दीपावली की तैयारी के साथ पूरा बाजार सजा हुआ है , यह एक गढ़वा नामक छोटा सा क़स्बा है, झारखंड राज्य, जहां के बाजार में निकट के ग्रामीण ज्यादा नजर आ रहे हैं, इस बार सही समय पर ऊख और धान दोनों फसल की कटाई लगभग हो चुकी है, एक वृद्ध दम्पति , साधारण पहनावे और हाथों में कई झोले लटकाए बाजार में घूम रहे हैं , वे वीरधवर गाँव के निवासी हैं , उस दम्पति में से वृद्ध महिला की नजर एक लाल कमीज़ पर टिक गई जो पंडाल नुमा कपडे की दुकान पर लटका है ,

वो फ़ौरन अपने आदमी की बांह खींच कर बोली “जी वो लाल कमीज़ सोनू पर खूब जंचेगी , क्या कहते हो ? मोल ले लें ? उस वृद्ध पुरुष ने भी अपनी नजरें घुमाई और उन्हें भी वह कमीज़ भा गई , उन्होंने उसी दूकान में ढेर सारी खरीदारी की, जिसमे अपने नातियों सोनू और छोटू के लिए कपडे लिए, उनके बेटे, बहु और दो पोते शहर में रहते हैं , और दीपावली मनाने गाँव आ रहे हैं , दाल रोटी की खातिर उन्हें अपने गाँव से दूर दुसरे शहर में जाना पड़ा.

सिंह परिवार के ये दम्पति इसी बात से बेहद खुश हैं की उनके बच्चे आने वाले हैं . खरीदारी करने के बाद वे दोनों चौराहे पर पहुंचे , यहाँ एक ट्रेक्टर खडा था , जिसमे कई गाँव वाले ट्राली में बैठे उन्ही लोगों का इन्तेजार कर रहे थे , चालक वहीँ पर खडा अपनी हथेली में तम्बाकू रगड़ते हुए उन्ही की प्रतीक्षा में था , उन्हें समीप आता देख फ़ौरन तम्बाकू गाल में दबाया और अपना लाल गमछा बाएं कंधे के पीछे लपेटकर उनकी ओर भागा और उनका थैला लपक कर फ़ौरन ट्राली में डालने लगा, और बोला “आज तो खूब देर लगा दी बाबा , लगता है पूरा बाजार खरीद लाये सोनू और छोटुआ के लिए, सिंह जी बस मुस्कुरा दिए और उसी की सहायता से ट्राली में सपत्नीक बैठ कर गाँव लौटे ,

हमेशा इसी प्रकार से गाँव के लोग बाजार आया करते हैं, कभी ट्रेक्टर में या फिर बैलगाड़ी से .

दो दिन बाद सोनू अपने गाँव के बस अड्डे पर पूरे परिवार समेत उतरा , उसके उतरते ही आस पास के लोग उनके स्वागत के लिए बढे , दो लोग पान की छोटी सी गुमटी पर खड़े थे वे तुरंत उनके समीप पहुंचे और उन लोगों का सारा सामान उठा कर सिंह साहब के घर की तरफ चलने लगे . उनके पीछे सिंह जी के सुपुत्र - अशोक सिंह जी उनकी पत्नी और दो बच्चे , रास्ते में सब कोई उनको राम राम कर रहे हैं कुशल क्षेम पूछा जा रहा है, सभी सोनू और छोटू को स्नेह दे रहे हैं, साथ ही बता रहे हैं , की चलो तुम लोगों को एक चीज दिखाएँगे जिसे देखकर बड़ा अच्छा लगेगा . वो दोनों बालक पूछने लगे- “भैया आखिर बताओ तो क्या चीज़ दिखाने वाले हो ? पूरा गाँव उन बालकों को यही बात कह रहा था , लेकिन बता कोई नहीं रहा था की क्या चीज़ है .

ये गाँव है , कोई कांक्रीट का जंगल नहीं , शुद्ध हवा , पानी और हरियाली से भरा . सोनू को गाँव आकर बड़ा अच्छा लगता , उसे ऐसा लगता है मानो उसकी सारी इन्द्रियाँ यहाँ आकर बराबर काम करने लगती है , जैसे यहाँ उसे हर चीज़ की सुगंध महसूस होती है - मिटटी और विभिन्न वनस्पतियों की . हर जगह उसे हर चीज़ शुद्धता से भरी प्रतीत होती है , यहाँ वह हर शाक-भाजी बड़े प्रेम से खाता है , शहर जाकर उसे लगता है की मेरा नाक ठीक से काम नहीं करता, उसे तो अपने दादा-दादी के साथ सोना और रात में कहानियां सुनना , चाचा जी के साथ गाँव की सैर करना बेहद पसंद है , वह अभी कक्षा आठ में और छोटू कक्षा पांच का छात्र है .

घर पहुँचते ही दादा और दादी ने अपने पोतों को हाथों हाथ लिया , उनके सर से सारी बलाएँ ली . और अपने दादा के आँगन में दोनों भाई खेलने लगे , यहाँ अधिकाँश संयुक्त परिवार हैं , और आपस में बड़े प्रेम से रहते हैं .शहर में उनका इतना बड़ा घर नहीं है , ना ही शहर वाले जानते हैं की सिंह जी के पास कितने बड़े खेत, बगीचे और विशाल भवन है . लेकिन हमारे देश में अधिकाँश कृषि वर्षा पर निर्भर है , इस लिए अशोक सिंह जी शहर में एक निजी कंपनी में काम करते हैं .

अगले दिन सुबह सुबह सोनू और छोटू अपने दादाजी के साथ खेतों की सैर पर निकले , उनके साथ कुछ और ग्रामीण भी साथ चलने लगे , ये उनके नौकर हैं जो खेतों में काम करते हैं , सभी कहने लगे “सोनू चलो अब वो चीज़ तुमको दिखाएँगे जो कल तुम्हे बताये थे , छोटू भी बहुत खुश है, दोनों भाई कौतुहल से भरे हुए ख़ुशी से इन्तेजार कर रहे हैं की कब हमें ये गुप्त खज़ाना देखने मिले, पगडंडियों से होते हुए पेड़ों से भरे रास्ते में वे खेतो की मेड पर चल रहे हैं , कई प्रकार की लम्बी घांस लांघते हुए वे अपने खेतों में घूम रहे हैं यहाँ तो कटाई हो चुकी है , पूरे खेत गंजे प्रतीत हो रहे हैं ,

कुछ दूर पर उन्हें ऊख के खेत मिले यहाँ भी कटाई हो चुकी थी , लेकिन उस विशाल खेत के अंतिम छोर पर थोड़े से गन्ने बचाए गए थे , जिन्हें सिंह जी ने अपने पोतों के लिए सुरक्षित करवा दिया था , और नौकरों को आदेश दिया था की कुछ मात्रा बचा कर रखी जाए,

बच्चों ने दूर से ही पहचान लिया और उनके भोले चेहरे ख़ुशी से खिल उठे , “अरे वाह हमारे लिए इतने सारे गन्ने, वाह , आज तो मै खूब गन्ने खाऊंगा , कहते हुए छोटू आगे की ओर दौड़ा , सोनू ने पूछा “दादाजी ये सब हमारे लिए है ?

“हाँ बेटा , ये सब तुम लोगों के लिए ही है . जी भर कर खाओ , चलो तुम लोगों के लिए ऊख कटवाते हैं . ग्रामीण लोग हंसिया लेकर आये थे , और उन्होंने ऊख काटना शुरू किया और एक मध्यम आकार का गन्ना काटकर उसके दो टुकड़े किये फिर दोनों भाई को दे दिए , दोनों ख़ुशी से नाचने लगे . जो ख़ुशी यहाँ मिल रही है वो बड़े बड़े होटलों में महंगे अंग्रेजी खाद्य पदार्थों में भी नहीं मिलती .

ढेर सारे ऊख काटकर उन्हें नौकर लोग कंधे में उठा लाये , घर आकर दोनों भाई आनंद पूर्वक गन्ना चूसने लगे, ऐसे ही आनंद-पूर्वक इस बार उन्होंने बड़ी ही शानदार तरीके से दीपावली मनाई और दस दिनों के बाद ये कह कर विदा हुए की अगले साल हम फिर आयेंगे .

hindi@pratilipi.com
080 41710149
सोशल मीडिया पर हमें फॉलो करें।
     

हमारे बारे में
हमारे साथ काम करें
गोपनीयता नीति
सेवा की शर्तें
© 2017 Nasadiya Tech. Pvt. Ltd.