सत्ता

वे रिश्ते में मेरी बुआ लगती थीं |गोरी-चिट्टी मझोले कद और गुलाबी चेहरे वाली बुआ फूफा जी की दूसरी पत्नी थीं |उम्र में उनसे लगभग पंद्रह साल छोटी |मेरी सगी बुआ की मृत्यु के तत्काल बाद ही फूफा जी ने उनसे विवाह कर लिया था |एक विधुर से विवाह रूपगर्विता बुआ नहीं करना चाहती थीं पर गरीबी उनकी मजबूरी बन गईं |फूफा जी अमीर आदमी थे |सरकारी नौकरी ,खेरी-बारी ,बाग-बगीचे ,बैंक-बैलेंस क्या नहीं था उनके पास |शादी के बाद बुआ जी ने यह वैभव देखा तो बौरा सी गईं |धन का नशा उनके सिर पर चढ़कर बोलने लगा |उन्होंने धीरे-धीरे फूफा जी को सारे रिश्तेदारों से दूर कर दिया और कुछ ही वर्षों में न केवल उनकी बल्कि उनकी सारी संपत्ति की स्वामिनी बन बैठीं |

मुझे तो पता ही नहीं था कि मेरी एक बुआ भी हैं जो इसी शहर में रहती हैं और मेरे कालेज के रास्ते में जो बड़ा –सा बाग है ,वह उन्हीं का है | बाग में आम,जामुन,फालसे ,लीची ,चीकू ,बड़हड़ आदि के बहुत से पेड़ थे ,जो फलों से लदे रहते |मैं उन्हें दूर से देखकर ललचाती रहती |पर बाग की रखवाली करते बड़ी-बड़ी मूछों वाले पहलवान के डर से बाग के अंदर नहीं जा पाती थी |पर जब यह पता चल गया कि वह बाग अपनी ही बुआ का है तो मैं माँ से जिद करने लगी कि बुआ के घर ले चलो |माँ वहाँ नहीं जाना चाहती थी क्योंकि फूफा ने वर्षों से उनसे कोई संबंध ही नहीं रखा था |पर मेरी जिद से मजबूर हो गयी |बुआ का घर महल जैसा था |मुझे तो घर के अंदर जाते हुए भी डर लग रहा था |ड्राइंगरूम बहुत आलीशान था |कीमती सोफ़े और सजावट की वस्तुएँ ...सब कुछ फिल्मी ड्राइग रूम की तरह भव्य और सुंदर |किनारे एक सजे हुए दीवान पर मसनद लगाए बुआ जी अधलेटी थीं |उनके चेहरे पर एक रूआब था |उनके पास उनकी पोती बैठी थी |बुआ से बिलकुल विपरीत थी उनकी पोती |साँवली ,दुबली और अनाकर्षक लगभग मेरी ही उम्र की थी |हमने बुआ जी को प्रणाम किया तो वे मुस्कुराईं और सीधी होकर बैठ गईं |पर जब तक उन्होंने हमें बैठने को नहीं कहा हम नहीं बैठे |ऐसा लग रहा था हम किसी अजनबी के घर आए हैं और वहाँ औपचारिकता बरतना बेहद जरूरी है |वे माँ से बोलीं –बहुत दिनों बाद आई |आते रहना चाहिए न |माँ ने मुस्कुरा कर सिर भर हिलाया |शिकायत करने का न तो यह अवसर था न उनमें इसकी हिम्मत थी |बुआ मेरी तरफ मुखातिब हुईं –किस क्लास में पढ़ती हो ?

‘जी नौवीं में ....मैंने शालीनता से उत्तर दिया |

--सुंदर और समझदार हो बिलकुल अपनी माँ की तरह ...|उनके स्वर में साफ-साफ ईर्ष्या की झलक थी |तभी उनका पोता बाहर से खेल कर लौटा ,वह भी अपनी बहन की तरह ही था |मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि बुआ के पोते-पोती उनसे बिलकुल विपरीत कैसे हैं ?वो तो बाद में भैया [बुआ के बेटे ]को देखकर पता चला कि वे अपने पिता के कार्बन कापी हैं |मेरे भीतर भाभी को देखने की उत्सुकता जागी पर उनके बारे में पूछ न सकी |सोचा भीतर होंगी ....आएंगी ही |

थोड़ी देर बाद बुआ ने अपनी पोती उज्ज्वला से कहा –दाई से नाश्ता-चाय लाने को बोल दो |पोती ने वहीं बैठे-बैठे आवाज लगाई –दाई नाश्ता-चाय लेकर आ |दस मिनट बाद ही साँवले रंग की बेहद दुबली-पतली औरत चाय-नाश्ता लेकर आई |मेज पर उसने सारा सामान रख दिया और जाने लगी तो उज्जवला चिल्लाई –कोई तमीज है कि नहीं ...चाय कौन बनाएगा और सर्व कौन करेगा ?औरत थरथरा गयी और काँपते हाथों से चाय बनाने लगी |बुआ उसे आग्नेय दृष्टि से देखती रही |मुझे बहुत बुरा लग रहा था |अपनी नौकरानी से भी कोई इस तरह बात करता है क्या ?गरीब है तो क्या उसकी कोई इज्जत ही नहीं है ?मैंने माँ की तरफ देखा उनके चेहरे पर भी दुख था और आँखें छलछला आई थीं |

औरत ने चाय बनाकर सबको दे दिया और किनारे खड़ी हो गयी तो बुआ ने जहर बुझे स्वर में कहा –अब सिर पर ही खड़ी रहोगी क्या ?जाओ भीतर ...सारा काम खत्म हो गया है क्या?

औरत काँपती हुई घर के अंदर चली गयी |हम कुछ देर ही वहाँ बैठ पाए |मैं वापसी के लिए कुछ ज्यादा ही बेचैन थी क्योंकि नौकरानी के साथ बुआ और उनकी पोती के व्यवहार ने मुझे आहत कर दिया था |मैं भूल गयी थी कि बुआ के घर आने का उद्देश्य उनके बाग में जाने की इजाजत लेना भी था |

रास्ते भर मैं बड़बड़ाती रही और माँ चुप रही ,पर घर आने पर माँ ने जो बताया ,उसे सुनकर मुझपर जैसे आसमान टूट पड़ा |जिस औरत को मैं नौकरानी समझ रही थी |वह बुआ की इकलौती बहू थी |अब मुझे समझ में आया कि बुआ के पोते-पोती का चेहरा उस औरत से क्यों मिल रहा था ?वे घर के भीतर एक अंधेरी कोठरी में रहती थीं,बचा-खुचा,आसी-बासी खाती थीं और पूरे घर की बोली-कुबोली सहती थीं |बुआ ने उनके बच्चों को भी उनके खिलाफ कर रखा था |पति तो माँ के हाथ की कठपुतली था ही |वे बेचारी बच्चों के मोह में सब-कुछ सह रही थीं ,पर बच्चे ही उनसे नौकरानी से भी बदतर व्यवहार करते थे |

-माँ शायद वे जानते ही न हों कि वे उनकी माँ हैं |मैंने अपनी आशंका बताई तो माँ हँसी –नहीं ,उन्हें सब पता है |

-और भैया कुछ नहीं कहते आखिर वे उनकी पत्नी और उनके बच्चों की माँ भी हैं |

‘नहीं वह तो तुम्हारी बुआ से बहुत डरता है |कोई काम –धाम तो करता नहीं |बस उनके पैसे से अय्याशी करता है |पत्नी का पक्ष लेगा तो घर से निकाल दिया जाएगा फिर ऐशो-आराम से कैसे जीएगा ?

-माँ बुआ ने भैया की शादी ही क्यों की,जब उन्हें बहू की जगह नौकरानी ही चाहिए थी |आखिए वे भाभी से नफरत क्यों करती हैं ?

-रूप-रंग और दहेज न लाने के कारण ...|

-तो अपने बेटे और पोते-पोती को क्यों प्यार करती हैं ?भाभी उनसे तो बेहतर ही हैं |

‘स्वामिनी होने का गुमान भी है |वे अपनी सत्ता को बहू के हाथ नहीं सौंपना चाहतीं |

-पर कब तक माँ ,एक दिन तो तो वे बूढ़ी हो जाएंगी और फिर उन्हें सत्ता क्या संसार भी छोड़ना होगा,यह ख्याल उन्हें क्यों आता ?वे जो भी करें पर एक माँ और उनके बच्चों के बीच दीवार खड़ा करना कहाँ का न्याय है ?इसके लिए तो ईश्वर भी उन्हें माफ नहीं करेगा | औरत के द्वारा औरत के शोषण की यह पहली घटना मैंने देखी थी और मेरा मन विचलित था |

मैं फिर कभी बुआ के घर नहीं गयी | भैया मेरे मुहल्ले की एक बदनाम औरत के घर रात-रात भर पड़े रहते |मैं सोचती –बेचारी भाभी !अगर ये बात जानेंगी तो क्या सोचेंगी ? पर जानकार भी वे क्या कर सकती थीं |कभी-कभी भैया मेरे घर आते तो मैं उन्हें खूब खरी-खोटी सुनाती |वे अपनी मजबूरी का रोना रोते |कहते –मेरी हिम्मत नहीं कि माँ के खिलाफ बोल सकूँ |और फिर पैसे से औरत तो मिल ही जाती है ,पर माँ कहाँ मिलेगी ?वे मुझे बेहद कायर ,कमजोर और पौरूष हीन लगते |मैं सोचती कि अगर ऐसे पुरूष से मेरी शादी हुई होती तो मैं उसे छोडकर भाग जाती |

मैंने उतनी ही उम्र में समझ लिया था कि सत्ता स्त्री या पुरूष जिस किसी के भी हाथ में हो ,वह क्रूर, हृदय हीन और शोषक हो जाता है|शायद सत्ता पर हमेशा काबिज रहने की कोशिश उसे ऐसा बना देती हो या फिर यही सत्ता का असली चरित्र हो |

समय बीतता रहा |पढ़ाई के सिलसिले में बाहर चली गयी तो डाक्टरेट करके ही लौटी |आते ही पता चला कि बुआ मरणासन्न हैं | बिस्तर पर ही मल-मूत्र कर रही हैं |वह तो बहू ऐसी है कि उनकी देखभाल हो पा रहा है ,वरना नर्सों ने भी उनसे तौबा कर ली है |फ़ालिज के कारण करीब दो वर्षों से वे चल-फिर नहीं पाती थीं |पर तेवर ज्यों के त्यों थे |बहू को गरियातीं...मारतीं |जान-बूझकर बिस्तर पर मल-मूत्र करके उसे पूरे कमरे में फेंकने लगतीं |वह उन्हें ब्रश देती तो फेंक देतीं |जब वह जबरन उनका मुंह खोलकर अपनी अंगुली में पेस्ट लगाकर उनके दाँत साफ करती तो दाँत काट लेतीं |बहू ने सब कुछ सहा |

बुआ मरना नहीं चाहती थीं |उन्हें यह मलाल था कि उनके न रहने पर बहू के हाथ में सत्ता चली जाएगी |वे चाहती थीं कि या तो बहू उनसे पहले मर जाए या उनके साथ ही चले |अंतिम समय में भी उनके प्राण नहीं निकल रहे थे |वे असहाय दृष्टि से बहू के पास खड़े बेटे और पोते-पोती को देख रही थीं और उनकी आँखों से विवश आँसू बहे जा रहे थे |


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