बाबूजी बहुत उमंग में थे। आतुरता से दरवाजे पर लगा घण्टी का बटन दबाया। सोच रहे थे, उन्हें अचानक सामने देखकर बिटिया कितनी खुश होगी। कितना समय हो गया उससे मिले।
कुछ देर बाद लड़खड़ाते हुए जमाई बाबू ने दरवाजा खोला। मुँह से एक तेज बदबूदार भभका निकला। उसके हाथ में शायद कोई आभूषण था। प्रणाम की मुद्रा में जुड़े हाथ यूं ही रह गए।
“बाबू जी आप!”
बेटी पर निगाह पड़ी तो कलेजा मुँह को आ गया। तन पर मारपीट के निशान, शरीर पर आभूषण के नाम पर नाक की कील तक न थी। आँखों के नीचे पड़े स्याह घेरे अपनी कहानी खुद कह रहे थे। उसकी दशा देखकर बहुत देर तक पछताते रहे। फिर बोले, "तू चल मेरे साथ, इस नर्क में अब मैं तुझे एक पल भी नही रहने दूँगा।"
"नही बाबूजी, अब तो यही तकदीर है मेरी, जिसे आपने चुना है मेरे लिए।"
"मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई बेटी।”
"माँ-बाप से कहीं कभी कोई गलती होती है बाबूजी!" कहते हुए अश्रु उसकी आँखों से निकल कर गालों से ढलक पड़े।
“बेटी तुमने कभी बताया भी नहीं कि…"
“बताती भी तो कौन सुनता मेरी … पहले भी मेरी कहाँ सुनी आपने… विकास दिल की गहराईयों से चाहता था मुझे, पर वह जात-बिरादरी का न था… यह आपकी जात-बिरादरी के हीरे जैसे वर हैं, मुझे तो अब इसी हीरे की चमक में रिसना है जिंदगी भर!"
“नहीं बेटी, नहीं। हर भूल को सुधारा जा सकता है। इस भूल को भी सुधारेंगे हम।”

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