मेरे बेटे की करवाचौथ

मैं जिस जगह से हूँ,वहां आदमियों का करवाचौथ का व्रत करना बहुत असामान्य बात थी। कोशिश यही रहती है कि अगर ये व्रत कोई पति अपनी पत्नि के साथ करता है तो छुप छुप कर ता फिर करता ही नहीं। और अगर किसी को पता चल जाये तो वो "जोरू का गुलाम" बन जाता है। 

हमारे यहां भी कुछ ऐसा ही हुआ। मेरी देवरानी और देवर,पिछले 5 साल से करवा चौथ का व्रत कर रहे हैं। वो लोग अहमदाबाद रहते हैं अकेले,परिवार से दूर। लेकिन इस बार किसी कारण की वजह से सास ससुर भी वहीं थे। रितेश,मेरे देवर ...सुबह से छिपते छिपाते व्रत ना रखने का ढोंग कर रहे थे। लेकिन जैसे तैसे पता चल ही गया कि उनका भी व्रत है। "अरे वाह रे! तू तो बड़ा पत्नीव्रता है रे! सासु मां ने ताना मारते हुए कहा।" बचपन में तो एक मिनट भी भूख सहन नहीं होती थी तुझे। हमेशा सर पर आकर नाचने लगता ...क्या बनाया आपने??" चिढाते हुए सासु माँ बोली।

रितेश बिना कुछ कहे झेंप गया। भव्या भी वहां से निकल ली। रितेश ने जो व्रत किया था जिसमें वो फल वगैरह लेता था लेकिन भव्या ने बिना पानी व्रत किया था। सुबह उठी ।घर का काम किया। अंश की देखरेख की। ससुर जी का खाना बनाया और फिर बाजार का कुछ काम करने चली गयी। रितेश को साथ मे चलने को कहा तो सासु मां बीच मे बोली,"कहां जाएगा इतनी धूप में बेचारा! तुम ही कर आओ भव्या बाजार का काम"

भव्या चुपचाप चली गयी। वापस आयी तो सोचा थोड़ी देर आराम कर लेगी। शाम होते होते चक्कर जैसा लग रहा था। घर लौटी तो देखा अंश ने पूरा घर बिखेर रखा है और कुछ रिश्तेदार ,जो ससुर जी के गांव के थे , आने वाले थे,करवाचौथ के मौके पर। घर मे घुसते ही ,पहले पूरा घर समेटा, फिर आने वाले मेहमानों के नाश्ते की तैयारी करने लगी। रितेश उसकी मदद करने किचन में घुसने लगा तो बोली," बेटा! तू रहने दे...भूखा है ना सुबह से...आराम से A.C. में बैठ जा।

7 बजते ही भव्या तैयार होने लगी। पूजा की सारी तैयारी की। दोनों सास बहू ने साथ में पूजा की । खाना खाने की बारी आई तो सासु मां ने तुरंत खाने की थाली जमाकर बेटे के सामने रख दी। "बेचारा सुबह से भूखा है...ना जाने कहाँ से सीख गया इतनी देर भूख काटना... केवल 2 कप चाय पर चल रहा है मेरा गुड्डु"

भव्या को अपना व्रत करना जैसे बेमानी लग रहा था। बिना पानी सुबह से दौड़ने वाली उस पतिव्रता का सूखा गला किसी का ध्यान नहीं खींच पाया। उसका थका हुआ चेहरा किसी से ये नहीं कहलवा पाया कि बैठ जा बेटा, चक्कर आ जाएंगे,तूने सुबह से कुछ नहीं खाया। रितेश का प्यार ही था जो उसे भूखे रहने की हिम्मत दिए हुए था। रितेश अपने माँ पापा को कुछ भी कहकर अपमान नहीं करना चाहता और ना ही भव्या ऐसा कुछ चाहती थी। 1 घंटा भी बिना खाये रहने वाली भव्या पूरा दिन पानी के बिना कैसे रह गयी होगी। लेकिन भूख का भी शायद अपना एक मापदंड  होता होगा। बेटे को ज़्यादा और बहू को कम लगती होगी। दाम्पत्य धर्म के मायने शायद अलग होते होंगे,पति के लिए पत्नी के लिए। या यूं कह लो, हमारा सामाजिक ढाँचा ही ऐसा बना हुआ है कि औरतों को मानो बनाया ही त्याग करने के लिए और पुरुषों का आधिपत्य स्वीकार करने के लिए और मर्दों को इस सामाजिक सेवा का लाभ उठाने के लिए।

उसने अपनी थाली खुद जमाई और खाना खा लिया। जब अंश को सुलाकर,पूरा घर का काम खत्म कर,सोने गयी,तो आंसू के मोती आंख में लिए,चैन से रितेश के सीने पर अपना सर रख कर सो गई और रितेश ने प्यार से अपना हाथ उसके सर पर फेरकर अपने चुप रहने की माफी मांग ली।

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