बातें

सचिवालय तक जाने वाली सड़क पर ऑफिस जाने वाले लोग पिछले कुछ समय से बड़े परेशान थे. कुछ दिनों से एक अजीब किस्म का पागल उस सड़क पर आतंक मचाये हुए था. गंदगी के चलते फिरते ढेर जैसे उस पागल की हरकत बड़ी विचित्र थी. वह न जाने कहाँ छिपा बैठा रहता था .अपना मौका ताक कर ऑफिस जाते हुए औरतों पुरुषों में से किसी के ऊपर अचानक एक प्रकार से टूट पड़ता था और उसके हाथ से खाने का डिब्बा झटक लेता था. फिर उसमे से खाना निकाल कर डिब्बा वहीँ सड़क पर फेंक कर तीव्र गति से भाग जाता था. कभी कभी वह यह हरकत कई लोगों के साथ दोहरा देता था. उसकी यह सारी कार्यवाही इतनी जल्दी होती थी कि सामने वाले को संभलने का अवसर न मिलता था. एक बार खाना छीन कर भागने के बाद वह उस दिन दुबारा वहां नहीं दिखता था. लोग उससे डरने लगे थे. इक्का दुक्का चलने की बजाए वे तीन चार के झुण्ड में चलने की कोशिश करने लगे थे. महिला वर्ग पुरुष साथियों के समीप से समीपतर चलते हुए तेज़ क़दमों से रास्ता नापने लगा था. पर उस पागल की चालाकी के आगे सब सावधानियां धरी रहे जाती थीं. वह इस सबके बावजूद अपना शिकार ढूंढ ही निकालता था. फिर लोगों ने बचाव का एक दूसरा रास्ता निकाला. उन्होंने अपने खाने के डिब्बे ब्रीफकेसों और मोटे मोटे थैलों में छिपाने शुरू कर दिए थे. कुछ ने तो खाना लाना ही बंद कर दिया था. ये तरकीबें कामयाब रहीं और धीरे धीरे पागल को अपने शिकार मिलने बंद हो गए. इससे उसका पागलपन एक दूसरा रूप धरने लगा. वह ऑफिस शुरू होने के समय से कुछ पूर्व उस सड़क के किनारे आकर बैठ जाता था तथा आने जाने वालों को खुलमखुल्ला गालियाँ बकता . " हरामी के पिल्लों रोटी लाओ, कुत्तों, कमीनों खाना कहाँ छिपाया है," बेचैनी से अपने हाथ पैर ज़मीन पर पटकता रहता. बहुत देर तक चीखने चिल्लाने के बाद कभी कभी रोने भी लगता, बच्चों की तरह ज़मीन पर लोटता . उस समय उसके स्वर में गुस्सा न होकर हठीला आग्रह होता , " खाना दो न, खाना दो न ....भूख लगी है, खाना दो." दोपहर में जब सब लोग लंच करके वापस चले जाते थे तो वह सड़क के किनारे से उठ कर ऑफिस के कम्पाउंड के पास आ जाता था. लंच टाइम में लोगों द्वारा फेंके गए बचे खाने के टुकड़ों को बीन कर खाते वक़्त गुस्से में डूबी उसकी तेज़ गालियाँ अन्दर तक सुनाई देती थीं. लोग उससे और भी डरने लगे थे.पुलिस में शिकायत की गयी. पुलिस वालों ने एक बार उसे डंडे मारकर वहां से भागा दिया. एक दो दिन शांति रही पर उसके बाद वह फिर उस सड़क पर वापिस आ गया और शुरू हो गया वही ," रोटी दो न, खाना दो न ...हरामियों, कमीनों....." अब वह अक्सर शाम तक भी दिखाई देने लगा था. कभी कभी कोई घबराया हुआ या उकताया हुआ व्यक्ति उसकी ओर पत्थर उछाल देता था तो उसकी गालियाँ सबकी माँ बहन की मर्यादा का उल्लंघन करने लगती थीं. लोग सुन कर नाक भौंह सिकोड़ते पर कर कुछ नहीं पाते थे सिवाय कि वहां से गुज़रते हुए अपनी चाल बढ़ा देते थे. महिलाएँ अक्सर उसकी गालियों की बौछार के बीच से गुज़रती हुई ऐसा प्रदर्शित करने की चेष्टा करती थीं जैसे उन्हें कुछ सुनाई ही नहीं दे रहा हो. इसी तरह से थोड़ा समय और इसी गाली गुफ्तार भरे माहौल में बीता और धीरे धीरे लोगों को उसकी गालियों में मज़ा आने लगा. अब वे उससे डरते न थे बल्कि जान बूझ कर उसे छेड़ने लगे. कुछ ग्रुप के लोगों में तो एक प्रकार की होड़ लग गयी थी कि कौन उसे ज्यादा से ज्यादा भड़काकर उसकी गालियाँ सुनेगा. जब वह उनकी माँ बहन को गालियाँ देता तो सब लोग ठट्ठा मार कर हँसते थे. गालियों के इस तेज़ चक्रवात के बीच से निकलती हुई महिलाओं की रफ़्तार में पहले जैसी तेज़ी तो रहती थी पर अब वहां पहले सा अनसुनेपन का प्रदर्शन नहीं था बल्कि उनके चेहरों पर दबी छुपी मुस्कान भी रहने लगी थी. सड़क पर चलते चलते यदि एक महिला की नज़र दूसरी से मिल जाती तो यह मुस्कान कुछ और गहरी हो जाती थी. पर एक दिन गज़ब तमाशा हुआ. ऑफिस जाते हुए लोगों ने देखा कि पागल सड़क के किनारे एकदम चुपचाप बैठा हुआ है. किसी से कुछ नहीं कह रहा है. लोग बेचैन होने लगे. उनसे यह चुप्पी बर्दाश्त नहीं हो रही थी. कुछ ने उसे ' पागल है बे' कह कर छेड़ने की कोशिश की पर वह चुप रहा. इससे खीझ कर किसी ने पत्थर फेंक कर उसे भड़काने का प्रयास किया पर वह फिर भी चुप रहा. उस दिन सभी दफ्तरों में सारा दिन पागल की इस अनपेक्षित चुप्पी का ही शोर मचता रहा था पर उसके बावजूद भी पूरे माहौल में जैसे एक सन्नाटा घिर आया था. लंच टाइम में तथा ऑफिस से वापस घर जाते समय हुए भी लोग इस उम्मीद में थे कि शायद वह किसी भी क्षण अपनी चुप्पी तोड़ दे पर पागल तो जैसे समाधि लगा बैठा था. दो तीन दिन और ऐसे ही चुपचाप बीत गए तो लोगों को लगने लगा जैसे कि उनकी ज़िन्दगी में नीरसता का हिस्सा बढ़ता जा रहा था . ऑफिस तक आने जाने का कुछ क़दमों का रास्ता बोझिल लगने लगा था. आते जाते वक़्त सभी एक हसरत भरी निगाह पागल पर डालते थे पर वह तो ना जाने क्या देखता था या क्या सोचता रहता था. इन्ही अकुलाहट भरे दिनों में एक दिन दोपहर के खाने के समय बाहर फिरते पांच -छह लोगों के झुण्ड में से एक को न जाने क्या सूझा. उसने पागल के कुछ पास जाकर कहा ," क्यों बे भूख लगी है? खाना खायेगा? " उदारता के इस बेमांगे प्रदर्शन से पागल शायद भौंचक्का रह गया . उसने कोई जवाब नहीं दिया बल्कि प्रश्न करने वाले को सपाट निगाहों से घूरता रहा . प्रश्नकर्ता ने अपना प्रश्न दोहराया ," अबे बोल न , खाना खायेगा? " अबकी बार पागल ने अपनी गन्दी खोपड़ी को ऊपर से नीचे सहमति के रूप में हिलाया. उसकी आँखों में भूख नाच उठी. उस आदमी ने कहा ," तो पहले गाली दे!" पागल चुप रहा. उस आदमी ने अपने खाने के डिब्बे में से कागज़ में लिपटा खाना निकाल कर पागल की ओर बढ़ाया और कहा, " ये लेना है?" पागल ने हाथ बढ़ाया तो उस आदमी ने खाना पीछे हटा लिया और बोला," साले फ़ोकट में खाना चाहता है. खाना चाहिए तो पहले गाली सुना." पागल हाथ खींच कर वैसे ही चुप बैठा रहा. झल्लाकर वह आदमी वापिस जाने के लिए मुडा ही था कि पागल की सुस्त काया में एकदम बिजली की लहर दौड़ी, उसने झपट कर खाना छीन लिया और पूरे ज़ोर से चीखा, " सूअर की औलादों, माँ के यारों....." इतने दिनों बाद गालियों भरी वह परिचित आवाज़ सुन कर एकबारगी तो दूर दूर खड़े लोग भी हक्के बक्के रह गए. पर उसके बाद तो जैसे ख़ुशी और ठहाकों के परनाले बह निकले. पागल ने दोबारा गाली देना कैसे शुरू किया यह उत्साहपूर्ण खबर सभी ऑफिसों में होली के रंगों की तरह से बिखर गयी. शाम को घर जाते हुए लोग पागल की ओर ख़ुशी भरी निगाहों से निहार रहे थे. उन्हें उनका खिलौना जो वापस मिल गया था और साथ ही एक नया खेल भी. ______________________________

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