे घरवालों को भी पसंद थी. हमदोनो के परिवार के बीच में भी काफी घनिष्टता आ गयी थी. स्कूल में भी हमदोनो हर पल, हर जगह साथ साथ ही रहते थे. हाँ हमारे बारे में कई तरह की बातें, अफवाएं भी उड़ा करती थी. पर हमें इन सब से कोई निश्बत नहीं थी. वो मेरा बहुत ख्याल रखता था. उसे खुद से ज्यादा मेरी फिक्र हुआ करती थी. कभी कभी तो मुझे ऐसा लगता था की अगर कभी अतीत मुझसे दूर चला जायेगा तो मैं तो पूरी तरह से अपंग हो जाउंगी.

खैर, ऐसे ही हँसते, खेलते, मस्तियाँ करते हमने स्कूल फ़ाइनल पास किया और कॉलेज में दाखिला लेने का चक्कर शुरू हो गया. अतीत हमेशां से ही पढ़ाई में अव्वल रहा था इसलिए उसके अंक भी अच्छे आये थे और एक बड़ी कॉलेज में उसे तुरंत दाखिला भी मिल गया पर मैं? हमेशां की तरह कम अंको से पास होने वाली, कॉलेज में दाखिले के लिए यहाँ से वहां, एक कॉलेज से दुसरे कॉलेज धक्के खाती रही. पर अतीत ने हमेशां की तरह ही मेरे दाखिले के लिए भी बहुत मेहनत की. मुझे सबसे ज्यादा बुरा तो तब लगा जब मेरी एक छोटी सी बात के कारण उसने अपना दाखिला उस कॉलेज से वापस ले लिया था.

कॉलेजों में धक्के खाते खाते मैं मानसिक तौर पर टूट गयी थी. ऊपर से इस हकीकत का बार बार याद आना की अब अतीत का साथ भी नहीं रहेगा, मुझे पागल कर रहा था. और इसी चक्कर में एक दिन गुस्से में अतीत को जोर से डांट दिया. "तुम्हें तो दाखिला मिल गया, २ दिन बाद तो तुम अपने कॉलेज जाना शुरू कर दोगे और मैं अकेली झख मारूंगी. और जिस कॉलेज में मुझे दाखिला मिलेगा वहां तो तुम्हारे बिना ही रहना पड़ेगा. तकलीफ तो मुझे ही होगी, तुम्हें तो कोई फर्क नहीं पड़ने वाला.

मेरी ये बात सुनकर, दुसरे ही दिन जाकर उसने उस कॉलेज से अपना दाखिला वापस ले लिया. इस बात का जब मुझे पता चला तो मैंने उसे खूब समझाया पर वो इसी बात पर अड़ा रहा की जब तक मुझे दाखिला नहीं मिल जाता वो भी कही दाखिला नहीं लेगा.

और आखिर तक वो अपनी जिद्द पर अड़ा रहा. फिर हम दोनों को एक ही कॉलेज में दाखिला मिल गया. एक दुसरे के साथ के कारण से कॉलेज में हमें और कोई दोस्त बनाने की कभी ज़रुरत ही नहीं पड़ी.

सुबह घर से कॉलेज जाने से लेकर शाम को घर लौटने तक हर घडी हर पल हम दोनों एक साथ ही रहते थे. कॉलेज में भी हम दोनों के रिश्ते को लेकर कई तरह की बातें चलती रहती थी पर हमने कभी उन बातों पर गौर नहीं किया या फिर यूँ कहो हमें कोई फर्क ही नहीं पड़ता था. दोस्ती के अलावा यूँ भी हम दोनों के बीच कोई रिश्ता था ही नहीं. (ऐसा मैं मानती थी, जो मेरी सबसे बड़ी गलत फ़हमी साबित हुई बाद में).

उसकी अगर किसी चीज़ से मैं अनजान थी तो सिर्फ उसकी डायरी. वो हमेशां एक डायरी लिखा करता था पर उस डायरी को पढ़ना तो दूर छूने तक की किसी को अनुमति नहीं थी. उन किसी में, मैं भी शामिल थी. उस डायरी को हाथ लगाना मुझे भी मना था. मेरे मन में हमेशां उस डायरी के बारे में उत्सुकता बनी रहती थी की आखिर उस डायरी में वो क्या लिखता था जिसको मैं भी नहीं पढ़ सकती थी? मेरी उत्सुकता को देख कर उसने एक दिन मुझे कहा भी था की, एक दिन मेरे पीछे से इस डायरी को तुम्हें पढ़ने की इजाज़त मिल जाएगी. पर उस वक़्त उसकी इस बात का मर्म में नहीं समझ पाई थी.

फ़ाइनल इअर की परीक्षा के बाद उसकी तबियत कुछ लड़खड़ाने लगी थी. पूछने पर हर बार मुझे यही बताया जाता था की उसे भारी बुखार रहने लगा था. वो भी कभी ठीक होता तो कभी तेज़. मैं भी कभी समझ नहीं पा रही थी की क्या चल रहा है? पर जब मुझे सच्चाई का पता चला तब बहुत देर हो चुकी थी. रिजल्ट के दिन में बहुत उत्साहित थी अपना और अतीत का रिजल्ट देखने के लिए. हम दोनों ने इन परीक्षाओ में खासी मेहनत की थी.

मैं उसे बुलाने उसके घर गयी तब वो पलंग पर आँखें बंद किये हुए लेटा हुआ था. मुझे लगा की वो आज का दिन भूल गया गया और इसीलिए ही इतने आराम से सोया हुआ है. मैं उसे छेड़ने के मिजाज़ से पास गयी पर अचानक उसे किसी के अपने पास होने का आभास हो गया और उसने आँखें खोल दी. पर जैसे ही मैंने उसकी आँखों में देखा मुझे उसमे एक दर्द नज़र आया. वो अपनी नादुरस्त तबियत के कारण से यूँ लेटा हुआ था. मैंने उसे बहुत मनाया की हम कार से कॉलेज जाकर रिजल्ट देख कर जल्दी लौट आयेंगे.

पर उसने मना कर दिया.

और मुझे भी जाने के लिए मना करने लगा. उसने कहा भी की, आज के दिन मैं उसे कहीं छोड़ कर ना जाऊ और उसके पास ही बैठूं. मुझे उसकी बातों पर उस समय बहुत हँसी आ रही थी. उसके गालों पर हाथ फेरते हुए मैं उसे समझाने लगी की उसे मामूली बुखार है, वो दवाई लेकर थोड़ी देर आराम कर ले तब तक में कॉलेज से दोनों का रिजल्ट लेकर लौट आउंगी. पर वो मना करता रहा.

आख़िरकार मेरे उत्साहित चेहरे को देख कर मुझे अपनी कसम देकर जाने को कहा. मैंने भी उसकी तबियत का ख्याल रखने की हिदायत देकर दौड़ पड़ी कॉलेज की और, आने वाले एक भयानक तूफान से अंजान...

हमारा रिजल्ट बहुत ही अच्छा हुआ था. ९०% से हम दोनों उतीर्ण हुए थे. ख़ुशी के मारे तो मेरे पाँव ज़मीन पर नहीं पड़ रहे थे. हवा के साथ बात करती मैं दौड़ पड़ी अतीत के घर की और. रास्ते में उसकी प्यारी मिठाई साथ लेते गयी. उस समय मुझे जरा भी अंदाज़ नहीं था की मैं मिठाई नहीं अपने लिए ज़हर लेकर जा रही हूँ.

अतीत के घर, खुशी के मारे पागल होती, दौड़ती पहोंची मैं. पर अतीत के घर के बहार इतनी भीड़ देख कर मैं सकते में आ गई. कुछ अनहोनी घटना का अंदेशा वहां खड़े लोगों के चेहरे से साफ़ नज़र आ रहा था. अपने आपको मैं नहीं रोक पाई. दौड़ते हुए उसके घर में घुस गयी पर उसके घर के अन्दर दाखिल होते ही मेरे पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक गयी. मुझे लगा की मैं अभी गिर पडूँगी. सामने फर्श पर अतीत का शव सफ़ेद कपड़ों में

लिप्त पड़ा हुआ था. तब मुझे एहसास हुआ आज पहली बार ज़िन्दगी में उसकी बात न मान कर क्या कुछ खो दिया था अपने जीवन से. पर मैं समझ नहीं पा रही थी अचानक हुए इस हादसे का राज़. हाथों से मिठाई का डब्बा कब गिर गया था पता ही नहीं चला. आंसुओं के शैलाब को नहीं रोक पाई अपनी आँखों में. रोते रोते मैं उसकी माँ के पास पहोंची और उनकी गोद में सर रख कर हम दोनों फुट फुट कर रो पड़े. बहुत समझाया था, बहुत मना किया था अतीत ने मुझे आज उसे छोड़ कर जाने के लिए. उसकी बातों का मतलब मुझे अब समझ में आ रहा था. उसे पहले ही पता चल गया था अपने आने वाले समय के बारे में. पर उसने मुझे इस बात के भनक तक नहीं पड़ने दी.

जब मुझसे रहा नहीं गया, मैंने अतीत की माँ से पूछ ही लिया – क्या हुआ था अतीत को? ऐसा क्या हुआ था जो अतीत ने, आप सबने मुझसे छुपाया? एक मामूली बुखार से ये हो सकता है मैं नहीं मानती. आप मुझे सच सच बताओ आंटी, क्या छुपाया है आप लोगों ने मुझसे?

मैं चीखती रही, पर वो मुझे अपने गले लिपटा कर रोती रही. थोड़ी देर बाद खुद ही स्वस्थ होते हुए उन्होंने मुझे सच बताया. मेरी ज़िन्दगी का सबसे कड़वा, सबसे खतरनाक सच. वो सच जिसे सुन कर मुझे एक पल को यूँ लगा की अभी मैं भी अतीत के बगल में लेट जाउंगी. मेरी साँसे एक पल को टूटने लगी थी.

अतीत को स्क्रब टाइफस था, लास्ट स्टेज था जिसका इलाज़ होना बिलकुल नामुमकिन था. ये बात अतीत और उसके घरवालों को कई महिनों पहले ही पता चली थी. पर अतीत की जिद्द के कारण, उसकी दी हुई कसम के कारण किसी ने मुझसे कुछ कहा नहीं था. उसने अपने आखरी दिन देख लिए थे पर वो मुझे मर मर के जीने नहीं देना चाहता था इसलिए उसने अपनी इस बीमारी की मुझे भनक तक नहीं लगने दी.

सारे क्रियाकर्म, विधि विधान होने के बाद दुसरे दिन आंटी मुझे अतीत के कमरे में ले जाने लगी. मुझमें इतनी हिम्मत नहीं थी के मैं उसके खाली कमरे तक का सामना कर पाऊं. पर आंटी जिद्द कर के मुझे वहां ले गयी, यह कह कर की अतीत ने तुम्हें कुछ देने को कहा है.

कमरे में जाते ही खाली दीवारें, पलंग, उसकी पढ़ाई का टेबल, किताबों की आलमारी, रास्ते पर खुलती खिड़की जहाँ खड़े खड़े हम दोनों घंटो, आते जाते वाहनों को देख कर, दिन-ब-दिन बदलती दुनिया की बातें किया करते थे, सब मुझे खाने दौड़ रहे थे, जैसे मुझे चिढ़ा रहे हो, कह रहे हो "अब बोलो, किसके साथ तुम यहाँ दिन भर बैठे बातें करोगी? किसके पास अपने दर्द के आंसू बहाओगी? किसके साथ इस कमरे में पढ़ाई करोगी और हँसोगी, खिलखिलाओगी?"

और नहीं, बस और नहीं. मैं उस कमरे में और ज्यादा नहीं रुक पायी और बहार की तरफ ज्यूँ दौड़ने को पलटी, मुझे टेबल पर पड़ी अतीत की डायरी दिख गयी. मैं सिर्फ उसे एकटक घूरे जा रही थी पर मुझमे इतनी हिम्मत नहीं थी की मैं आगे बढ़ कर उसे हाथ में ले सकू. तभी आंटी की आवाज़ ने मेरी तन्द्रा भंग कर दी.

"प्रिशा, ये वही डायरी हैं जो अतीत हमेशां लिखा करता था, और जिसे हाथ लगाने की किसी को अनुमति नहीं थी. मुझे पता है की ये डायरी अतीत ने आज तक तुम्हें भी कभी पढ़ने नहीं दी थी, जबकि उसके दिल के करीब, हम दोनो- उसके माँ-बाप से भी ज्यादा, तुम ही थी हमेशां. अपने अंतिम वक़्त में उसने मुझे ये डायरी तुम्हें देने को कहा था. वो तुमसे कुछ कहना चाहता था, और इसलिए वो आज तुमसे उसके पास रहने की इतनी जिद्द कर रहा था.

मेरी आँखों के सामने अतीत का वो चेहरा नज़र आने लगा जब मैं उसे कॉलेज जाने के लिए मना रही थी और मुझे वो अपने पास रहने को मना रहा था, या यूँ कहूँ तो जिद्द ही कर रहा था. मैं क्यूँ नहीं समझ पायी उसकी बातों को? आज ऐसा क्या हो गया पहली बार इतने सालों में, की मैं उसकी नज़रों की बातों को नहीं पढ़ पायी? मुझे अपने आप से नफरत हो गयी. अगर आज में उसकी बात मान कर उसके पास रुक गयी होती तो? मैंने अपने दोस्त को एक, तन्हाँ, दर्द भरी मौत दे दी. मैं चीख चीख कर अतीत से माफ़ी मांगना चाहती थी. पर पीछे से मेरे कन्धों पर पड़े आंटी के हाथों ने मुझे रोक लिया. उनके मूंह से में सिर्फ इतना ही सुन पायी - "अतीत की इस डायरी में क्या लिखा है यह तो मुझे नहीं पता, पर उसकी बातों से मैंने यह महसूस किया की वो ये चाहता था की इस डायरी के कुछ पन्नो को तुम्हें पूरा करना है".

मैं रोते रोते अपने घर को दौड़ पड़ी और सीधी अपने कमरे में, पलंग पर जा गिरी. मैं जल्द से जल्द उस डायरी को पढ़ना चाहती थी. क्या था उस डायरी में जो वो चाहता था की मैं पूरी करूँ? जबकि आजतक उसने ना तो मुझे वो डायरी पढ़ने दी थी, ना ही उसमे वो क्या लिखा करता था इस बात का कभी ज़िक्र किया था.

मैंने कांपते हाथों से डायरी को खोला. पहले पन्ने को देखते ही मुझे ऐसा लगा जैसे किसी ने मेरे हाथों में बिजली का नंगा तार थमा दिया हो जिससे मुझे जोरों का झटका लगे.

"ये डायरी प्रिशा के नाम – मेरा पहला और आखरी प्यार". – पहले ही पन्ने में अतीत ने रंग बिरंगे अक्षरों में लिख रखा था.

अतीत मुझसे प्यार करता था और कभी मुझे कहा तक नहीं? और मैं उसके प्यार को केवल एक सच्ची और सबसे प्यारी दोस्ती ही समझती रही?

मेरी नज़रों के सामने इतने सालों में साथ बिताये वो सारे पल, वो सारे लम्हे आने लगे. उसका मेरा यूँ इतना ख्याल रखना, मेरी इतनी फ़िक्र करना, इन सबका कारण मुझे अब समझ में आ रहा था.

मेरी सोचने की शक्ति ख़त्म हो रही थी. दिमाग मेरा सुन्न हुए जा रहा था. दिल जैसे किसी बोझ तले दबा जा रहा था. मैंने धीरे धीरे डायरी के एक एक पन्नो को पलटते हुए पढना शुरू किया. अतीत ने हर पन्ने पर कुछ न कुछ लिखा था, पर उन तारीखों वाले पन्ने पर बहुत कुछ ही लिखा था जब जब वो मेरे साथ हुआ करता था. हर उस पन्ने पर और कुछ नहीं पर मेरे साथ बिताये लम्हों का जिक्र था. मेरे साथ होती तमाम बातों का जिक्र उन पन्नों में किया था अतीत ने. उसकी ज़िन्दगी में मैं कितना महत्व रखती थी ये मुझे आज इस वक़्त पता चल रहा था, जब वो मेरे साथ नहीं था.

पढ़ते पढ़ते २५ अगस्त यानी अतीत की मौत से २ दिन पहले के दिन के पन्ने पर आ कर अटक गयी. ये आखरी पन्ना था जिसमे कुछ लिखा था और इसके बाद, बाकी की पूरी डायरी खाली थी. पर इस पन्ने पर जो कुछ लिखा था पढ़ कर, जैसे मुझे हज़ार मेगावाट बिजली का करंट लगा हो.

"प्रिशा, मैंने तुमसे तबसे प्यार किया है जबसे मैंने प्यार को जाना है, समझा है. मैं तुम्हें स्कूल के दिनों से ही चाहने लगा था पर कभी कहने की कोशिश नहीं कर पाया. डरता था की कही इकलौती, इतनी प्यारी दोस्त को खो न बैठूं. और तुम भी तो मुझे सिर्फ अपना अच्छा दोस्त मानती थी ना? तो कहीं मेरे प्यार के इज़हार पर तुम बुरा ना मान बैठो और मुझसे दूर ना हो जाओ इसी डर से मैं आज तक तुमसे कुछ ना कह पाया. कई बार कोशिश की, तुम्हें बता सकूँ के मेरे दिल में तुम्हारे लिए कितनी मोहब्बत है, पर, नहीं कर सका. और फिर मुझे अपनी इस बीमारी का पता चला. प्रिशा, मैं हमेशां

तुमसे शादी के सपने देखा करता था. पर अब नहीं देख सकता. कैसे देखूं? कुछ दिन की तो मेरी ज़िन्दगी है. फिर? फिर तुम्हें मैं इतनी छोटी उम्र में सफ़ेद साड़ी में तो नहीं सोच सकता ना. प्रिशा, मैं मरना नहीं चाहता, मैं जीना चाहता हूँ. तुम्हारे संग ज़िन्दगी बिताना चाहता हूँ. पहले जब अकेला था, जीने की चाहत नहीं थी तो ऊपर वाला मौत नहीं दे रहा था. अब जब जीने की हसरत है तो वो ज़िन्दगी नहीं दे रहा. प्रिशा, मैं इस पन्ने पर तुम्हारी लिखावट देखना चाहता हूँ. बस एक बार तुम इस पन्ने को अपने प्यार भरे लफ़्ज़ों से भर दो, मुझे और किसी चीज़ की तमन्ना नहीं रहेगी. मेरी दुल्हन के रूप में एक बार मेरे इस कमरे में अपने कदम रखो और कोई हसरत नहीं. करोगी ना प्रिशा? मेरी तमन्ना, मेरी हसरत पूरी करोगी ना? देखो तुम ये मानती हो ना की मैंने आजतक कभी कोई फ़रमाइश नहीं की है, कभी कोई जिद्द नहीं की है? तो प्लीज़ मेरी ये फ़रमाइश, मेरी जिद्द पूरी कर दो."

प्रिशा की ये पूरी दास्ताँ सुनकर मानव की आँखों में कब आंसुओं का शैलाब उमड़ पड़ा ये खुद उसे भी नहीं पता चला. वो इस सोच में पड़ गया की वो तो सिर्फ यही समझता था की सिर्फ वो ही प्रिशा को इतनी हद्द तक प्यार कर सकता है. पर यहाँ तो अतीत जैसा दीवाना भी कोई था जो उसे शर्मिंदा कर रहा था. सारी बातें खत्म होने पर वो प्रिशा के बहते हुए आंसुओं को पोंछता हुआ बोला - "तुम कल वो

डायरी लेकर अतीत के घर जाना". इससे आगे वो और कुछ नहीं बोल पाया. एक लम्बी ख़ामोशी के बाद उन दोनों ने वहां से निकलने का फैसला किया. अलग होते हुए मानव ने प्रिशा से फिर वही बात दोहरायी. प्रिशा उसकी इस बात का मतलब नहीं समझ पाई पर वो इस वक़्त कोई बात करने की मनोदशा में नहीं थी.

अगले दिन वो बे-मन से डायरी लेकर अतीत के घर के लिए निकल पड़ी. और न चाहते हुए भी उसे जाना पड़ रहा था क्यूंकि कल रात से अभी तक मानव उसके मोबाइल पर कितनी बार ये बात याद दिलाने के लिए सन्देश भेज चूका था. वो अपनी दुखती रगों को फिर से नहीं छेड़ना चाहती थी पर पता नहीं मानव ने क्या सोच कर उसे डायरी के साथ अतीत के घर बुलाया होगा?

अतीत के घर पहोंचते ही वो सकते में आ गयी. मानव वहां पहले से ही पहोंचा हुआ था. बहार हॉल में अतीत के माँ-पापा मानव के साथ कुछ बातें कर रहे थे. आंटी की आँखें कुछ गीली थी पर चेहरे पर एक ख़ुशी भरी चमक थी. मानव के हाथ में कोई बड़ा सा पैकेट था. देखने से लग रहा था जैसे नए कपडे हो उसके अन्दर जो अभी ही कहीं से ख़रीदे गए हो.

जैसे ही उसने अन्दर कदम रखा, आंटी ने उसके पास आकर उसके माथे को चूम लिया और उसे बाहों में भर लिया. प्रिशा अवाक सी ख़ड़ी थी, वो कुछ समझ नहीं पा रही थी क्या हो रहा है? मानव ने उनदोनों को सोफे पर बैठाया और प्रिशा के हाथों में वो पैकेट थमा दिया. कांपते हाथों से प्रिशा वो पैकेट ले रही थी. "क्या है इसमें?" मानव: "जाओ अन्दर जाकर इसे पहन कर आओ प्रिशा." वो कुछ समझ नहीं पाई. मानव उठ कर उसे हाथों से पकड़ कर अन्दर कमरे तक ले गया. कमरे में जाते ही पीछे पीछे अतीत की माँ भी आ गयी और उन्होंने दरवाज़ा बंद कर दिया.

पैकेट खोलते ही उसमे से जो बहार आया, उसे देखते ही प्रिशा का सर चकरा गया. वो दुल्हन का लाल रंग का जोड़ा था जो मानव उसे पहनाना चाहता था. पर क्यूँ? वो भी यहाँ अतीत के घर में? और आंटी? वो भी इसमें साथ दे रही थी. प्रिशा बूत बनी ख़ड़ी थी पर उसकी प्रश्नों भरी आँखों को देख कर अतीत की माँ ने कहा की ये सब मानव का कहा हुआ है. वो तुमसे कुछ चाहता है. बस एक बार ये शादी का लाल जोड़ा पहन कर बहार चलो सब समझ जाओगी.

प्रिशा एक रोबोट की तरह सब सुनते हुए, सब कुछ करती रही. तैयार होकर जैसे ही वो बहार आई, बहार कोई नहीं था. आंटी से पूछने पर उन्होंने उसे अपने साथ चलने को कहा और दोनों, घर के पीछे बने बगीचे में पहोंच गये. फिर से उसकी आँखों को आश्चर्यचकित करने वाला द्रश्य मौजूद था. हवन कुंड बना हुआ था, पंडितजी मंत्र पढ़ रहे थे. वो समझ गयी की मानव शादी करना चाहता है. पर वो ये नहीं समझ पा रही थी, ये सब कुछ यहाँ ऐसे अचानक क्यूँ?

और फिर मानव की बातों ने धमाका किया. प्रिशा की शादी, अतीत की तस्वीर से करवा रहा था मानव. वो प्रिशा को अतीत की दुल्हन बना रहा था. अब प्रिशा के मन में सारी बात साफ़ हो गयी थी. वो सब कुछ समझ गयी थी, की क्यूँ मानव ने उसे अतीत के घर आने को कहा, और वो भी उसकी डायरी के साथ. जैसे ही उसने कुछ पूछने के लिए अपने होंठ हिलाए, मानव ने अपनी ऊँगली उसके होठों पर रख कर कुछ भी न बोलने का इशारा किया.

वो उसे पकड़ कर मंडप तक ले आया और उसे दुल्हन के पाट पर बैठा दिया और खुद अतीत की तस्वीर को दुल्हे के पाट पर रख कर खड़ा हो गया. पंडित से कह कर उसने प्रिशा की शादी अतीत की तस्वीर के साथ विधिवत करवाई. फेरे लेते वक़्त प्रिशा की छलकती आँखों से कोई भी अनजान नहीं था. सब प्रिशा के दर्द को समझ रहे थे. बहती आँखों के साथ उसने फेरे पुरे किये.

शादी की सारी विधियाँ पूरी हो चुकी थी. मानव ने एक हाथ में वो डायरी ली और दुसरे हाथों से प्रिशा को थाम कर वो अतीत के कमरे की और चल पड़ा. उसने अतीत की पढ़ाई के टेबल पर वो डायरी रखी और सामने पड़ी खुर्शी पर प्रिशा को बैठाया. प्रिशा एकटक उसके चेहरे को घूरे जा रही थी. कई सवाल उसकी निगाहों में थे जो मानव अच्छी तरह पढ़ पा रहा था. "प्रिशा, ये वो पल तुम्हें दे रहा हूँ जिसकी अतीत ने हमेशां चाहत की थी. उसने बहुत दर्द सहा है प्रिशा, जीते जी. इतने सालों तक वो तुमसे प्यार करता रहा पर एक बार भी तुमसे अपने दिल की बात कह ना पाया. और वही चाहत अपने दिल में लिए, हमेशां के लिए चला गया. इससे ज्यादा दर्द प्यार में और क्या मिल सकता है किसी को? और मुझे पता हैं की तुम भी तो, दिल से उसे चाहती थी, प्यार करती थी. आज मैं वही २ प्यार को मिला रहा हूँ. तो क्या हुआ अतीत खुद यहाँ हाज़िर नहीं है, पर उसकी रूह तो यहाँ हैं, इस कमरे में, तुम्हारे पास. आज तुम्हें मौका मिला है प्रिशा, कर दो अतीत के अरमान पूरे, उसकी हसरत को पूरी कर दो. दे दो उसे उसके हिस्से का प्यार. हम दोनों को तो फिर उम्र भर साथ निभाना हैं पर अतीत की आत्मा को तो जैसे तुम एक ज़िन्दगी दे दोगी प्रिशा. देखो उसकी तस्वीर को, कितना खुश लग रहा है वो तुम्हें अपने कमरे में अपनी दुल्हन के रूप में देख कर. जाओ, डायरी के उस आखरी पन्ने पर अपनी लिखावट से, प्यार के वो सारे जज़्बात लिख डालो, जिसकी चाहत अतीत ने की थी. अतीत की डायरी को पूरी कर दो प्रिशा, अतीत की डायरी को पूरी कर दो. और यह कहते ही वो प्रिशा को खुर्शी पर बिठा कमरे के बहार चला आया.

अगले पल, एक तरफ कोई अपने प्यार को शब्द दे रहा था तो दूसरी तरफ कोई अपने प्यार को, किसी और को, ख़ुशी देते देख रहा था. आंसू दोनों तरफ, दोनों की आँखों में थे, पर ये आंसू किसी दर्द, किसी तकलीफ के नहीं, पर प्यार बांटने के थे.

और दूर कहीं ऊपर आसमान में कोई बहुत खुश था. किसी को मरने के बाद अपना प्यार मिल रहा था. और उसे अब भगवान से कोई शिकायत नहीं रह गयी थी.

बस मानव और प्रिशा के लिए दुआ मांग रहा था भगवान् के सामने खड़ा अतीत.

अतीत जो अपने नाम के विपरीत हो गया था किसी के लिए. वर्तमान के साथ भूतकाल का रिश्ता जोड़ कर एक सुन्दर, अद्भुत, अकल्पनीय और नामुमकिन सा भविष्य बनाया मानव ने.

एक नामुमकिन सा सच.

अतीत – एक नामुमकिन सच

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